सोमवार, 24 सितंबर 2018

muktak

मुक्तक 
कान्हा कहता 'करनी का फल सबको मिलता है'
माली नोचे कली-फूल तो, आप न फलता है 
सिर घमण्ड का नीचा होता सभी जानते हैं -
छल-फरेब कर व्यक्ति स्वयं ही खुद को छलता है
*
बहुत बुरा जो तुरत भुला दो, मन से फेंक निकाल
बार-बार क्यों ध्यान करे मन, खुद से करो सवाल?
क्यों अच्छे का ध्यान न आता, मन क्यों अकुलाता?
शुभ संकल्प अगर हों कुछ तो होगा मन न निढाल
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अपने मन में आप जल लें नव आशा का दीप
तूफानों के बीच मिले मोती, यदि ले लें सीप
शिकवे की रेती पर दौड़े तो थक जायेंगे
क्षमा-घाट पर बैठ जाइये धरा तनिक सी लीप
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तन धोखा है, मन धोखा है, जीवन धोखा है
श्वास, आस, विश्वास, रास, परिहास भी धोखा है
धोखे के कीचड़ में हमको कमल खिलाना है
खुद को क्षमा कर सकें खुद से ब्यर्थ लजाना है
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