रविवार, 30 सितंबर 2018

समीक्षा- समय की दौड़ में

कृति चर्चा:
'समय की दौड़ में' नवगीत सबसे आगे 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति विवरण: समय की दौड़ में, नवगीत संस्करण, बृजनाथ श्रीवास्तव, प्रथम संकरण, २०१७, आई एस बी एन ९७८-९३-८५८१२-३०-९, आकार २२ से. x १४ से., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १२०, मूल्य ३००/-, ज्ञानोदय प्रकाशन, ६-७ जी मानसरोवर कोम्प्लेक्स, पी, रोड, कानपूर, २०८०१२, चलभाष ९४१५१२९७७३, गीतकार संपर्क: २१ चाणक्यपुरी, ई श्यामनगर, नयी पी. ए. सी. लाइन, कानपुर २०८०१५, चलभाष ९४५०३२६९३० / ९७९५१११९०७, ईमेल sribnath@gmail.com]
*
                    मानव और ध्वनि का साथ आदिकालीन है। नाद का श्रवण, स्मरण और अनुकरण ही आदि मानव को अन्य  जीव-जन्तुओं से भिन्न और सबल बनाने का कारण हुआ। कालांतर में श्रुति-स्मृति जनित वाचिक काव्य को नया आयाम दिया ध्वन्यांकन ने जिससे लिपि का विकास हुआ। कलम, रंग और पटल के संयोजन ने ध्वनि को स्थिर तथा स्थाई कर दिया। नादाधारित वाचिक परंपरा में रस, तथा लय के समावेश ने गीत गोविन्द तक रचनाकार-पाठक गोपों की पहुँच आसान कर दी। विश्ववाणी हिंदी हे इन्हीं विश्व की किसी भी भाषा में गद्य की तुलना में पद्य न केवल अधिक रचा-पढ़ा गया अपितु याद भी अधिक रखा गया। स्थाई (मुखड़ा)-अंतरा, तुकांत के शिल्प तथा एक विचार  के इर्द-गिर्द रची गयी पद्य रचना लोकगीत, जन गीत, गीत तथा नवगीत के पथ पर पग रखती हुई जन-मन का नैकट्य तथा सराहना पाकर कल से आज तक लोक-मन पर राज कर रही है और आज से कल तक करती रहेगी। गीति विधा के समसामयिक समर्थ हस्ताक्षरों में श्री बृजनाथ श्रीवास्तव का भी शुमार है। समय की दौड़ में ५२ सार्थक-समर्थ गीतों का संकलन है। 
                    गीत को प्रगतिवाद के नाम पर छंदहीन कविता में बदलने की कोशिश ने कथ्य के शब्द-चित्रों को जन सामान्य की समझ और बूझ दोनों से दूर कर निष्प्राण कर दिया। जन उदासीनता को सही परिप्रेक्ष्य में न समझकर खेमेबाज शब्दशिल्पियों ने गीत के मरण का शंखनाद कर दिया किन्तु गीत-विमुख घोषणाकर्ता ही काल कवलित हो गए और गीत नव भाव-भंगिमा के साथ पुन: जनमन के सिंहासन पर नवगीत की संज्ञा और विशेषण सहित आसीन हो गया।  'समय की दौड़ में' नवगीत सभी काव्य विधाओं का नायक होकर जन-मन की अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर रहा है। श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार अवध बिहारी श्रीवास्तव जी ठीक ही कहते हैं "कविता में भाषागत प्रयोगों के चक्कर में कविता को दुरूह और अति बौद्धिक बनाकर उसे पाठक की समझ से दूर कर दिया गया है।" नवगीत के सामने भी यही चुनौती है। एक वर्ग उसे प्रगतिवाद के खूंटे से बांधे रखना छठा है तो दूसरा विशिष्ट भाव-भंगिमा के पिंजरे में कैद कर आम आदमी से दूर कर वर्ग विशेष की संपदा बनाना चाहता है। बृजनाथ जी के नवगीत इन दोनों समूहों से दूर आम आदमी की अनुभूति को अनुभव कर     

doha dahej

दोहे दहेज़ पर
*
लें दहेज़ में स्नेह दें, जी भर सम्मान
संबंधों को मानिए, जीवन की रस-खान
*
कुलदीपक की जननी को, रखिए चाह-सहेज
दान ग्रहण कर ला सके, सच्चा यही दहेज
*
तीसमारखां गए थे, ले बाराती साथ
जीत न पाए हैं किला, आए खाली हाथ
*
शत्रुमर्दिनी अकेली, आयी बहुत प्रबुद्ध
कब्ज़ा घर भर पर किया, किया न लेकिन युद्ध
*
जो दहेज की माँग कर, घटा रहे निज मान
समझें जीवन भर नहीं, पाएँगे सम्मान
*
संजीव
३०-९-२०१८
http://divyanarmada.blogspot.in/

amrut lal vegad

चरित चर्चा: 
सादा जीवन उच्च विचार के पर्याय अमृतलाल वेगड़
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*



[लेखक परिचय: जन्म २०-८-१९५२, मंडला, शिक्षा डी.सी.ई., बी. ई., एम.आई.ई, एम.ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, संप्रति पूर्व कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग, अधिवक्ता म. प्र. उच्च न्यायालय,  संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, सभापति अभियान जबलपुर, चेयरमैन इन्डियन जिओ टेक्निकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर, प्रकाशित कृतियाँ: कलम के देव (भक्ति गीत), लोकतंत्र का मकबरा तथा मीत मेरे कविताएँ,  काल है संक्रांति का तथा सड़क पर नवगीत संग्रह, कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य, भूमिका लेखन ४३ पुस्तकें, संपादन १३ संकलन, १६ स्मारिकाएँ, ८ पत्रिकाएँ,  सहलेखन ५ पुस्तकें, शोधलेख १५ आदि, उपलब्धि: १३ राज्यों की संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान, १२ भारतीय भाषाओं में लेखन तथा अनुवाद, हिंदी छंदशास्त्र न विशेष कार्य ३५० नए छंदों का सृजन। संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१, ८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.कॉम
                      एक चित्रपटीय गीत है "जिओ तो ऐसे जिओ, जैसे सब तुम्हारा है / मरो तो ऐसे कि जैसे, तुम्हारा कुछ भी नहीं" इन पंक्तियों में अंतर्निहित जीवन सूत्र वही है जिसे कबीरदास "यह चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ के मैली कीन्हीं चदरिया / दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया" कहकर व्यक्त करते हैं। वर्तमान भौतिकतावादी समय में जब व्यक्ति को स्वार्थ के और कुछ दिखाई नहीं दे रहा, नैतिक मूल्यों का सतत पतन हो रहा है क्या कोई व्यक्ति ऐसा जीवन जी सकता है? यह प्रश्न जिन किशोरों और युवाओं के मन में उठे उन्हें संस्कारधानी जबलपुर निवासी नर्मदा परिक्रमावासी और नर्मदा साहित्य के प्रणेता रहे नर्मदापुत्र अमृतलाल वेगड़ के जीवन को जानना चाहिए। वे (मैं भी) भाग्यवान हैं जिन्हें वेगड़ दादा को जानने और उनसे मिलने का अवसर मिला। भविष्य में वेगड़ जी के साथ गुजारे पलों को लोग वैसे ही याद करेंगे जैसे बापू के साथ बीते दिनों को करते हैं। अमृतलाल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी, बहुभाषी (हिंदी, गुजराती, अंग्रेजी), कोलाज चित्रकार, पर्यटक, संस्मरण लेखक, कुशल वार्ताकार, प्रभावी वक्ता, प्रकृति-प्रेमी, निरभिमानी, सरल, मितव्ययी व मृदुभाषी होने के साथ-साथ उदारमना सहृदय मानव भी थे। उन्होंने नर्मदा परिक्रमा यात्रा करके नर्मदा के आंचल में मौजूद जैव विविधता को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत कर नर्मदा के पर्यावरण की रक्षा हेतु सतत काम किया। आरंभ में लोग उनकी अनदेखी करते किंतु वे गुरुदेव की 'एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!' नीति का अनुसरण कर निरंतर आगे बढ़ते गए. अंतत: आलोचक ही उनके प्रशंसक बन गए।   

सफल नहीं सार्थक 
                      सनातन सलिला नर्मदा तट स्थित संस्कारधानी ( पूज्य विनोबा भावे द्वारा प्रदत्त विशेषण) जबलपुर में कच्छ गुजरात से आ बसे मेस्ट्री परिवार में ३ अक्तूबर १९२८ को जन्मे तरुण अमृतलाल ने १९४८ से १९५३ के मध्य विश्व विख्यात चित्रकार आचार्य नन्दलाल बोस से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित शांति निकेतन, विश्व भारती विश्वविद्यालय में चित्र कला की शिक्षा प्राप्त की। पाठ्यक्रम पूर्ण कर वापिस लौटते समय उन्होंने आचार्य बोस से जीवन का उद्देश्य पूछा। गुरु ने कहा "जीवन को सफल नहीं, सार्थक बनाना।" गुरु की बात उन्होंने गाँठ बाँध ली और आजीवन सार्थकता को वरीयता दी। म. गाँधी के अहिंसा सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने छात्र जीवन में एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत 'अहिंसा टु बैटलफील्ड" लिखा जिसे कालांतर में 'गाँधी गंगा' शीर्षक से प्रकाशित किया। १९७७ से २०१० तक उन्होंने लगभग ४०० किलोमीटर पदयात्रा कर नर्मदा परिक्रमा संबंधी  संस्मरण लेखन किया जिसे 'सौंदर्य की नदी नर्मदा', 'तीरे-तीरे नर्मदा', तथा 'नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो' शीर्षकों से तीन पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया। उन्होंने इसी मध्य नर्मदा पर निर्मित कोलाज व रेखाचित्रों की पुस्तक  'नर्मदा रेखांकन' शीर्षक से प्रकाशित कर अपने कला-गुरु आचार्य नंदलाल बोस को समर्पित की। २००४ में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और मध्य प्रदेश साहित्य पुरस्कार से सम्मनित किया गया। गुजराती भाषा में 'सौदाराणी नर्मदा यात्रा' और 'परिक्रमा नर्मदा मायानी' के लिए  उन्हें कई सम्मान और अपार लोकप्रियता मिली। 

साथी हाथ बढ़ाना
                       मेरा सौभाग्य है कि वेगड़ जी का आशीर्वाद मुझे अनेक बार मिला, घंटों उनसे चर्चाएँ हुईं। १९९४ में सड़क दुर्घटना में घायल होकर जबलपुर में डॉ. प्रमोद बाजपेई द्वारा की कई शल्यक्रिया में संक्रमण होने के बाद बोम्बे हॉस्पिटल में डॉ. ढोलकिया के निर्देशन में डॉ. झुनझुनवाला तथा डॉ. पचौरी द्वारा पुन: शल्य क्रिया में बाएँ पैर के कूल्हे का जोड़ कटने पर मैं लगभग ३ माह बाद बैसाखियों पर चल पाया। धीरे-धीरे निवास के समीप रानी दुर्गावती उद्यान में ओशो को संबोधि प्राप्ति का माध्यम बने मौलश्री वृक्ष के तले बैठकर व्यायाम और काव्य लेखन करता। उन दिनों एक पैर से ६०% विकलांगता को लेकर मैं अभियंता कार्यस्थल पर काम कैसे कर सकूंगा, कैरियर पर विपरीत प्रभाव होगा आदि चिंताएँ घेरे रहती थीं। प्रात: भ्रमण पर बहुधा वेगड़ दादा सपत्निक मिलते हाल-चाल पूछते और कुछ मनोविनोद कर मेरी मनोव्यथा दूर करते। उनके चलने की गति बहुत तेज थी, कभी-कभी बा पीछे रह जातीं तो वे रुककर किसी परिचित से गपशप करते ताकि बा साथ आ जाएँ, फिर उन्हें कुछ आगे निकल जाने देते और खुद तेजी से चलकर बा के साथ जा मिलते। जब मुझे एक चित्रपटीय गीत याद आता 'साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, सब मिल बोझ उठाना' वेगड़ दम्पति आगे बढ़ जाते, मैं बैसाखी पर धीरे-धीरे साधना (धर्मपत्नी प्रो. डॉ. साधना वर्मा) के साथ अपना भ्रमण-व्यायाम करता।                      

पुस्तक संस्कृति के अग्रदूत 
                       कई बार बाहर से आए मित्र वेगड़ जी से मिलाने आग्रह करते और मैं उन्हें लेकर समय-असमय दादा के पास चला जाता। असाधारण प्रसिद्धि, लोकप्रियता और सम्मान प्राप्ति के बाद भी उनकी निरभिमानता विस्मित करते थी। वे यथाशीघ्र आकर आगंतुकों से मिलते, उनसे वार्तालाप करते, उनके प्रश्नों के उत्तर देते, और माँग होने पर अपना साहित्य भी उपलब्ध कराते। उनसे साहित्य बिना मोल न देने का पाठ मैंने सीखा। वे किताब देने के पूर्व उसका दाम अवश्य लेते और यह वचन भी कि उस किताब का सदुपयोग किया जाएगा। 'सड़क पर हीरा पड़ा हो तो आदमी ठोकर मारकर नाली में डाल देता है किंतु कंचा खरीदता है तो सम्हालकर जेब में रखता है', वे कहते थे। 'खरीदेगा तो पढ़ेगा, मुफ्त में मिलेगी तो फेंक देगा'।  उनकी यह बात मैंने अनेक बार सत्य होते देखी। कादंबिनी सम्पादक राजेन्द्र यादव नगर पधारे तो अनेक साहित्यकारों ने उन्हें अपनी कृतियाँ भेंट कीं, यादव जी गए तो वे सभी कृतियाँ फूल मालाओं के साथ मुँह बिसूरती पड़ी थीं। तब मुझे वेगड़ दादा की बात का मर्म समझ में आया। वे अपने मूल्यों से खुद को भी मुक्त नहीं रखते थे। वे पुस्तक मुफ्त न देने के साथ यथासंभव पुस्तक मुफ्त न लेने के भी कायल थे। 
                      
वही लो जो काम का हो                       
                      मेरा नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' छपा तो मैं उन्हें प्रति भेंट करने गया, उन्होंने देखा, कुछ पन्ने पलटे, कहा जो रचनाएँ पसंद हैं सुनाओ। पुस्तक रख ली, कुछ गप-शप, स्वल्पाहार पश्चात चलने को उठा तो बोले 'मेरा एक काम कर दो. यह पुस्तक अमुक जी (एक विख्यात वरिष्ठ-रचनाकार) तक पहुँचा दो। उन्हें तो जानते होगे। मैंने बताया कि दरस-परस मात्र है निकटता नहीं तो बोले 'बहुत बढ़िया व्यक्ति हैं, मिलोगे तो आनंद आएगा। उन्हें बताना मैंने भेजी है, वे इसके साथ न्याय कर उत्तम समीक्षा लिखेंगे। मैं तो गीत जे जुदा नहीं हूँ। यहाँ किताब का उपयोग नहीं हो पायेगा, मैं भी ले जाकर उन्हें ही दूँगा, तुम जाओगे तो 'एक पंथ दो काज' उनसे समीपता भी होगी अच्छा रुको, चलता हूँ, बहुत दिनों से मिला नहीं हूँ, मेरी भी भेंट हो जाएगी।' मैं ठहर गया, वे वस्त्र बदलकर आए। मैं दरवाजे से निकल कर सड़क तक आया, पीछे-पीछे दादा थे, अचानक उन्होंने मुख्य द्वार का सहारा लिया, देखते ही मैंने उन्हें सम्हाला। कुछ क्षण उन्हें सम्हालने में लगे, बोले 'अचानक चक्कर आ गया, आज जाना नहीं हो सकेगा। तुम्हीं चले जाओ।' मैंने उन्हें अंदर बगीचे तक ले जाकर कुर्सी पर बैठाया, बा को आवाज देकर बुलाया और दोनों को प्रणाम कर बिदा ली, तब क्या पता था कि यही अंतिम भेंट हैं।    

जहाँ चाह, वहाँ राह  
                      उनकी पहली पुस्तक 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' चर्चा में आई तो मैं पुस्तक लेने दादा के के पास चला गया। वह पहली ही भेंट थी। तब वे बैठक के कमरे में आगंतुकों से मिला करते थे। नर्मदा परिक्रमा करने के सम्बन्ध में पूछने पर वेगड़जी ने बताया कि प्रकृति और सौन्दर्य से प्रेम की प्रकृति उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी। वे अपने स्थानीय कलानिकेतन संस्थान में कला की शिक्षा देते थे, बीच-बीच में चित्र बनाने के लिये नर्मदा तट के आसपास जाते रहते थे। पहले आसपास के घाटों पर, फिर गावों में  रेखांकन के लिए के लिये दृश्य  देखने जाते थे। वहीं नर्मदा परिक्रमा करते लोग मिलते, बातचीत होती। धीरे-धीरे मन होने लगा कि नर्मदा की परिक्रमा की जाए लेकिन कोई न कोई बाधा आ ही जाती। अंतत:, पचास की उमर के आसपास १९७७ से वे नर्मदा-यात्रा आरंभ कर सके और यह क्रम एक दशक (१९८७) तक चला। सामान्य परंपरा पूरी यात्रा एक साथ करने की है कितु यह संभव न होने पर वेगड़ जी ने टुकड़ों-टुकड़ों में परिक्रमा करना आरंभ कर दिया। “सौंन्दर्य की नदी नर्मदा” में उन्होंने लिखा है: 'कभी-कभी मैं अपने आप से पूछता हूं, यह जोखिम भरी यात्रा मैंने क्यों की?' और हर बार मेरा उत्तर होता, 'अगर मैं यह यात्रा न करता तो मेरा जीवन व्यर्थ जाता।' जो जिस काम के लिये बना हो, उसे वह काम करना ही चाहिये। और मैं नर्मदा पदयात्रा के लिये बना हूँ।' ग्यारह वर्षों में की गई दस यात्राओं का वर्णन और इस मध्य किये गए कुछ रेखांकन हैं इस पुस्तक में प्रकाशित हैं। 

एकदा नैमिषारण्ये 


                      वेगड़ जी की प्रेरणा से वर्ष २००२ में अभियान संस्था के माध्यम से 'दिव्य नर्मदा' अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ. पत्रिका के ४ वर्षों में १० अंक प्रकाशित हुए किन्तु मेरा स्थानांतरण शहडोल हो जाने तथा सहयोगियों और अर्थ के भाव में इसे अंतरजाल पर ले जाना पड़ा। अब यह www.divyanarama.in पर उपलब्ध है। अब तक २४ लाख से अधिक पाठक इससे जुड़ चुके हैं तथा लगभग ७००० रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी साहित्य, छंद शास्त्र तथा अन्य विषयों पर कार्यशालाओं से देश-विदश में सहस्त्राधिक रचनाकार लाभान्वित हुए हैं। इस पत्रिका के प्रथम २ अंकों के मुखपृष्ठ पर वेगड़ जी द्वारा नर्मदा पर निर्मित कोलाज ही प्रकाशित हुए हैं। उनके एक और कोलाज की छाया-प्रति मेरे पास उपलब्ध है। जब भी भेंट होती वे नर्मदा जी से जुड़े नये अनुभव सुनाते। भारतीय ग्रंथों में कई आख्यान 'एकदा नैमिषारण्ये'  'एक बार नैमिषारण में' से आरम्भ होते हैं। इसी शीर्षक से उपन्यास भी रचा गया है। वृक्ष की छाया तले पंछियों की कलरव के साथ वेगड़ जी के श्री मुख से नर्मदा आख्यान सुनकर कल्पना की जा सकती थी कि ज्ञान-दान की भारतीय वाचिक परंपरा कितनी सरल और उदात्त रही होगी। 

महापरिवार  
                      वेगड़ जी का पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन वर्तमान काल में जीवन आदर्श रहा। एक ही घर में एक साथ तीन पीढ़ियों का सरस-सार्थक समन्वय देखकर किसी तीर्थ की सी अनुभूति होती थी। पहली बार उनके घर जाने पर मैंने घंटी बजाई तो एक बच्चा निकला। मुझे अजनबी पाकर उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो मैंने कहा 'वेगड़ जी से मिलना है' 
उसने पूछा- 'किनसे?' 
मैंने सोचा यह सुन नहीं पाया तो फिर कहा 'वेगड़ जी से' 
उसने शायद मजा लेने के अंदाज में फिर पूछा 'किनसे?' 
अब मुझे संदेह हुआ कि गलत घर में तो नहीं आ गया, अत: उसी से पूछा 'वेगड़ जी का घर यही है न?' 
'जी हाँ यही है' बच्चे ने कहा। 
'तो उन्हें बुला दो, उन्हीं से मिलना है।' मैं बोला। 
'किन्हें बुला दूँ?' अब बच्चे के मुँह पर झुंझलाहट परिलक्षित हो रही थी। खेल छोड़कर आया था और उसके साथी आवाज़ दे रहे थे।
मुझे भी उलझन हो रही कि कैसा बच्चा है बार-बार पूछता है और किसी को बुलाता नहीं। मैंने कुछ खीजकर कहा वेगड़ जी से मिलना है, बुलाते क्यों नहीं?'
'बताइए तो कौन से वेगड़ जी को बुला दूँ?' अब मैं समझा कि यहाँ पूरा परिवार रहता है, और सभी वयस्क पुरुष वेगड़ जी ही कहे जाते होंगे। अपनी नासमझी पर हँसी भी आ रही थी, बच्चा उलझन में था, मैं भी पशोपेश में था  कि उसकी आयु के आधार पर अनुमान से नाना को बुलाने को कहूँ या दादा को? अंतत: 'सबसे बड़े वाले वेगड़ जी को।' उसने भीतर जाकर बताया, बैठक खाने का दरवाजा खोला, मुझे बैठाया और यह जा, वह जा। कुछ देर में वेगड़ जी से बातों ही बातों में सम्मिलित परिवार की जानकारी मिली, तब बच्चे का असमंजस समझ सका कि घर में जितने भी बड़े हैं उनसे मिलनेवाले सभी जन 'वेगड़ जी' से मिलने आते हैं, अत: कौन से वेगड़ जी को बुलाना यह, यह जाने बिना वह किसे बुलाता?

पति--पत्नी परिपूरक  
                      प्राय: देखा है कि कलाकार-साहित्यकार आदि से उनके परिवारजनों को शिकायत रहती है कि वे अपने में डूबे रहते हैं और परिवार पर अपेक्षित ध्यान नहीं देते किन्तु वेगड़ जी इसके अपवाद रहे। वे कला और साहित्य की आराधना करते समय भी परिवारमय होते और परिवार के साथ रहते हेभी कला और साहित्य में डूबे रहते। “अमृतस्य नर्मदा” में 'मेरे पति' शीर्षक से कांता जी (बा) ने वेगड़ जी के विषय में अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए लिखा है- "४५ वर्षों के साथ में मैने उनके विविध रूप देखे। मैंने उन्हें खुश देखा, नाराज देखा, उदास और दुखी देखा, रोते देखा और खिलाखिलाकर हँसते देखा। मन के दृढ़ नहीं हैं। अतिशयोक्ति बहुत करते हैं, आत्मप्रशंसा उससे भी अधिक। मैं रोकती हूँ तो कहते हैं, मैं किसी की निंदा नहीं करता। परनिंदा से आत्मप्रशंसा अच्छी। आडंबरहीन और डरपोक से लगने वाले इस इनसान को देखकर मन में यही बात आती है कि नर्मदा तट की २६२४ कि.मी. की कठिन और खतरनाक पदयात्रा इन्होंने कैसे की होगी।"

                      मैंने कई कार्यक्रमों में वेगड़ जी को बोलते सुना, बा सामने होतीं तो वेगड़ जी जी की वक्तृता अधिक स्निग्ध और सरस होती। बा प्राय: मुग्ध भाव से उन्हें निहारतीं किंतु अपना उल्लेख आते ही सँकुच जातीं, तब उनके चेहरे की छटा मनोहारी होती। वेगड़ दादा परिहास करते हुए उन्हें 'वन वुमेन सेंसर बोर्ड' कहते थे। दोनों का एकत्व भाव ऐसा कि अपेक्षाकृत युवाकाल में की गयी प्रथम यात्रा में वेगड़ जी अकेले गए, बा घर सम्हालती रहीं, ७५ वर्ष की आयु में की दूसरी यात्रा अधिक कठिन और खतरों से भरी थी में किंतु बा साथ थीं। 

मितव्ययी वेगड़ जी 
                      'सादा जीवन उच्च विचार' वेगड़ जी का ध्येय वाक्य था। मधुर तथा मितभाषी वेगड़ जी बोलने और लिखने दोनों में शब्दों का प्रयोग बहुत सजगता के साथ करते थे। उनके लेखन और भाषण में कोइ निरर्थक शब्द नहीं होता था। यह साहित्यप्रेमी ही नहीं हर मनुष्य के लिए सीखने की बात है। वेगड़ जी लिखकर कभी-कभी निकटस्थ मित्रों को सुनाते, उनकी प्रतिक्रिया पाकर अथवा खुद पढ़कर दुबारा काँट-छाँट करते, सुधारते। यह देख मुझे बुआ श्री (महीयसी महादेवी जी) द्वारा बताया प्रसंग याद हो आता कि दद्दा (राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त) जब भारत-भारती लिख रहे थे तो पत्र लिखकर चिरगाँव बुलाया तथा पांडुलिपि सुनाकर विमर्श किया। मुंशी अजमेरी और सियारामशरण जी के साथ तो प्राय: रोज ही विमर्श करते थे। बुआ जी को शिकायत थी कि नयी पीढ़ी बहुत जल्दी में रहती है जो लिखा झटपट प्रकाशित कर देती है, न पुनर्विचार न विमर्श फिर श्रेष्ठता कैसे हो? तब क्या पता था कि अगली पीढ़ी ऐसी आएगी जो कागज़ -कलम से रिश्ता तोड़कर जो मन में आये सीधे टंकित कर भेज देगी।

सोद्देश्य लेखन:
                      वेगड़ जी के लिए लेखन समय बिताने का साधन नहीं सरस्वर उपासना था। वे सरल, सरस और सहज लिखते थे। जो देखते वह इस तरह लिखते कि बात के तार से तार निकलता जाए। कथा कहने की औपनिषदिक शैली या बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियों की वे कहते चलते थे। जो बताते उसके साथ देश-काल-परिवेश, अतीत और भावी को भी यथावश्यक समेट लेते। इसलिए उनके लेखन में कालातीत होने का तत्व समाहित रहता था। एक उदाहरण देखें-
ओंकारेश्वर से खलघाट
सुबह विष्णुपरी घाट पर बैठा था। सुबह की गुनगुनी धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। सामने है ओंकारेश्वर पहाड़ी नदी का पहाड़ी तीर्थस्थान। संकरी नर्मदा के दोनों ओर खड़ी चट्टानी कगारें हैं। इस तट पर मांधाता, उस तट पर ओंकारेश्वर दोनों मिलकर ओंकार-मांधाता और बीच में अलस गति से बहती शांत-नीरव नर्मदा। नदी बहती हुई भी रुकी सी जान पड़ती है। सुदूर केरल से आकर बालक शंकर ने यहाँ गुरु गोविन्दपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वे हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक हैं। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया, वह अनुपम है। ऐसे आद्य शंकराचार्य को पावन स्मृति इस ओंकारेश्वर से जुड़ी हुई है। फिर कमलभारती जी, रामदासजी और मायानंदजी सदृश संतों के आश्रम भी यहाँ रहे। आज भी नए नए आश्रम बनते जा रहे हैं।
नर्मदा तट के छोटे से छोटे तृण और छोटे से छोटे कण न जाने कितने परव्राजकों, ऋषि मुनियों और साधु संतों की पदधूलि से पावन हुए होंगे। यहाँ के वनों में अनगिनत ऋषियों के आलम रहे होंगे। वहाँ उन्होंने धर्म पर विचार किया होगा, जीवन मूल्यों की खोज की होगी और संस्कृति का उजाला फैलाया होगा। हमारी संस्कृति आरण्यक संस्कृति रही। लेकिन अब? हमने उन पावन वनों को काट डाला है और पशु-पक्षियों को खदेड़ दिया है या मार डाला है। धरती के साथ यह कैसा विश्वासघात है। एक आदमी स्नान के लिए आया था। मैंने कहा, '' नर्मदा कितनी संकरी है। ''
'' नर्मदा की यह एक धारा है। दूसरी ओंकारश्वर के पीछे है। कहते हैं कावेरी नर्मदा से मिली लेकिन थोड़ी ही देर में दोनों में अनबन हो गई और कावेरी नर्मदा से अलग हो गई। ओंकारेश्वर के इस ओर है नर्मदा, उस ओर है कावेरी। ''
'' दोनों फिर मिलती हैं या नहीं? ''
'' जहाँ ओकारेश्वर का टापू खत्म होता है, वहीं दोनों फिर मिल जाती है। नर्मदा ने आखिर छोटी बहना को मना लिया। इसलिए असली कावेरी संगम बाद का है, पहला नहीं। ''
पहले आगमन, फिर बहिर्गमन, अंत में पुनरागमन! बढ़िया कल्पना है!
यहाँ बैठा सामने के घाट को देख रहा हूँ। वहाँ न जा पाने का कोई दुख नहीं है क्योंकि ओंकारेश्वर दो बार हो आया हूँ लेकिन अनिल और श्यामलाल से कहा कि तुम जरूर हो आओ। नाव से जाना, पुल से आना। यहाँ से मोरटक्का। वहाँ तक सड़क जाती है, लेकिन हम सड़क से नहीं जाएँगे, नदी के किनारे-किनारे जाएँगे।
दोपहर को निकले। लेकिन थोड़ी ही देर में समझ में आ गया कि दोपहर को चलकर गलती की। सूरज सामने रहता है, चट्टानें तंदूर को तरह गरमा गई हैं और श्यामलाल नंगे पाँव है। लेकिन वह तो शायद दहकते अंगारों पर भी चल सकता है।
कभी चट्टानों से जूझते, कभी झाड़ी से उलझते तो कभी सामने तट की पर्वत-माला से आते हवा के झोंकों का आनंद उठाते आगे बढ़ रहे थे। कभी रुक जाते माथे का पसीना पोंछते और आगे बढ़ते। शाम को मारटक्का के खेडीघाट पहुँचे। यहाँ नर्मदा पर सड़क का पुल है, पास में रेल का पुल भी है। रात यहीं बिताई। सुबह उठते ही अनिल ने कहा, '' जरा ऊपर देखिए।' मध्य आकाश में चाँद था। मैंने कहा. '' सूरज के हिसाब से अभी सबेरा है, लेकिन चांद के हिसाब से अभी दोपहर है!''
अनिल के लिए यह भले ही विस्मय की बात हो, पर मैं तो चाँद के एक से एक करतब देख चुका हूँ। कभी पूर्ण कुंभ. तो कभी बारीक रेखा उसका बांकपन कभी सीधा तो कभी उलटा, कभी घटता तो कभी बढ़ता कभी निकलते ही डूबने की तैयारी तो कभी आधी रात को गायब और भरी दोपहर को हाजिर! क्या कहना इस मनमौजी का। चाँद जब यह सब कर सकता है। तो एक करतब उसे और दिखाना था। सूर्योदय और सूर्यास्त के कारण पूर्व और पश्चिम दिशाओं की छटा देखते ही बनती है। उपेक्षित रह जाते हैं उत्तर और दक्षिण। क्या ही अच्छा होता अगर चाँद उत्तर में निकलता और दक्षिण में डूबता। चंद्र का ऐसा अपूर्व उदय देखकर सूर्य भी निरुत्तर रह जाता। 

वेग जी व्यक्ति होते हुए भी व्यक्ति नहीं थे, वे समय थे। हमरा सौभग्य कि हम उनके समय में हुए, उन्हें देख, सुना, स्पर्श किया, आशीष पाया। गाँधी और विनोबा कैसे रहे होंगे यह वेगड़ जी को देखकर समझ सके। जबलपुर का नाम संस्कारधानी जिन व्यक्तित्वों के कारण सार्थक लगता है उनमें से वेगड़ जी अनन्य हैं। काश, उनके रहते हुए उन पर लिखने का अवसर मिला होता तो उन्हें ही सुनाता और उनकी राय पूछता।  
अमृत केवल नाम नहीं था 
अमृत उनकी 
श्वास-श्वास में 
आस-आस में 
दिया प्रकृति ने। 
रखा नहीं, कर बंद तिजोरी
बूँद-बूँद दी बाँट विहँसकर 
कुछ बूँदें पायीं मैंने भी। 
दैव! शक्ति दे 
फसल अमृत की उगा सकूँ मैं 
बाँट सकें फिर-फिर अमृत हम। 
***
   

शनिवार, 29 सितंबर 2018

समीक्षा नवगीत


कृति चर्चा:

नवगीतीय परिधान में 'फुसफुसाते वृक्ष कान में'    
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: फुसफुसाते वृक्ष कान में, नवगीत संग्रह, हरिहर झा, प्रथम संस्करण २०१८, आई एस बी एन ९७८-९३-८७६२२-९०-६, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १६५, मूल्य ३५०/-, अयन प्रकाशन, १/२० महरौली नई दिल्ली ११००३०, चलभाष ९८१८९८८६१३]
                                                     *
विश्ववाणी हिंदी ने देववाणी  संस्कृत से विरासत में प्राप्त व्याकरण व पिंगल  को देश-काल-परिस्थितियों और मानवीय आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तित-संवर्धित करते हुए पुरातन विधाओं को नव रूपाकार देकर ग्राह्य बनाये रखने का जो सारस्वत अनुष्ठान सतत सम्पादित किया है उसकी गीत विधायी प्राप्ति नवगीत है। लोकमांगल्य के गिरि शिखर से  सतत प्रवाहित पारंपरिक साहित्यिक गीत, लोकगीत और जनगीत की त्रिवेणी ने विसंगतियों की शिलाओं, विडंबनाओं के गव्हरों और सामाजिक संघर्षों के रेगिस्तानों को पार करते हुए कलकल निनादिनी नर्मदा के निर्मल प्रवाह की तरह जनहितैषिणी होकर नवगीत विशेषण को शिरोधार्य किया जो रूढ़ होकर संज्ञा रूप मे व्यवहृत हो रहा है। लोक-पालक 'हरि' और शंका-विनाशक 'हर' का सुखद सम्मिलन जिनके नाम में है वे हरिहर झा अपनी सृजन-थाल में ८३ नवगीत दीप प्रज्वलित कर माँ भारती की आरती उतार रहे हैं। कोई आरती पूर्ण तभी होती है जब उसके चतुर्दिक सलिल बिन्दुओं को घुमा दिया जाए। इन नवगीत-दीपों के चतुर्दिक सनातन भारतीय मूल्यों-मान्यताओं का सलिल को घुमाया गया है।  
                           नवगीत के उद्गम और तत्कालीन मान्यताओं को पत्थर की लकीर मानकर परिवर्तनों को नकारने और हेय सिद्ध करने के आदी संकीर्णतावादी इन नवगीतों का छिन्द्रान्वेषण कर स्वीकारने में हिचकें तो भी यह सत्य नकारा नहीं जा सकता कि नवगीत दिनानुदिन नई-नई भावमुद्राएँ धारणकर नव आयामों में खुद को स्थापित करता जा रहा है। हरिहर जी के नवगीत मुखड़ों-अंतरों में युगीन यथार्थ को पिरोते समय पारंपरिक बिंबों, प्रतीकों और मिथकों से मुक्त रहकर अपनी राह आप बनाते हैं। 'आइना दिखाती' शीर्षक नवगीत का मुखड़ा 'तूफान, दे थपकी सुलाये, / डर लगे तो क्या करें? /विष में बुझे सब तीर उर को / भेद दें तो क्या करें?' आम आदमी के सम्मुख पल-पल उपस्थित होती किंकर्तव्यविमूढ़ता को इंगित करता है। 
                           स्वराज्य के संघर्ष और उसके बाद के परिदृश्य में लोकतंत्र में  'लोक' के स्थान पर 'लोभ',
प्रजातंत्र में 'प्रजा' के स्थान पर 'सत्ता', गणतंत्र में 'गण' के स्थान पर 'तंत्र' को देखकर दिन-ब-दिन मुश्किल होती जाती जिन्दगी की लड़े में हारता सामान्य नागरिक सोचने के लिए विवश है- 'उलट गीता कैसे हुई, / अर्जुन उधर सठिया रहे / भ्रमित है धृतराष्ट्र क्यों / संजय इधर बतिया रहे / दौड़ते टीआरपी को, / बेचते ईमान।' (सुर्ख़ियों में कहाँ दिखती, खग-मृग की तान।) खग-मृग के माध्यम से जन-जीवन से गुम होती 'तान' अर्थात आनंद को बखूबी संकेतित किया है कवि ने। अर्जुन, धृतराष्ट्र और संजय जैसे पौराणिक चरित्रों को आधुनिक परिवेश में चिन्हित कर सकना हरिहर जी के चिंतन सामर्थ्य का परिचायक है। 'वो बहेलिया' शीर्षक नवगीत में एक और उदाहरण देखें- 'दुर्योधन का अहंकार तू / डींग मारता ऊँची ऊँची, है मखौलिया।' मिथकों के प्रयोग कवि को प्रिय हैं क्योंकि वे 'कम शब्दों में अधिक' कह पाते हैं- 'जीवन जैसे खुद ब्रह्मा ने / दुनिया नई रची / राह नई, गली अंधियारी / मन में कहाँ बची/ तमस भले ही हो ताकतवर, / कभी न दाल गले। / किसने इंद्र वरुण अग्नि को, / आफत में डाला / सौलह हजार ललनाओं पर / संकट का जाला / नरकासुर का दर्प दहाड़ा / शक्ति का आभास / दुर्गति रावण जैसी ही तो / बोलता इतिहास / ज्योत जली, यह देखा / अचरज़ लौ की छाँव तले।'
                           अपसंस्कृति की शिकार नई पीढ़ी पर व्यंग्य करता कवि अंगरेजी के वर्चस्व को घातक मानता है- 'चोंच कहाँ, / चम्मच से तोते सीख गये खाना। / भूले सब संस्कार, समझ, / फूहड़ता की झोली / गम उल्लास  निकलते थे, / बनी गँवारू बोली / गिटपिट अब चाहें, / अँगरेजी, में गाल बजाना।' जन-जीवन में व्यवस्था और शांति का केंद्र नारी अपनी भूमिका के महत्व को भुलाकर घर जोड़ने की जगह तोड़ने की होड़ में सम्मिलित दिखती है- ' रतनारी आँखे मौन, / ज्यों निकले अंगार / कुरूप समझे सबको / किये सोला सिंगार।  पल में बुद्ध बन जाती ..... पल में होती क्रुद्ध / आलिंगन अभिसार, / लो तुरत छिड़ गया युद्ध / रूठी फिर तो खैर नहीं, / विकराल रूपा जोगन' स्वाभाविक ही है कि ऐसे दमघोंटू वातावरण में कुछ लिखना दुष्कर हो जाए- ' गलघोटूँ कुछ हवा चली,/ रोये कलि, ऊँघे बगिया / चूम लिया दौड़ फूलों को, / काँटा तो ठहरा ठगिया/ दरार हर छन्द में पाऊँ सुधि न पाये क्यों रचयिता / कैसे लिखूँ मैं कविता।'
                           पारिस्थितिक विषमताओं के घटाटोप अँधेरे में भे एकवि निराश नहीं होता। वह 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की विरासत का वाहक है,  उजियारे की किरण खोज ही लेता है- 'नन्हा बालक या नन्ही परी / भाये कचोरी या मीठी पुरी / लुभाती बोली में कहे मम्मी / रबड़ी बनी है यम्मी यम्मी / घर में कितना उजाला है / फरिश्ता आने वाला है। अपने कष्टों को भूलकर अन्यों की पीड़ा कम करने को जीवनोद्देश्य मनेवाली भारतीय संस्कृति इन गीतों में यत्र-तत्र झलकती है- 'भूख लगी, / मिले न रोटी / घास हरी चरते हैं / झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं। / मिली बिछावट काँटों की / लगी चुभन कुछ ऐसे / फूल बिछाते रहे, दर्द / छूमंतर सब कैसे / भूले पीड़ा , औरों का संकट हर लेते हैं / झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।'
                           कबीर ने अपने समय का सच बयान करते हुए कहा था- 'यह चादर सुर नर मुनि ओढ़ी / ओढ़ के मैली कीन्ही चदरिया / दास कबीर जतन से ओढ़ी / ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।' हरिहर जी  'मैली हो गई बहुत चदरिया' कहते हुए  कबीर को फिर-फिर जीते हैं। कबीर और लोई के मतभेद जग जाहिर हैं।  कवि इसी परंपरा का वाहक है। देखें- घर में भूख नहीं होती, / किस-किस के संग खाते हो?/ / चादर अपनी मैली करके / नाम कबीरा लेते हो?' स्त्री-विमर्श के इस दौर में पुरुष-विमर्श के बिना पुरुषों की दुर्दशा हकीकतबयानी है- 'मैं झाँसी की रानी बन कर/ तुम्हें मजा चखाऊँगी / दुखती रग पर हाथ रखूँ / हँस कर के तुम्हें रुलाऊँगी / पति-परमेश्वर समझ लिया,/ पुरूष-प्रभुता के रोगी! / सारी अकड़ एक मिनिट में / टाँय टाँय यह फिस होगी / तो सुनो किट्टी-पार्टी है कल / तुम बच्चों को नहलाना।' स्त्री-पुरुष जीवन-रथ के दो पहिए हैं। दोनों को पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन मिल-जुलकर करना होता है। बच्चों की देखभाल की सहज प्रक्रिया को सबक सिखाने की तरह प्रयोग किया जाना ठीक नहीं प्रतीत होता। 'हँस कर के तुम्हें रुलाऊँगी' में 'के' का प्रयोग अनावश्यक है जो कथ्य को शिथिल करता है। 
                           सामाजिक वैषम्य और दहेज़ की कुरीति पर हरिहर जी ने प्रबल आघात किया है। "खुलने लगी कलाई तो क्या, बना रहेगा पुतला? / तू इतना तो बतला / तृष्णा मिटे कहाँ मृगजल से, माँगी एक पिटारी / टपके लार ससुर, देवर की, दर्द सहे बेचारी / रोती बहना, आँख फेर ली, खून हुआ क्यों पतला तू इतना तो बतला ...... ’धनिया’ आँसू पोछ न पाये, खून पिलाये ’होरी’ / श्वेत वस्त्र में दिखे न काले, धन से भरी तिजोरी / जाला करतूतों का फिर क्यों, दिखे दूर से उजला / तू इतना तो बतला।'
                           'समय का फेर' सब कुछ बदल देता है। 'हरि'-'हर'  से बढ़कर समय के परिवर्तन का साक्षी और कौन हो सकता है? 'पोथियाँ बहुत पढ़ ली / जग मुआ, आ गई कंप्यूटरी आभा। / ज्ञान सरिता प्रवाह खलखल, जरूरी होता उसे बहना / लौ दिये की, / चाहे कभी ना, बंद तालों में जकड़ रहना / वेद ऋषियों के हुये प्राचीन / दौर अणु का कर गये ‘भाभा’। / पूर्वजों ने, / तीक्ष्ण बुद्धि से, / कैसे किया, समुद्र का मंथन / जाना पार सागर, / पाप क्यों? क्यों चाहिये किसका समर्थन / चाँद, मंगल जा रही दुनिया / राह में क्यों बन रहे खंभा।'
                            निरानान्दित होते जाते जीवन में आनद की खोज कवि की काव्य-रचना का उद्देश्य है। वह कहता है- 'पंडिताई में नहीं अध्यात्म, झांके ह्रदय में, फकीर /“चोंचले तो चोंचले, नहीं धर्म”, माथा फोड़ता कबीर / मूर्ख ना समझे, ईश तक पहुँचे, चाहे यज्ञ या अजान / भगवत्कृपा जिसे मिली बस, खुल गई अंदरूनी आँख / चक्र की जीवन्त ऊर्जा तक पहुँचने मिल गई लो पाँख / नाद अनहद सुन सके, तैयार हैं, भीतर खड़े जो कान।'
                            इन गीति रचनाओं में विचार तत्व की प्रबलता ने गीत के लालित्य को पराभूत सा कर दिया है, फलत: गीतों की गेयता क्षीण हुई है। गीत और छंद का चोली-दामन का साथ है। भारत में नवगीतों में पारंपरिक छंदों और लोकगीतों की लय के प्रयोग का चलन बढ़ा है।  'काल है संक्रांति का' में पारंपरिक छंदों के यथेष्ट प्रयोग के बाद कई नए-पुराने नवगीतकार छंदों के प्रति आकर्षित हुए हैं। नवगीतों में नए छंदों का प्रयोग और कई छंदों को एक साथ मिलकर उपयोग किया जाना भी सर्व मान्य है। हरिहर जी ने शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हुए छंद को अपनी भूमिका आप तय करने दी है। मात्रिक या वर्णिक छंद के बंधनों को गौड़ मानते हुए, कथ्य को प्रस्तुत करने के प्रति अधिक संवेदनशील रहे हैं।  समतुकांती पंक्तियों से लयबद्धता में सहायता मिली है। कवि की कुशलता यह है कि वह छंद को यथावत रखने के स्थान पर कथ्य की आवश्यकता के अनुसार ढालता है। इन नवगीतों की रचना किसी एक छंद के विधानानुसार न होकर मुखड़े और अंतरे में भिन्न-भिन्न और कहीं-कहीं मुखड़े में भी एकाधिक छन्दों के संविलयन से हुई है।
                            नवगीत की नवता कथ्य और शिल्प दोनों के स्तर पर होती है। हरिहर जी ने दोनों पैमानों पर अपनी निजता स्थापित की है। प्रसाद गुण संपन्न भाषा, सरल-सहज बोधगम्य शब्दावली, मुहावरेदार कहन और सांकेतिक शैली हरिहर जी के इन नवगीतों का वैशिष्ट्य है। सुदूर आस्ट्रेलिया में रहकर भी देश के अंदरूनी हालात से पूरी तरह अवगत रहकर उन पर सकारात्मक तरीके से सोचना और संतुलित वैचारिक अभिव्यक्ति इन नवगीतों को पठनीयता और प्रासंगिकता से संपन्न करती है। सोने की चिड़िया भारत हो जाए, जय हो हिंदी भाषा की, इंद्रधनुषी रंग मचलते, दो इन्हें सम्मान, कच्ची कोंपल की लाचारी, दर्द भारी सिसकी है, मन स्वयं बारात हुआ, निहारिकाओं ने खेल ली होली, कौन जाने शाप किसका, शहर में दीवाली, साथ नीम का, उपलब्धि, दुल्हन का सपना, बदरी डोल रही वायदों की पतंग आदि रचनाएँ समय साक्षी हैं। 
                             इंग्लैंड निवासी विदुषी उषा राजे सक्सेना जी ने कुछ नवगीतों की पृष्ठभूमि में पुरुष की शोषक, लोभी, कामी प्रवृत्ति और स्त्री-अपराधों की उपस्थिति अनुभव की है किन्तु मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि रचनाकार ने दैनंदिन जीवन में होती कहा-सुनी को सहज रूप में प्रस्तुत किया है। इन रचनाओं में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं परिपूरक के रूप में शब्दित हैं। 
                                कृत्या पत्रिका की संपादिका रति सक्सेना जी ने हरिहर जी का मूल स्वर वैचारिकता मानते हुए, अतीत की उपस्थिति को वर्तमान पर भरी पड़ते पाया है। सुरीलेपन और कठोरता की मिश्रित अभिव्यक्ति इन रचनाओं में होना सहज स्वाभाविक है चूँकि जीवन धूप-छाँव दोनों को पग-पग पर अपने साथ पाता है। लन्दन निवासी तेजेंद्र शर्मा जी अपने चतुर्दिक घटती, कही-सुनी जाती बातों को इन गीतों में पाकर अनुभव करते हैं कि जैसे यह तो हमारे ही जीवन पर लिखी गयी है। स्वयं गीतकार अपनी रचनाओं में वामपंथी रुझान की अनुपस्थिति से भीगी है तथा इस कसौटी पर की जाने वाली आलोचना के प्रति सजग रहते हुए भी उसे व्यर्थ मानता है। वह पूरी ईमानदारी से कहता है "प्रवासी साहित्य पर जो आक्षेप लगाये जाते हैं, उन पर टिप्पणी करने की अपेक्षा अर्धसत्य से भी सत्य को निकाल कर उससे मार्गदर्शन लेना मैं अधिक उचित समझता हूँ।" मैंने इन गीतों में शैल्पिकता पर कथ्य की भैव्यक्ति को वरीयता दी जाना अनुभव किया है। वैचारिक प्रतिबद्धता किसी विधागत रचना को कुंद करती है। हरिहर जी अपने नाम के अनुरूप बंधनों की जड़ता को तोड़ते हुए सहज प्रवाहित सलिला की तरह इन रचनाओं में अपने आप को प्रवाहित होने देते हैं।  
                           प्रवासी भारतीयों द्वारा रचे जा रहे साहित्य विशेषत: गद्य साहित्त्य में विदेशी परिवेश प्राय: मिलता है। हरिहर जी पूरी तरह भारत में ही केन्द्रित रहे हैं। आशा है उनका अगला काव्य संग्रह रचनाओं में आस्ट्रेलिया को भी भारतीय पाठकों तक पहुँचेगा। वैश्विक समरसता के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ पड़ोसी के आँगन की हवा लेते रहना भी आवश्यक है। इससे हरिहर जी के नवगीतों में शेष से भिन्नता तथा ताज़गी मिलेगी। लयबद्धता और गेयता के लिए छांदस लघु पंक्तियाँ लम्बी पंक्तियों की तुलना में अधिक सहज होती हैं। 
-------------------
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान,  ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, 
ईमेल: salil.sanjiv @gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४ 

कुछ चित्र







dr. meghnaad saha

स्मृति आलेख:
मानवता तथा राष्ट्र के प्रति समर्पित डॉ. मेघनाद साहा 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
Scientistवर्ष १९३२ में मेघनाद साहा ने इलाहाबाद में उत्तर प्रदेश एकेडमी ऑफ़ साइंस की स्थापना की. १९३८ में वे साइंस कोलेज कलकत्ता में आणविक भौतिकी (Nuclear physics) के क्षेत्र में कार्य किया. कालांतर में विज्ञान के उच्च अध्ययन एवं शोध हेतु यह संस्था उन्हीं के नाम पर 'साहा इंस्टीटयूट ऑफ़ न्यूक्लिअर फिजिक्स' के नाम से विख्यात हुई. उन्हीं की पहल पर विदेशों में परमाण्विक भौतिकी संबंधी शोधों हेतु प्रयुक्त सायक्लोट्रोंन (cyclotrons) पहले-पहल १९५० भारत में लाया गया तथा इस संस्था में इस पर शोध कार्य किये गये. उन्होंने सौर किरणों का वज़न तथा दबाव मापने हेतु एक यंत्र का अविष्कार किया जिसे बहुत सराहना मिली. उन्होंने विश्व प्रसिद्ध ‘equation of the reaction-isobar for ionization’ की खोज की जिसे कालांतर में Saha’s “Thermo-Ionization Equation” के नाम से प्रसिद्धि मिली.


आधुनिक भारतीय विज्ञान के उन्नयन में भौतिकी का योगदान अनन्य है. एस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर डॉ. मेघनाद साहा ने स्पेक्ट्रल लाइन्स की उपस्थिति की व्याख्या हेतु विश्व विख्यात 'ओनाइजेशन फार्मूला' दिया। बांगला देश स्थित ढाका जिले के शाओराटोली गाँव में एक निर्धन परिवार में ६ अक्तूबर १८९३ को बंगाली कायस्थ श्री जगन्नाथ साहा तथा श्रीमती भुवनेश्वरी देवी के आँगन में ऐसा पुष्प खिला जिसने अपनी मेधा की सुगंध से सकल जगत में अपना नाम किया। उनके पिता एक छोटे से किराना व्यापारी थे जो बहुत कठिनाई से अपने परिवार को पाल पाते थे. बालक मेघनाद की शिक्षा गाँव की पाठशाला से आरम्भ हुई. डॉ. अनंत कुमार दास ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उनके आवास-भोजन का प्रबंध किया और वे १० किलोमीटर दूर ढाका कोलेजिएट स्कूल तथा ढाका कोलेज में आगे शिक्षा ग्रहण कर सके. वे आजीवन डॉ. दास के प्रति इस सहायता हेतु आभार तथा कृतज्ञता व्यक्त करते थे.

Scientist मेघनाद साहा ने किशोरीलाल जुबली स्कूल में प्रवेश लेकर १९०९ में कलकत्ता विश्व विद्यालय की एंट्रेंस परीक्षा भाषा समूह (अंग्रेजी, बंगाली, संस्कृत) तथा गणित में सर्वाधिक अंकों सहित उत्तीर्ण की तथा समूचे पूर्व बंगाल में प्रथम स्थान पाया. १९११ में इंटर साइंस परीक्षा में वे तृतीय स्थान पर रहे जबकि प्रथम स्थान पर रहे सत्येन्द्र नाथ बोस बाद में विश्व विख्यात वैज्ञानिक हुए. १९१३ में उन्होंने प्रेसिडेंसी कोलेज कलकत्ता से गणित मुख्य विषय लेकर स्नातक परीक्षा में द्वितीय स्थान पाया। १९१५ में एम. एससी. परीक्षा में मेघनाद साहा एप्लाइड मैथेमैटिक्स में तथा सत्येन्द्र नाथ बोस प्योर मैथेमैटिक्स में प्रथम स्थान पर रहे.
उनके छात्र जीवन में जगदीश चन्द्र बोस तथा प्रफुल्ल चन्द्र सेन अपनी ख्याति के शिखर पर थे. सहपाठियों के रूप में सत्येन्द्र नाथ बोस, ज्ञान घोष तथा जे. एन. मुखर्जी जैसी प्रतिभाओं का तथा इलाहाबाद विश्व विद्यालय में विख्यात गणितज्ञ अमियचरण बनर्जी का साथ उन्हें मिला. स्साहा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग की स्थापना की. वे अनीश्वरवादी (एथीस्ट) थे.
वर्ष १९१७ में कलकत्ता में नए प्रारंभ यूनिवर्सिटी कोलेज ऑफ़ साइंस में व्याख्याता के रूप में श्री साहा ने कार्य आरम्भ कर क्वांटम फिजिक्स का शिक्षण किया. उन्होंने सत्येन्द्र नाथ बोस के साथ मिलकर रिलेटिविटी पर आइन्सटाइन तथा हरमन मिंकोवस्की के अंग्रेजी में प्रकाशित शोधपत्र का अंग्रेजी में अनुवाद किया. वर्ष १९१९ में अमेरिकन एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल में उनका शोधपत्र “On Selective Radiation Pressure and its Application” प्रकाशित हुआ. इसमें उन्होंने स्पेक्ट्रल लाइन्स की उपस्थिति की व्याख्या करते हुए 'तत्वों के ऊष्मीय आयनीकरण' (थर्मल आयोनाइजेशन ऑफ़ एलिमेंट्स) का सिद्धांत प्रतिपादित कर 'साहा समीकरण' प्रस्तुत किया जो एस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध हुआ. यह समीकरण तारों के स्पेक्ट्र के अध्ययन आगामी अध्ययन हेतु आधार बना जिससे शोधकर्ता तारों का तापमान तथा उनका निर्माण करनेवाले तत्वों का पता कर सके. उन्होंने २ वर्षों तक इम्पीरियल कोलेज लन्दन तथा रिसर्च लेबोरेटरी जर्मनी में शोध कार्य किया. वे १९२३ से १९३८ तक इलाहाबाद विश्व विद्यालय में प्राध्यापक तथा तत्पश्चात १९५६ में निधन तक कलकत्ता विश्व विद्यालय में साइंस फैकल्टी के डीन रहे. १९२७ में उन्हें लन्दन की रॉयल सोसायटी का फेलो चुने जाने का असाधारण गौरव प्राप्त हुआ. १९३४ में भारतीय विज्ञान कांग्रेस अपने २१ वें सत्र में उन्हें अध्यक्ष की आसंदी पर पाकर गौरवान्वित हुई.


उन्होंने पत्रिका 'साइंस एंड कल्चर' की स्थापना कर आजीवन सम्पादन किया.

वे भारत की विश्व विख्यात विज्ञान-संस्थाओं के जनक थे. उन्हीं की प्रेरणा से १९३० में राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (‘National Academy of Science), , १९३४ में इंडियन फिजीकल सोसाइटी, १९३५ में भारतीय विज्ञान संस्थान (‘Indian Institute of Science), तथा १९४४ में ‘Indian Association for the Cultivation of science’ की स्थापना हुई. १९४३ में कलकत्ता में स्थापित ‘Saha Institute of Nuclear physics’ उनके महत्वपूर्ण कार्य के प्रति राष्ट्र की ओर से व्यक्त कृतज्ञता का स्मारक है. वे नदी-नियोजन के प्रमुख वास्तुविद थे. दामोदर घाटी परियोजना का मूल प्रस्ताव उन्हीं ने तैयार किया था. मेघनाद साहा का नाम १९३५-३६ में नोबल पुरस्कार हेतु एस्ट्रोफिजिस्ट के रूप में नामांकित किया गय. यह गौरव पानेवाले वे एकमात्र भारतीय हैं. १९५२ में उन्हें उत्तर-पश्चिम कलकत्ता क्षेत्र से सांसद चुन गया. वे परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के पक्षधर तथा भारतीय नीति के निर्माता थे. वे भारतीय राष्ट्रीय कैलेण्डर निर्धारण समिति के अध्यक्ष थे. उन्हीं के प्रयास से राष्ट्रीय कैलेण्डर का निर्धारण बिना किसी विवाद के हो सका. १६ फरवरी १९५६ को हृदयाघात से उनके निधन से भारत ही नहीं विश्व ने एक प्रतिभा संपन्न वैज्ञानिक खो दिया.
Scientistआत्म मूल्यांकन :
प्रायः वैज्ञानिकों पर हाथी दांत की मीनार में रहने और सचाइयों को न स्वीकारने का आरोप लगाया जाता है. अपने कीमती वर्षों में राजनैतिक आंदोलनों से जुडाव के बावजूद १९३० तक मैं ऐसी मीनार में रहा किन्तु वर्तमान में प्रशासन के लिए विज्ञान भी शांति-व्यवस्था की तरह आवश्यक है. मैं क्रमशः राजनीति की ओर झुका क्योंकि मैं अपने तरीके से देश के किसी काम आना चाहता था.

श्रृद्धांजलि:
डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर: मेघनाद साहा का आयनीकरण समीकरण जिसने स्टेलर एस्ट्रोफिजिक्स का द्वार खोला २० वीं सदी की दस महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है किन्तु नोबल पुरस्कार श्रेणी में नहीं चुना जा सका.
एस. रोज़लैंड: साहां के कार्य द्वारा एस्ट्रोफिजिक्स को मिले महत्त्व का अधिमूल्यन संभव है क्योंकि पश्चातवर्ती काल में हुई समस्त प्रगति साहा की अवधारणाओं से प्रभावित है.
० दौलत सिंह कोठारी: वेप्नी आदतों तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं के सम्बन्ध में बहुत सरल तथा कठोर थे. सामान्यतः कर्कश प्रतीत होने पर भी एक बार बाहरी खोल टूटने पर वे अति गर्मजोशी, गहन मानवीयता, संवेदना, समझदारी तथा निजी सुविधाओं के प्रति उदासीन किन्तु अन्यों के प्रति अत्यंत सजग थे. दूसरों को छलना उनके स्वभाव में नहीं था. वे दिलेरी, संकल्प, ऊर्जा तथा समर्पण भाव से संपन्न व्यक्ति थे.
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com

lokgeet

* लोकगीत:  
पोछो हमारी कार.....
संजीव 'सलिल'
*
ड्राइव पे तोहे लै जाऊँ, 
ओ सैयां! पोछो हमारी कार.  
पोछो हमारी कार, 
ओ बलमा! पोछो हमारी कार.....
*
नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,
गोरी काया मक्खन-मलाई. 
तुम कागा से सुघड़, कहे जग-
'बिजुरी-मेघ' पुकार..  
ओ सैयां! पोछो हमारी कार.  
पोछो हमारी कार, 

ओ बलमा! पोछो हमारी कार..... *
संग चलेंगी मोरी गुइयां,
तनक न हेरो बिनको सैयां.
भरमाये तो कहूँ राम सौं-
गलन ना दइहों दार..
ओ सैयां! पोछो हमारी कार.
पोछो हमारी कार, 
 ओ बलमा! पोछो हमारी कार.....
*
बनो डिरेवर, हाँको गाड़ी.
कैहों सबसे बलमा अनाड़ी'.
'सलिल' संग केसरिया कुल्फी-
खैहों, करो न रार..
ओ सैयां! पोछो हमारी कार.
पोछो हमारी कार, 
ओ बलमा! पोछो हमारी कार.....
*

prranon men shlok

पुराणों में श्लोक संख्या
सुखसागर के अनुसारः
ब्रह्मपुराण में श्लोकों की संख्या १४००० और २४६ अद्धयाय है|
पद्मपुराण में श्लोकों की संख्या ५५००० हैं।
विष्णुपुराण में श्लोकों की संख्या तेइस हजार हैं।
शिवपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।
श्रीमद्भावतपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।
नारदपुराण में श्लोकों की संख्या पच्चीस हजार हैं।
मार्कण्डेयपुराण में श्लोकों की संख्या नौ हजार हैं।
अग्निपुराण में श्लोकों की संख्या पन्द्रह हजार हैं।
भविष्यपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार पाँच सौ हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।
लिंगपुराण में श्लोकों की संख्या ग्यारह हजार हैं।
वाराहपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।
स्कन्धपुराण में श्लोकों की संख्या इक्यासी हजार एक सौ हैं।
वामनपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।
कूर्मपुराण में श्लोकों की संख्या सत्रह हजार हैं।
मत्सयपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार हैं।
गरुड़पुराण में श्लोकों की संख्या उन्नीस हजार हैं।
ब्रह्माण्डपुराण में श्लोकों की संख्या बारह हजार हैं।
(विकिपीडिया से अनुसरण )

kundaiya,

कार्य शाला 
कुंडलिया = दोहा + रोला 
*
दोहा २ x १३-११, रोला ४ x ११-१३
*
दर्शन लाभ न हो रहे, कहाँ लापता हूर? १.
नज़र झुकाकर देखते/ नहीं आपसे दूर। २. 
नहीं आपसे दूर, न लेकिन निकट समझिये १.
उलझ गयी है आज पहेली विकट सुलझिए
'सलिल' नहीं मिथलेश कृपा का होता वर्षण
तो कैसे श्री राम सिया का करते दर्शन?
***

bhavani chhand

हिंदी में नए छंद : १. 
पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय भवानी छंद 
*
प्रात: स्मरणीय जगन्नाथ प्रसाद भानु रचित छंद प्रभाकर के पश्चात हिंदी में नए छंदों का आविष्कार लगभग नहीं हुआ। पश्चातवर्ती रचनाकार भानु जी के ग्रन्थ को भी आद्योपांत कम ही कवि पढ़-समझ सके। २-३ प्रयास भानु रचित उदाहरणों को अपने उदाहरणों से बदलने तक सीमित रह गए। कुछ कवियों ने पूर्व प्रचलित छंदों के चरणों में यत्किंचित परिवर्तन कर कालजयी होने की तुष्टि कर ली। संभवत: पहली बार हिंदी पिंगल की आधार शिला गणों को पदांत में रखकर छंद निर्माण का प्रयास किया गया है। माँ सरस्वती की कृपा से अब तक ३ मात्रा से दस मात्रा तक में २०० से अधिक नए छंद अस्तित्व में आ चुके हैं। इन्हें सारस्वत सभा में प्रस्तुत किया जा रहा है। आप भी इन छंदों के आधार पर रचना करें तो स्वागत है। शीघ्र ही हिंदी छंद कोष प्रकाशित करने का प्रयास है जिसमें सभी पूर्व प्रचलित छंद और नए छंद एक साथ रचनाविधान सहित उपलब्ध होंगे। 
भवानी छंद 
*
विधान: 
प्रति पद ५ मात्राएँ। 
पदादि या पदांत: यगण। 
सूत्र: य, यगण, यमाता, १२२। 
उदाहरण:
सुनो माँ! 
गुहारा। 
निहारा, 
पुकारा। 
*
न देखा 
न लेखा 
कहीं है 
न रेखा 
कहाँ हो 
तुम्हीं ने 
किया है
इशारा 
*
न पाया 
न खोया 
न फेंका 
सँजोया 
तुम्हीं ने 
दिया है 
हमेशा 
सहारा 
*
न भोगा 
न भागा
न जोड़ा 
न त्यागा 
तुम्हीं से 
मिला है
सदा ही 
किनारा 
*************************
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४ 

doha salila

दोहा सलिला 
*
श्याम-गौर में भेद क्या, हैं दोनों ही एक 
बुद्धि-ज्ञान के द्वैत को, मिथ्या कहे विवेक
*
राम-श्याम हैं एक ही, अंतर तनिक न मान 
परमतत्व गुणवान है, आदिशक्ति रसखान
*
कृष्ण कर्म की प्रेरणा, राधा निर्मल नेह 
सँग अनुराग-विराग हो, साधन है जग-देह
*
कण-कण में श्री कृष्ण हैं, देख सके तो देख 
करना काम अकाम रह, खींच भाग्य की रेख
*
मुरलीधर ने कर दिया, नागराज को धन्य 
फण पर पगरज तापसी, पाई कृपा अनन्य
*
आत्म शक्ति राधा अजर, श्याम सुदृढ़ संकल्प 
संग रहें या विलग हों, कोई नहीं विकल्प
*
हर घर में गोपाल हो, मातु यशोदा साथ 
सदाचार बढ़ता रहे, उन्नत हो हर माथ
*
मातु यशोदा चकित चित, देखें माखनचोर
दधि का भोग लगा रहा, होकर भाव विभोर
*

ekaksharee doha

एकाक्षरी दोहा: 
आनन्दित हों, अर्थ बताएँ
*
की की काकी कूक के, की को काका कूक.
काका-काकी कूक के, का के काके कूक.
*​
एक द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*
यह द्विपदी अश्वावातारी जातीय बीर छंद में है

navgeet- samay

नवगीत:
समय पर अहसान अपना...
संजीव 'सलिल'
*
समय पर अहसान अपना
कर रहे पहचान,
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हम समय का मान करते,
युगों पल का ध्यान धरते.
नहीं असमय कुछ करें हम-
समय को भगवान करते..
अमिय हो या गरल-
पीकर जिए मर म्रियमाण.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हमीं जड़, चेतन हमीं हैं.
सुर-असुर केतन यहीं हैं..
कंत वह है, तंत हम हैं-
नियति की रेतन नहीं हैं.
गह न गहते, रह न रहते-
समय-सुत इंसान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
पीर हैं, बेपीर हैं हम,
हमीं चंचल-धीर हैं हम.
हम शिला-पग, तरें-तारें-
द्रौपदी के चीर हैं हम..
समय दीपक की शिखा हम
करें तम का पान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*