रविवार, 23 सितंबर 2018

doha salila

दोहा सलिला
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मीरा का पथ रोकना, नहीं किसी को साध्य।
दिखें न लेकिन साथ हैं, पल-पल प्रभु आराध्य।।
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श्री धर कर आचार्य जी, कहें करो पुरुषार्थ। 
तभी सुभद्रा विहँसकर, वरण करेगी पार्थ।।
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सरस्वती-सुत पर रहे, अगर लक्ष्मी-दृष्टि। 
शक्ति मिले नव सृजन की, करें कृपा की वृष्टि।।
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राम अनुज दोहा लिखें, सतसई सीता-राम। 
महाकाव्य रावण पढ़े, तब हो काम-तमाम।।

व्यंजन सी हो व्यंजना, दोहा रुचता खूब। 
जी भरकर आनंद लें, रस-सलिला में डूब।।
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काव्य-सुधा वर्षण हुआ, श्रोता चातक तृप्त। 
कवि प्यासा लिखता रहे, रहता सदा अतृप्त।।
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शशि-त्यागी चंद्रिका गह, सलिल सुशोभित खूब।  
घाट-बाट चुप निरखते, शास्वत छटा अनूप।।
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 दीप जलाया भरत ने, भारत गहे प्रकाश।  
कीर्ति न सीमित धरा तक, बता रहा आकाश।।
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राव वही जिसने गहा, रामानंद अथाह। 
नहीं जागतिक लोभ की, की किंचित परवाह। 
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अविरल भाव विनीत कहँ, अहंकार सब ओर। 
इसीलिए टकराव हो, द्वेष बढ़ रहा घोर।।
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तारे सुन राकेश के, दोहे तजें न साथ। 
गयी चाँदनी मायके, खूब दुखा जब माथ।।

कथ्य रखे दोहा अमित, ज्यों आकाश सुनील। 
नहीं भाव रस बिंब में, रहे लोच या ढील।।
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वंदन उमा-उमेश का, दोहा करता नित्य।
कालजयी है इसलिए, अब तक छंद अनित्य।।
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कविता की आराधना, करे भाव के साथ। 
जो उस पर ही हो सदय, छंद पकड़ता हाथ।।
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कवि-प्रताप है असीमित, नमन करे खुद ताज। 
कवि की लेकर पालकी, चलते राजधिराज।।  
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अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय सृष्टि। 
कथ्य, भाव रस बिंब लय, करें सत्य की वृष्टि।।
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करे कल्पना कल्पना, दोहे में साकार। 
पाठक पढ़ समझे तभी, भावों का व्यापार।।
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दूर कहीं क्या घट रहा, संजय पाया देख। 
दोहा बिन देखे करे, शब्दों से उल्लेख।।
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बेदिल से बेहद दुखी, दिल-डॉक्टर मिल बैठ। 
कहें बिना दिल किस तरह, हो अपनी घुसपैठ।।
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मुक्तक खुद में पूर्ण है, होता नहीं अपूर्ण। 
छंद बिना हो किस तरह, मुक्तक कोई पूर्ण।।
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तनहा-तनहा फिर रहा, जो वह है निर्जीव।
जो मनहा होकर फिर, वही हुआ संजीव।।
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पूर्ण मात्र परमात्म है, रचे सृष्टि संपूर्ण। 
मानव की रचना सकल, कहें लोग अपूर्ण।।
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छंद सरोवर में खिला, दोहा पुष्प सरोज।
प्रियदर्शी प्रिय दर्श कर, चेहरा छाए ओज।.
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किस लय में दोहा पढ़ें, समझें अपने आप। 
लय जाए तब आप ही, शब्द-शब्द में व्याप।।
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कृष्ण मुरारी; लाल हैं, मधुकर जाने सृष्टि। 
कान्हा जानें यशोदा, अपनी-अपनी दृष्टि।। 
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नारायण देते विजय, अगर रहे यदि व्यक्ति। 
भ्रमर न थकता सुनाकर, सुनें स्नेहमय उक्ति।।
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शकुंतला हो कथ्य तो, छंद बने दुष्यंत। 
भाव और लय यों रहें, जैसे कांता-कंत।।
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छंद समुन्दर में खिले, दोहा पंकज नित्य। 
तरुण अरुण वंदन करे, निरखें रूप अनित्य।।
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 विजय चतुर्वेदी वरे, निर्वेदी की मात। 
जिसका जितना अध्ययन, उतना हो विख्यात।।
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श्री वास्तव में गेह जो, कृष्ण बने कर कर्म। 
आस न फल की पालता, यही धर्म का मर्म।।
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राम प्रसाद मिले अगर, सीता सा विश्वास। 
जो विश्वास न कर सके, वह पाता संत्रास।।
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२३.९.२०१८      
      





















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