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सोमवार, 10 सितंबर 2018

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

गीत पर्व आया है - राजेन्द्र गौतम

- माहेश्वर तिवारी
यह देख कर खुशी होती है कि श्री राजेन्द्र गौतम ऐसे कवियों की संदिग्ध भीड़ से अलग-थलग खड़े हैं, जो कभी किसी और की रचना से कोई मुहावरा तोड़ लेते हैं तो कभी किसी रचना के कथ्य को अपनी थिगलीदार भाषा तथा शिल्प में पिरो कर अपने मौलिक कृतित्व के नाम पर बिछा देते हैं। श्री गौतम का कथ्य ही अपना नहीं है बल्कि काव्य-भाषा भी किसी रचनात्मक ऊष्मा में तपी है। उन्होंने अपने समकालीन रचनाकारों से भाषा तथा काव्य के क्षेत्र में कुछ भी नहीं लिया है। उनका सारा रचना-संसार स्वनिर्मित तथा स्वार्जित है।

अपने आसपास पर पड़ते आधुनिक दबावों को वे आन्तरिक निजता से महसूस करते हैं। जीवनानुभवों से सीधा साक्षात्कार करते हैं। उन्हें अपनी रचनामुखी संवेदनात्मक उँगलियों से गढ़ कर काव्यात्मकता से जोड़ते हैं। इसी कारण उनकी रचनात्मकता से गहरी आत्मीयता की ऊष्मा मिलती है। रचनात्मकता के साथ आत्मीयता के पूर्ण लगाव की यह प्रक्रिया एक परिपक्व काव्य-दृष्टि से ही संभव है।

गौतम का रचनात्मकता से यह आत्मीयतापूर्ण सलूक सहज ही अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता है-
अब सबीलों पर टंगे हैं
फूल से महके हुए दिन
भीड़ के पहियों तले
कुचली हुई पाँखें
धुँध में पथ खोजती
कुहरा गई आँखें
समय की हथकड़ी पहने
गंध से बहके हुए दिन

इन गीतात्मक पंक्तियों में अभिव्यक्त छटपटाहट व करूणा निजी न होकर सामूहिक है। निजता इसमें एक अन्तर्लय की तरह गुँथी होकर काव्यात्मकता की वृद्धि करती है। अनुभूति की प्रामाणिकता अभिव्यक्ति को गहरी अर्थसम्पन्नता से लैस करती हुई उसे रचनात्मक विस्तार देती है क्योंकि रचनाकार का यह अनुभव सामूहिक चिंताओं और संघर्षों से जुड़ा हुआ है इसलिए रचनाकार जगह-जगह संकल्पों के साथ खड़ा दिखता है-
संकल्प के हैं गूँजते ये छन्द अम्बर में
हम आज बोयेंगे मलय की गंध ऊसर में

यह किसी तरह का बड़बोलापन नहीं है। रचनात्मक विश्वास है। सृजनात्मकता के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देने का संकल्पूर्ण उछाह है। इस तरह का संकल्प जब उठ खड़ा होता है तो कहीं कुछ थिर नहीं रह पाता। सन्नाटा टूटता है और चारों तरफ एक सर्जक थिरकन दौड़ने लगती है-
जब से हवाओं ने सुनी आवाज मौसम की
होने लगी हलचल तभी से थिर सरोवर में

आयतित आधुनिक बोध के दबाव में तमाम सारे मानवीय-मूल्य, आत्मीयता की गंध में नहाये रिश्ते कुचल कर किस तरह टूट-फूट रहे हैं, यह महानजी संस्कृति के पोषकों तथा व्यवस्थावादियों की मोटी चमड़ी को भले न महसूस हो किंतु एक संवेदनशील रचनाकार मात्र इनका तटस्थ द्रष्टा नहीं बना रह सकता। उसे इस नये महाभारत में एक और धृतराष्ट्र बनना स्वीकार नहीं है। इसीलिए तो उसकी शिराओं में टूटन की अप्रीतिकर झनझनाहट महसूस होती है-
इस कदर ढुलमुल हुए रिश्ते
फुसफुसे कैंचुल हुए रिश्ते।।
तीर पर संवेदना ठहरी
एक टूटा पुल हुए रिश्ते ।।
खो गई राहें अँधेरों में
चिरग्रों से गुल हुए रिश्ते

जीवन्त संबंधों की उपस्थिति का एहसास रोशनी की एक फाँक है, जिससे देहरी-आँगन सब जगर-मगर हो उठते हैं और उनका बुझना ही तो ठहराव है, अँधेंरा है जो सारी सक्रियताओं को निरस्त कर देता है।

स्वाधीनता के लिए यातनापूर्ण संघर्ष करने वाली पीढ़ी के ही नहीं बल्कि स्वातंत्र्योत्तर काल में जन्म लेने वाली पीढ़ियों के भी बेहतर जीवन-स्थितियों के तमाम स्वप्न साकार-सगुण होने से पूर्व ही भंग हो चुके हैं। तमाम सारी आशाएँ, आकांक्षाएँ भ्रुण-हत्या का अभिशाप झेल रही हैं। इस त्रासदी को झेलना उनकी नियति बन चुकी है। इस स्वप्न-भंग के कारणों का जब हम विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इसके पीछे घटिया राजनीतिक छल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। लोकतंत्र में ’लोक‘ की हिस्सेदारी, उसकी सक्रियता लुप्त हो गई और केवल ’तंत्र‘ हमारी जेबों व मुट्ठियों में भर दिया गया है। राजनीति का यह छल रचनात्मक मन को उस द्वापर-प्रसंग की ओर खींच ले जाता है, जिसमें परमवीर कर्ण से उसकी शक्ति के अजेय स्त्रोत कवच-कुण्डल माँग लिये गए थे-
लो माँगने को कवच-कुण्डल का तुम्हीं से वर
उगने लगे हैं मंच से फिर भाषणों के स्वर

उसी द्वापर-परम्परा की तरह इस देश का वयस्क मताधिकार बार-बार निष्कवच किया जाता रहा है। स्पष्ट है कि श्री गौतम का कवि-व्यक्तित्व केवल उनका द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी है।

 गीत-कवि राजनीति के इन व्यवसायियों की तुलना अँधेरे की लहरों से करता है और संवेदनात्मक पड़ताल से उसे इस बात की दृढ़ प्रतीति होती है कि उजाले का पुल इन्हीं के द्वारा तोड़ा गया है-
पुल ज्योति के हैं तोड़ती लहरें अँधेरों की
देगा नहीं कोई तुम्हें सूरज नय़ा लाकर

स्वाभाविक है कि ऐसे लोगों से नई सुबह या नए सूरज की अपेक्षा रखना एक और स्वप्न-भंग से गुजरना भर है।
और जब नई सुबह की आहटों से लोग निराश हो चुके हों तो सुबह की स्फुरणकारक गुनगुनाहट कोई कहाँ से सुन सकता है। इसकी अपेक्षा चारों ओर एक गहरा सन्नाटा ही अपने को खोलता नज़र आता है। सुबह की यह गुनगुनाहट ही तो नये उजालों की पदचाप है और पदचापें तो रचनाकार के शब्दों में गुमसुम पड़ी हैं-
सूर्यमुखी गीतों की
गुमसुम हैं पदचापें
शिथिल पवन-पंखों पर
तिरतीं बोझिल सांसें

साँसों का यह बोझिलपन अपने आस-पास में घटित होते हुए-से एक ठंडे अजनबीपन से जोड़ता है। मन के विश्वास को संदेहों, द्विविधाओं से घेर लेता है परिणामतः कवि प्रश्नाकुलता के लिए अपनी रचना-यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हुए कहता है-
तय करें
कैसे भला अब
परिचयों का यह सफर
अजनवीपन
काँच-सा जब
राह में जाए बिखर
चुप्पियों की ही चुभन को
जिंदगी भर हम सहें।

कविता के उद्भव काल से समकालीन लेखन तक उषा-काल, प्रातः बेला तथा संध्याकाल को विषय बनाकर हजारों कविताऐं लिखी गई हैं और भविष्य में भी काव्यक्षेत्र से यह विषय निर्वासित नहीं किया जाने वाला है किन्तु नया रचनाकार यदि उन्हें नई ताजगी और अपने अन्दाजे-बयाँ में प्रस्तुत करता है, तो विषयगत दुहराव भी पढ़ने, सुनने और गुनने में सर्वथा नया प्रतीत होने लगता है। संध्या को शब्दांकित करने के लिए ’पगडंडियों से आहट की खुशबुओं का उड़ना‘ जैसे काव्यात्मक चित्र एक गतिशील तथा नितांत टटके बिम्ब का सृजन श्री गौतम की काव्य-प्रतिभा का सार्थक प्रमाण है-
उड़ गई-
पगडंडियों से
खुशबुऐं सब आहटों की।

इस गीत की अगली पंक्ति में कवि आहटों की धेनुओं का प्रयोग करके वैदिक सांध्य-ऋचाओं के काव्य-सम्पन्न संसार की ओर खींच ले जाता है तथा इस तरह अपने काव्य की ’क्लासिकी‘ शक्ति का परिचय देता है।

प्रकृति श्री गौतम की रचनाओं में बार-बार उभर कर सामने आने वाला एक महत्वपूर्ण चरित्र है। किन्तु यहाँ प्रकृति द्विवेदी-युगीन कवियों के काव्य-संसार में चित्रित प्रकृति से सर्वथा भिन्न है। प्रकृति से गहरी रागात्मकता के बावजूद यहाँ कवि प्राकृतिक सुषमा पर मुग्धता का शिकार नहीं है। यहाँ प्रकृति के माध्यम से समकालीन मनुष्य की चिंताओं, उल्लासों तथा अभिशप्त संसार का ही एक अंग है, रचनाकार की अंतरंग है, सारी प्रतिकूलताओं की सहभोक्ता है, रचनात्मक सक्रियता की साझेदार है-
साँझ की
यह वृद्ध बेला
लौटती पगडंडियों से
मौन की थाम्हे उँगलियां
झील सहमी
छोड़ पीछे
उड़ चले सारस-युगल सब
एक चुप्ती बस थम्ही है
जे दिगन्तों तक
गई थीं
गूँजकर केंकार ध्वनियाँ
स्तब्ध हो हिम-सी जीम हैं
 अपने पहले संग्रह में ही श्री गौतम के गीत-कवि ने प्रखरता और परिपक्वता की जितनी मंजिलें तय कर ली हैं वह तमाम दूसरे लोगों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। देखने में तो ऐसा भी आता है कि कुछ लोग तमाम उम्र कलम घसीटते रहने के बाद भी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बना पाते और बहैसियत एक नसलनवीस की तरह जीते रहते हैं।

श्री गौतम का रचनाकार गंवई संस्कृति की सहजता-सरलता तथा आंतरिक सुवास में नहाया हुआ है। उसे महानगरीय जीवन की विद्रपताएँ बार-बार आहत करती हैं। फलतः अपनी सम्पूर्ण आंतरिक टीस तथा असहमति को व्यक्त करता हुआ कवि बोल पड़ता है-
चर्चा करें क्या आपसे
इस वक्त के अंदाज की
सम्बंध-
ज्यों सूखी नदी
सब ओर फैली रेत है
हर समय
मँडराता यहाँ पर
एक संशय-प्रेत है
कसते शिकंजे गर्दनें हैं
हर मुखर आवाज की।

व्यवस्था की कालिख की ओर संकेत करने वाली तथा उससे अपनी असहमति का इजहार करने वाली हर ईमानदार आवाज को किन खतरों का सामना करना पड़ता है, इसका स्पष्ट संकेत ऊपर की पंक्तियों में मिलता है। किंतु कवि विभिन्न-आयामी प्रतिकूलताओं के बावजूद अंततः हताशा की गिरफ़्त में अपने को नहीं आने देता और पराजय को उसकी सृजनात्मकता निरन्तर अस्वीकार करती जाती है बल्कि प्रतिकूलताएँ जितनी व्यापक तथा सघन होती हैं कवि सामाजिक बेहतरी तथा खुशहालियों के लिए उतनी ही संकल्प-शक्ति के साथ सक्रियता से भर उठता है-
शोर को हम गीत में बदलें
इन निरर्थक शब्द-ढूहों का
खुरदुरापन ही घटे कुछ तो
उमस से दम घोटते दिन ये
सुखद लम्हों में बँटें कुछ तो
चुप्पियों का यह विषैलापन
लयों के नवगीत में बदलें

शोर को गीत में बदलने की यह प्रक्रिया आसान नहीं है। यह बदलाव तभी संभव है, जब ’मैं‘ तुमसे एकाकार हो जाए। इसके लिए निरंतर सचेतना तथा क्रियाशीलता को सतत जीवित बनाए रखना आवश्यक है। इस संदर्भ में अपने रचनात्मक प्रयासों का संकेत देते हुए कवि अपने एक गीत में कहता है-
भोर होते ही जगाता हूँ
गीत के इन छन्द शिशुओं को
हास जिनके किरण-पाँखों पर
दिगन्तों में फैल जाते हैं।
साँझ होते ही जगाता हूँ
शब्द के उन रूप-रंगों को
अर्थ जिनके चिनगियाँ बनकर
राख में भी दिपदिपाते हैं।

’मैं‘ की यह अपरोक्ष स्थिति किसी व्यक्तिवादी सोच से जुड़े रचनाकार में घेरे पर घेरा बनाती जाती है जबकि रचनात्मकता की सही यात्रा उस घेरे को तोड़ने की और निजता के सामाजिक विसर्जन की है। ’स्व‘ का यह विसर्जन रचनात्मकता की ही एक प्रक्रिया है। अनुभव तथा अभिव्यक्ति के क्षेत्रों को विस्तार देने का उपक्रम है। इसकी अनुपस्थिति किसी रचना को निजी संस्मरण या दिवास्वप्न बनाकर छोड़ देती है। ये रचनाएँ स्वयं बातचीत के लिए आपको आमंत्रित करेंगी। आप भविष्य की उस यात्रा, उस बातचीत में शामिल हों, यही मेरी सर्वोपरि वांछा है।
२७.१०.२०१२ 
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नवगीत संग्रह- गीत पर्व आया है, रचनाकार- राजेन्द्र गौतम, प्रकाशक- दिगंत प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली,  प्रथम संस्करण- जनवरी १९८३, मूल्य-रू. ३०/-, पृष्ठ-९६,  लेखक- माहेश्वर तिवारी, भूमिका।

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