रविवार, 30 सितंबर 2018

समीक्षा- समय की दौड़ में

कृति चर्चा:
'समय की दौड़ में' नवगीत सबसे आगे 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति विवरण: समय की दौड़ में, नवगीत संस्करण, बृजनाथ श्रीवास्तव, प्रथम संकरण, २०१७, आई एस बी एन ९७८-९३-८५८१२-३०-९, आकार २२ से. x १४ से., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १२०, मूल्य ३००/-, ज्ञानोदय प्रकाशन, ६-७ जी मानसरोवर कोम्प्लेक्स, पी, रोड, कानपूर, २०८०१२, चलभाष ९४१५१२९७७३, गीतकार संपर्क: २१ चाणक्यपुरी, ई श्यामनगर, नयी पी. ए. सी. लाइन, कानपुर २०८०१५, चलभाष ९४५०३२६९३० / ९७९५१११९०७, ईमेल sribnath@gmail.com]
*
                    मानव और ध्वनि का साथ आदिकालीन है। नाद का श्रवण, स्मरण और अनुकरण ही आदि मानव को अन्य  जीव-जन्तुओं से भिन्न और सबल बनाने का कारण हुआ। कालांतर में श्रुति-स्मृति जनित वाचिक काव्य को नया आयाम दिया ध्वन्यांकन ने जिससे लिपि का विकास हुआ। कलम, रंग और पटल के संयोजन ने ध्वनि को स्थिर तथा स्थाई कर दिया। नादाधारित वाचिक परंपरा में रस, तथा लय के समावेश ने गीत गोविन्द तक रचनाकार-पाठक गोपों की पहुँच आसान कर दी। विश्ववाणी हिंदी हे इन्हीं विश्व की किसी भी भाषा में गद्य की तुलना में पद्य न केवल अधिक रचा-पढ़ा गया अपितु याद भी अधिक रखा गया। स्थाई (मुखड़ा)-अंतरा, तुकांत के शिल्प तथा एक विचार  के इर्द-गिर्द रची गयी पद्य रचना लोकगीत, जन गीत, गीत तथा नवगीत के पथ पर पग रखती हुई जन-मन का नैकट्य तथा सराहना पाकर कल से आज तक लोक-मन पर राज कर रही है और आज से कल तक करती रहेगी। गीति विधा के समसामयिक समर्थ हस्ताक्षरों में श्री बृजनाथ श्रीवास्तव का भी शुमार है। समय की दौड़ में ५२ सार्थक-समर्थ गीतों का संकलन है। 
                    गीत को प्रगतिवाद के नाम पर छंदहीन कविता में बदलने की कोशिश ने कथ्य के शब्द-चित्रों को जन सामान्य की समझ और बूझ दोनों से दूर कर निष्प्राण कर दिया। जन उदासीनता को सही परिप्रेक्ष्य में न समझकर खेमेबाज शब्दशिल्पियों ने गीत के मरण का शंखनाद कर दिया किन्तु गीत-विमुख घोषणाकर्ता ही काल कवलित हो गए और गीत नव भाव-भंगिमा के साथ पुन: जनमन के सिंहासन पर नवगीत की संज्ञा और विशेषण सहित आसीन हो गया।  'समय की दौड़ में' नवगीत सभी काव्य विधाओं का नायक होकर जन-मन की अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर रहा है। श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार अवध बिहारी श्रीवास्तव जी ठीक ही कहते हैं "कविता में भाषागत प्रयोगों के चक्कर में कविता को दुरूह और अति बौद्धिक बनाकर उसे पाठक की समझ से दूर कर दिया गया है।" नवगीत के सामने भी यही चुनौती है। एक वर्ग उसे प्रगतिवाद के खूंटे से बांधे रखना छठा है तो दूसरा विशिष्ट भाव-भंगिमा के पिंजरे में कैद कर आम आदमी से दूर कर वर्ग विशेष की संपदा बनाना चाहता है। बृजनाथ जी के नवगीत इन दोनों समूहों से दूर आम आदमी की अनुभूति को अनुभव कर     

कोई टिप्पणी नहीं: