शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

osho

ओशो का अंतिम प्रवचन : 
"सम्मासति"
१०  अप्रैल १९८९ 
बुद्धा सभागार
ओशो आश्रम, पुणे
भारत।
अपने अंतिम प्रवचन में भगवान् श्री ने कहा-
"परम्परावादी झेन का मार्ग रहित मार्ग बहुत कठिन या दुरूह है। २०-३० वर्षों तक, घर परिवार छोड़कर मठ में गुरु के सानिध्य में निरंतर ध्यान करते रहना और सभी स्थानों से अपनी उर्जा हटाकर केवल ध्यान में लगाना बहुत मुश्किल है। यह परम्परा गौतम बुद्ध से प्रारम्भ हुई जो बारह वर्ष तक निरंतर कठोर तप करते रहे और एक दिन सब छोडकर परम विश्राम में लेट गये और घटना घट गई। पर आज के युग में न तो किसी के पास इतना धैर्य और समय है और न सुविधा।
मैं इस परम्परा को पूर्णतया बदल रहा हूं। इसी परम्परा के कारण झेन चीन से समाप्त हुआ और अब वह जापान से समाप्त हो रहा है। इसका प्रारम्भ गौतम बुद्ध द्वारा महाकाश्यप को कमल का फूल देने से हुआ था जब उन्होंने मौन की संपदा का महाकाश्यप को हस्तांतरण किया था। बुद्ध के ५०० वर्षों बाद तक यह परम्परा भारत में रही। फिर भारत में इस सम्पदा के लेवनहार न होने से बोधिधर्म इसे चीन ले गया। भारत से चीन, चीन से जापान और अब इस परम्परा को अपने नूतन स्वरुप में मैं फिर जापान से भारत ले आया हूं।
जापान के झेन सदगुरु पत्र लिखकर मुझे बताते हैं कि जापान में बढ़ती वैज्ञानिक प्रगति और टेक्नोलोजी से झेन जापान से मिट रहा है और वह झेन मठों में मेरी प्रवचन पुस्तकों से शिष्यों को शिक्षा दे रहें हैं। यही स्थिति भारत में भी है।
यह परम्परा तभी जीवित रह सकती है जब यह सरल, सहज और विश्राम पूर्ण हो। यह उबाऊ न होकर उत्सवपूर्ण हो। यह वर्षों की साधना न होकर समझ विकसित होते ही कम समय ले।
जब उर्जा अंदर जाती है तो वही उर्जा विचारों, भावों और अनुभवों में रूपांतरित हो जाती है। जब वही उर्जा बाहर गतिशील होती है तो वह व्यक्तियों से, वस्तुओं से या प्रकृति से संबंध जोड़ती है। अब एक तीसरी स्थिति भी है कि उर्जा न अंदर जाये और न बाहर, वह नाड़ियों में धड़कती हुई अस्तित्व से एकाकार हो जाये।
पूरे समाज का यही मानना है कि उर्जा खोपड़ी में गतिशील है, पर झेन कहता है कि खोपड़ी से निकल कर अपने हारा केंद्र पर पहुंचो। वह तुम्हारा ही नहीं पूरे अस्तित्व का केंद्र है। वहां पहुंचकर अंदर और बाहर का आकाश एक हो जाता है, जहां तुम स्वतंत्रता से मुक्ताकाश में पंखों को थिर किये चील की भांति उड़ते हो। झेन का अर्थ है- इसी केंद्र पर थिर होकर पहुंचना। यह प्रयास से नहीं, यह होता है परम विश्रामपूर्ण स्थिति में।
सबसे पहले शांत बैठकर अपने अंदर सरक जाओ। अपनी खोपड़ी के अंदर समस्त उर्जा को भृकुटी या त्रिनेत्र पर ले आओ। गहन भाव करो कि सिर की सारी उर्जा भुकुटि पर आ गई है। थोड़ी ही देर में भृकुटी पर उर्जा के संवेदनों को महसूस करोगे।फिर गहन भाव करते हुये इस उर्जा को हृदय की ओर ले आओ। हृदय चक्र पर तुम्हें जब उर्जा के स्पंदनों का अनुभव होने लगे तो समग्रता से केंद्र की ओर गतिशील करना है। पर यह बिंदु बहुत नाज़ुक है। हृदय चक्र से उर्जा से सीधे सहस्त्रधार की ओर फिर से वापस लौट सकती है। पर गहन भाव से तुम्हें अपनी गहराई में उतरना है। अपने केंद्र तक अपनी समग्र उर्जा को लाये बिना उसे जानने का अन्य कोई उपाय नहीं।
'हू मंत्र की चोट से, सूफी नृत्य के बाद नाभि के बल लेटकर, चक्रा ब्रीदिंग, चक्रा साउंड अथवा मिस्टिक रोज़ ध्यान से जिनका हारा चक्र सक्रिय हो गया है, वह गहन भाव करते ही स्वयं समस्त उर्जा को अपनी ओर खीँच लेते हैं। मैं इसीलिये पिछले एक वर्ष से प्रवचन के बाद तुम्हें सरदार गुरुदयाल सिंह के जोक्स सुनाकर ठहाके लगाने को विवश करता हूं, जिससे तुम्हारा हारा चक्र सक्रिय हो। उसके द्वारा नो माइंड ध्यान द्वारा मैं तुम्हें निर्विचार में ले जाता रहा हूं जिससे विचारों भावों में लगी उर्जा रूपांतरित होकर नाड़ियों में गतिशील हो जाये।"
इतना कहकर भगवान् श्री कुछ देर के लिये मौन में चले गये। बोलते-बोलते उनके अचानक मौन हो जाने से, सभी संन्यासी भी प्रस्तर प्रतिमा की भांति अपनी दो श्वांसों के अन्तराल में थिर हो गये। उन्होंने ओशो से यही सीखा था कि दो शब्दों या आती जाती श्वांस के अंतराल में थिर हो जाना ही मौन में गहरे सरक जाना है, जहाँ विचार और भाव सभी विलीन हो जाते हैं। इस गहन मौन में ओशो उस अमूल्य संपदा को अपने शिष्यों को हस्तांतरित कर रहे थे जिसे शब्दों द्वारा अभिव्यक्त करने का कोई उपाय नहीं।पर यह अमूल्य सम्पदा केवल थोड़े से ही संन्यासी ही ग्रहण कर सके जो मौन की भाषा समझने लगे थे।
कुछ मिनट बाद भगवान् ने काफी देर से थिर पलकों को झपकाया। उनके हाथों की मुद्रा परवर्तित हुई। उनके होठ हिले।
उन्होंने कहा-" सम्मासति "
"स्मरण करो। तुम भी एक बुद्ध हो।"

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