रविवार, 30 सितंबर 2018

amrut lal vegad

चरित चर्चा: 
सादा जीवन उच्च विचार के पर्याय अमृतलाल वेगड़
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
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[लेखक परिचय: जन्म २०-८-१९५२, मंडला, शिक्षा डी.सी.ई., बी. ई., एम.आई.ई, एम.ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, संप्रति पूर्व कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग, अधिवक्ता म. प्र. उच्च न्यायालय,  संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, सभापति अभियान जबलपुर, चेयरमैन इन्डियन जिओ टेक्निकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर, प्रकाशित कृतियाँ: कलम के देव (भक्ति गीत), लोकतंत्र का मकबरा तथा मीत मेरे कविताएँ,  काल है संक्रांति का तथा सड़क पर नवगीत संग्रह, कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य, भूमिका लेखन ४३ पुस्तकें, संपादन १३ संकलन, १६ स्मारिकाएँ, ८ पत्रिकाएँ,  सहलेखन ५ पुस्तकें, शोधलेख १५ आदि, उपलब्धि: १३ राज्यों की संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान, १२ भारतीय भाषाओं में लेखन तथा अनुवाद, हिंदी छंदशास्त्र न विशेष कार्य ३५० नए छंदों का सृजन। संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१, ८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.कॉम
                      एक चित्रपटीय गीत है "जिओ तो ऐसे जिओ, जैसे सब तुम्हारा है / मरो तो ऐसे कि जैसे, तुम्हारा कुछ भी नहीं" इन पंक्तियों में अंतर्निहित जीवन सूत्र वही है जिसे कबीरदास "यह चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ के मैली कीन्हीं चदरिया / दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया" कहकर व्यक्त करते हैं। वर्तमान भौतिकतावादी समय में जब व्यक्ति को स्वार्थ के और कुछ दिखाई नहीं दे रहा, नैतिक मूल्यों का सतत पतन हो रहा है क्या कोई व्यक्ति ऐसा जीवन जी सकता है? यह प्रश्न जिन किशोरों और युवाओं के मन में उठे उन्हें संस्कारधानी जबलपुर निवासी नर्मदा परिक्रमावासी और नर्मदा साहित्य के प्रणेता रहे नर्मदापुत्र अमृतलाल वेगड़ के जीवन को जानना चाहिए। वे (मैं भी) भाग्यवान हैं जिन्हें वेगड़ दादा को जानने और उनसे मिलने का अवसर मिला। भविष्य में वेगड़ जी के साथ गुजारे पलों को लोग वैसे ही याद करेंगे जैसे बापू के साथ बीते दिनों को करते हैं। अमृतलाल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी, बहुभाषी (हिंदी, गुजराती, अंग्रेजी), कोलाज चित्रकार, पर्यटक, संस्मरण लेखक, कुशल वार्ताकार, प्रभावी वक्ता, प्रकृति-प्रेमी, निरभिमानी, सरल, मितव्ययी व मृदुभाषी होने के साथ-साथ उदारमना सहृदय मानव भी थे। उन्होंने नर्मदा परिक्रमा यात्रा करके नर्मदा के आंचल में मौजूद जैव विविधता को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत कर नर्मदा के पर्यावरण की रक्षा हेतु सतत काम किया। आरंभ में लोग उनकी अनदेखी करते किंतु वे गुरुदेव की 'एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!' नीति का अनुसरण कर निरंतर आगे बढ़ते गए. अंतत: आलोचक ही उनके प्रशंसक बन गए।   

सफल नहीं सार्थक 
                      सनातन सलिला नर्मदा तट स्थित संस्कारधानी ( पूज्य विनोबा भावे द्वारा प्रदत्त विशेषण) जबलपुर में कच्छ गुजरात से आ बसे मेस्ट्री परिवार में ३ अक्तूबर १९२८ को जन्मे तरुण अमृतलाल ने १९४८ से १९५३ के मध्य विश्व विख्यात चित्रकार आचार्य नन्दलाल बोस से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित शांति निकेतन, विश्व भारती विश्वविद्यालय में चित्र कला की शिक्षा प्राप्त की। पाठ्यक्रम पूर्ण कर वापिस लौटते समय उन्होंने आचार्य बोस से जीवन का उद्देश्य पूछा। गुरु ने कहा "जीवन को सफल नहीं, सार्थक बनाना।" गुरु की बात उन्होंने गाँठ बाँध ली और आजीवन सार्थकता को वरीयता दी। म. गाँधी के अहिंसा सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने छात्र जीवन में एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत 'अहिंसा टु बैटलफील्ड" लिखा जिसे कालांतर में 'गाँधी गंगा' शीर्षक से प्रकाशित किया। १९७७ से २०१० तक उन्होंने लगभग ४०० किलोमीटर पदयात्रा कर नर्मदा परिक्रमा संबंधी  संस्मरण लेखन किया जिसे 'सौंदर्य की नदी नर्मदा', 'तीरे-तीरे नर्मदा', तथा 'नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो' शीर्षकों से तीन पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया। उन्होंने इसी मध्य नर्मदा पर निर्मित कोलाज व रेखाचित्रों की पुस्तक  'नर्मदा रेखांकन' शीर्षक से प्रकाशित कर अपने कला-गुरु आचार्य नंदलाल बोस को समर्पित की। २००४ में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और मध्य प्रदेश साहित्य पुरस्कार से सम्मनित किया गया। गुजराती भाषा में 'सौदाराणी नर्मदा यात्रा' और 'परिक्रमा नर्मदा मायानी' के लिए  उन्हें कई सम्मान और अपार लोकप्रियता मिली। 

साथी हाथ बढ़ाना
                       मेरा सौभाग्य है कि वेगड़ जी का आशीर्वाद मुझे अनेक बार मिला, घंटों उनसे चर्चाएँ हुईं। १९९४ में सड़क दुर्घटना में घायल होकर जबलपुर में डॉ. प्रमोद बाजपेई द्वारा की कई शल्यक्रिया में संक्रमण होने के बाद बोम्बे हॉस्पिटल में डॉ. ढोलकिया के निर्देशन में डॉ. झुनझुनवाला तथा डॉ. पचौरी द्वारा पुन: शल्य क्रिया में बाएँ पैर के कूल्हे का जोड़ कटने पर मैं लगभग ३ माह बाद बैसाखियों पर चल पाया। धीरे-धीरे निवास के समीप रानी दुर्गावती उद्यान में ओशो को संबोधि प्राप्ति का माध्यम बने मौलश्री वृक्ष के तले बैठकर व्यायाम और काव्य लेखन करता। उन दिनों एक पैर से ६०% विकलांगता को लेकर मैं अभियंता कार्यस्थल पर काम कैसे कर सकूंगा, कैरियर पर विपरीत प्रभाव होगा आदि चिंताएँ घेरे रहती थीं। प्रात: भ्रमण पर बहुधा वेगड़ दादा सपत्निक मिलते हाल-चाल पूछते और कुछ मनोविनोद कर मेरी मनोव्यथा दूर करते। उनके चलने की गति बहुत तेज थी, कभी-कभी बा पीछे रह जातीं तो वे रुककर किसी परिचित से गपशप करते ताकि बा साथ आ जाएँ, फिर उन्हें कुछ आगे निकल जाने देते और खुद तेजी से चलकर बा के साथ जा मिलते। जब मुझे एक चित्रपटीय गीत याद आता 'साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, सब मिल बोझ उठाना' वेगड़ दम्पति आगे बढ़ जाते, मैं बैसाखी पर धीरे-धीरे साधना (धर्मपत्नी प्रो. डॉ. साधना वर्मा) के साथ अपना भ्रमण-व्यायाम करता।                      

पुस्तक संस्कृति के अग्रदूत 
                       कई बार बाहर से आए मित्र वेगड़ जी से मिलाने आग्रह करते और मैं उन्हें लेकर समय-असमय दादा के पास चला जाता। असाधारण प्रसिद्धि, लोकप्रियता और सम्मान प्राप्ति के बाद भी उनकी निरभिमानता विस्मित करते थी। वे यथाशीघ्र आकर आगंतुकों से मिलते, उनसे वार्तालाप करते, उनके प्रश्नों के उत्तर देते, और माँग होने पर अपना साहित्य भी उपलब्ध कराते। उनसे साहित्य बिना मोल न देने का पाठ मैंने सीखा। वे किताब देने के पूर्व उसका दाम अवश्य लेते और यह वचन भी कि उस किताब का सदुपयोग किया जाएगा। 'सड़क पर हीरा पड़ा हो तो आदमी ठोकर मारकर नाली में डाल देता है किंतु कंचा खरीदता है तो सम्हालकर जेब में रखता है', वे कहते थे। 'खरीदेगा तो पढ़ेगा, मुफ्त में मिलेगी तो फेंक देगा'।  उनकी यह बात मैंने अनेक बार सत्य होते देखी। कादंबिनी सम्पादक राजेन्द्र यादव नगर पधारे तो अनेक साहित्यकारों ने उन्हें अपनी कृतियाँ भेंट कीं, यादव जी गए तो वे सभी कृतियाँ फूल मालाओं के साथ मुँह बिसूरती पड़ी थीं। तब मुझे वेगड़ दादा की बात का मर्म समझ में आया। वे अपने मूल्यों से खुद को भी मुक्त नहीं रखते थे। वे पुस्तक मुफ्त न देने के साथ यथासंभव पुस्तक मुफ्त न लेने के भी कायल थे। 
                      
वही लो जो काम का हो                       
                      मेरा नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' छपा तो मैं उन्हें प्रति भेंट करने गया, उन्होंने देखा, कुछ पन्ने पलटे, कहा जो रचनाएँ पसंद हैं सुनाओ। पुस्तक रख ली, कुछ गप-शप, स्वल्पाहार पश्चात चलने को उठा तो बोले 'मेरा एक काम कर दो. यह पुस्तक अमुक जी (एक विख्यात वरिष्ठ-रचनाकार) तक पहुँचा दो। उन्हें तो जानते होगे। मैंने बताया कि दरस-परस मात्र है निकटता नहीं तो बोले 'बहुत बढ़िया व्यक्ति हैं, मिलोगे तो आनंद आएगा। उन्हें बताना मैंने भेजी है, वे इसके साथ न्याय कर उत्तम समीक्षा लिखेंगे। मैं तो गीत जे जुदा नहीं हूँ। यहाँ किताब का उपयोग नहीं हो पायेगा, मैं भी ले जाकर उन्हें ही दूँगा, तुम जाओगे तो 'एक पंथ दो काज' उनसे समीपता भी होगी अच्छा रुको, चलता हूँ, बहुत दिनों से मिला नहीं हूँ, मेरी भी भेंट हो जाएगी।' मैं ठहर गया, वे वस्त्र बदलकर आए। मैं दरवाजे से निकल कर सड़क तक आया, पीछे-पीछे दादा थे, अचानक उन्होंने मुख्य द्वार का सहारा लिया, देखते ही मैंने उन्हें सम्हाला। कुछ क्षण उन्हें सम्हालने में लगे, बोले 'अचानक चक्कर आ गया, आज जाना नहीं हो सकेगा। तुम्हीं चले जाओ।' मैंने उन्हें अंदर बगीचे तक ले जाकर कुर्सी पर बैठाया, बा को आवाज देकर बुलाया और दोनों को प्रणाम कर बिदा ली, तब क्या पता था कि यही अंतिम भेंट हैं।    

जहाँ चाह, वहाँ राह  
                      उनकी पहली पुस्तक 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' चर्चा में आई तो मैं पुस्तक लेने दादा के के पास चला गया। वह पहली ही भेंट थी। तब वे बैठक के कमरे में आगंतुकों से मिला करते थे। नर्मदा परिक्रमा करने के सम्बन्ध में पूछने पर वेगड़जी ने बताया कि प्रकृति और सौन्दर्य से प्रेम की प्रकृति उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी। वे अपने स्थानीय कलानिकेतन संस्थान में कला की शिक्षा देते थे, बीच-बीच में चित्र बनाने के लिये नर्मदा तट के आसपास जाते रहते थे। पहले आसपास के घाटों पर, फिर गावों में  रेखांकन के लिए के लिये दृश्य  देखने जाते थे। वहीं नर्मदा परिक्रमा करते लोग मिलते, बातचीत होती। धीरे-धीरे मन होने लगा कि नर्मदा की परिक्रमा की जाए लेकिन कोई न कोई बाधा आ ही जाती। अंतत:, पचास की उमर के आसपास १९७७ से वे नर्मदा-यात्रा आरंभ कर सके और यह क्रम एक दशक (१९८७) तक चला। सामान्य परंपरा पूरी यात्रा एक साथ करने की है कितु यह संभव न होने पर वेगड़ जी ने टुकड़ों-टुकड़ों में परिक्रमा करना आरंभ कर दिया। “सौंन्दर्य की नदी नर्मदा” में उन्होंने लिखा है: 'कभी-कभी मैं अपने आप से पूछता हूं, यह जोखिम भरी यात्रा मैंने क्यों की?' और हर बार मेरा उत्तर होता, 'अगर मैं यह यात्रा न करता तो मेरा जीवन व्यर्थ जाता।' जो जिस काम के लिये बना हो, उसे वह काम करना ही चाहिये। और मैं नर्मदा पदयात्रा के लिये बना हूँ।' ग्यारह वर्षों में की गई दस यात्राओं का वर्णन और इस मध्य किये गए कुछ रेखांकन हैं इस पुस्तक में प्रकाशित हैं। 

एकदा नैमिषारण्ये 


                      वेगड़ जी की प्रेरणा से वर्ष २००२ में अभियान संस्था के माध्यम से 'दिव्य नर्मदा' अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ. पत्रिका के ४ वर्षों में १० अंक प्रकाशित हुए किन्तु मेरा स्थानांतरण शहडोल हो जाने तथा सहयोगियों और अर्थ के भाव में इसे अंतरजाल पर ले जाना पड़ा। अब यह www.divyanarama.in पर उपलब्ध है। अब तक २४ लाख से अधिक पाठक इससे जुड़ चुके हैं तथा लगभग ७००० रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी साहित्य, छंद शास्त्र तथा अन्य विषयों पर कार्यशालाओं से देश-विदश में सहस्त्राधिक रचनाकार लाभान्वित हुए हैं। इस पत्रिका के प्रथम २ अंकों के मुखपृष्ठ पर वेगड़ जी द्वारा नर्मदा पर निर्मित कोलाज ही प्रकाशित हुए हैं। उनके एक और कोलाज की छाया-प्रति मेरे पास उपलब्ध है। जब भी भेंट होती वे नर्मदा जी से जुड़े नये अनुभव सुनाते। भारतीय ग्रंथों में कई आख्यान 'एकदा नैमिषारण्ये'  'एक बार नैमिषारण में' से आरम्भ होते हैं। इसी शीर्षक से उपन्यास भी रचा गया है। वृक्ष की छाया तले पंछियों की कलरव के साथ वेगड़ जी के श्री मुख से नर्मदा आख्यान सुनकर कल्पना की जा सकती थी कि ज्ञान-दान की भारतीय वाचिक परंपरा कितनी सरल और उदात्त रही होगी। 

महापरिवार  
                      वेगड़ जी का पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन वर्तमान काल में जीवन आदर्श रहा। एक ही घर में एक साथ तीन पीढ़ियों का सरस-सार्थक समन्वय देखकर किसी तीर्थ की सी अनुभूति होती थी। पहली बार उनके घर जाने पर मैंने घंटी बजाई तो एक बच्चा निकला। मुझे अजनबी पाकर उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो मैंने कहा 'वेगड़ जी से मिलना है' 
उसने पूछा- 'किनसे?' 
मैंने सोचा यह सुन नहीं पाया तो फिर कहा 'वेगड़ जी से' 
उसने शायद मजा लेने के अंदाज में फिर पूछा 'किनसे?' 
अब मुझे संदेह हुआ कि गलत घर में तो नहीं आ गया, अत: उसी से पूछा 'वेगड़ जी का घर यही है न?' 
'जी हाँ यही है' बच्चे ने कहा। 
'तो उन्हें बुला दो, उन्हीं से मिलना है।' मैं बोला। 
'किन्हें बुला दूँ?' अब बच्चे के मुँह पर झुंझलाहट परिलक्षित हो रही थी। खेल छोड़कर आया था और उसके साथी आवाज़ दे रहे थे।
मुझे भी उलझन हो रही कि कैसा बच्चा है बार-बार पूछता है और किसी को बुलाता नहीं। मैंने कुछ खीजकर कहा वेगड़ जी से मिलना है, बुलाते क्यों नहीं?'
'बताइए तो कौन से वेगड़ जी को बुला दूँ?' अब मैं समझा कि यहाँ पूरा परिवार रहता है, और सभी वयस्क पुरुष वेगड़ जी ही कहे जाते होंगे। अपनी नासमझी पर हँसी भी आ रही थी, बच्चा उलझन में था, मैं भी पशोपेश में था  कि उसकी आयु के आधार पर अनुमान से नाना को बुलाने को कहूँ या दादा को? अंतत: 'सबसे बड़े वाले वेगड़ जी को।' उसने भीतर जाकर बताया, बैठक खाने का दरवाजा खोला, मुझे बैठाया और यह जा, वह जा। कुछ देर में वेगड़ जी से बातों ही बातों में सम्मिलित परिवार की जानकारी मिली, तब बच्चे का असमंजस समझ सका कि घर में जितने भी बड़े हैं उनसे मिलनेवाले सभी जन 'वेगड़ जी' से मिलने आते हैं, अत: कौन से वेगड़ जी को बुलाना यह, यह जाने बिना वह किसे बुलाता?

पति--पत्नी परिपूरक  
                      प्राय: देखा है कि कलाकार-साहित्यकार आदि से उनके परिवारजनों को शिकायत रहती है कि वे अपने में डूबे रहते हैं और परिवार पर अपेक्षित ध्यान नहीं देते किन्तु वेगड़ जी इसके अपवाद रहे। वे कला और साहित्य की आराधना करते समय भी परिवारमय होते और परिवार के साथ रहते हेभी कला और साहित्य में डूबे रहते। “अमृतस्य नर्मदा” में 'मेरे पति' शीर्षक से कांता जी (बा) ने वेगड़ जी के विषय में अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए लिखा है- "४५ वर्षों के साथ में मैने उनके विविध रूप देखे। मैंने उन्हें खुश देखा, नाराज देखा, उदास और दुखी देखा, रोते देखा और खिलाखिलाकर हँसते देखा। मन के दृढ़ नहीं हैं। अतिशयोक्ति बहुत करते हैं, आत्मप्रशंसा उससे भी अधिक। मैं रोकती हूँ तो कहते हैं, मैं किसी की निंदा नहीं करता। परनिंदा से आत्मप्रशंसा अच्छी। आडंबरहीन और डरपोक से लगने वाले इस इनसान को देखकर मन में यही बात आती है कि नर्मदा तट की २६२४ कि.मी. की कठिन और खतरनाक पदयात्रा इन्होंने कैसे की होगी।"

                      मैंने कई कार्यक्रमों में वेगड़ जी को बोलते सुना, बा सामने होतीं तो वेगड़ जी जी की वक्तृता अधिक स्निग्ध और सरस होती। बा प्राय: मुग्ध भाव से उन्हें निहारतीं किंतु अपना उल्लेख आते ही सँकुच जातीं, तब उनके चेहरे की छटा मनोहारी होती। वेगड़ दादा परिहास करते हुए उन्हें 'वन वुमेन सेंसर बोर्ड' कहते थे। दोनों का एकत्व भाव ऐसा कि अपेक्षाकृत युवाकाल में की गयी प्रथम यात्रा में वेगड़ जी अकेले गए, बा घर सम्हालती रहीं, ७५ वर्ष की आयु में की दूसरी यात्रा अधिक कठिन और खतरों से भरी थी में किंतु बा साथ थीं। 

मितव्ययी वेगड़ जी 
                      'सादा जीवन उच्च विचार' वेगड़ जी का ध्येय वाक्य था। मधुर तथा मितभाषी वेगड़ जी बोलने और लिखने दोनों में शब्दों का प्रयोग बहुत सजगता के साथ करते थे। उनके लेखन और भाषण में कोइ निरर्थक शब्द नहीं होता था। यह साहित्यप्रेमी ही नहीं हर मनुष्य के लिए सीखने की बात है। वेगड़ जी लिखकर कभी-कभी निकटस्थ मित्रों को सुनाते, उनकी प्रतिक्रिया पाकर अथवा खुद पढ़कर दुबारा काँट-छाँट करते, सुधारते। यह देख मुझे बुआ श्री (महीयसी महादेवी जी) द्वारा बताया प्रसंग याद हो आता कि दद्दा (राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त) जब भारत-भारती लिख रहे थे तो पत्र लिखकर चिरगाँव बुलाया तथा पांडुलिपि सुनाकर विमर्श किया। मुंशी अजमेरी और सियारामशरण जी के साथ तो प्राय: रोज ही विमर्श करते थे। बुआ जी को शिकायत थी कि नयी पीढ़ी बहुत जल्दी में रहती है जो लिखा झटपट प्रकाशित कर देती है, न पुनर्विचार न विमर्श फिर श्रेष्ठता कैसे हो? तब क्या पता था कि अगली पीढ़ी ऐसी आएगी जो कागज़ -कलम से रिश्ता तोड़कर जो मन में आये सीधे टंकित कर भेज देगी।

सोद्देश्य लेखन:
                      वेगड़ जी के लिए लेखन समय बिताने का साधन नहीं सरस्वर उपासना था। वे सरल, सरस और सहज लिखते थे। जो देखते वह इस तरह लिखते कि बात के तार से तार निकलता जाए। कथा कहने की औपनिषदिक शैली या बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियों की वे कहते चलते थे। जो बताते उसके साथ देश-काल-परिवेश, अतीत और भावी को भी यथावश्यक समेट लेते। इसलिए उनके लेखन में कालातीत होने का तत्व समाहित रहता था। एक उदाहरण देखें-
ओंकारेश्वर से खलघाट
सुबह विष्णुपरी घाट पर बैठा था। सुबह की गुनगुनी धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। सामने है ओंकारेश्वर पहाड़ी नदी का पहाड़ी तीर्थस्थान। संकरी नर्मदा के दोनों ओर खड़ी चट्टानी कगारें हैं। इस तट पर मांधाता, उस तट पर ओंकारेश्वर दोनों मिलकर ओंकार-मांधाता और बीच में अलस गति से बहती शांत-नीरव नर्मदा। नदी बहती हुई भी रुकी सी जान पड़ती है। सुदूर केरल से आकर बालक शंकर ने यहाँ गुरु गोविन्दपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वे हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक हैं। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया, वह अनुपम है। ऐसे आद्य शंकराचार्य को पावन स्मृति इस ओंकारेश्वर से जुड़ी हुई है। फिर कमलभारती जी, रामदासजी और मायानंदजी सदृश संतों के आश्रम भी यहाँ रहे। आज भी नए नए आश्रम बनते जा रहे हैं।
नर्मदा तट के छोटे से छोटे तृण और छोटे से छोटे कण न जाने कितने परव्राजकों, ऋषि मुनियों और साधु संतों की पदधूलि से पावन हुए होंगे। यहाँ के वनों में अनगिनत ऋषियों के आलम रहे होंगे। वहाँ उन्होंने धर्म पर विचार किया होगा, जीवन मूल्यों की खोज की होगी और संस्कृति का उजाला फैलाया होगा। हमारी संस्कृति आरण्यक संस्कृति रही। लेकिन अब? हमने उन पावन वनों को काट डाला है और पशु-पक्षियों को खदेड़ दिया है या मार डाला है। धरती के साथ यह कैसा विश्वासघात है। एक आदमी स्नान के लिए आया था। मैंने कहा, '' नर्मदा कितनी संकरी है। ''
'' नर्मदा की यह एक धारा है। दूसरी ओंकारश्वर के पीछे है। कहते हैं कावेरी नर्मदा से मिली लेकिन थोड़ी ही देर में दोनों में अनबन हो गई और कावेरी नर्मदा से अलग हो गई। ओंकारेश्वर के इस ओर है नर्मदा, उस ओर है कावेरी। ''
'' दोनों फिर मिलती हैं या नहीं? ''
'' जहाँ ओकारेश्वर का टापू खत्म होता है, वहीं दोनों फिर मिल जाती है। नर्मदा ने आखिर छोटी बहना को मना लिया। इसलिए असली कावेरी संगम बाद का है, पहला नहीं। ''
पहले आगमन, फिर बहिर्गमन, अंत में पुनरागमन! बढ़िया कल्पना है!
यहाँ बैठा सामने के घाट को देख रहा हूँ। वहाँ न जा पाने का कोई दुख नहीं है क्योंकि ओंकारेश्वर दो बार हो आया हूँ लेकिन अनिल और श्यामलाल से कहा कि तुम जरूर हो आओ। नाव से जाना, पुल से आना। यहाँ से मोरटक्का। वहाँ तक सड़क जाती है, लेकिन हम सड़क से नहीं जाएँगे, नदी के किनारे-किनारे जाएँगे।
दोपहर को निकले। लेकिन थोड़ी ही देर में समझ में आ गया कि दोपहर को चलकर गलती की। सूरज सामने रहता है, चट्टानें तंदूर को तरह गरमा गई हैं और श्यामलाल नंगे पाँव है। लेकिन वह तो शायद दहकते अंगारों पर भी चल सकता है।
कभी चट्टानों से जूझते, कभी झाड़ी से उलझते तो कभी सामने तट की पर्वत-माला से आते हवा के झोंकों का आनंद उठाते आगे बढ़ रहे थे। कभी रुक जाते माथे का पसीना पोंछते और आगे बढ़ते। शाम को मारटक्का के खेडीघाट पहुँचे। यहाँ नर्मदा पर सड़क का पुल है, पास में रेल का पुल भी है। रात यहीं बिताई। सुबह उठते ही अनिल ने कहा, '' जरा ऊपर देखिए।' मध्य आकाश में चाँद था। मैंने कहा. '' सूरज के हिसाब से अभी सबेरा है, लेकिन चांद के हिसाब से अभी दोपहर है!''
अनिल के लिए यह भले ही विस्मय की बात हो, पर मैं तो चाँद के एक से एक करतब देख चुका हूँ। कभी पूर्ण कुंभ. तो कभी बारीक रेखा उसका बांकपन कभी सीधा तो कभी उलटा, कभी घटता तो कभी बढ़ता कभी निकलते ही डूबने की तैयारी तो कभी आधी रात को गायब और भरी दोपहर को हाजिर! क्या कहना इस मनमौजी का। चाँद जब यह सब कर सकता है। तो एक करतब उसे और दिखाना था। सूर्योदय और सूर्यास्त के कारण पूर्व और पश्चिम दिशाओं की छटा देखते ही बनती है। उपेक्षित रह जाते हैं उत्तर और दक्षिण। क्या ही अच्छा होता अगर चाँद उत्तर में निकलता और दक्षिण में डूबता। चंद्र का ऐसा अपूर्व उदय देखकर सूर्य भी निरुत्तर रह जाता। 

वेग जी व्यक्ति होते हुए भी व्यक्ति नहीं थे, वे समय थे। हमरा सौभग्य कि हम उनके समय में हुए, उन्हें देख, सुना, स्पर्श किया, आशीष पाया। गाँधी और विनोबा कैसे रहे होंगे यह वेगड़ जी को देखकर समझ सके। जबलपुर का नाम संस्कारधानी जिन व्यक्तित्वों के कारण सार्थक लगता है उनमें से वेगड़ जी अनन्य हैं। काश, उनके रहते हुए उन पर लिखने का अवसर मिला होता तो उन्हें ही सुनाता और उनकी राय पूछता।  
अमृत केवल नाम नहीं था 
अमृत उनकी 
श्वास-श्वास में 
आस-आस में 
दिया प्रकृति ने। 
रखा नहीं, कर बंद तिजोरी
बूँद-बूँद दी बाँट विहँसकर 
कुछ बूँदें पायीं मैंने भी। 
दैव! शक्ति दे 
फसल अमृत की उगा सकूँ मैं 
बाँट सकें फिर-फिर अमृत हम। 
***
   

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