शनिवार, 12 अगस्त 2017

navgeet

​​नवगीत 
*
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
गए विदेशी दूर 
स्वदेशी अफसर 
हुए पराए.  
सत्ता-सुविधा लीन 
हुए जन प्रतिनिधि 
खेले-खाए.
कृषक, श्रमिक, 
अभियंता शोषित 
शिक्षक है अस्थाई.
न्याय व्यवस्था 
अंधी-बहरी, है 
दयालु नाती पर
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर 
*
अस्पताल है  
डॉक्टर गायब  
रोगी राम भरोसे.  
अंगरेजी में
मँहगी औषधि  
लिखें, कंपनी पोसे.
दस प्रतिशत ने 
अस्सी प्रतिशत  
देश संपदा पाई.
देशभक्त पर   
सौ बंदिश हैं  
कृपा देश-घाती पर  
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४ 
#दिव्यनर्मदा 
#हिंदी_ब्लॉगर

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