बुधवार, 19 सितंबर 2018

samiksha

कृति चर्चा:
'हरापन बाकी है' इसलिए कि नवगीत जिन्दा है 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
[कृति विवरण: हरापन बाकी है, नवगीत संग्रह, देवेंद्र सफल, प्रथम संस्करण २०१६, पृष्ठ १२०, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, मूल्य २५०/-, दीक्षा प्रकाशन, ११७/क्यू /७५९-ए, शारदा नगर, कानपुर २०८०२५, चलभाष ९४५१४२४२३३, ९००५२२२२६६, ८५६३८११६१५ ]
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वर्तमान संक्रांति काल में मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के बावजूद अधिकाधिक व्यक्तिनिष्ठ होता जा रहा है। फलत:, पति-पत्नी, भाई-बहिन, पिता-पुत्र जैसे अभिन्न संबंधों में भी दूरी (स्पेस) की तलाश की जा रही है। अधिकतम पाने और कुछ न देने की कामना ने परिवार को कष्ट-विक्षत कर दिया है। 'कुनबा' और 'खानदान' शब्दकोशों में कैद होकर रह गए हैं, 'व्यक्ति' अकेलेपन का शिकार होकर कुंठा, संत्रास, ऊब, घुटन, यांत्रिक नीरसता, मूल्यहीनता, संदेह, छल, कपट, निराशा का शिकार होकर नशे व आत्महत्या की ओर बढ़ता जा रहा है। विस्मय यह कि यह प्रवृत्ति साधनहीनों की अपेक्षा साधन सम्पन्नों में अधिक व्याप्त है। जन सामान्य हो या विशिष्ट वर्ग सफल होने की कीमत दोनों को चुकानी पड़ती है। गेहूँ के साथ चाहे-अनचाहे पिसना ही घुन की नियति है। इसलिए अंतत:, सकल समाज तथाकथित प्रगति की कीमत चुकाते-चुकाते नि:शेष होता जाता है। इस सबके बावजूद कलम हाथ में लेकर उद्घोषणा करना कि 'हरापन बाकी है' सचमुच हिम्मत की बात है। श्री देवेंद्र 'सफल' यह घोषणा दमदारी से कर रहे हैं इसलिए कि उनके हाथ में कलम और साथ में नवगीत की ताकत है। देवेंद्र 'सफल' १९९८ से २०१६ के मध्य 'पखेरू गंध के', 'नवांतर', 'लेख लिखे माटी ने', 'सहमी हुई सदी' शीर्षक नवगीत संकलनों के माध्यम से गीत-गगन में उड़ान भर चुके हैं। नित नया आसमान नापने की आदत 'हरापन बाकी है' की शक्ल  में समय को सच का आईना दिखा रहा है।

देवेंद्र जी के नवगीत समकालिक अन्य नवगीतकारों से भिन्न इस मायने में हैं कि इनमें किताबी विसंगति, विडंबना और त्रासदी पर जमीनी सचाई को वरीयता दी गयी है। देवेंद्र छद्म मार्मिकता के लिए घड़ियाली आँसू नहीं बहाते, वे दैनंदिन जीवन की कसक को उद्घाटित करते हैं-
हर करवट में बेचैनी है
भटक रहा मन इधर-उधर
सारी रात न सोने देता
दरकी दीवारों का घर

यहाँ कोई आसमान नहीं टूटा पड़ रहा, किंतु सर पर छाँव होने के बावजूद अघटित घटित होने की आशंका न जीने देती है, न मरने। बात यही तक सीमित नहीं है-
अब घर नहीं रहा घर जैसा
बाजारों का है जमघट
संबंधों की सेल लगी है
कीमत नित्य रही है घट

ज्यादा से ज्यादा पाने की दावेदारी, रसोई में कलह, घातक मंसूबे, और कुचलें, तू-तू मैं-मैं एकता की चाह रखने के बाद भी निराशा की बाढ़.... यह हर घर की व्यथा-कथा है। इन नवगीतों का कथ्य रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है और भाषा आम आदमी द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले शब्दों से बनी है। अत:, पाठक को अपनी खुद की अनुभूति कही गयी प्रतीत होती है-
पिछले साल पड़ा सूखा तो
रोई मुनिया की महतारी
देबी की किरपा से अबकी
गौना देने की तैयारी   
जो संबंधी तने-तने थे
लगे तनिक वो भी निहुरे हैं

हिंदी के साहित्य जगत में जिनसे सीखा उन्हें भुला देने की कुटैव व्याप्त है। कामयाब उर्दू शायर अपने से कम कामयाब उस्ताद का भी शुक्रिया अदा करते हुए मुशायरों में फख्र के साथ खुद को उनका शागिर्द बताता है लेकिन हिंदी का छोटे से छोटा कवि भी ऐसा जताता है मानो सब कुछ माँ के पेट से सीख कर आया हो। विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में सद्य प्रकाशित दोहा शतक मंजूषा के तीन भागों में दोहाकार के परिचय में काव्य गुरु का नाम इसीलिये जोड़ा गया कि रचनाकारों में गुरु का स्मरण और गुरु के प्रति कृतज्ञता का भाव हो। देवेंद्र जी की ईमानदारी यह कि वे प्रो. रामस्वरूप सिंदूर को स्मरण करते हुए उनके कथन को उद्धृत कर 'अपनी बात' का श्री गणेश करते हैं- "मेरे काव्य-गुरु स्मृति-शेष प्रो. रामस्वरूप सिंदूर के कथनानुसार "गीत का कवि कालातीत, अनंतता का कवि होता है। समयातीत होकर भी गीत समय-शून्य नहीं होता। वह समय में रहकर भी समय का अतिक्रमण करता है।'

'हरापन बाकी है' का रचनाकार गाँव और शहर दोनों से समान अपनत्व के साथ जुड़ा है, उसे आम आदमी की पीड़ा से सरोकार है। वह दोनों अंचलों की वस्तिस्थिति, विसंगतियों और विडंबनाओं को उद्घाटित करता है। उसकी भाषा में कथ्य और पात्र के अनुकूल भाषा और शब्दों का व्यवहार किया गया है। उपले, महतारी, जानी, कलेवा, मन्नत, बहुरे, कुठला, बरोठे, कागा, मुंडेर, तिरिया, किरपा, निहुरे, डिठौने, काठ, मुहाचाई, दहे, खटिया जैसे ठेठ देशज शब्दों के साथ त्राण, भूमंडलीकरण, अनिवासी, पुष्ट, आसीन, संग्राम, तमस, पार्श्व, वेदिका, परिहास, नव्य, संताप, सरिता, मेघ, अनुनय, अन्तस्, लंबोदर, सहोदर, क्षत्रप, अवसाद, चरण, अरुणिम आदि संस्कृत निष्ठ शब्दों, वेलकम, होर्डिंग, बैनर, टी. वी., बंपर, जींस, टी-शर्ट, मिनी, रैम्प, मैडम, डेवलपमेंट, पाकिट, क्रास, गुड लक वगैरह अंग्रेजी शब्दों के साथ अन्य भाषाओँ के प्रचलित शब्द भी उपयोग किये गए हैं। अरबी ( अमन, आमीन, आसार, इशारे, इंसानियत, उजाले, कबीले, गायब, जुल्म, गमगीन, तमाशाई, नज़र आदि),  और फारसी (ख़ाक, खातिर, खुशहाली, खुशियाँ, खुशबू, तख़्त, दर्द, दरमियान, दरियादिली, दस्तूर, दुकां, दुश्मन वगैरह) के शब्दों को भी सफलता के साथ सफल जी ने प्रयोग किया है।

इन गीतों की मुहावरेदार भाषा इनकी ताकत है। गीतकार शब्द युग्मों (धूल-धूसरित, ताना-बाना, घर-द्वार, लिपे-सँवारे, चैता-बन्ना, रंग-बिरंगे, जादू-टोने, हँसूँ-गाऊँ, खुसुर-पुसुर, व्यंग्य-बाण, सुख-दुःख. दुःख-दर्द, कुर्सी-गद्दी, अस्थि-पिंजर, नोच-खसोट, चेतन, अवचेतन, शब्द-अर्थों, संगी-साथी, प्रणय-गाथाएँ, आग-बबूला, रिश्ते-नाते, विधि-विधान, सुर-ताल, दाँव-पेंच,बने-बिगड़े, यक्ष-प्रश्न, ज्ञानी-ध्यानी, हरे-भरे, नीति-निर्धारक, बंदूक खंजर, खेल-खिलौने, तरु-लता-पल्लव, लय-सुर-ताल, जाती धर्म भाषा आदि ), और शब्दावृत्ति (तने-तने, शुभ-शुभ, माथे-माथे, गहरे-गहरे, भद्दी-भद्दी, सोच-सोच, पल-पल, झर-झर, रह-रह, तू-तू मैं-मैं, अपने-अपने, भीतर-भीतर, डरे-डरे, देख-देख, थकी-थकी आदि ) की ताकत जानता है और उसने उनका भली-भाँति उपयोग किया है। यथास्थान मुहावरों और लोकोक्तियों के  उपयोग ने सोने में सुहागा का कार्य किया है- चिकना घड़ा, सीना तानना, सपने बुने, कीच उछालना, भाग्य सराहना, रद्दी के भाव, हाथ के तोते उड़े जैसे प्रयोग नवगीतों के भाव पक्ष को सशक्त करते हैं।

आजकल नवगीत या तो अनभिज्ञता के कारण या अकारण ही विराम चिन्हों का प्रयोग नहीं करते।   देवेंद्र जी का व्याकरणिक पक्ष मजबूत है। इस कृति में उन्होंने योजक चिन्ह (-) का उपयोग विविध अर्थों में किया है। ओस-कण ओस के कण, हँसूँ-गाऊँ हँसूँ और गाऊँ, आते-जाते आते या जाते, पुष्प-गंध पुष्प की गंध, सूत्र-से सूत्र जैसे, नज़र-वाले जिससे दिखाई दे। नए रचनाकारों को इससे सीख लेना चाहिए क्यों कि छंद की आवश्यकतानुसार अक्षर कम-अधिक करना हो तो विराम चिन्ह बहुत उपयोगी होते हैं।

अंग्रेजी में कहावत है- 'टू एरर इस ह्युमन' अर्थात गलती करना मनुष्य का स्वभाव है। 'कैसे हंस लें?' में कवि अनुनासिक चिन्ह का उपयोग करने में चूक गया है। हंस = उच्चारण हन्स = पक्षी, हँस अर्थात हँसना क्रिया। एक और त्रुटि राग-द्वेश में 'ष' के स्थान पर 'श' का उपयोग करने से हुई है।

सफल जी ने कथ्य और प्रसंग के अनुरूप प्रतीकों का उपयोग किया है। तेजी से पनपी नागफनी, हो गए प्रवासी स्वप्न सभी, आँगन में पंछी उतरे हैं, वर्षों बाद बज रही पायल, श्वासों पर पहरे ही पहरे, मन में बसे कबीले, टूटा नहीं जुड़ाव, भूख मुँह फाड़े, जाने कितनी बार ढहे आदि ऐसे शब्द-प्रयोग हैं जो शब्दकोशीय अर्थ की सीमा का उल्लंघन कर अपने अर्थ से अधिक भाव संप्रेषित करते हैं। ऐसे प्रयोगों से 'कम कहने से अधिक समझना' की परंपरा अनजाने ही सही जी उठी है। नवगीत को ऐसे प्रयोग सारगर्भित बनाते हैं।

देवेंद्र जी ने नवगीतों के कथ्य में एकपक्षीय न होकर संतुलन साधने की सफल कोशिश की है। 'सीता को पीटे राम धनी' में स्त्री-प्रताड़ना है, 'माँ को अपनी परवाह नहीं' में स्त्री की त्यागवृत्ति और खुद के प्रति लापरवाही है तो 'आशीष दे रही महतारी' में स्त्री-गौरव है। 'बेटा ब्याहा हम छले गए में' स्त्री ही स्त्री की बैरी के रूप में हैं। 'रैम्प पर जलवे बिखेरें / उर्वशी मैडम' तथा 'फटी जींस, बिकनी के ऊपर / बैकलेस है टॉप / राधारानी पहने घूमें / साधु भूलते जाप' में देह-दर्शन को प्रगति समझती स्त्री, 'दुखी रसोई घर की पीड़ा / समझे बढ़कर कौन / आँख कान मुख हाथों वाले / साधे रहते मौन' में' स्त्री की व्यथा को समझ कर नासमझ बनता समाज, 'समझ न आये / कौन गलत है, कौन सही / शबरी अपने आँसू / पीते सोच रही' में परिवर्तन के लिए चिंतन की और उन्मुख होती स्त्री अनेक बिंब इन नवगीतों में उभरते हैं और पाठक को चिंतन करने के लिए प्रेरित करते हैं।   

राजनीति के विविध रूप सफलता के साथ इन गीतों में प्रतिबिंबित हुए हैं। 'शातिर मुखिया क्या जाने कब / चल दे कैसी चाल', 'चतुर राजा जन सभा में / दे रहा भाषण', घूरें शातिर खड़े मछेरे / दाना डालें शाम-सवेरे,  'न्याय आँख पर पट्टी बांधे / अपराधी बेखटके / राजा सोया हुआ / पहरुए करें / खूब मनमानी', बौने से हो गए शीर्ष कद / दूषित मन इतने मटमैले / दोषी कौन कहे दूजे को / ढोंगी अमर बेल से फैले', 'भरोसा कैसे करें / इतना हुआ नैतिक पतन / हमारे ही नीति निर्धारक / हमें छलने लगे' आदि गीत जैसे-जैसे समय बीतेगा अधिकाधिक प्रासंगिक होते जाएँगे।

'जींस में ऐसा असर गायब हुई धोती' में परंपरा पर हावी होती अधुनातनता, 'होर्डिंग बैनर लगाये धूर्त व्यापारी' में हावी होता पूंजीवाद', 'मुझे डराने आ पहुँचा / मँहगाई का बैताल' में जमीनी सचाई, चाँद-सितारे छूकर भी हम / मन से अभी आदिवासी हैं' तथा 'खुला-खुलापन कहने को है / सहज सी सिमटी मुद्राएँ में अंतर्विरोध, 'जूझ रहे हम अंधकार से / हाथों की छिन गई मशालें में' विडंबना, 'साहूकार सुबह आ धमका / बोला ब्याज निकाल' में शोषण, मन के बंधन / बंधन लगते' में बेबसी, 'क्या कहें कैसे बताएँ / होंठ पर कितनी कथाएँ' तथा 'मन की अपनी लाचारी है / थिर हैं पाँव / सफ़र जरी है' में असमंजस आदि भावनाएँ व्यक्त कर कवि ने अपनी सामर्थ्य की झलक दिखाई है। 'हम विजयी नायक' शीर्षक नवगीत एक भिन्न भाव-मुद्रा के माध्यम से कवि की सामर्थ्य का परिचय देता है।

'हार न मानो, जीवन में हैं / यक्ष-प्रश्न अनगिन', सच न झूठ से हार मानता / हार सोचना भी अनुचित है, 'मंजिल के संदेशे आते / लगते हम किस्मतवाले हैं' द्युति चमके मचले पुरवाई / रस-विभोर उमगे तरुणाई', 'शक्ति के आधार हैं / अरुणिम सवेरे' तथा 'घोर अँधेरा अब न सहेंगी / खोल रही हैं बंद खिड़कियाँ / चौखट बढ़कर / लाँघ रही हैं / दृष्टि नई / दे रही बेटियाँ', 'आओ, हम यूँ शुरुआत करें / सुख-दुःख बाँटे / कुछ बात करें' आदि में आशावाद की झलक से नवगीत को एकांगी होने से बचाना सफल जी की ऐसी सफलता है जिससे अधिकांश नवगीतकार वंचित रहे हैं. संभव है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से ग्रस्त पूर्वाग्रही समीक्षक ऐसे नवगीतों को नवगीत मानाने से ही इनकार कर दें किंतु देवेंद्र जी को उनकी परवाह ना करते हुए ऐसे नवगीत इतनी अधिक संख्या में रचने चाहिए कि नवगीत की भावी परिभाषा पराजय, कुंठा, पीड़ा से अधिक संघर्ष, प्रयास, विश्वास और साफल्य के रूप में हो। 'उजाला बनकर / अँधेरी / रात को खलिए' तथा 'आनेवाली पीढ़ी को हम / आओ, सुखद जवानी दे दें / अपने जले पाँव हों चाहे / उनको शाम सुहानी दे दें' जैसे नवगीत वास्तव में नयेपन की ओर बढ़ते नवगीत की ऐसी भाव मुद्राएँ हैं जिन्हें स्वीकारने में संकीर्ण-दृष्टि आलोचक को समय लगेगा। नए नवगीतकारों को यह परंपरा सुदृढ़ बनाने के प्रयास कर खुद को स्थापित करना होगा ताकि नवगीत भी कल्पना के खुले आकाश में साँस ले सके।
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समीक्षक संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संसथान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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