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मंगलवार, 23 जून 2026

जून २३, सॉनेट, विधायक, वर्षा गीत, घनश्याम छंद, ग़ज़लिका, द्विपदियाँ, मुक्तक

सलिल सृजन जून २३

*
१० थाट , १० राग , १० गीत
बिलावल - बौरा ही गया अँधियारा, सरे जग में हुआ उजियारा, बावर्ची
यमन - जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना, चितचोर
खमाज - कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, अमर प्रेम
भैरव - जागो मोहन प्यारे सांवरी सूरत मोरे मन भावे
           मोहे भूल गए साँवरिया,आवन कह गए अजहुँ न आए, बैजू बावरा
पूर्वी - हे रामा ये क्या हुआ तुम ऐसे हमें सताने लगे,
मारवा - हे री सखी मैं अंग अंग आज रंग डार दूँ ,
काफ़ी - ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,
            चुपके चुपके आँसू रात दिन बहाना याद है
आसावरी - आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल हमें
भैरवी - सुर की नदिया हर दिशा से बह के सागर में मिले
तोड़ी - जग में सुंदर है दो नाम, बोलो राम राम राम बोलो श्याम श्याम श्याम
         भोर भई तोरी बाट तकत पिया
ग़ज़लिका ० भोर भई जै जै सिया-राम प्रगट गईं ऊसा अभिराम . सुरज देवता दमक रए दिन कर दिनकर लें परनाम . करें कलेवा राधा-कान्ह जाएँ पढ़बे सारद-धाम . आलस मत कर री बन्नो! भई दुपैरी निबटा काम . टप टप बूँदें नच बरसें संझा बाती बार ललाम . सपन दिखाए रे रजनी बंद नैन कर हो बिसराम . चिंता-फिकर न कर की कर भली करेंगें प्रभु गुणधाम २३.६.२०२६ ०००
सॉनेट
विधायक
अंधेर नगरी चौपट राजा
बिकें टके के तीन विधायक
रुपै सेर भाजी, टके सेर खाजा
सत्ता-पद-मद हुए नियामक
आपन मुख आपन प्रभुताई
निज कवित्त ही लागे नीका
भले अंत में हो रुसवाई
कर निज माथे पर खुद टीका
संविधान को दिखला ठेंगा
लोकतंत्र का गला घोंट दे
नाग-साँप कुर्सी पर बैठा
जो विषधर तू उसे वोट दे
पंडे झंडे डंडे की जय
बोलो, अंडे खाओ निर्भय
२३-६-२०२२
•••
दो दुम का दोहा
उषा सूर्य कर गह कहे, जगो हो गई भोर।
आलस तजकर थाम लो, श्रम-कोशिश की डोर।।
सफलता तभी मिलेगी
कहानी नई बनेगी
ग़ज़लिका
*
माता जिसकी सूरत है, वह मूरत है साकार पिता
लेन-देन कहिए, या मुद्रा माँ है तो व्यापार पिता
माँ बिन पिता, पिता बिन माता कैसे कहिए हो सकते?
भव्य इमारत है मैया तो है उसका आधार पिता
यह काया है वह छाया है, यह तरु वह है पर्ण हरे
माँ जीवन प्रस्ताव मान सच, जिसका है स्वीकार पिता
अर्पण और समर्पण की हैं परिभाषा अद्भुत दोनों
पिता बिना माता बेबस हैं, माता बिन लाचार पिता
हम दोनों उन दोनों से हों, एक दूसरे के पूरक
यही चाहते रहे हमेशा माँ दुलार कर प्यार पिता
***
२३-६-२०२०
मुक्तक
*************************
हम हैं धुर देहाती शहरी दंद-फंद से दूर
पुलकित होते गाँव हेर नभ, ऊषा, रवि, सिंदूर
कलरव-कलकल सुन कर मन में भर जाता है हर्ष
किलकिल तनिक न भाती, घरवाली लगती है हूर.
*
तुम शहरी बंदी रहते हो घर की दीवारों में
पल-पल घिरे हुए अनजाने चोरों, बटमारों में
याद गाँव की छाँव कर रहे, पनघट-अमराई भी
सोच परेशां रहते निश-दिन जलते अंगारों में
***************************************
वर्षा गीत
पानी दो, अब पानी दो
मौला धरती धानी दो, पानी दो...
*
तप-तप धरती सूख गयी
बहा पसीना, भूख गई.
बहुत सयानी है दुनिया
प्रभु! थोड़ी नादानी दो, पानी दो...
*
टप-टप-टप बूँदें बरसें
छप-छपाक-छप मन हर्षे
टर्र-टर्र बोले दादुर
मेघा-बिजुरी दानी दो, पानी दो...
*
रोको कारें, आ नीचे
नहा-नाच हम-तुम भीगे
ता-ता-थैया खेलेंगे
सखी एक भूटानी दो, पानी दो...
*
सड़कों पर बहता पानी
याद आ रही क्या नानी?
जहाँ-तहाँ लुक-छिपते क्यों?
कर थोड़ी मनमानी लो, पानी दो...
*
छलकी बादल की गागर
नचे झाड़ ज्यों नटनागर
हर पत्ती गोपी-ग्वालन
करें रास रसखानी दो, पानी दो...
२३-६-२०१७
विमर्श:
छंद सलिला:
सोलह अक्षरी वार्णिक घनश्याम छंद
लक्षण: जगण जगण भगण भगण भगण गुरु
मापनी: १२१ १२१ २११ २११ २११ २
लय: ललालल लाल लाल ललालल लाल लला
***
यति: ५-५-६
नहीं रुकना, नहीं झुकना, बदनाम न हो
नहीं जगना, नहीं उठना, यश-नाम न हो
नहीं लड़ना, नहीं भिड़ना, चुक शाम न हो
यहीं मरना, यहीं तरना, प्रभु वाम न हो
*
यति: १०, ६
विशाल वितान देख जरा, मत भाग कभी
ढलाव-चढ़ान लेख जरा, मत हार कभी
प्रयास-विकास रेख बने, मनुहार सदा
मिलाप-विछोह दे न भुला, कर प्यार सदा
*
यति ६, १०
करो न विनाश, हो अब तो कुछ काम नया
रहो न हताश, हो अब तो परिणाम नया
जुटा न कबाड़, सूरज सा नव भोर उगा
बना न बिगाड़, हो तब ही यश-नाम नया
***
टीप: कृपया बताएँ-
१. घनश्याम एक छंद है या छंद समूह (जाति)?
२. एक ही मापनी पर रचित छंदों में गति-यति परिवर्तन स्वीकार्य हो या न हो?
३. क्या गति-यति परिवर्तन से बनी छंद, नए छंद कहे जाएँ?
४. यदि हाँ, तो इस तरह बने असंख्य छंदों के नामकरण कौन, किस आधार पर करेगा?
५. हिंदीतर छंदों (लावणी, माहिया, सोनेट, कपलेट, बैलेड, हाइकु, तांका स्नैर्यु आदि) को हिंदी छन्दशास्त्र का अंग कहा जाए या नहीं?
६. गणों से साम्य रखनेवाले लयखंड (रुक्न) और उनसे निर्मित छंद (बहर) हिंदी की हैं या अन्य भाषा की?
७. लोकगीतों में प्रयुक्त लयखंड हिंदी छंद शास्त्र का हिस्सा हैं या नहीं? यदि हैं तो उनकी मापनी कौन-कैसे-कब निर्धारित करेगा?
==========
***
पुस्तक चर्चा-
संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें
आचार्य भगवत दुबे
*
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, पुस्तकालय संस्करण ३००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१]
कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेदनात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।
गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधार, आपदा निवारण व शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं।
इंजीनियर्स फोरम (भारत) के महामंत्री के रूप में अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सार्थक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं।
अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प के साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।
सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के प्रति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है।
'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिपा माल दो
जगो, उठो।'
उठो सूरज, जगो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति के उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं-
'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिन उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ता फूल।'
गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'मत हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।
'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'
पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है।
मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री
समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायें दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
लिये शपथ सब संविधान की
देश देवता है सबका
देश-हितों से करो न सौदा
तुम्हें वास्ता है रब का
सत्ता, नेता, दल, पद झपटो
करो न सौदा जन-हित का
भार करों का इतना ही हो दरक न जाएँ दीवारें
कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।
आचार्य भगवत दुबे
महामंत्री कादंबरी
२३-६-२०१६
***
ग़ज़लिका
*
साँझ शर्मा गयी, गुलाल हुई
क्या कहूँ?, हाय! बेमिसाल हुई
*
एक पल में हँसी वो बच्ची सी
दूसरे पल मचल, धमाल हुई
*
फ़िक्र में माँ दुपहरी दुबलाई
रात दादी मिली, निहाल हुई
*
चाँद माथे सजा, लगे सूरज
चाँदनी जिस्म-ढल कमाल हुई
*
होंठ हैं या कमल की पंखुड़ियाँ?
मुस्कुराहट भ्रमर-रसाल हुई
*
ओढ़नी-टाँक ओढ़कर तारे
ज़ुल्फ़ काली नची निढाल हुई
*
अँजुरी में 'सलिल' लिया बरबस
रूप देखे नज़र सवाल हुई
***
२३-६-२०१५
***
चौपाल चर्चा:
जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद ३७०
*
भारत की स्वतंत्रता के समय भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ के अनुसार भारतीय रियासतों को छूट थी कि वे भारत या पाकिस्तान में से जिसके साथ चाहें विलय करें या दोनों में से किसी से विलय न कर स्वतंत्र रहें। कश्मीर, हैदराबाद तथा जूनागढ़ को छोड़कर शेष रियासतों ने अधिमिलन पत्र हस्ताक्षरित कर भारत के साथ मिलन स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ की जनता ने नवाब से विद्रोह कर भारत में विलय की घोषणा कर दी तो नवाब पाकिस्तान भाग गया। हैदराबाद में जनता भारत चाहती थी जबकि नवाब पाकिस्तान में। तब सरदार पटेल ने सैन्य कार्यवाही कर जनता के चाहे अनुसार नवाब को भारत में विलय स्वीकारने हेतु बाध्य कर दिया।
जम्मू-कश्मीर के एक भाग में मुस्लिम जनसँख्या अधिक थी तो दूसरे में हिंदू, राजा हिन्दू तो वज़ीर मुसलमान। मुसलमान वज़ीर शेख अब्दुल्ला तथा जनता भारत में विलय के पक्ष में थे, पाकिस्तान मुस्लिम आबादी का आधार लेकर अपना दावा कर रहा था, जबकि महाराज हरिसिंह स्वतंत्र देश के रूप में रहना चाहते थे। पाकिस्तान ने अनिश्चितता का लाभ उठाने की नियत से फ्रोंटियर के पठानों को शस्त्र देकर कश्मीर पर हमलाकर कब्ज़ा करने के लिए भेजा। अपना बचाव करने में असमर्थ होकर २६-१०-१९४७ को महाराज ने भारत सरकार के पास विलय पत्र भेजा।
महाराज तथा भारत सरकार के बीच वार्ता में महाराजा ने जनप्रतिनिधियों के सहयोग से उत्तरदायी सरकार बनाकर वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराना तथा कश्मीरी संविधान निर्माण हेतु विधान सभा बनाना स्वीकार कर ५-३-१९४८ को उद्घोषणा जारी की।महाराज के स्थान सत्तासीन युवराज कर्णसिंह ने २५-११-१९४९ को एक उद्घोषणा जारी की जिसके आधार पर संविधान के भाग २१ में अनुच्छेद ३७० अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध सम्मिलित कर ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा दिया है। इसके अनुसार अनुच्छेद २३८ के उपबंध जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होंगे। इस राज्य के सम्बन्ध में भारत की कानून बनाने की शक्ति उन विषयों तक सीमित होगी जिनको राष्ट्रपति राज्य सरकार से परामर्श कर अधिमिलन पत्र में निर्दिष्ट ऐसे विषय के रूप घोषित कर दे उक्त जिस पर भारत कानून बना सकता है।
अतः संसद को जम्मू -कश्मीर के सम्बन्ध में स्वरक्षा, यातायात, मुद्रा (सिक्का) तथा विदेश नीति के सम्बन्ध में ही कानून बनाने का अधिकार है. अन्य विषयों पर कानून कश्मीर सरकार की सहमति से ही बनाया जा सकता है। राष्ट्रपति ने संविधान जम्मू-कश्मीर में प्रभावशील होने का आदेश १९५० में जारी तथा १९५४ में परिवर्तित किया। अनुच्छेद २४६ के अनुसार अवशिष्ट शक्तियाँ संसद को नहीं कश्मीर विधान सभा को है।
इस अनुच्छेद के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विविध वादों में निर्गत निर्णयों के अनुसार यह अनुच्छेद अस्थायी है किन्तु इसे राज्य विधान सभा की सहमति से ही समाप्त किया जा सकता है।
इसी अनुच्छेद में गुजरात, महाराष्ट्र, नागालैंड, सिक्किम मिजोरम आदि सम्बन्धी विशेष उपबंधों की चर्चा है।
***
गीत:
मौसम बदल रहा है…
*
मौसम बदल रहा है
टेर रही अमराई
परिवर्तन की आहट
पनघट से भी आई...
*
जन आकांक्षा नभ को
छूती नहीं अचंभा
छाँव न दे जनप्रतिनिधि
ज्यों बिजली का खंभा
आश्वासन की गर्मी
सूरज पीटे डंका
शासन भरमाता है
जनगण मन में शंका
अपचारी ने निष्ठा
बरगद पर लटकाई
सीता-द्रुपदसुता अब
घर में भी घबराई...
*
मौनी बाबा गायब
दूजा बड़बोला है
रंग भंग में मिलकर
बाकी ने घोला है
पत्नी रुग्णा लेकिन
रास रचाये बुढ़ापा
सुत से छोटी बीबी
मिले शौक है व्यापा
घोटालों में पीछे
ना सुत, नहीं जमाई
संसद तकती भौंचक
जनता है भरमाई...
*
अच्छे दिन आये हैं
रखो साल भर रोजा
घाटा घटा सकें वे
यही रास्ता खोजा
हिंदी की बिंदी भी
रुचे न माँ मस्तक पर
धड़क रहा दिल जन का
सुन द्वारे पर दस्तक
क्यों विरोध की खातिर
हो विरोध नित भाई
रथ्या हुई सियासत
निष्कासित सिय माई...
२३-६-२०१४
***
नवगीत:
करो बुवाई...
*
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
२३-६-२०११
***
ग़ज़लिका:
आँख का पानी
*
आजकल दुर्लभ हुआ है आँख का पानी.
बंद पिंजरे का सुआ है आँख का पानी..
शिलाओं को खोदकर नाखून टूटे हैं..
आस का सूखा कुंआ है आँख का पानी..
द्रौपदी को मिल गया है यह बिना माँगे.
धर्मराजों का जुआ है आँख का पानी..
मेमने को जिबह करता शेर जब चाहे.
बिना कारण का खुआ है आँख का पानी..
हजारों की मौत भी उनको सियासत है.
देख बिन बोले चुआ है आँख का पानी..
किया मुजरा, मिला नजराना न तो बोले-
जहन्नुम जाए मुआ! खो आँख का पानी..
देवकी राधा यशोदा कभी विदुरानी.
रुक्मिणी कुंती बुआ आँख का पानी..
देख चन्दा याद आतीं रोटियाँ जिनको
दिखे सूरज में पुआ बन आँख का पानी..
भजन प्रवचन सबद साखी साधना बानी
'सलिल' पुरखों की दुआ है आँख का पानी..
***
कुछ द्विपदियाँ :
वक्-संगति में भी तनिक, गरिमा सके न त्याग.
राजहंस पहचान लें, 'सलिल' आप ही आप..
*
चाहे कोयल-नीड़ में, निज अंडे दे काग.
शिशु न मधुर स्वर बोलता, गए कर्कश राग..
*
रहें गृहस्थों बीच पर, अपना सके न भोग.
रामदेव बाबा 'सलिल', नित करते हैं योग..
*
मैकदे में बैठकर, प्याले पे प्याले पी गये.
'सलिल' फिर भी होश में रह, हाय! हम तो जी गए..
*
खूब आरक्षण दिया है, खूब बाँटी राहतें.
झुग्गियों में जो बसे, सुधरी नहीं उनकी गतें..
*
थक गए उपदेश देकर, संत मुल्ला पादरी.
सुन रहे प्रवचन मगर, छोड़ें नहीं श्रोता लतें.
*
२३-६-२०१०

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

सॉनेट, द्विपदियाँ, मुक्तक, व्यंग्य लेख, मुक्तिका, गीत, नवगीत

सॉनेट 
कामना 
*
कामना हो साथ हर दम
काम ना छोड़े अधूरा 
हाथ जो ले करे पूरा
कामनाएँ हों न कम

का मनाया?; का मिला है?
अनमना है; उन्मना है
क्यों इतै नाहक मुरझना?
का मना! तू कब खिला है?

काम ना- ना काम मोहे
काम ना हो तो परेशां
काम ना या काम चाहे?

भला कामी या अकामी?
बनो नामी या अनामी?
बूझता जो वही सामी
संजीव 
१३-१२-२२
जबलपुर, ७•०४
●●●
***
द्विपदियाँ
फ़िक्र वतन की नहीं तनिक, जुमलेबाजी का शौक
नेता को सत्ता प्यारी, जनहित से उन्हें न काम
*
कुर्सी पाकर रंग बदल, दें गिरगिट को भी मात
काम तमाम तमाम काम का, करते सुबहो-शाम
१३-१२-२०२०
***
मुक्तक
*
कुंज में पाखी कलरव करते हैं
गीत-गगन में नित उड़ान नव भरते हैं
स्नेह सलिल में अवगाहन कर हाथ मिला-
भाव-नर्मदा नहा तारते तरते हैं
*
मनोरमा है हिंदी भावी जगवाणी
सुशोभिता मम उर में शारद कल्याणी
लिपि-उच्चार अभिन्न, अनहद अक्षर है
शब्द ब्रह्म है, रस-गंगा संप्राणी है
*
जैन वही जो अमन-चैन जी-जीने दे
पिए आप संतोष सलिल नित, पीने दे
परिग्रह से हो मुक्त निरंतर बाँट सके-
तपकर सुमन सु-मन जग को रसभीने दे
*
उजाले देख नयना मूँदकर परमात्म दिख जाए नमन कर
तिमिर से प्रगट हो रवि-छवि निरख मन झूमकर गाए नमन कर
मुदित ऊषा, पुलक धरती, हुलस नभ हो रहा हर्षित चमन लख
'सलिल' छवि ले बसा उर में करे भव पार मिट जाए अमन कर
१२-१२-२०२०, ६.४५
***
व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।
हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।
'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।
लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।
हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।
'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
१३-१२-२०१८
***
द्विपदी भय की नाम-पट्टिका पर, लिख दें साहस का नाम.
कोशिश कभी न हारेगी, बाधा को दें पैगाम.
१३-१२-२०१७
***
मुक्तिका
*
मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा.
जो छिपा है राज खोलूँगा.
*
अनतुले अब तक रहे हैं जो
बिना हिचके उन्हें तोलूँगा.
*
कालिया है नाग काला धन
नाच फन पर नहीं डोलूँगा.
*
रूपए नकली हैं गरल उसको
मिटा, अमृत आज घोलूँगा
*
कमीशनखोरी न बच पाए
मिटाकर मैं हाथ धो लूँगा
*
क्यों अकेली रहे सच्चाई?
सत्य के मैं साथ हो लूँगा
*
ध्वजा भारत की उठाये मैं
हिन्द की जय 'सलिल' बोलूँगा
***
गीत
खाट खड़ी है
*
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
हल्ला-गुल्ला,शोर-शराबा
है बिन पेंदी के लोटों का.
*
नकली नोट छपे थे जितने
पल भर में बेकार हो गए.
आम आदमी को डँसने से
पहले विषधर क्षार हो गए.
ऐसी हवा चली है यारो!
उतर गया है मुँह खोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
नाग कालिया काले धन का
बिन मरे बेमौत मर गया.
जल, बहा, फेंका घबराकर
जान-धन खाता कहीं भर गया.
करचोरो! हर दिन होना है
वार धर-पकड़ के सोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
बिना परिश्रम जोड़ लिया धन
रिश्वत और कमीशन खाकर
सेठों के हित साधे मिलकर
निज चुनाव हित चंदे पाकर
अब हर राज उजागर होगा
नेता-अफसर की ओटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
१३-१२-२०१६
***
नवगीत:
*
लेटा हूँ
मखमल गादी पर
लेकिन
नींद नहीं आती है
.
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बर्तनवाली बाई
देह सांवरी नयन कटीले
अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन
खनके चूड़ी
जाने क्या गाती है
मुझ जैसे
लक्ष्मी पुत्र को
बना भिखारी वह जाती है
.
उस करवट ने साफ़-सफाई
करनेवाली छवि दिखलाई
आहा! उलझी लट नागिन सी
नर्तित कटि ने नींद उड़ाई
कर ने झाड़ू जरा उठाई
धक-धक धड़कन
बढ़ जाती है
मुझ अफसर को
भुला अफसरी
अपना दास बना जाती है
.
चित सोया क्यों नींद उड़ाई?
ओ पाकीज़ा! तू क्यों आई?
राधे-राधे रास रचाने
प्रवचन में लीला करवाई
करदे अर्पित
सब कुछ
गुरु को
जो
वह शिष्या
मन भाती है
.
हुआ परेशां नींद गँवाई
जहँ बैठूं तहँ थी मुस्काई
मलिन भिखारिन, युवा, किशोरी
कवयित्री, नेत्री तरुणाई
संसद में
चलभाष देखकर
आत्मा तृप्त न हो पाती है
मुझ नेता को
भुला सियासत
गले लगाना सिखलाती है

१३-१२-२०१४
***
गीत
क्षितिज-फलक पर...
*
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
रजनी की कालिमा परखकर,
ऊषा की लालिमा निरख कर,
तारों शशि रवि से बातें कर-
कहदो हासिल तुम्हें हुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
राजहंस, वक, सारस, तोते
क्या कह जाते?, कब चुप होते?
नहीं जोड़ते, विहँस छोड़ते-
लड़ने खोजें कभी खुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
मेघ जल-कलश खाली करता,
भरे किस तरह फ़िक्र न करता.
धरती कब धरती कुछ बोलो-
माँ खाती खुद मालपुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
रमता जोगी, बहता पानी.
पवन विचरता कर मनमानी.
लगन अगन बन बाधाओं का
दहन करे अनछुआ-छुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
चित्र गुप्त ढाई आखर का,
आदि-अंत बिन अजरामर का.
तन पिंजरे से मुक्ति चाहता
रुके 'सलिल' मन-प्राण सुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
१३-१२-२०१२
***

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

सॉनेट,साहित्य संगम,नवगीत, दोहे, द्विपदियाँ,गरिमा सक्सेना,चंद्रकांता अग्निहोत्री,रामकुमार चतुर्वेदी

सॉनेट 
दीप्ति
दीप्ति तम मिटा  दे प्रकाश नव
आत्म दीप प्रज्ज्वलित करें हम
जीवन में व्यापे हुलास नव 
कर पाएँ जग से कुछ गम कम

दीप्त रहे मन-प्राण हमारा
शांति पा सकें, स्नेह लुटाकर
कभी किसा का बनें सहारा
द्वेष-घृणा को दूर भगाकर 

बाती जले, तेल चुक जाए
किंतु श्रेय दीपक को मिलता
जग उजियारे की जय गाए
जीवन तम से मगर जनमता

दीप्तिमान हों मैं-तुम, हम सब
देख सकें सबके भीतर रब
२६-७-२०२२
•••
साहित्य संगम को समर्पित
जबलपुर में हो रहा 'साहित्य संगम' सफल हो
शारदा की हो कृपा, साहित्य महिमा अचल हो

श्रावणी वातावरण में, 'ज्ञानश्री' सब मिल वरें
'तृप्ति' पायें; छंद 'छाया' बैठ कर कवि मन तरें

स्नेह दें-लें, 'मंत्र' जीवन में यही पल-पल जपें
हों अनंत 'बसंत' रच साहित्य सुंदर हम तपें

'कलावती' हो 'मनीषा'; सृजन 'उमा' 'पूजा' सदृश
देख 'सुषमा' संग 'गीता' , 'सुरेखा' प्रगटे अदृश

'मुकुल' मुकुल कर मेघ, कहें कीर्ति साहित्य की
'रश्मि' 'दीप्ति' 'सुशील', 'ममता' मय आदित्य की

'स्वर्ण लता' लख छंद की, 'मनसिज' आप प्रबुद्ध हो
हों 'भगवान सहाय' आ, बुद्धि 'विनीता' सिद्ध हो

'राजेश्वरी' 'आशीष' दें, 'लवकुश' 'रामप्रकाश' पा
'शिवशंकर' हो आत्म, कर 'परिहार' 'नरेंद्र' आ

'राजन' हो 'राजेश', जब हो 'प्रियंक' 'सुधीर'
'विक्रम' का 'अभिषेक' कर, 'प्रांशु' बने मतिधीर

आ 'सुनील' 'जगदीश' भी, करता रस का पान
पूजे सदा 'सतीश' को, बन 'दिलीप' रसखान
२६-७-२०२१
***
नवगीत
*
फ्रीडमता है बोल रे!
हिंगलिश ले आनंद
अपनी बोली बोलते
जो वे हैं मतिमंद
होरी गारी जस भुला
बंबुलिया दो त्याग
राइम गाओ बेसुरा
भूलो कजरी फाग
फ़िल्मी धुन में रेंककर
छोड़ो देशी छंद
हैडेक हो रओ पेट में
कहें उठाके शीश
अधनंगी हो लेडियाँ
परेशान लख ईश
वेलेंटाइन पूज तू
बिसरा आनंदकंद
*
२७-७-२०२०

***
द्विपदियाँ 

न केवल बात में, हालात में भी है वहाँ सीलन
जहाँ फौजों के साए में, चुनावी जीत होती है


न बारिश तुम इसे समझो, गिरा है आँख से पानी.
जो आहों का असर होगा, कहाँ जाओगे ये सोचो.


ग़ज़ल कहती न तू आ भा, ग़ज़ल कहती है जी मुझको
बताऊँ मैं उसे कैसे, जिया है हमेशा तुझको


नेता नौटंकी करे, कहकर आम चुनाव.
जिसको चाहे लड़ा दे, डगमग है अब नाव.

चमक रहे चमचे चतुर, गोल-मोल हर बात
पोल ढोल की खुल रही, नाजुक हैं हालात

शोक न करता जो कभी, कहिए उसे अशोक.
जो होता होता रहे, कोई न सकता रोक.

वही द्विवेदी जो पढ़े, योग-भोग दो वेद.
अंत समय में हो नहीं, उसको किंचित खेद.

मन के मनसबदार! तुम, कहो हुए क्यों मौन?
तनकर तन झट झुक गया, यहाँ किसी का कौन?

डर से डर ही उपजता, मिले स्नेह को स्नेह.
निष्ठा पर निष्ठा अडिग, सम हो गेह-अगेह.
***
समीक्षा :
''है छिपा सूरज कहाँ पर'' : खोजिए नवगीत में
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल"
*
[कृति विवरण : है छिपा सूरज कहाँ पर, नवगीत संग्रह, गरिमा सक्सेना, प्रथम संस्करण २०१९, आई.एस.बी.एन. ९७८९३८८९४६१७९, आकार २२ से.मी. x १४.से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द लेमिनेटेड जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य २००/-, बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा। लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क : २१२ ए ब्लॉक, सेंचुरी सरस् अपार्टमनत, अनंतपुरा मार्ग, यलहंका, बेंगलोर ५६००६४, चलभाष ७६९४९२८४४८, ईमेल : garimasaxena1990@gmail.com ]
*
साहित्य समाज का समय सापेक्ष दर्पण है जिसमें उज्जवल-मलिन छवि बिना किसी लाग-लपेट के देखी जा सकती है। साहित्य स्वयं पूरी तरह निरपेक्ष होता है किन्तु साहित्यकार प्राय: तटस्थ नहीं होता। हर रचनाकार की अपनी मान्यताएँ और प्रतिबद्धताएँ होती हैं। साहित्य भाषा, अनुभूति और भाव की त्रिवेणी है जिओ सतत प्रवाहित हो तो निर्मल और किसी प्रतिबद्धता के कुएँ में कैद होकर मलिन हो जाती है। साहित्य लेखन, पठान और समीक्षण तीनों स्तरों पर गतागत का संघर्ष स्वाभाविक है। साहित्यकार जिन्हें पढ़कर लिखने सीखता है, सीखते ही उनसे भिन्न पथ पर जाता है किन्तु किसी वैचारिक खूँटे से बँधे स्वयंभूजन उसे नकारने या अपने खेमे में खींचने-घसीटने का प्रयास करते हैं। समय, भाषा और साहित्य सतत परिवर्तनशील होता है किन्तु ये तथाकथित प्रतिबद्ध मठाधीश परिवर्तन को नकारकर अपनी मान्यताओं को थोपकर खुद को धन्य अनुभव करते हैं। समाज के युवा जनों को आकर्षित करती विधाएँ नवगीत, व्यंग्य लेख हुए लघुकथा के क्षेत्र में यह द्व्न्द सहज दृष्टव्य है।
नवोदित नवगीतकार रचना सक्सेना इस सबसे परिचित होकर भी किसी खेमे में कैद न होकर बेबाकी से अपनी अनुभूतियों को नवगीत में अभिव्यक्त कर सकी हैं, इसके लिए उन्हें सराहा जाना चाहिए। डॉ. कुंअर बेचैन ने ठीक ही लिखा है "जैसे बागों में हर वर्ष पतझर का मौसम भी आता है और वसंत का भी, पतझर में पुराने पत्ते झर जाते हैं और फिर नई कोंपलें आती हैं। ऐसे ही हमारे जीवन में उम्र और परिस्थिति के अलग-अलग पड़ावों पर हमारे भाव, हमारे विचार, हमारी जीवन शैली, हमारे भाषा-व्यवहार और अगर हम साहित्य से जुड़े रचनाकार हैं तो कुछ नया करने का भाव भी बदलता जाता है। गीतकार का मन भी एक वृक्ष की तरह होता है, उस पर भी भावनाओं-अनुभूतियों और उनकी शब्दाभिव्यक्तियों के नए-नए रूप जैसे प्रतीकों की नवीनता, बिम्बों की नवीनता और गीतों के आकार का स्वरूप आदि बदलते जाते हैं। यह नव्यता ही गीत को नवगीत की ओर ले जाती है।" नवगीत के उद्भव से अब तक नवगीतकारों के कथ्य और शिल्प में यह बदलाव सहज दृष्टव्य है। गरिमा के नवगीत इस बदलाव के साक्षी हैं।
गरिमा के व्यक्तित्व में भाव पक्ष और बुद्धि पक्ष के सहल-सार्थक तालमेल की उपज हैं ये नवगीत। गरिमा के शब्दों में "गीत वही है जो किसी एक ह्रदय से उपजकर हर ह्रदय का स्वर स्वत्: ही बन जाये। अधिक निजी पैन लिए गीत या अत्यधिक क्लिष्ट गीत आमजन के मन तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि उनका संबंध लोक से स्थापित नहीं हो पता है, न ही वे आम जन के लिए उपयोगी हो पते हैं। गीत का विस्तार तभी हो पायेगा जब गीत समाज में वर्तमान की व्याप्तियों को अभिव्यक्त कर पाएंगे और सबकी पीड़ा का आभास कर सकेंगे और गीत का प्रयोजन तब पूर्ण होगा जब न केवल घाव को इंगित करें बल्कि उन घावों पर समाधान का मरहम भी लगाने का प्रयत्न करें। ऐसे में गीत को सामाजिक यथार्थ को समझना होगा, वह भी गीत के शिल्प, लय, गेयता, भाव आदि विशिष्टताओं को बचाते हुए।"
'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत तिमिर से भयाक्रांत नहीं हैं। वे तमस की भयावहता का चित्रण कर रुकते भी नहीं, वे अँधेरे में भटकते भी नहीं अपितु उजास देने या राह तलाशने की कोशिश करते हैं। समाज में व्याप्त असंगति का संकेत संकलन के आरम्भ में ही है-
है बदलता आस में पन्ने कलेंडर
पर छाला जाता है बस प्रस्ताव से
ताख पर सिद्धांत
धन की चाह भारी
हो गया है आज
आँगन भी जुआरी
रोज ही गंदला रहा है आँख का जल
स्वार्थ ईर्ष्या के हुए ठहराव से
प्रतिबद्ध रचनाकारों के नवगीत इस ठहराव के आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि उनकी यह मान्यता है की नवगीत वैषम्य धर्मा है, दिशा दर्शन या पीर-हरण से नवगीत को कुछ लेना-देना नहीं है। मेरी कृतियों 'काल है संक्रांति का' और 'सड़क पर' को इसी पूर्वाग्रही दृष्टिका शिकार होना पड़ा। मैं देख पाता हूँ कि मुखपोथी (फेसबुक) पर उदित हो रही नई कलमें ही नहीं नवगीतकारों की प्रतिष्ठित हो रही नई पीढ़ी जिसमें संध्या सिंह, अशोक गीते, मधु प्रधान, मधु प्रसाद, पूर्णिमा बर्मन, जयप्रकाश श्रीवास्तव, बृजमोहन श्रीवास्तव, डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', रामशंकर वर्मा, डॉ. प्रदीप शुक्ल, शीला पाण्डे, डॉ. रंजना गुप्ता, बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार, रविशंकर मिश्र, धीरज श्रीवास्तव, कृष्ण 'शलभ', छाया सक्सेना आदि भी अपने नवगीतों में सांत्वना, सहानुभूति और सामाजिक सरोकारों को सुदृढ़ करने के स्वर घोल रहे हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश को नवगीत कोष में स्थान नहीं मिला है। कारण उनसे अपिरचय हो या उनकी अवहेलना नवगीत के लिए दोनों ही दृष्टियों से परिवर्तन की पदचाप को अनसुना किया जाना हितकर नहीं है। गरिमा के नवगीत 'समाधान के गीत' लिखकर इस पीढ़ी का प्रतिनिधि स्वर बन पाती है-
हरे-भरे जीवन के पत्ते
हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें
समाधान के गीत
अँधियारे पर कलम चलकर
सूरज नया उगायें
उम्मीदों के पंखों को
विस्तृत आकाश थमायें
चलो हाय-तौबा की, डर की
आज गिरायें भीत
इन गीतों में सामाजिक वैषम्य को विविध बिम्बों, रूपकों और उपमाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है- 'गाँवों के भी मन-मन अब / उग आये हैं शूल / देख चकित हो रहा बबूल', 'बने बिजूके हम सब / वर्षों से चुपचाप ख़डे', 'रेत हो रही नदियाँ / खोया कल-कल का उल्लास', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से, 'इस सूखे में बीज न पनपे / फिर जीवन से ठना युद्ध है', सुर्ख लावा हो गए हैं / पाँव तपती रेत में', 'वृद्धाश्रम में माँ बेटे की / राह देखती', 'हम अधीन हो गए / सफल हो गया नियोजन', 'धन अर्जित कर सहे जा रहे / निज मूल्यों की मंदी हम', 'राजमार्ग पर सपने सजते / पगडंडी का घाव हरा है', 'ओझल मुद्दों को करना है / हंगामा इसलिए जरूरी', 'राजनीति ने छला हमेशा / नदियों का विश्वास', 'क्षरित हुई ओज़ोन / बनी भू गरम कड़ाही है', 'नख से शिख तक है भ्रष्ट तंत्र / रो-रोकर कहते बाबूजी', सदा सियासत करते रहती / समझौंतों की ता-ता-थैया, आदि आदि पंक्तियों में देश-काल को विविध दृष्टियों से निरख-परख कर यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप गयी विसंगतियों का लेखा-जोखा इन नवगीतों के सर्जक की सजगता शब्द-शब्द में निहित है।
गीतों में अंतर्व्याप्त दूसरा तत्व है इन विसंगतियों के प्रति चेतना जागना। प्रथम चरण में विसंगतियों का आकलन तो हो गया यदि उस आकलन पर चिंतन न हो तो आकलन करना उद्देश्यहीन हो जायेगा। ' ढल रहा जो वक़्त / उसकी चाल का स्वर / कह रहा है आगमन का / वक़्त बदतर', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ / मौत का माहौल हैँ', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', कब तलक हम बरगदों की / छाँव में पलते रहेंगे', 'कोहरे की बढ़ गयी हैं टहनियाँ / मौत का माहौल है', 'पोखर-नाले भी करते हैं / अब उसका उपहास', 'जीवन के सच बतलाते हैं दाग पड़े गहरे / मगर बने प्रोफ़ाइल पिक्चर / दाग मुक्त चेहरे', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से', 'धन की कमी कहीं अच्छी थी / मन को मिले अभावों से', 'घायल कंधे, मन है व्याकुल / स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है', 'मैं ही क्यूँ? मेरे हिस्से क्यूँ? / सोचूँ लिखा मुश्किल ढोना', 'नैन मूंदकर बोलबो कब तक / पूजोगे तुम पाहुन को', 'सोच रहे है सुता -भाग्य में / क्यों लिक्खी है सिर्फ रसोई' आदि अभिव्यक्तियाँ केवल विसंगति का शब्दांकन नहीं करतीं उनके प्रति असंतोष को मुखर कर परिवर्तन की चेतना जगाती हैं।
गरिमा सक्सेना के नवगीत जिस तीसरे तत्व को मुखर करते हैं वह है विसगंतियों के आकलन से उपजी चेतना को बदलाव में बदलने का आव्हान या विसंगतियों की प्रतिक्रियावत उपजे प्रश्न। इस अंतर्वस्तु को उद्घाटित करती कुछ पंक्तियाँ देखें - 'हरे-भरे जीवन के पत्ते / हुए जा रहे पीत / आओ हम सब मिलकर गायें / समाधान के गीत', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ?', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', 'कैसे मानें सत्य, ट्रेंड में जब / जुमला है', 'आओ मिलकर आज लगायें / खुशियों की दो-चार फसल', 'कौन लड़ा है किसकी खातिर / खुद ही लड़ना है', चूक गया सूरज गगन का / अब उजाला कौन देगा?' आदि पंक्तियों से पाठक की मन:स्थिति परिवर्तन हेतु तत्पर होने की बनती है।
ये नवगीत आव्हान मात्र को भी पर्याप्त नहीं मानते। वे उपचार और समाधान भी सुझाते हैं- 'जी रहा जो वृहनला का / रूप धरकर / यदि जगे उस पार्थ के / गांडीव का स्वर / तो सुरक्षित हो सकेगा देश अपना / स्वयं पर ही हो रहे पथराव से', 'अँधियारे पर कलम चलकर / सूरज नया उगायें / उम्मीदों के पंखों को / विस्तृत आकाश थमायें / चलो हाय-तौबा की, डर की / आज गिरायें भीत', 'आग खोजें, कँपकँपाती हड्डियाँ', 'ढूँढ़ते हैं / है छिपा सूरज कहाँ पर .... चेतते हैं जड़ों की जकड़न छुड़ाकर ... चीखते हैं / आइए संयम भुलाकर। ... तोड़ते हैं स्वयं पर हावी हुआ डर ...', 'कुहरे का गुब्बारा / छेड़ गयी पिन / चीर निकल आई हैं / किरणें कमसिन ... साहस ने काट लिए पतझड़ के दिन', 'कूकने है लगी कोयल / देख ऋतु मधुमास की', 'हमें हमारी चिंता खुद ही / करनी होगी / कब तक मन का क्रोध रहेगा / सुविधा भोगी', नए वर्ष में जारी रक्खें / उम्मीदों की चहल-पहल', कब तक हम दीपक बालेंगे / हमको सूर्य उगाना होगा' आदि पंक्तियों में गरिमा परिवर्तन की अभिलाष को संकल्प तक ले जाती हैं।
नवगीतकारों की नयी पीढ़ी नवगीतों को 'अरण्य रोदन' मात्र न बनाकर उन्हें मांगलिक परिवर्तन और शुभत्व से जोड़ रहे है। यह स्वर १९८० से २०१० के मध्य जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण' के नवगीतों में था किन्तु तब नवगीतों को वैषम्य चित्रण तक सीमित रखने की जिद ने उन्हें नवगीत की परिधि में स्वीकार नहीं किया। अब नवगीतकारों की नई पीढ़ी नवगीत का सीमा विस्तार कर उसे विसंगति, विसंगति की प्रतीति, प्रतीति से उपजा आक्रोश और आक्रोश से परिवर्तन के संकल्प तक ले जा रही है। गरिमा सक्सेना के शब्दों में -
हवा आज आई है
लाल किले से होकर
बोल रही है नव विकास का
द्वार खुला है
यही नहीं गरिमा एक कदम और आगे बढ़कर परिवर्तन असफल न रह जाए, इसके प्रति भी चेताती हैं। संपूर्ण क्रांति और अन्ना आंदोलन की परिणति को देखते हुए गरिमा का यह चिंतन यथार्थवादी ही कहा जायेगा।
देखना फिर उग न आएँ
नागफनियाँ खेत में
इस कृति में वैचारिक दृष्टि से एक और नवाचार है। अन्न का मोल रुपये से नहीं चुकाया जा सकता। वास्तव में रूपया ममता, शिक्षा, स्नेह, श्रम, त्याग, समर्पण किसी का मोल नहीं चुका सकता।
नहीं अन्न का मोल रुपैया
अन्न बड़ी मेहनत से उगता
इसे उगाने की खातिर ही
कोई धूप, शीत सब सहता
कथ्य में नवता के साथ इस संकलन के नवगीत भाषिक दृष्टी से सटीक शब्दों का चयन कर रचे गए हैं। गरिमा की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा उन्हें प्रचुरशब्द संपदा और सांस्कारिक भाषा संपन्न बनाती है , यह समृद्धि नवगीतों में झलकती है।
'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत छंद वैविध्य की दृष्टि से प्रयोगधर्मिता कम है। पारंपरिक छंदों का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। सामान्यत: चार पंक्तियों के तीन अंतरों का प्रयोग कर गीत रचे गए हैं। मुखड़े में २ से ५ पंक्तियों का प्रयोग है। मात्रिक छंदों पर आधृत इन गीतों में लयबढ़ता और गेयता चारुत्व वृद्धि करती है। छंद वैविध्य ने इन नवगीतों की सरसता वृद्धि की है। कुछ उदाहरण देखें-
सरसी छंद
हरे-भरे जीवन के पत्ते,
हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें
समाधान के गीत
पादाकुलक छंद
अम्मा आँखों के स्याही से
नया नहीं कुछ लिख पाती हैं
विष्णुपद छंद
जहाँ कभी थीं हरसिंगार की
टेसू की बातें
चम्पा, बेली के संग कटतीं
थीं प्यारी रातें
अवतारी जातीय छंद
सदियों तक जो
शक्ति रही है जन जीवन की
तट को सींचा, प्यास बुझाई
जिसने तन की
चौपाई छंद
सुता किसी की ब्याह योग्य है
कहीं बीज का कर्जा भरी
जुआ किसानी हुआ गाँव में
मदद नहीं कोई सरकारी
सर्व विदित है कि चन्द्रमा में भी दाग होते हैं। ''है छिपा सूरज कहीं पर'' में क्रिया रूपों में समरूपता नहीं है। यथा - गायें पृष्ठ ३३, वर्जनाएँ पृष्ठ ४६, आई पृष्ठ ४७ , आयी पृष्ठ ७५, भायी पृष्ठ ४९, हुए पृष्ठ ५५ , गए पृष्ठ ५९, नई पृष्ठ ५१, तुरपाई पृष्ठ ६८, बुझायी पृष्ठ ७० आदि। अशुद्ध शब्द प्रयोग दुक्ख पृष्ठ ८२, रक्खें ८५। लिंग दोष - ऊपर से शिक्षा ऋण का / युवकों को गड़ती पिन।
दोहा संग्रह 'दिखते नहीं निशान' के पश्चात् यह गरिमा सक्सेना की दूसरी प्रकाशित कृति है। 'है छिपा सूरज कहीं पर' के नवगीत उनकी कारयित्री प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। यह कृति नवगीत में नवाचार की दृष्टी से महत्वपूर्ण है और नवगीत के नव आयामों में ले जाने में सक्षम है। गरिमा के अगले नवगीत संग्रह की प्रतीक्षा की जाएगी।
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[संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सभापति विश्ववाणी हिंदी संसथान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, salil.sanjiv@gmail.com ]
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समीक्षा
काल है संक्रांति का
चंद्रकांता अग्निहोत्री
*
शब्द, अर्थ, प्रतीक, बिंब, छंद, अलंकार जिनका अनुगमन करते हैं और जो सदा सत्य की सेवा में अनुरत हैं, ऐसे मनीषी के परिचय को शब्दों में बाँधना कठिन है। इनकी कविताओं को प्रयोगवादी कविता कहा जा सकता है। काल है संक्रांति का आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल’ जी की नवीन कृति है। २०१५ में प्रकाशित इस गीत, नवगीत संग्रह में कवि ने कई नए प्रयोग किये हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। नवीन की चाह में इन्होंने शाश्वत मूल्यों को तिलांजलि नहीं दी क्योंकि इस संग्रह में आरंभ में ही 'वंदन' नामक कविता में सब प्रकार से अभिनंदन किया है:
‘शरणागत हम
चित्रगुप्त प्रभु!
हाथ पसारे आए।’
अब वे ’स्तवन’ के अंतर्गत शारदा माँ की स्तुति करते हैं:
‘सरस्वती शारद ब्रह्माणी!
जय-जय वीणापाणी!'
एक आध्यात्मिक यात्री की तरह वे अपने पूर्वजों का स्मरण भी करते हैं:
कलश नहीं आधार बन सकें
भू हो हिंदी धाम।
सुमिर लें पुरखों को हम
आओ करे प्रणाम।
समाज हमें प्रभावित करता है और समाज की विद्रूपताओं को देख कवि हृदय विचलित हो काव्य रचना करता है। चारों और फैले आतंक को महसूस करते कवि कहता है:
‘झोंक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
तुम मत झुको सूरज।’
कवि कहता है विकास के,प्रकाश के, नई उड़ान के सूरज तुम मत थकना। यहाँ सूरज प्रतीक है शुभ संकल्प का, उदित श्रेष्ठ संभावनाओं का और कहीं भी भ्रष्टाचार का अँधेरा न हो।
अपने भीतर के सूरज को संबोधित करते हर कवि कहता है:
'तुम रुको नहीं
थको नहीं।'
क्योंकि काल है संक्रांति का ।इस काल में चलते हुए कवि कहता है:.
खरपतवार न शेष रहे,
कचरा कहीं न लेश रहे।
सच में संक्रांति काल से गुजरना निश्चय ही पीड़ादायक है लेकिन कवि की निश्चयात्मक बुद्धि कहती है:
‘प्रणति है आशीष दो रवि
बाँह में कब घेरते हैं
प्रतीक्षा है उन पलों की।’
'काल है संक्राति का’ नामक काव्य संग्रह में यही स्वर उद्घोषित होता है: 'तुम रुको तुम थको नहीं। हम नये युग की ओर बढ़ रहे हैं। पुराना छूट रहा है,नये का आगमन है।
'सिर्फ सच में
धांधली अब तक चली
अब रोक दे।
सुधारों के लिए खुद को
झोंक दे।'
आक्रोश भी है उम्मीद भी। यह भाव लगभग सभी कविताओं में दृष्टिगोचर होता है:
'सुंदरिये मुंदरिये' की तर्ज़ पर अभिनव प्रयोग द्रष्टव्य है:
‘झूठी लड़े लड़ाई होय
भीतर करें मिताई होय।'
सदा शुभ की प्रेरणा देते हुए ‘करना सदा’ में कवि कहता है:
'हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे।
तुम बन्दूक चलाओ तो.
दीन-धर्म की तुम्हें न चाह
अमन-चैन को देते दाह
तुम जब आग लगाओगे
हम हँस, फिर फूल खिलाएँगे।'
स्थिति कोई भी हो, मनुष्य को उसका सामना करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। समाज में रहते हुए भी भीड़ के साथ होना पड़ता है। 'राम बचाए' में कवि प्रश्न करते हैं:
'दुश्मन पर कम, करे विपक्षी पर
ही क्यों ज्यादा प्रहार हम?
कजरी आल्हा फागें बिसरे
माल जा रहे माल लुटाने
क्यों न भीड़ से
हुए भिन्न हम
राम बचाए।'
'कब होंगे आजाद' में क्षोभ है, स्वतंत्र होने की अभीप्सा है:
रीति-नीति, आचार-विचारों, भाषा का हो ज्ञान।
समझ बढ़े तो सीखें, रुचिकर धर्म नीति विज्ञान।
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो हो पाएगा, धरती पर आबाद।
कब होंगे आजाद?
कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी की सभी रचनाएँ श्रेष्ठ हैं। ‘काल है संक्राति का’ का उद्घोष सभी
रचनाओं में परिलक्षित होता है। सभी रचनाओं की अपनी एक अलग पहचान है। जैसे: उठो पाखी, संक्रांति
काल है, उठो सूरज, छुएँ सूरज, सच की अर्थी, लेटा हूँ, मैं लडूंगा, उड़ चल हंसा, लोकतंत्र का पंछी आदि
विशेष उल्लेखनीय हैं।
अधिकांश बिंब व प्रतीक नए व मनोहारी हैं। कवि ने अपनी भावनाओं को बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया है।इनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है घोर अन्धकार में भी आशावादी होना। प्रस्तुत संग्रह हमें साहित्य के क्षेत्र में आशावादी बनाता है। यह पुस्तक अमूल्य देन है साहित्य को। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से सभी रचनाएं श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है।
आचार्य संजीव 'सलिल' जी को बहुत-बहुत बधाई।
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पुरोवाक:
हास्य साहित्य परंपरा और 'चमचावली' हास्य-व्यंग्य की दीपावली
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
मार्क ट्वेन ने कहा है कि हँसना एक गुणकारी औषधि है मगर इस औषधि को देनेवाला डॉक्टर बहुत मुश्किल से मिलता है। आजकल हर मंच पर हास्य-व्यंग पढ़ने का फैशन होने के बाद भी हास्य-व्यंग्य की सरस काव्य रचनाओं का अभाव है। सामान्यत: चुटकुलेबाजी और फूहड़ टिप्पणियाँ ही हास्य-व्यंग्य के नाम पर सुनाई जाती हैं। यह विसंगति तब है जबकि हिंदी और हिंदी भाषी अंचल की लोक भाषाओँ-बोलिओं में शिष्ट हास्य कविता लेखन-पठन की उदात्त परंपरा रही है। हास्य-व्यंग्य का मूल स्रोत हमारी पुरातन संस्कृति, सभ्यता और जीवन दर्शन में देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में मृत्यु, भय और दु:ख का विशेष महत्व नहीं है। ब्रह्म सत् चित् के साथ ही आनंद का स्वरूप है जिसके अंश सकल सृष्टि का कण-कण है। ब्रह्म आनंद के रूप में सभी प्राणियों में निवास करता है। उस आनंद की अनुभूति जीवन का परम लक्ष्य माना जाता है। इसी से ब्रह्मानंद शब्द की रचना हुयी है। वह रस, माधुर्य, लास्य का स्वरूप है। इसीलिये ब्रह्म जब माया के संपर्क से मूर्तरूप लेता है तो उसकी लीलाओं में आनंद को ही प्रमुखता दी गयी है। हमारे कृष्ण रास रचाते हैं, छल करते हैं, लीलायें दीखाते हैं। वे वृंदावन की कुंज गलियों में आनंद की रसधार बहा देते हैं। मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम भी होली में रंग, गुलाल उड़ाते हैं और सावन में झूला झूलते हैं। उनकी मर्यादा में भी भक्त आनंद का अनुभव करते हैं। यह आनंदानुभूति निराकार है, इसका चित्र नहीं बनाया जा सकता, इसका चित्र गुप्त है। 'गूँगे के गुण' की तरह आनंद भी प्रसन्नता को जन्म देता है, यह प्रसन्नता अधरों या नेत्रों से व्यक्त होती है। हास्य को आनंद की प्रतीति करानेवाला 'ब्रम्हानंद सहोदर' कहा जा सकता है।
सनातन भारतीय संस्कृति में मृत्यु और दु:ख को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया। मृत्यु परिवर्तन की वाहक मात्र है। देह के साथ आत्मा नहीं मरती, वह एक चोला बदलकर दूसra पहन लेती है। कुछ पंथ शरीर का समय पूरा होने पर खुशी मनाते हैं। नाच-गाने, उमंग और उत्साह से पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है कि जीवात्मा अपने स्वामी ब्रह्म से मिलने जा रही है। मिलन की इस पावन बेला में दु:ख, दर्द और शोक क्यों? अंत समय का शोक मोह, अज्ञान और लोक-परंपरा का निर्वहन मात्र है। कुछ पन्थों में शव को दफनाते हैं ताकि वह कुछ जीवों का भोज्य बन जाए, कुछ अन्य पंथ शव को पक्षियों के भोग हेतु छोड़ देते हैं। सनातन धर्म रोगजनित मृत्यु के कारण शव में उपस्थित रोगाणु अन्यों के लिए घातक होने की सम्भावना के कारण शव-दाह करते हैं जबकि इसी से बनी भभूत से बोले बाबा का शृंगार किया जाता है जो 'सत-शिव-सुंदर' के पर्याय और परम आनंद के प्रतीक हैं। वे नृत्य, गायन, व्याकरण, भाषा आदि के केंद्र हैं जिनसे प्राणी के मन में आनंद का सागर हिलोरें लेने लगता है। हम अवतारों की जयंतियाँ उत्साह और श्रध्दा सहित मानते किन्तु निधन तिथियों को भूलकर भी याद नहीं करते। हम मूलत: आनंद को ईश्वर का पर्याय मानते हैं। इसलिए आनंददायी हास्य-व्यंग्य की परंपरा वेद-पूर्व से तत्कालीन भाषाओं के साहित्य में है। लौकिक और वैदिक संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आदि के साहित्य में हास्य-व्यंग्य की छटा देखते ही बनती है। उदाहरण: - "मम पुत्रस्य अन्नवस्त्रादि-व्ययं समग्रं सर्वकारः एव निर्वहति।" इति उक्तवती रुक्मिणी-देवी। = "कथं सम्भवति तत्?" कीदृशः उद्योगः तस्य ??" इति पृष्टवती मालादेवी। -"एकपैसात्मक-व्ययः अपि नास्ति तस्य। यतः आजीवनकारागारवासेन दण्डितः अस्ति सः।" (लौकिक संस्कृत) पुत्र के अन्न-वस्त्रादि की व्यवस्था हतु उसे आजीवन कारावास के उपाय में छिपे व्यंग्य को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
अपभ्रंश साहित्य में संवत १२४१ विक्रम में सोमप्रभ सूरि रचित 'कुमार पाल प्रतिबोध' से एक दोहा देखिए: 'बेस बिसिट्ठइ बारियइ, जइबि मनोहर गत्त। / गंगाजल पक्वालियवि, सुणिहि कि होइ पवित्त।। अर्थात ''वेश-धारियों से बचें, चाहे मनहर गात। / गंग-स्नान से हो नहीं,पावन कुतिया जात।।'सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है' अथवा 'मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से' जैसी लोकोक्तियों का सार अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी के निम्न दोहे में हो सकता है जहाँ दोहाकार की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी? 'रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु। / चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरु।। अर्थात् एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा तात। / दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात।।
संत कबीर हास्य-व्यंग्य परंपरा के श्रेष्ठ वाहक रहे। वे ब्रम्ह के साथ जो रिश्ता जोड़ते हैं उसकी कल्पना भी आसान नहीं है: 'हम बहनोई, राम मोर सारा। हमहिं बाप, हरिपुत्र हमारा।।' लोक भी हास्य-व्यंग्य का आनंद लेने में पीछे नहीं रहता- 'फागुन में बाबा देवर लागे' गाकर ससुअर को छेदती नव्वादु को देखकर कौन सोच सकेगा कि वह शेष समय लज्जा का निर्वहन सहजता और आनंद के साथ करती है। उत्सवधर्मी भारतीय मनीषा आराध्य के साथ भी हंसी-ठिठोली करने से बाज नहीं आती। भगवान जगन्नाथ के दर्शनकर एक भक्त कवि के मन में प्रश्न है कि भगवान काठ क्यों हो गये? 'कठुआ जाना' लोक बोली का एक मुहावरा है। भक्त अपनी कल्पना की उड़ान से संस्कृत में जो छंद रचता है उसका हिन्दी रूपान्तर कुछ इस तरह किया जा सकता है -'भगवान की एक पत्नी आदतन वाचाल हैं (सरस्वती) दूसरी पत्नी (लक्ष्मी) स्वभाव से चंचल हैं। वह एक जगह टिक कर रहना नहीं चाहतीं। उनका एक बेटा मन को मथनेवाला कामदेव है जो अपने पिता पर भी शासन करता है । उनका वाहन गरूड़ है। विश्राम करने के लिये उन्हें समुद्र में जगह मिली है। सोने के लिये शेषनाग की शैय्या है। भगवान विष्णु को अपने घर का यह हाल देख कर काठ मार गया है। एक अन्य भक्त कवि आशुतोष शंकर का दर्शन कर सोचता है कि इस भोले भण्डारी, जटाधारी, बाघम्बर वस्त्र पहनने वाले के पास खेती-बारी नहीं है। रोजी का कोई साधन नहीं है तो इनका गुजारा कैसे होते है। भक्त संस्कृत में छंद कहता है: 'उनके पास पाँच मुँह हैं। उनके एक बेटे (कार्तिकेय) के छह मुँह हैं। दूसरे बेटे गजानन का मुँह और पेट थी का है। यह दिगबंर कैसे गुजारा करता अगर अन्नपूर्णा पत्नी के रूप में उसके घर नहीं आतीं। तीसरा भक्त कवि कहता है कि भगवान शंकर बर्फीले कैलाश पर्वत पर रहते हैं। भगवान विष्णु का निवास समुद्र में है। इसकी वजह क्या है? निश्चित ही दोनों भगवान मच्छरों से डरते हैं इसलिये उन्होंने ने अपना ऐसा निवास स्थान चुना है। मृच्छकटिक नाटक के रचयिता राजा शूद्रक हैं ब्राह्मणों की खास पहचान 'यज्ञोपवीत 'की उपयोगिता के बारे में ऐसा व्यंग्य करते हैं जिसे सुनकर हँसी नहीं रुकती। वे कहते हैं: य'ज्ञोपवीत कसम खाने के काम आता है। अगर चोरी करना हो तो उसके सहारे दीवार लांघी जा सकती है।'
हास्य का जलवा यह कि संस्कृत वांग्मय में हास्य को सभी आचार्यों ने रस स्वीकार किया है। भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र के अनुसार- 'विपरीतालंकारैर्विकृताचाराभिधानवेसैश्च/विकृतैरर्थविशेषैहंसतीति रस:स्मृतो हास्य:।।'भावप्रकाश में लिखा है- 'प्रीतिर्विशेष: चित्तस्य विकासो हास उच्यते।'साहित्यदर्पणकार का कथन है- 'वर्णदि वैकृताच्चेतो विकारो हास्य इष्यते विकृताकार वाग्वेश चेष्टादे: कुहकाद् भवेत्।।दशरूपककार की उक्ति है- 'विकृताकृतिवाग्वेरात्मनस्यपरस्य वा / हास: स्यात् परिपोषोऽस्य हास्य स्त्रिप्रकृति: स्मृत:।। सार यह है कि हास एक प्रीतिपरक भाव है और चित्तविकास का एक रूप है। उसका उद्रेक विकृत आकार, विकृत वेष, विकृत आचार, विकृत अभिधान, विकृत अलंकार, विकृत अर्थविशेष, विकृत वाणी, विकृत चेष्टा आदि द्वारा होता है। इन विकृतियों से युक्त हास्यपात्रता कवि, अभिनेता, वक्ता द्वारा कथनी या करनी से किया जाना हास्य है। विकृति का तात्पर्य है प्रत्याशित से विपरीत अथवा विलक्षण कोई ऐसा वैचित्र्य, कोई ऐसा बेतुकापन, जो हमें प्रीतिकर जान पड़े, क्लेशकर न जान पड़े। इन लक्षणों में पाश्चात्य समीक्षकों के प्राय: सभी लक्षण समाविष्ट हो जाते हैं, जहाँ तक उनका संबंध हास्य विषयों से है। ऐसा हास जब विकसित होकर हमें कवि-कौशल द्वारा साधारणीकृत रूप में, अथवा आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली के अनुसार, मुक्त दशा में प्राप्त होता है, वह हास्यरस कहलाता है। हास के भाव का उद्रेक देश-काल-पात्र-सापेक्ष रहता है। घर पर कोई खुली देह बैठा हो तो दर्शक को हँसी न आएगी परंतु उत्सव में भी वह इसी तरह पहुँच जाए तो उसका आचरण प्रत्याशित से विपरीत या विकृत माना जाने के कारण हँसी जगा देगा। इसी तरह युवा व्यक्ति श्रृंगार करे तो फबने की बात है किंतु जर्जर वृद्ध का श्रृंगारर हास का कारण होगा; कुर्सी से गिरनेवाले पहलवान पर हम हँसेंगे परंतु छत से गिरनेवाले बच्चे के प्रति हमारी सहानुभूति उमड़ेगी। हास का आधार प्रीति है न कि द्वेष। किसी की प्रकृति, प्रवृत्ति, स्वभाव, आचार आदि की विकृति पर कटाक्ष भी करना हो तो वह कटुक्ति के रूप में नहीं, प्रियोक्ति के रूप में हो। उसकी तह में जलन अथवा नीचा दिखाने की भावना न होकर विशुद्ध संशुद्धि की भावना होगी। संशुद्धि की भावनावाली यह प्रियोक्ति भी उपदेश की शब्दावली में नहीं किंतु रंजनता की शब्दावली में होगी।
वर्तमान काल में हरिमोहन झा ने अपनी हास्य व्यंग्य कृति 'खट्टर काका' में देवी-देवताओं और अवतारों के साथ खूब जमकर ठिठोली की है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, अकबर इलाहाबादी , बाबू बालमुकुंद गुप्त आदि ने अन्योक्तिपूर्ण व्यंग्य लेखन का नया मानक बनाया। उर्दू शायरों ने तो ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजियत पर ऐसे तीखे प्रहार किये कि अंग्रेज उसे समझ भी नहीं पाते थे और हिन्दुस्तानी उसका जायका लेते थे। अकबर साहब फरमाते हैं - 'बाल में देखा मिसों के साथ उनको कूदते। /डार्विन साहब की थ्योरी का खुलासा हो गया।' जनाब अकबर इलाहाबादी ब्रिटिश अदालत में मुंसिफ थे लेकिन वे अपने व्यंग के तीरों से ऐसा गहरा घाव करते थे कि पढ़नेवाला एक बार उसे पढ़कर हजारों बार उस पर सोचने को मजबूर हो जाता था। लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दति का पोस्टमार्टम जिस बेबाकी से अकबर साहब ने किया उसकी गहराई तक आज के व्यंगकार सोच भी नहीं सकते हैं -'तोप खिसकी प्रोफेसर पहुंचे। बसूला हटा तो रंदा है।' प्लासी की लड़ाई में सिराज्जुदौला को शिकस्त देकर तमाम देसी रियासतों को जंग में मात देकर अंग्रेजों ने तोप पीछे हटा ली और अंग्रेजी पढ़ानेवाले प्रोफेसरों को आगे कर दिया। तोप के बसूले ने समाज को छील दिया और प्रोफेसर के रंदे ने उसे अंग्रेजों के मनमाफिक कर दिया। तोप और प्रोफसर का यह तालमेल ब्रिटिश शिक्षापध्दति पर बेजोड़ और बेरहम हमला है।
पं0 मदनमोहन मालवीय और सर सैयद अहमद खाँ जिन दिनों हिन्दू यूनिवर्सिटी और मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिये प्रयास कर रहे थे उन्हीं दिनों मालवीय जी के मित्र अकबर इलाहाबादी ने अंग्रेजपरस्त सैयद अहमद खाँ को लक्ष्य कर एक शेर कहा- 'शैख ने गो लाख दाढ़ी बढ़ाई सन की सी। मगर वह बात कहाँ मालवी मदन की सी। ' यहाँ 'सन' की शब्द पर गौर कीजिये। दोनों शब्दों को मिला देने पर जो अर्थ निकलता है वह शायर के हुनर की मिसाल है। हास्य के प्रमुख कारक: (अ) अप्रत्याशित शब्दाडंबर: शब्द की अप्रत्याशित व्युत्पत्ति के सहारे 'को घट ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर' -बिहारी, 'न साहेब ते सूधे बतलाएँ, गिरी थारी अइसी झन्नायें, कबौं छउकन जइसी खउख्यायें, पटाका अइसी दगि-दगि जाएँ'-रमई काका, 'मन गाड़ी गाड़ी रहै. प्रीति क्लियर बिनु लैन, जब लगि तिरछे होत नहिं, सिंगल दोऊ नैन' -सुकवि, (आ) विलक्षण तर्कोक्ति: 'पाँव में चक्की बाँध के हिरना कुदा होय', (इ) वाग्वैदग्ध्य (विट्): अर्थ के फेर-बदल के सहारे "भिक्षुक गो कितको गिरिजे? सुत माँगन को बलि द्वारे गयो री / सागर शैल सुतान के बीच यों आपस में परिहास भयो री, (ई) प्रत्युतर में नहले की जगह दहला लगाने की कला: 'गावत बाँदर बैठ्यो निकुंज में ताल समेत, तैं आँखिन पेखे / गाँव में जाए कै मैं हू बछानि को बैलहिं बेद पढ़ावत देखे- काव्य कानन; (उ) व्यंग्य (सैटायर): रामचरितमानस के शिव-बरात प्रसंग में विष्णु की उक्ति 'कि बर अनुहारि बरात न भाई, हँसी करइइहु पर पुर जाई', कृष्णायन में उद्धव की उक्ति 'की भवन जरैहैं मधुपुरी, श्याम बजैहैं बेनु?' भवानीप्रसाद मिश्र जी का गीतफरोश आदि, (ऊ)कटाक्ष (आइरानी):'करि फुलेल को आचमन, मीठो कहत सराहिं / रे गंधी मति-अंध तू, अतर दिखावत काहि' - बिहारी; 'मुफ्त का चंदन घस मेरे नंदन' - लोकोक्ति; 'मुनसी कसाई की कलम तलवार है' - भड़ोवा संग्रह, (ए) रचना विरूपीकरण (पैरोडी): 'नेता ऐसा चाहिए जैसा रूप सुभाय / चंदा सारा गहि रहै देय रसीद उड़ाय' - चोंच, 'बीती विभावरी जाग री / छप्पर पर बैठे काँव-काँव करते हैं कितने काग री'-बेढब), (ऐ) वक्त्तृत्व विरूपीकरण: अभिनेताओं, नेताओं या कवियों की कहन-शैली की नकल आदि हैं। प्रभाव की दृष्टि से हास्य को (क) परिहास: संतुष्टि प्रधान, व्यंग्य रहित, गुदगुदाता हुआ, तथा (ख) उपहास: संशुद्धि प्रधान, व्यंग्य सहित तिलमिलाता हुआ में वर्गीकृत किया जा सकता है।
भारत के ह्रद्प्रदेश नर्मदांचल के सिवनी जिले निवासी युवा शिक्षक और उत्साही रचनाकार रामकुमार चतुर्वेदी हास्य कविता-लेखन और पठन को गंभीरता से लेकर निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। राम कुमार चतुर्वेदी जीवट और संघर्ष की मशाल और मिसाल दोनों हैं। ३४ वर्ष की युवावस्था में सड़क दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी, कमर की हड्डी, पसली, कोलर बोन, हाथ-पैर आदि को गंभीर क्षति, दो वर्ष तक पीड़ादायक शल्य क्रिया और सतत के बाद भी वे न केवल उठ खड़े हुए अपितु पूर्वापेक्षा अधिक आत्मविश्वास से शैक्षणिक-साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। महाकवि शैली के अनुसार ‘अवर स्वीटैस्ट सोंग्स आर दोज विच टैल ऑफ़ सैडेस्ट थोट’, कवि शैलेंद्र के शब्दों में ‘हैं सबसे मधुर वे गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ को राम कुमार ने चरितार्थ कर दिखाया है और दुनिया को हँसाने के लिए कलम थाम ली है। चमचावली के दोहे लक्षणा और व्यंजन के माध्यम से देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर चोट करते हैं-
पढ़कर ये चमचावली, जाने चम्मच ज्ञान।
सफल काज चम्मच करे, कहते संत सुजान।
साधु-संतों की कथनी-करनी और भोग-विलास चमचों की दम पर फलते-फूलते हैं किंतु एक लोकोक्ति के अनुसार ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ मिल ही जाता है-
बाबा बेबी छेड़कर, पहुँच गये हैं जेल।
कैसे तीरंदाज को, मिल जाती है बेल।।
चम्मच अपने मालिक को सौ गुनाहों के बाद भी मुक्त कराकर ही दम लेता है। चमचे की स्वामिभक्ति के सामने श्वान भी हार मान लेता है। एक अभिनेता द्वारा कृष्ण-मृग का शिकार करने के बाद भी उसे दंडित न किये जाने की प्रतिक्रियास्वरूप कवि एक दोहा कहता है-
अपने मालिक के लिए, चम्मच करे उपाय।
हिरन मारकर भी उन्हें, मिल जाता है न्याय।।
संन्यास लिए संत ईश-भक्ति के अलावा शेष संसार को माया और निस्सार समझते हैं। तुलसीदास जी को अकबर द्वारा मनसबदारी दिए जाने पर उन्होंने 'पटा लिखो रघुबीर को, जे साहन के साह / तुलसी अब का होइंगे, नर के मनसबदार' कहते हुए प्रस्ताव अमान्य कर दिया था। किन्तु आगामी चुनाव को देखते हुए शासन द्वारा राज्य मंत्री का पद-प्रस्ताव होते ही तथाकथित संतों ने लपक लिया। इस प्रसंग पर रामकुमार कहते हैं: राजनीति चमचों की चारागाह है-
मंत्री का दर्जा मिला, चहके साधु-संत।
डूबे भोग विलास में, चम्मच बने महंत।।
चमचे सब का हिसाब-किताब माँगते हैं किंतु अपनी बारी आते ही गोलमाल करने से नहीं चूकते-
अपनी पूँजी का कभी, देते नहीं हिसाब।
दूजे के हर टके का, माँगें चीख जवाब।।
राम कुमार की भाषा सरल, सहज, प्रसंगानुकूल चुटीली और विनोदपूर्ण है। हास्य-व्यंग्य की चासनी में घोलकर कुनैन खिला देना उनके लिए सहज-साध्य है। वे सामयिक प्रसंगों को लेकर सरस व्यंग्य प्रहार करते हैं साथ ही हास्य की फुहार से भिगाते चलते हैं। प्रसाद गुण संपन्न भाषा, यथावसर सम्यक शब्द-प्रयोग, मुहावरेदार भाषा तथा सहजग्राह्यता उनका वैशिष्ट्य है। 'चमचावली' सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दिनानुदिन घटित हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में कवि के स्वस्थ्य छंटन तथा देश-समाज हित की लोकोपकारी भावना से उत्पन्न हास्य-व्यब्ग्य काव्य है। इस सार्थक, सर्वोपयोगी, पथ-प्रदर्शक कृति का न केवल साहित्यिक जगत अपितु जन सामान्य में भी स्वागत होगा यम मुझे विश्वास है। रामकुमार ने एक मनुष्य, भारत के एक नगरीं और हिंदी के हास्य कवि के रूप में इस कृति की रचना कर अपनी शवासन को सार्थक किया है। उनका उर्वर चिंतन भविष्य में भी ऐसी कृतियों का परायण कराए यही कामना है।
२६-७-२०१८
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मुक्तक
खिलखिलाती रहो, चहचहाती रहो
जिंदगी में सदा गुनगुनाती रहो
मेघ तम के चलें जब गगन ढाँकने
सूर्य को आईना हँस दिखाती रहो
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दोहा सलिलाः
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प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अन्तर्मन जागृत करें, सन्त बन सकें सन्त
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आशा पर आकाश टंगा है, कहते हैं सब लोग
आशा जीवन श्वास है, ईश्वर हो न वियोग
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जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
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लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
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गाल टमाटर की तरह, अब न बोलना आप
प्रेयसि के नखरे बढ़ें, प्रेमी पाये शाप.
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प्याज कुमारी से करे, युवा टमाटर प्यार
किसके ज्यादा भाव हैं?, हुई मुई तकरार
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२७-७-२०१४