शनिवार, 29 सितंबर 2018

muktika

मुक्तिका 
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हक है मछली का उसको हवा भी मिले 
सब सुखाये समंदर हैं दरबार ने 
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केंकड़ों का समय है बहुत कीमती 
रेलगाड़ी बुलेट ली है सरकार ने 

आम लोगों का क्या है जियें या मरें?
ख़ास ही खास को आये उपकारने 
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कल भिखारी थे, मालिक बने आज जो 
वे दाता को लगते हैं दुतकारने
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बात मन की करे मत, सुने हो विवश 
सच विवश है बहुत झूठ स्वीकारने 
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salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com

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