सोमवार, 21 अगस्त 2017

मंगल कामनाएँ

आपकी भावनाएँ
- राकेश खंडेलवाल
शारदा के करों से प्रवाहित सलिल, देह धर भू पे उतरा दिवस आज के
बीन के तार झंकार कर भर गये, ज्ञान का कोष उसमें सहज गूंज कर
वो घिरा बादलों की तरह कर रहा, काव्य अमृत की वृष्टि न पल भी रुके
उसको अर्पित हैं शुभकामनायें मेरी, एक मुट्ठी भरे शब्द में गूँथ कर
- डॉ. महेशचंद्र गुप्ता 'खलिश', दिल्ली
जो निरंतर करे काव्य-वृष्टि सदा, जो समर्पित हुआ नागरी के लिए

आज है जन्म दिन, पुण्य वो आत्मा, निस्पृह रह करे जा रही है सृजन

काव्य की है विधा कौन बतलाओ तो जो अछूती सलिल की कलम से रही

है श्रृंगार उसने रचा तो ख़लिश हैं रचे उसने हरि भक्ति के हैं भजन. 

आभार शत-शत 
मुक्तक:
मिलीं मंगल कामनाएँ, मन सुवासित हो रहा है। 
शब्द, चित्रों में समाहित, शुभ सुवाचित हो रहा है।। 
गले मिल, ले बाँह में भर, नयन ने नयना मिलाए- 
अधर भी पीछे कहाँ, पल-पल सुहासित हो रहा है।।
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