शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

bundeli muktika

बुन्देली मुक्तिका
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कओ बाद में, सोचो पैले।
मन झकास रख, कपड़े मैले।।
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रैदासों सें कर लई यारी।
रुचें नें मंदिर पंडित थैले।।
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शीश नबा लओ, हो गओ पूजन।
तिलक चढ़ोत्री?, ठेंगा लै ले।।
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चाहत हो पीतम सें मिलना?
उठो! समेटो, नाते फैले।।
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जोड़ मरे, जा रए  छोड़कर
लिए मनुज तन, बे थे बैले।।
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salil.sanjiv@gmail.com
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