गुरुवार, 6 सितंबर 2018

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

नाप रहा हूँ तापमान को- वेद प्रकाश शर्मा 'वेद'

संजय शुक्ल 
श्री वेदप्रकाश शर्मा वेद अपने पहले नवगीत संग्रह ‘आओ नीड़ बुने’ से साहित्य जगत् में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। कथ्य का चयन और उसकी अनूठी प्रस्तुति वेद जी को अपने समकालीन कवियों से थोड़ा अलग किंतु विशेष पहचान प्रदान करती है। इन्ही विशेषताओं के साथ वेद जी अपने दूसरे नवगीत संग्रह ‘नाप रहा हूँ तापमान’ को लेकर प्रस्तुत हैं।

दरअसल, कवि के मन में जब किसी गीत की विषयवस्तु अँकुरित होती है तो उसकी रचना से पहले कवि बिंबों और प्रतीकों की चयन प्रक्रिया को पूरी करता है। बिंबों और प्रतीकों के अनुरूप भाषा स्वयं बनती चली जाती है। अतः कवि की कुशलता उसके द्वारा प्रयुक्त किए गए बिंबों और प्रतीकों से परखी जा सकती है। कभी-कभी इन दोनों के प्रयोग में हुई असावधानी कविता की सम्प्रेषणीयता को प्रभावित करती है तो कभी उसे अखबारी बना देती है। ऐतिहासिक पौराणिक, मिथकीय पात्रों और घटनाओं का कविता में प्रयोग कोई नई बात नहीं है। 

समकालीन और पूर्ववर्ती रचनाकारों ने इन सभी का सफल प्रयोग अपनी कविताओं में किया है और आने वाली पीढ़ी के कवि इस परंपरा को अपनाएँगे - इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए परन्तु संकट के वर्तमान युग के पाठकों के सीमित ऐतिहासिक, पौराणिक तथा सांस्कृतिक बोध के जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए व्यक्ति अपने गौरवमयी अतीत से अनभिज्ञ ही रह जाता है। अतः जब उसके सामने ऐसी कोई कविता जिसमें उपर्युक्त क्षेत्रों से बिंब, प्रतीक, कोई पात्र अथवा कोई घटना आज के समय की विरूपताओं को व्याख्यायित करती हुई आती है तो वह कथ्य से जुड़ने में कठिनाई का अनुभव करता है भले ही उस कविता में पाठक को अपने त्रासद अथवा सुखद जीवन की ही छवि क्यों न नजर आती हो। दीर्घ और निरन्तर अभ्यास के पश्चात् ही कवि को इस प्रकार के प्रयोगों में सफलता मिल पाती है। वेद जी इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। सरयू खोज रहा हूँ’ कविता की निम्न पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं-
तू तो अग्नि परीक्षा देकर
चिर-अर्चित उपमान हो गई
उससे जन्मे प्रश्नों से बिंध
अब तक सरयू खोज रहा हूँ

धुर अंधे विश्वास निभाये 
पर सच्चे एहसास जलाये
कुछ स्फुर्लिग जो बच्चे बचाये
उनका आधा, पौना, पूरा
खट्टा, मीठा भोज रहा हूँ

इस प्रकार की पंक्तियाँ 'कहाँ हो', हर्षवर्द्धन गीत में भी देखी जा सकती हैं- 
हर दिशा से आ रही बस
एक ही धुन
कहाँ हो तुम
हर्षवर्द्धन! 
कहाँ हो तुम? 

माघ-मेला, सांध्य बेला
में पहुँचकर थक गया है
छक गया है 
राह तककर

आँख में था
पाँख में था
साफ-सुथरा रेत पर वो
रेत-सा हो बिम्ब बिखरा

चिन्दियों में खड़ा टटका
झुर्रिया बुन 
हर्षवर्द्धन 
कहाँ हो तुम?

वेद अपने परिवेश पर बहुत ही सूक्ष्म और पैनी दृष्टि रखते हैं। उसका बहुत ही बारीकी से परीक्षण, निरीक्षण करते हैं और फिर उसमें फैली विरूपता पर पूरी ऊर्जा और शक्ति के साथ शाब्दिक चोट करते हैं। ऐसा करते हुए कवि मन आक्रोश से भरा होने के बाद भी अपने प्रहारों से मानवता को खंड-खंड नहीं अपितु उसे सुंदर और सुघड़ बनाने का प्रयास करता है और अपने कविधर्म को निभाता है-
गंगापुत्रों, अपनी अपनी
परिभाषाएँ नई लिखो अब
समय चीखता-बंधु विदुर के 
साँचों में कुछ ढले दिखो अब

शर-शैया का मर्मान्तक विष 
घूँट-घूँट क्यों पियें-पचाएँ
जाने क्या-क्या चला गया है
लिया-दिया जो शेष रह गया 
आ सुगना अब उसे बचाएँ।

वेद जी अपनी भाषा से जैसी गीत संरचनाएँ करते हैं वे उनकी विलक्षण प्रतिभा का ही बोध करातीं हैं। वह अपने देश-काल की नहीं अपितु परंपरा, संस्कृति और दार्शनिक दृष्टियों को भी अपने नवगीतों में सफलतापूर्वक अभिव्यंजित करते हैं। ‘संस्कृति का सतिया’ कवि की इस दृष्टि से परिचय कराता है-
एक लांछना लेकर सिर पर
कितना काम किया
तुलसी, शायद ठीक जिया

युग ने कैसे देखा होगा
तुझको एक आँख से
चील के पंजे लेकर
गिद्दई हठी पाँख से

तेरे सुगना ने मिट्ठू को 
कब-कब नहीं पिया
तुलसी, तू अद्भुत नदिया!

श्री वेदप्रकाश शर्मा वेद अपने गीतों में शब्द-चयन, लय-प्रवाह, संगीतात्मकता और भाषासामरस्य के प्रति अत्यंत सचेत रहते हैं। कवि ने विभिन्न छंदों में गीत रचे हैं और उनको अपने काव्य-कौशल से बखूबी साधा है-
आशंकाएँ मूल
कभी निर्मूल
बनी क्यों भूल
समय से पूछ रहे हम

विपदाओं के ठाठ
हमारे घाट
बिछाकर खाट
मजे से हुक्का पीते
सूनी-सूनी बाट
कि उजड़ी हाट
द्वार का टाट
चिलम भर-भरकर जीते

दूर कहीं मस्तूल
हवा प्रतिकूल
गई क्या भूल
समय से पूछ रहे हम। उपर्युक्त छंद-प्रवाह वेद जी के अतिरिक्त कहीं और वर्षों से देखने को नहीं मिला। हाँ! एक पुराने फिल्मी गीत की पंक्तियाँ अवश्य स्मरण हो जाती हैं- मान मेरा अहसान/अरे नादान/ कि मैंने तुझसे किया है प्यार। - इत्यादि।

पूरे संग्रह का आद्योपान्त पारायण करने के पश्चात् यह धारणा बनने में देर नहीं लगती कि वेद जी कुछ अलग सोचने वाले कवि हैं। उनकी अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति चिन्ताएँ हैं। वे आत्ममुग्धता से परे एक सचेत और चौकन्ने रचनाकार हैं। तभी तो वो अपने समय के तापमान को मापने का साहसिक कर्म करते हैं। साहसिक इसलिए के गीत में भीड़ लुभावन मांसल प्रेम, प्रकृति सौंदर्य अथवा लिजलिजी और मसृण भावुकताएँ गाकर तात्कालिक प्रसिद्धि बटोरने के मोह को त्यागकर एक कवि अपने परिवेश की तपिश को मापने निकला है और उसे लयात्मकता और संगीतात्मकता के साथ छंदों में अभिव्यक्ति करता है-
जन-गण-मन वाले पारे से
आस-पास के तापमान को 
नाप रहा हूँ!

उगते संशय बीच अनिश्चय
गहराता है धूम-धूम सा
वलय बनाकर
और निगलता नई लीक की
नई बगावत बहला-फुसला

डरा-डराकर
ढीली तो है कीली, लेकिन
दिल्ली अब भी दूर बहुत है
भाँप रहा हूँ!

वेद जी न तो संपूर्णत या कलावादी हैं, न ही यथार्थवादी अथवा तात्कालिकतावादी और न ही महल मनोरंजनवादी। वे एक समर्पित और समर्थ गीतकार हैं जिनकी कथ्य और शिल्प की नव्यता स्वागत योग्य है। वेगमयी भाषा पाठक को गीतों से जोड़े रखने में सफल है। कहीं-कहीं विचारों के क्रम और भाव-विस्तार के सूत्रों को पकड़ने में कठिनाई अवश्य होती है परन्तु एक बार यह धुँधलका छटते ही कुनकुनी धूप की-सी चमक पाठक को चमत्कृत कर देती है।
९.११.२०१५ 
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गीत- नवगीत संग्रह - नाप रहा हूँ तापमान को, वेद प्रकाश शर्मा 'वेद', प्रकाशक ज्योति पर्व प्रकाशन, ९९-ज्ञान खंड-३, इंदिरापुरम, गाजियाबाद।  प्रथम संस्करण- २०१४, मूल्य- रूपये २४९/-, पृष्ठ- १२८, समीक्षा - संजय शुक्ल।

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