मंगलवार, 8 अगस्त 2017

laghukatha

लघु कथा 
पथ की अशेषता      
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'आधी रात हो गयी है, तुझे बुलाते हुए संकोच हो रहा है लेकिन...' 
"तू चिंता मत कर, मैं आती हूँ;" कहकर निकल पड़ी वह।  
लाल बाती देख वाहन रोका तो पीछे एक वाहन में दो युवक दिखे, एक हाथ में बोतल थामे था और दूसरा छीनने की कोशिश कर रहा था। 
पीली बत्ती के हरे होते ही उसने अपनी धुन में कार आगे बढ़ा दी। धीरे-धीरे अन्य अन्य वाहन दायें-बायें मुड़े तो उसके वाहन के ठीक पीछे उन लड़कों का वाहन था। लडकों ने उसे अकेला देखा तो अपनी गति बढ़ाई और उसे रुकने का इशारा किया। 
सड़क का सूनापन देख उसने वाहन की गति बढ़ाने के साथ-साथ पुलिस का आपात संपर्क नंबर लगा स्थान और परिस्थिति की जानकारी दे दी। इस बीच उसके वाहन की गति कम हुई तो मौक़ा पाते ही दूसरा वाहन आगे निकला और उसके वाहन के ठीक आगे खड़ा हो गया। विवश होकर उसे रुकना पड़ा। लड़के उतर कर उसके वाहन का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगे। असफल रहने पर वे काँच पर मुक्के बरसाने लगे कि काँच टूटने पर दरवाज़ा खिलकर उसे बाहर घसीट सकें। 
परिस्थिति की गंभीरता को भाँपने के बाद भी उसने धीरज नहीं खोया और पुलिस के आपात नंबर पर लगातार संकेत करती रही। पुलिस न आई तो वह खुद को कैसे बचाये? सोचते हुए उसे बालों में फँसे क्लिप, कार में लगी सुगंध की शीशी का ध्यान आया। उसने शीशी तोड़ डाली कि काँच टूटने पर हाथ अंदर आते ही वह बिना देर दिए वार करेगी और दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल बाहर दौड़ लगा देगी। इस बीच उसने अपने पिता को भी स्थान सूचित कर दिया था। 
लड़कों का क्रोध, मुक्कों की बढ़ती रफ़्तार और मुकाबले के लिए तैयार वह... पल-पल युगों जैसा कट रहा था।  तभी पुलिस ने गुंडों को धर दबोचा।  
सैकड़ों बार सैंकड़ों पथों से गुजरने के बाद आज चैन की साँस लेते हुए जान सकी थी आत्मबल के पथ की अशेषता।   
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