रविवार, 22 सितंबर 2019

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना
रजनी शर्मा 


















जन्म - १५ मार्च ६७, जगदलपुर।  
आत्मजा - स्व. सीता देवी-स्व. चुम्मन धर दुबे।  
जीवन साथी - श्री अजय कुमार शर्मा।  
शिक्षा - बी. एससी., एम. ए. (अंग्रेजी, राजनीति) एम. एड.
संप्रति - व्याख्याता अंग्रेजी सुरजन विद्यालय।
प्रकाशन - बस्तर पर १४ किताबें प्रकाशित। बस्तर पर सर्वाधिक किताब लिखने का कीर्तिमान। 
उपलब्धि - बस्तर के समाधि स्तंभ एवं भित्ति चित्र, पंच शिल्प व बस्तर, अनोखा बस्तर, अनोखे पर्व, बस्तर के लोक नृत्य अलंकार एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु चयनित। सिकल सेल पर किताब साक्षरता विभाग द्वारा नव साक्षर हेतु चयनित।
छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य मंडल उत्कृष्ट लेखन के लिए पुर्ननवा पुरस्कार २०१६, उतराखंड द्वारा एन.एम.यू.आई. साहित्य पुरस्कार २०१७, सायलेंट वर्कर छत्तीसगढ़ २०१७, संभाग स्तरीय शिक्षा श्री २०१९, राज्य शिक्षक स्मृति सम्मान २०१९, राज्यपाल उईके छत्तीसगढ़ द्वारा प्रशस्ति पत्र व ५०,००० रु. प्राप्त। वोकेशनल छात्रों को धान  व कांच के गहने बनाने का सघन प्रशिक्षण देने हेतु माननीय मंत्री श्री राजेश मूणत द्वारा ५०,००० रु का पुरस्कार।  कैरम राष्ट्रीय खिलाडी, जिला स्तरीय कैरम प्रतियोगिता (एकल, युगल) २ स्वर्ण पदक विजेता।
संपर्क - ११६ सोनिया कुंज, देशबंधु प्रेस के सामने, रायपुर (छ.ग.)
चलभाष -  ९३०१८३६८११।  
*

छत्तीसगढ़ी
परनाम के लेवईय्या तै हस
* परनाम के लेवईय्या तै हस। आसीस मंगईय्या हो माॅ मैं।। आखर ज्ञान देवईया तै हस। माॅ तोर सीस नवावथंव मैं।।
लईका हम हन माता तै हस। ज्ञान के पियास धरे हँव मैं।। जगत के पार लगैय्या तै हस। ये जुग में अज्ञानी हँव मैं।।
इंद्रावती कस पोसइय्या तै हस। चिरिया, चुनमुन कस परानी मैं।। ठोलकल गणेश संग बिराजे तै हस। शंकनी, डंकनी कस हाॅवव मैं।। उज्जर अँजोर मुख के तैं हस। तम के करिया कोठरी हो मैं।। वाणी, वीणा के धरईय्या तै हस। सप्तक पंचम सुर के पियासुहँव मैं।। भारत में जुग -जुग से तै हस। तोर पाँव पखारहुँ जीयत भर मैं।। *

हल्बी
ऐ आया, ऐ आया तुके जोहार
* ऐ आया, ऐ आया तुके जोहार। तुचो किरिया खाऊन से हजार।। आमी जम्माय आसु तुमचो पिला। पढ़बा काजे जम्माय हों इला।। नुम्को गोठ अऊर रोसरोसा बानी। तूचो परभाव के दुनिया हे जानी।। बस्तर चो प्रस्तर आमचो हे किला। जानुआय सियान नोनी अऊ पिला।। मोहरी, तुड़बुड़ी संग बाजे से बाजा। अक्षर संग मसि नाचेसे नाचा।। जम्माय झन के देऊआस तुमी ज्ञान। ऐ आया, ऐ आया तुके परनाम।। *
११६, सोनिया कुञ्ज, देशबनधु प्रेस के सामने रायपुर छग , चलभाष ९३०१८३६८११।

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विनत जन करते हैं मैया

विनत जन करते हैं मैया 
नित तेरी ही आराधना
जीवन बीते करते-करते 
सदा तेरी ही उपासना 

हम तो हैं निर्बाेध प्राणी,
तुम हो विद्या-दायिका 
युगल कर संग धवल मन से 
करते है नित याचना  

तुम हो वाणी, तुम कल्याणी 
तुम हो वीणा धारिका
सुता लड़ैती पुष्करपति की
पूरी कर दो कामना 

फैले जब तम का गरल
तू कर वरद से इसे विरल
विनय का अमिय हमेशा बरसे
शेष न देना-पावना 

वाणी की वीणा झंकृत कर   
रजनी पूनम बन जाए
गाए नित यश गान तुम्हारा 
हो निर्मल मन-भावना 
*


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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

पुरोवाक -संतोष शुक्ल

पुरोवाक 

भौजी सरसों खिल रही, छेड़े नंद बयार।
भैया गेंदा रीझता, नाम पुकार पुकार।।

समय नहीं; हर किसी पर, करें भरोसा आप।
अपना बनकर जब छले, दुख हो मन में व्याप।।

उसकी आए याद जब, मन जा यमुना-तीर।
बिन देखे देखे उसे, होकर विकल अधीर।।

दाँत दिए तब थे नहीं, चने हमारे पास। 
चने मिले तो दाँत खो, हँसते हम सायास।।

पावन रेवा घाट पर, निर्मल सलिल प्रवाह।
मन को शीतलता मिले, सलिला भले अथाह।।

हर काया में बसा है, चित्रगुप्त बन जान। 
सबसे मिलिए स्नेह से, हम सब एक समान।।
मुझमें बैठा लिख रहा, दोहे कौन सुजान?
लिखता कोई और है, पाता कोई मान।।



शीत लहर

शीत-लहर
मचा कहर

डगर-डगर
गई ठहर 

ठिठुर रही 
ग़ज़ल-बहर

एक हुईं 
साँझ-सहर

राम जपो 
आठ पहर

हिचकी
**

सुबह-सुबह
आई हिचकी
दौड़ा दिमाग
किया किसने याद?
कोई करता
अब नहीं याद
जमाने गए जब
आने पर हिचकी
लेते थे हम कई नाम 
जिस नाम पे 
रुकती थी हिचकी
कहते थे- 
उसने किया याद
अब हैं 
सभी बहुत व्यस्त
व्यस्त नहीं वे, 
सच तो ये है कि 
सब हो गए हैं 
अस्त व्यस्त। 

बचपन 
**
चंचल बचपन नटखट बचपन
रहती सदा छना छन छन छन
उछल कूद थी भागा दौड़ी
कभी रेल जाती थी दौड़ी
चेयर हो या आलू रेस  
दौड़ भाग कर  जीतो रेस
छुपन-छुपाई गिट्टी फोड़ो
गिरो पड़ो हिम्मत मत छोड़ो
इण्टरवल की घण्टी बजती
दौड़ सभी की घर की लगती
जैसे-तैसे खाना खाकर
झट विद्यालय पहुँचे जाकर
मिला न खाली यदि वो झूला
गाल हमारा फिर तो फूला
खेल कबड्डी, टूटी हड्डी
कभी न लेकिन हुए फिसड्डी
बचपन की खुशियां अनन्त
मन रहता था सदा बसंत

सपना 
बूंद बूंद से घट भर जाये
थोड़े से ही धन बढ़ जाये
साथ अगर दे दें सारे जन
पूर्ण तुरत सपना हो जाय

यमुना किनारे 
यूं चाँदनी रात में यमुना किनारे 
बैठी हैं राधा जिनके नैन कजरारे
आऊँ कैसे श्याम, हैं केश मेरे उलझे
कंघी करें श्याम, राधा मुखड़ा निहारे

जब तक आया नही अभिनन्दन
भारतीय मन करता रहा क्रन्दन
धोखेबाज रहा दुश्मन तो हरदम 
कैसे कर पाता विश्वास राष्ट्र मन

दोपदी 
सब कुछ गुरुवर को अर्पण
अब यही है सुख का दर्पण                                                                                                          

सवैया

मुझे क्यों बुलाया, नहीं बात कोई, बताई बनाया बहाना
नहीं जान पाना, कहानी जहां की, सुनाना किसी को फसाना
बहाना बनाना उसे, भूल जाना नहीं याद आना जमाना

न चाहो किसी को, न भूलो किसी को, बने ना किसी का फसाना

बुधवार, 4 सितंबर 2019

दादा भाई नौरोजी

दादा भाई नौरोजी : भारतीय राजनीति के  पितामह
दादा भाई नौरोजी दिग्गज (जन्म- 4 सितंबर, 1825 ई. मुम्बई; मृत्यु- 30 जून, 1917 ई. मुम्बई) राजनेता, उद्योगपति, शिक्षाविद और विचारक भी थे। श्री दादाभाई नौरोजी का शैक्षिक पक्ष अत्यन्त उज्ज्वल रहा। 1845 में एल्फिन्स्टन कॉलेज में गणित के प्राध्यापक हुए। यहाँ के एक अंग्रेज़ी प्राध्यापक ने इन्हें 'भारत की आशा' की संज्ञा दी। अनेक संगठनों का निर्माण दादाभाई ने किया। 1851 में गुजराती भाषा में 'रस्त गफ्तार' साप्ताहिक निकालना प्रारम्भ किया। 1867 में 'ईस्ट इंडिया एसोसियेशन' बनाई। अन्यत्र लन्दन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर बने। 1869 में भारत वापस आए। यहाँ पर उनका 30,000 रु की थैली व सम्मान-पत्र से स्वागत हुआ। 1885 में 'बम्बई विधान परिषद' के सदस्य बने। 1886 में 'होलबार्न क्षेत्र' से पार्लियामेंट के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहे। 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए। 'पावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया' पुस्तक लिखी, जो अपने समय की महती कृति थी। 1886 व 1906 ई. में वह 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' के अध्यक्ष बनाए गए।
जन्म
दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को मुम्बई के एक गरीब पारसी परिवार में हुआ। जब दादाभाई 4 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनकी मां ने निर्धनता में भी बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई। उच्च शिक्षा प्राप्त करके दादाभाई लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। लंदन में उनके घर पर वहां पढ़ने वाले भारतीय छात्र आते-जाते रहते थे। उनमें गांधी जी भी एक थे। मात्र 25 बरस की उम्र में एलफिनस्टोन इंस्टीट्यूट में लीडिंग प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय बने।

राजनीति में
नौरोजी वर्ष 1892 में हुए ब्रिटेन के आम चुनावों में 'लिबरल पार्टी' के टिकट पर 'फिन्सबरी सेंट्रल' से जीतकर भारतीय मूल के पहले 'ब्रितानी सांसद' बने थे। नौरोजी ने भारत में कांग्रेस की राजनीति का आधार तैयार किया था। उन्होंने कांग्रेस के पूर्ववर्ती संगठन 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' के गठन में मदद की थी। बाद में वर्ष 1886 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उस वक्त उन्होंने कांग्रेस की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। नौरोजी गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी के सलाहकार भी थे। उन्होंने वर्ष 1855 तक बम्बई में गणित और दर्शन के प्रोफेसर के रूप में काम किया। बाद में वह 'कामा एण्ड कम्पनी' में साझेदार बनने के लिये लंदन गए। वर्ष 1859 में उन्होंने 'नौरोजी एण्ड कम्पनी' के नाम से कपास का व्यापार शुरू किया। कांग्रेस के गठन से पहले वह सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा स्थापित 'इंडियन नेशनल एसोसिएशन' के सदस्य भी रहे। यह संगठन बाद में कांग्रेस में विलीन हो गया।[1]उन्होंने 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'कलकत्ता अधिवेशन' की अध्यक्षता की। उनकी महान कृति पॉवर्टी ऐंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया 'राष्ट्रीय आंदोलन की बाइबिल' कही जाती है। वे महात्मा गांधी के प्रेरणा स्त्रोत थे। वे पहले भारतीय थे जिन्हें एलफिंस्टन कॉलेज में बतौर प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाए दीं। उन्होंने शिक्षा के विकास, सामाजिक उत्थान और परोपकार के लिए बहुत-सी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया, और वे प्रसिद्ध साप्ताहिक 'रास्ट गोफ्तर' के संपादक भी रहे। वे अन्य कई जर्नल से भी जुडे़ रहे। वे सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेते थे। उनका कहना था कि, ‘हम समाज की सहायता से आगे बढ़ते हैं, इसीलिए हमें भी पूरे मन से समाज की सेवा करनी चाहिए।’

योगदान
दादाभाई नौरोजी ने 'ज्ञान प्रसारक मण्डली' नामक एक महिला हाई स्कूल एवं 1852 में 'बम्बई एसोसिएशन' की स्थापना की। लन्दन में रहते हुए दादाभाई ने 1866 ई. मे 'लन्दन इण्डियन एसोसिएशन' एवं 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' की स्थापना की। वे राजनीतिक विचारों से काफ़ी उदार थे। ब्रिटिश शासन को वे भारतीयों के लिए दैवी वरदान मानते थे। 1906 ई. में उनकी अध्यक्षता में प्रथम बार कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज्य की मांग की गयी। दादाभाई ने कहा "हम दया की भीख नहीं मांगते। हम केवल न्याय चाहते हैं। ब्रिटिश नागरिक के समान अधिकारों का ज़िक्र नहीं करते, हम स्वशासन चाहते है।" अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारतीय जनता के तीन मौलिक अधिकारों का वर्णन किया है। ये अधिकार थे-

लोक सेवाओं में भारतीय जनता की अधिक नियुक्ति।
विधानसभाओं में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व।
भारत एवं इंग्लैण्ड में उचित आर्थिक सबन्ध की स्थापना।

विदेश में
बंबई में एक पहचान क़ायम करने के बाद वे इंग्लैण्ड गए और वहाँ 'भारतीय अर्थशास्त्र और राजनीति' के पुनरुद्धार के लिए आवाज़ बुलंद की और हाउस ऑफ कॉमंस के लिए चुने गए। 'भारतीय राजनीति के पितामह’ कहे जाने वाले प्रख्यात राजनेता, उघोगपति, शिक्षाविद और विचारक दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मोहन के बीच उसकी स्याह सचाई को सामने रखने के साथ ही कांग्रेस के लिये राजनीतिक ज़मीन भी तैयार की थी। उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मोहन को खत्म करने का प्रयास किया। दादाभाई नौरोजी को भारतीय राजनीति का 'ग्रैंड ओल्डमैन' कहा जाता है। वे पहले भारतीय थे जिन्हें 'एलफिंस्टन कॉलेज' में बतौर प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में 'यूनिवर्सिटी कॉलेज', लंदन में उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाए दीं। उन्होंने शिक्षा के विकास, सामाजिक उत्थान और परोपकार के लिए बहुत-सी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया, और वे प्रसिद्ध 'साप्ताहिक रास्ट गोफ्तर' के संपादक भी रहे। वे अन्य कई जर्नल से भी जुडे़ रहे। बंबई में एक पहचान क़ायम करने के बाद वे इंग्लैण्ड गए और व 'भारतीय अर्थशास्त्र और राजनीतिक पुनरुद्धार' के लिए आवाज़ बुलंद की और 'हाउस ऑफ कॉमंस' के लिए चुने गए।

स्वदेश प्रेम
दादाभाई का स्वदेश प्रेम उन्हें भारत ले आया। उस समय यहां अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। ब्रिटिश सरकार ने अपनी छवि यह बना रखी थी कि वह भारत को तरक़्क़ी के रास्ते पर ले जा रही है, लेकिन दादाभाई नौरोजी ने तथ्यों और आंकड़ों से सिद्ध किया कि अंग्रेजी राज में भारत का बहुत आर्थिक नुकसान हो रहा है। भारत दिन-पर-दिन निर्धन होता जा रहा है। उनकी बातों से लोगों को यह विश्वास हो गया कि भारत को अब स्वतंत्र हो जाना चाहिए। वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने कहा कि भारत भारतवासियों का है। उनकी बातों से तिलक, गोखले और गांधीजी जैसे नेता भी प्रभावित हुए।

द ग्रैंड ओल्डमैन आफ इंडिया के नाम से मशहूर दादा भाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले एशियाई थे। संसद सदस्य रहते हुए उन्होंने ब्रिटेन में भारत के विरोध को प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ब्रिटिश संसद में थ्योरी पेश की। इस ड्रेन थ्योरी में भारत से लूटे हुए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख था। कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले प्रो. एसआर मेहरोत्रा ने बताया कि नौरोजी अपनी वाक् कला से लोगों को अचंभित करते थे। वह जब ब्रिटिश संसद के लिए सदस्य चुने गए तो उन्होंने संसद में कहा, ‘कि मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं’। वह कहा करते थे कि जब एक शब्द से काम चल जाए तो दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। एक लिबरल के रूप में वह 1892 में हाउस आफ कामंस के लिए चुने गये। वे एक कुशल उद्यमी थे। 1939 में पहली बार नौरोजी की जीवनी लिखने वाले आरपी मसानी ने ज़िक्र किया है कि नौरोजी के बारे में 70 हज़ार से अधिक दस्तावेज थे जिनका संग्रह ठीक ढंग से नहीं किया गया।
मेहरोत्रा के मुताबिक वेडबर्न डब्ल्यू सी बनर्जी और एओ ह्यूम की तरह दादा भाई नौरोजी के बिना कांग्रेस का इतिहास अधूरा है। उन्होंने जो पत्र लिखे हैं उनका संग्रह और संरक्षण किया जाना जरूरी है। वे 30 जून 1917 को दुनिया को अलविदा कह गए। नौरोजी गोपाल कृष्ण और महात्मा गांधी के गुरु थे। नौरोजी सबसे पहले इस बात को दुनिया के सामने लाए कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार भारतीय धन को अपने यहां ले जा रही है। उन्होंने गरीबी और ब्रिटिशों के राज के बिना भारत नामक किताब लिखी। वह 1892 से 1895 तक ब्रिटिश संसद के सदस्य रहे। एओ ह्यूम और दिनशा एडुलजी वाचा के साथ मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता है। मनेकबाई और नौरोजी पालनजी डोर्डी के पुत्र दादा भाई नौरोजी का जन्म एक गरीब पारसी परिवार में चार सितंबर 1825 को गुजरात के नवसारी में हुआ। वे शुरुआत से काफ़ी मेधावी थे। वर्ष 1850 में केवल 25 वर्ष की उम्र में प्रतिष्ठित एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए। इतनी कम उम्र में इतना सम्मानजनक ओहदा संभालने वाले वह पहले भारतीय थे।

बाल कविता : तुहिना-दादी

बाल कविता :
तुहिना-दादी
संजीव 'सलिल'
*
तुहिना नन्हीं खेल कूदती.
खुशियाँ रोज लुटाती है.
मुस्काये तो फूल बरसते-
सबके मन को भाती है.
बात करे जब भी तुतलाकर
बोले कोयल सी बोली.
ठुमक-ठुमक चलती सब रीझें
बाल परी कितनी भोली.
दादी खों-खों करतीं, रोकें-
टोंकें सबको : 'जल्द उठो.
हुआ सवेरा अब मत सोओ-
काम बहुत हैं, मिलो-जुटो.
काँटें रुकते नहीं घड़ी के
आगे बढ़ते जायेंगे.
जो न करेंगे काम समय पर
जीवन भर पछतायेंगे.'
तुहिना आये तो दादी जी
राम नाम भी जातीं भूल.
कैयां लेकर, लेंय बलैयां
झूठ-मूठ जाएँ स्कूल.
यह रूठे तो मना लाये वह
वह गाये तो यह नाचे.
दादी-गुड्डो, गुड्डो-दादी
उल्टी पुस्तक ले बाँचें.
*********************

कहानी पितर डॉ. पुष्पा जोशी

कहानी
पितर
डॉ. पुष्पा जोशी


मुझे लगता है कौए को हमेशा हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है । उसकी काँव-काँव की कर्कश आवाज जब भी कानों पडती है लोगों का मुँह बन जाता है और बरबस मुँह से निकल जाता है, कहाँ से टपक गया कलमुँहा ?? किसी के सिर पर बैठ जाए तब तो पक्का अपशकुन .......कहते हैं जिसके सिर पर बैठता है उसकी मृत्यु निश्चित .... हमारे समय में तो रिश्तेदारों को तार
भिजवा दिया जाता था कि फलाना परलोक सिधार गया और जब तक वे रो-धोकर गोलोकवासी के घर जाने का प्रोग्राम बनाते थे तब तक दूसरा तार पहुँच जाता था कि सब ठीक-ठाक है……नासपिटे कौए के कारण आपको परेशान होना पडा .... सिर पर बैठ गया था। हमारे शास्त्रों में तो कौए की भर्त्सना कुछ इस प्रकार की गई है‌ ‌–

काकस्य गात्रं यदि काञ्चनस्य , माणिक्यरत्नं यदि चञ्चुदेशे।
ऐकैकपक्षे ग्रथितं मणिनां ,तथापि काको न तु राजहंस:

अर्थात् कौए का शरीर यदि सोने का हो जाए ,चोंच के स्थान पर माणिक्य और रत्न हो जाए, एक-एक पंख में मोतियों का गुम्फन हो तो भी कौआ राजहंस तो नही हो जाता।

यही कौआ हरकारे का काम भी करता आया है, जिस किसी की मुँडेर पर सुबह-सुबह बैठकर आवाज दे तो समझ लीजिए घर में कोई मेहमान आने वाला है। सबसे अधिक सम्मान तो उसे पितृपक्ष में प्राप्त होता है। हमारे पितर कौए के रूप में ही पूजे जाते हैं।

आज हरिया कौए के सभी मित्र पितृपक्ष में अपने–वंशजों की बाट जोह रहे हैं। उनके बच्चे इन दिनों उनका श्राद्ध करते हैं, उन्हें तृप्त करने के लिए खीर-पूडी और उनके इप्सित खाद्यों का भोग लगाते हैं। वर्ष में सोलह दिन शास्त्रों में पित्रों के लिए सुरक्षित किए गए हैं। इन दिनों देव भी सो जाते हैं। पितरों और उनके बच्चों के बीच कोई भी दख़ल देने वाला नही होता। याने जीते जी माता-पिता को खाना नही खिलाया तो पितृपक्ष में उन्हें तृप्त करना ही होगा। हरिया की मृत्यु पिछले वर्ष हुई थी। उसके सामने पहला पितृपक्ष पडा है।

हरिया जब मनुज योनि में था तब अपने पूर्वजों का खूब विधि –विधान से श्राद्ध किया करता था। माता-पिता की सेवा को उसने परम कर्तव्य माना था। जब तक माता-पिता जीवित रहे पहले उन्हें खिलाता फिर स्वयं खाता। रात में जब-तक उनकी चरण-सेवा न कर लेता खटिया न पकडता। पत्नी भी साध्वी रूपा सास-ससुर की सेवा पूरे मनोयोग से करती थी। बच्चों में भी उनके ही संस्कार पडे। परंतु जैसे-जैसे वे बडे होने लगे मनमानी करने लगे। पढाया-लिखाया अच्छे पद प्राप्त हुए, अपनी मर्जी से शादी-ब्याह किए। पढी-लिखी बहुएँ घर में आ गईं थीं। घर के बडे-बूढों में अब खोट निकलने लगे। रीति- रिवाजों की दुहाई दी जाने लगी। परम्पराएं, शास्त्रों की बातें अखरने लगी। हरिया बच्चों को समझाने की कोशिश करता तो सब उसकी बातों को काट
देते । धीरे-धीरे वह चुप रहने लगा। बहुएँ नौकरी पर जाती तो मेरी पत्नी घर का सारा काम करती ,बच्चे संभालती। ढलती उम्र में वो भी जल्दी ही थक जाती, मैं भी अंदर-बाहर कम कर पाता । बच्चों को लगता था हम मुफ़्त की रोटियाँ तोड रहे हैं।कभी-कभी बच्चे सुना दिया करते थे, इतने बूढे नही हो गये हैं आप कि आप से कुछ काम ही नही हो पा रहा है।

मैं सन्न रह जाता, हमने इस प्रकार की बात कभी अपने माता-पिता से नही की थी। एक बार छुट्टी के दिन चार बजे तक हमें खाने के लिए नही पूछा। मैंने कहा, “बेटा तुम्हारी माँ को भूख लग रही है। “ बहू ने ताना मारा 'काम के न काज के दुश्मन अनाज के' भीतर तक तडप कर रह गया था मैँ। बाहर से एक अमरूद वाला निकला तो चोरी से आधा किलो अमरूद लिये और चोरी से ही हम दोनों बुढ्ढे–बुढिया ने खाये। फिर तो यह सिलसिला ही चल निकला, मन होता खाना देते मन नही होता तो नही देते। माँगने पर दो टुकडे हमारे आगे डाल दिये जाते, साथ में ताना भी दिया जाता बाबूजी! इस उम्र में आपकी जीभ चटोरी हो गई है। क्या करता ऐसा कुछ नही था पास, जिसे लेकर बुढिया के साथ दूर निकल जाता। रूपया-पैसा सब बच्चों की पढाई पर खर्च कर दिया। यही सोच रही हमेशा पूत-कपूत तो का धन-संचय ,पूत‌‌ – सपूत तो का धन संचय बच्चों से बडी भी भला कोई पूँजी होती है इसलिए कभी पैसे को पूँजी नही बनाया। लोग समझाते थे थोडा बुढापे के लिए भी रख ले हरिया! पर मैंने किसी की भी एक न सुनी। ‘ मेरे बच्चे बहुत संस्कारी हैं उन्होंने देखा है हम किस प्रकार अपने माता-पिता की सेवा करते हैं’ कहकर उन्हें भगा देता।

दूर से दादा जी को उडकर आते हुए देखा। ‘अरे हरिया ! कैसा है? क्या कर रहा है?‘‘

'कुछ नही दादाजी! बस बैठा हूँ, आस लगाये बैठा हूँ शायद घर से कोई आये। घर के बच्चे दिख जाएं। दादाजी! आप कैसे हैं ?अभी-अभी पोते आकर खीर-पूडी खिला गए हैं, तृप्त हूँ। दादा जी ने बताया।

अरे! तेरा तो अभी पहला साल ही है, देख शायद कोई आ जाए। मुझे लगा
जीते जी तो मुझे भरपेट खाना दिया नही अब क्या देंगे? तब तक एक कौवे मित्र ने बात छेड दी। ‘मेरे घर में सभी मेरा सम्मान करते थे। समय-समय पर खाना-पानी , दवाई, कपडे-लत्ते सभी बातों का ध्यान रखते थे। लेकिन जब से मैं मरा हूँ कमबख़्त कोई एक ग्रास भी खाने का डालने नही आया। सोचते होंगे जीते जी कर तो दिया। वे भी अपनी जगह सही हैं । सदा खुशहाली का आशीर्वाद देता हूं अपने बच्चों को।

एक अन्य ने बताया उसके तो बच्चे ही नही थे पर एक पडोसी ने पिता की तरह मान-सम्मान दिया। कभी महसूस ही नही हुआ कि मेरी कोई संतान नही। मरते समय सब उसके नाम कर दिया। बहुत खुश है वह, मैं भी खूब आशीष देता हूँ उसे। जिस प्रकार मेरे कौवे मित्र अपनी बातें बता रहे थे मुझे लगा इससे तो मैं बेऔलाद ही होता तो अच्छा था।

अरे! ये क्या मेरे बेटे ब्राह्मण देव के साथ चले आ रहे हैं। हाथों में खाने-पीने का बहुत सा सामान दिखाई दे रहा है। ‘बेटा! तुम्हारे पिताजी का कर्मकाण्ड करते हुए तुम लोगों से कोई भूल हो गई है जिस कारण तुम्हारे पिता तुमसे नाराज हैं और तुम दोनों भाईयों को अनिष्ट का सामना करना पड रहा है।‘‘

पर अब तो सब ठीक हो जाएगा न?’ बडे बेटे ने पूछा।

‘हाँ-हाँ सब ठीक हो जाएगा यजमान’ माता-पिता अपने बच्चों का बुरा नही सोचते ‘ ब्राह्मण देव कहा।‘

‘पर पंडित जी हमने तो सदा माँ-बाबूजी का आदर किया, भरपेट और मनचाहा भोजन दिया, प्रत्येक कार्य उनकी ही सलाह से किया। फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है। जबसे पिताजी का देहांत हुआ है, घर में दुख का प्रवेश हो गया, खुशियों को तो जैसे हमारे घर का पता भूल ही गया है।‘ छोटा बेटा बोल रहा था।

कोई बात नही बेटा! हो जाता है कभी.... गलती किसी से भी हो सकती है । पितरों को तृप्त तो करना ही होगा। प्रतिवर्ष श्राद्ध कर दिया करो, प्रसन्न हो जायेंगे पितर देव । ब्राह्मण देव समझा रहे थे।

मैं देख रहा हूँ मेरे बेटों ने, विधि-विधान से स्नान, दान, स्वधा और फिर भोज्य पदार्थों का तर्पण किया .... अच्छा लग रहा था। बुढिया और मेरी रुचि के खाद्य पदार्थ, वस्त्रादि बडे प्रेम से अर्पित किए गए। मैं सोच रहा था, तब नही दिए अब सही। आगे भी देने का वादा किया है। मैं बहुत प्रसन्न था। उन शास्त्रों को भी लाखों धन्यवाद दे रहा था जिनके कारण मैं और मुझ जैसे अनेक लोग तृप्त होते हैं । मैं अपने छल-दंभ से भरे पुत्रों को सौ-सौ अशीष देता हुआ प्रार्थना कर रहा था कि हे परमात्मा! आज की पीढी को जीते जी माता-पिता का सम्मान करना सिखा, ढकोसलों से दूर रख, उन्हें श्राद्ध की नही श्रद्धा की जरूरत है।
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