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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

laghukatha

लघु (संवाद) कथा
अनदेखी
संजीव
*
'पोता विद्यालय जाने से मना करता है कि रास्ते में बच्चे गाली-गलौज करते हैं, उसे भय लगता है।' मित्र  बताया। 
अगले दिन मैं मित्र के पोते के साथ स्थानीय भँवरताल उद्यान गया। मार्ग में एक हाथी मिला जिसके पीछे कुत्ते भौंक रहे थे।
'क्यों बेटे? क्या देख रहे हो?'
बाबा जी! हाथी के पीछे कुत्ते भौंक रहे हैं।
'हाथी कितने हैं?'
बाबाजी ! एक।
'और कुत्ते?'
कई।
'अच्छा, हाथी क्या कर रहा है?'
कुत्तों की ओर बिना देखे अपने रास्ते जा रहा है।
हम उद्यान पहुँच गए तो उस मौलश्री वृक्ष के नीचे जा बैठे जहाँ ओशो को सम्बोधि प्राप्त हुई थी। बच्चे से मैंने पूछा: ' इस वृक्ष के बारे में कुछ जानते हो?'
जी, बाबा जी! इसके नीचे आचार्य रजनीश को ज्ञान प्राप्त हुआ था जिसके बाद उन्हें 'ओशो' कहा गया।
मैंने बच्चे को बताया कि ओशो को पहले स्थानीय विरोध और बाद में अमरीकी सरकार का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी राह नहीं बदली और अंत में महान चिन्तक के रूप में इतिहास में अमर हुए।
वापिस लौटते हुए मैंने बच्चे से पूछा: 'बेटे! यदि हाथी या ओशो राह रोकनेवालों पर ध्यान देकर रुक जाते तो क्या अपनी मंजिल पा लेते?'
नहीं बाबा जी! समझ गया कोई कितना भी रास्ता रोके, मंजिल आगे बढ़ने से ही मिलती है।
''यार! आज तो गज़ब हो गया, पोता अपने आप विद्यालय जाने को तैयार हो गया। उसके पीछे-पीछे मैं भी गया लेकिन वह रास्ते में भौकते कुत्तों से न डरा, न उन पर ध्यान दिया, सीधे विद्यालय जाकर ही रुका।'' मित्र ने प्रसन्नता से बताया.
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