बुधवार, 12 सितंबर 2018

समीक्षा

कृति चर्चा:

दंतक्षेत्र : गतागत को जोड़ती समकालिक कृति 

- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

[कृति विवरण- दंतक्षेत्र (दंतेवाड़ा: थोड़ा जाना-थोड़ा अनजाना), लेखक- राजीव रंजन प्रसाद, आई.एस.बी.एन ९७८-९३-८४६३३ -८३-७, आकार - डिमाई, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ४५६, मूल्य ५००/- प्रकाशक - यश पब्लिशर्स, एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स १/१०७५३ सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली ११००३२]

विश्ववाणी हिंदी में प्रभूत लेखन होते हुई भी, समसामयिक परिदृश्य पर गतागत को ध्यान में रखते हुए सार्थक तथा दूरगामी सोच को आमंत्रित करता लेखन कम ही होता है। विवेच्य कृति दंतक्षेत्र (दंतेवाडा : थोड़ा जाना, थोड़ा अनजाना) एक ऐसी ही कृति है जिसे पढ़कर पाठक को गौरवमय विरासत, अतीत में हुई चूकों, वर्तमान में की जा रही गलतियों और भविष्य में उनसे होनेवाले दुष्प्रभावों का आकलन करने की प्रेरणा ही नहीं आधारभूत सामग्री भी प्राप्त होती है। विवेच्य पुस्तक वर्त्तमान में नक्सलवाद के नाम से संचालित दिशाहीन आन्दोलन से सर्वाधिक क्षत-विक्षत हुए बस्तर के दंतेवाड़ा क्षेत्र पर केन्द्रित है। भारतीय राजनीति में चिरकाल से उपेक्षित यह अंचल अब आतंक और दहशत का पर्याय बन गया है। विधि की विडम्बना यह कि देश के औद्योगिक और आर्थिक उन्नयन में सर्वाधिक अवदान देते रहने के बाद भी इस अन्चल को उसका प्रदेय कभी नहीं मिला। 'जबरा मारे रोन न दे' की लोकोक्ति का अनुसरण करते हुए केंद्र सरकारें, चाहे वे विदेशी रही हों या भारतीय, जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे इस क्षेत्र के प्रति सौतेली माँ की वक्र-दृष्टि रखती रही हैं। लेखन राजीव रंजन प्रसाद इसी माटी के बेटे हैं, इसलिए उन्हें यह विसंगति अंतर्मन में सालती रही है। प्रस्तुत किताब दीर्घकालिक मन-मंथन से नि:सृत नवनीत है।

विश्व की सर्वाधिक पुरानी गोंडवाना भूमि में प्राण संचार करते बस्तर के दण्डकारण्य क्षेत्र के ऐतिहासिक गौरव, प्राकृतिक वैभव, आर्थिक समृद्धि, मानवीय निश्छलता, राजनैतिक दुराग्रह्जनित दुश्चक्रों, आम जन की पीड़ा तथा रक्तरंजित सशस्त्र आन्दोलन की निष्पक्ष, पूर्वाग्रहरहित विवेचना करते राजीव रंजन ने अभिव्यक्ति की स्पष्टता, भाषा की सरलता तथा प्रस्तुति की सरसता का ध्यान रखा है। इस कारण यह कृति उपन्यास न होते हुए भी औपन्यासिक औत्सुक्य, कहानी न होने हुए भी कहानीवत कथानक, कविता न होते हुए भी काव्यवत रसात्मकता तथा निबंध न होते हुए भी नैबंधिक वैचारिकता से सम्पन्न है। इस कृति की अंतर्वस्तु विषय-बाहुल्य तथा विभाजनहीनता से कभी-कभी किसी वैचारिक उद्यान में टहलने जैसे प्रतीति कराती है। दंतेवाडा के नामकरण, भूगर्भीय संरचना, पुरातात्विक महत्त्व और अवहेलना, ऐतिहासिक संघर्ष, स्वाधीनता प्रयासों तथा स्वातंत्र्योत्तर राजनीति सब कुछ को समेटने का यह प्रयास पठनीय ही नहीं विचारणीय भी है। बस्तर की भूमि से लगाव और जुड़ाव ने लेखक को गहराए में जाने के स्थान पर विस्तार में जाने को प्रेरित किया है। इसका अन्य अकारण विवाद टालने की चाह भी हो सकती है। पर्यावरणीय वैशिष्ट्य, वानस्पतिक वर्गीकरण, जैव विविधता, अंधाधुंध खनिजीय दोहन, प्राकृतिक विनाश, आम जन की निरंतर होती उपेक्षा हर आयाम को छुआ है लेखक ने।

प्रकृति-पुत्र वनवासियों का तथाकथित सभ्यजनों द्वारा शोषण, मालिक मक्बूजा काण्ड के कारण अपनी जमीन और वन से वंचित होते वनवासी जन सामान्य की पीड़ा और उनसे की गयी ठगी को राजीव रंजन ने बखूबी उजागर किया है। राजतन्त्र, विदेशी शासन और लोकतंत्र तीनों कालों में प्रशासनिक अधिकारियों की अदूरदर्शिता और मनमानी ने जन सामान्य का जीना दूभर करने में कोई कसर नहीं छोडी। जनजातीय जीवन पद्धति और जीवन मूल्यों को समझे बिना खुद को श्रेष्ठ समझा कर लिए गए आपराधिक प्रशासनिक निर्णयों की परिणति महारानी प्रफुल्ल कुमारी की हत्या से लेकर महाराज प्रवीर चंद भंजदेव की हत्या तक अबाध चलती रही है। बस्तर और छतीसगढ़ से गत ६ दशकों के निरंतर जुड़ाव के कारन मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हीं निष्कर्षों को पा सका हूँ जो राजीव जी ने व्यक्त किये हैं। राजेव जी गैर राजनैतिक हैं इसलिए उन पर कोई वैचारिक प्रतिबद्धताजनित दबाव नहीं है। उन्होंने मुक्त मन से पौराणिक गाथाओं का भी उल्लेख यथास्थान किया है और आदिवासीय जीवन शैली के सकारात्मक-नकारात्मक प्रभावों का भी उल्लेख किया है।

इस कृति में सभी आदिवासी विद्रोहों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि, कारण, टकराव, संघर्ष, दमन और पश्चातवर्ती परिवर्तनों का संकेतन है। इस क्रम में वर्त्तमान नक्सलवादी आन्दोलन के मूल में व्याप्त राजनैतिक स्वार्थ, स्थानीय जन-हित की उपेक्षा, प्रशासनिक अदूरदर्शिता, विनाश और अलगावजनित जन-असंतोष की अनदेखी को भली-भाँति देखा और दिखाया है लेखक ने। आदिवासियों को बर्बर, असभ्य, क्रूर और नासमझ मानकर उन पर तथाकथित जीवन शैली थोपना ही सकल विप्लवों का कारण रहा है। विडम्बना यह कि निरपराध और निर्दोष जन ही षड्यंत्रकारियों द्वारा मारे जाते रहे। वर्त्तमान शासन-प्रशासन भी पारंपरिक सोच से भिन्न नहीं है। सोच वही है, थोपने के तरीके बदल गए हैं। छतीसगढ़ बनने के पूर्व पीढ़ियों से वहाँ रहनेवाने लघु किसान और श्रमजीवी अब वहाँ नहीं हैं। उनकी छोटी-चोटी जमीनें शासन या व्यापारियों द्वारा येन-केन-प्रकारेण हडपी जा चुकी हैं। कुछ धन मिला भी तो टिका नहीं।

आदिवासी जीवन शैली में अन्तर्निहित मानवीय मूल्य, ईमानदारी, निष्कपटता, निर्लोभता, नैतिकता आदि का ज़िक्र बार-बार हुआ है। नाग संस्कृति इन्हीं जीवन मूल्यों पर आधृत रही है। लिंगादेव औए आदिवासी वंश परंपरा का भी उल्लेख है। भगवान् राम का ननिहाल है यह क्षेत्र। राजीव ने इन सभी का संकेत तो किया है किंतु किसी पर व्यवस्थित-विस्तृत अध्ययन नहीं दिया। इस पुस्तक की सामग्री को छोटे-छोटे अध्यायों में विभक्त कर विषय वार दिया जाता तो कुछ पृष्ठ संख्या बढ़ती किंतु उपयोगिता अधिक हो जाती। मेरा सुझाव है कि आगामी संस्करण में विषयवार और घटनावार अध्याय, अंत में अकारादिक्रम में शब्दानुक्रमणिका तथा सन्दर्भ ग्रन्थ सूची जोड़ दी जाए ताकि इसकी उपादेयता शोध छात्रों के लिए और अधिक हो सके। पुस्तक की विषय-वस्तु अत्यधिक व्यापक है। सामग्री की व्यवस्था बैठक खाने की तरह न होकर भंडार गृह की तरह हो गयी है। इससे विश्वसनीयता में कमी भले ही न हो, उपादेयता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

साहित्य की दृष्टि से इसे गद्य विधा में समाजशास्त्रीय विवेचनात्मक ग्रंथों में ही परिगणित किया जाएगा। लेखक ने पाठकीय दृष्टि से भाषा को सहज बोधगम्य, प्रसाद गुण संपन्न रखा है। यत्र-तत्र उद्धरण देकर अपनी बात की पुष्टि की है। मुद्रण की शीघ्रता में कुछ पाठ्य त्रुटियाँ छूट गयी हैं जो स्वादिष्ट खीर में कंकर की तरह हैं। राजीव जी ने पुरातत्वीय सन्दर्भों में लिखा है- 'कोई भी विद्वान् एक स्पष्ट दिशा नहीं देते... अपने -अपने मायने निकाल रहे हैं।' इस कृति में भी लेखक वर्तमान से जुड़े अपना स्पष्ट मत देने बचा है। इस नीति का सुपरिणाम ह है कि पाठक खुद अपना मत निर्धारण बिना अन्य से प्रभावित हुए कर सकता है। बहुचर्चित और विश्व पुस्तक मेले में लोकप्रिय रही यह कृति पाठकों को बस्तर, दंतेवाडा और छतीसगढ़ गतागत के सम्बन्ध में चिंतन करने को प्रेरित करने में समर्थ है। शोध छात्रों के साथ हे राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को भी इसे पढ़कर यह समझना चाहिए कि स्थानीयता की उपेक्षा कर थोपी गयी जीवन पद्धति के परिणाम सकारात्मक नहीं होते। श्री ब्रम्हदेव शर्मा अथवा श्री नरोन्हा जैसे अधिकारसंपन्न अधिकारी जो एकतरफा निर्णय लेते हैं वे लोक जीवन और जीवन पद्धति को स्वीकार्य नहीं होते। 'लोकतत्र में तंत्र को लोक का सहायक होना चाहिए, स्वामी नहीं' राजीव रंजन इसे स्पष्ट शब्दों में न कहकर भी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में विवेचन करते हुए व्यक्त कर देते हैं। हमारी सरकारों को दलीय और व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर आम जन के हित में सोचना होगा तभी जन कल्याणकारी राज्य की उद्भावना साकार हो सकेगी।

सारत: 'दंतक्षेत्र' शीर्षक यह कृति एक क्षेत्र विशेष तक सीमित न रहकर, समूचे मानवैतिहास में व्याप्त प्रकृति-अनुकूल और प्रकृति-प्रतिकूल जीवन शैलियों के संघर्ष में अन्तर्निहित तत्वों की विवेचन व्यक्तियों और घटनाओं के माध्यम से करती है। लेखक इस महत प्रयास हेतु साधुवाद का पात्र है।
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