गुरुवार, 6 सितंबर 2018

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

नदी की धार सी संवेदनाएँ- रोहित रूसिया

गुलाब सिंह 
'नदी की धार सी संवेदनाएँ’ की रचनाओं के अनेक फलक हैं। आज समय और समाज निरपेक्ष होकर किये गए लेखन का महत्व संदिग्ध हो गया है। रोहित रुसिया अपने समाज, देश और उसके परिवेश से जुड़े हैं और उन्हें समय की रंगीनियों और विरूपताओं की पहचान भी है। छान्दसिक कविता को माध्यम के रूप में स्वीकार कर उन्होंने उसके अद्यतन शिल्प को पकड़ने का सफल प्रयत्न किया है। 

आज आगे बढ़ने के केवल वैचारिक पारे के ऊपर चढ़ने से मानवीय सम्बन्धों और उनकी वास्तविकताओं के तापमान का ज्ञान नहीं किया जा सकता, शायद इसलिये कि विचारकों के सिद्धान्तों का स्वयं उनके अपने व्यवहारों से ही मेल नहीं दिखाई पड़ता। जिस तरह प्रयोगवादी शब्द सज्जा फैशन लगने लगी थी, उसी तरह प्रगतिवादी रचनात्मक दृष्टि खेमों में बँट कर बौद्धिक कसरत और तर्कों की ओर आजमाइश का गद्देदार अखाड़ा बन गई। फिर कोई मानवीय प्रेम, मांसल सौंदर्य, रूमान, लालित्य और ‘मधुचर्या’(आचार्य राम चन्द्र शुल्क द्वारा प्रयुक्त) आदि की बातें करके वैचारिक पिछड़ेपन की तोहमत क्यों झेलता। रूमानियत किसी इन्फेक्शस रोग की तरह समझी जाने लगी, जिससे बचने के लिये परहेज आवश्यक हो गया। रूमानियत, जिस्मानियत से बचकर रूहानियत की अन्तर्दशा में पहुँचने का यह ऐसा छद्म अध्यात्म था कि इसमें मन से रससिक्त रह कर, चेहरे से रूखा ठोस बौद्धिक दिखाई पड़ना था। खड़ाऊ पहनकर नगरवधू वाली गली से गुजरने का यह हठयोग धीरे-धीरे प्रभाहीन हो गया।

रोहित रुसिया अपने ‘मैं’ से अपने ‘तुम’ को जिस संकोच के साथ सम्बोधित कर रहे थे, उस पर इस छद्म अध्यात्म का प्रभाव तो नहीं, छाया रही हो-
‘रंग फीके हों भले पर
प्यार के 
संबल रहेंगे’

संबल के स्थायित्व से मुतमइन होने पर ही गीत गाने के निश्चय पर पहुँचे
‘छोड़ो मत
अब 
जुड़ जाने दो
प्रीत भरे अनुबन्ध

या
बह जाने दो
नेह नदी को
तोड़ सभी प्रतिबन्ध’

सहज मनःस्थिति में गुनगुनाने और गाने पर रचनात्मक प्रकाश की किरणें दिखाई पड़ती हैं-
‘द्वार पर मेरे 
रखा हुआ है
दीप तुम्हारे नाम का’

और इसी दीप के प्रकाश में यह दर्शन भी उभरता है-
‘रिश्तों का 
एक गीत है जीवन 
प्रकृति उसी की एक कड़ी है’

गीत कभी-कभी एक ही कड़ी का होता है, लेकिन जीवन और उसके रिश्तों की कड़ियाँ निर्बन्ध होती है, उनके अनेक आयाम दिखाई पड़ते हैं। रोहित रुसिया ने इस विस्तार को भली प्रकार देखा है। इसलिये प्रेम और जीवन सम्बन्धों को एकाकार रूप में देख सके हैं।
‘एहसासों के 
साये गुम हैं
बंद महल में
हाँ हम तुम हैं’

इन गुम एहसासों के साये के भीतर से कुछ रंग झिलमिलाते हैं- 
‘तस्वीरों में रंग तुम्हारे 
अनजाने ही आए’ 

और 
‘नयन झील के दीप हुए 
जाने कब नाम तुम्हारे’  

‘अनजाने’ और ‘जाने कब’ की आकस्मिकताओं के कारण ही ‘कितने उलझ गए हैं हम तुम’
‘मुझको सदा।
छला करती है।
याद तुम्हारी।
साँसों के संग
आती जाती।
याद तुम्हारी।

इसलिए
‘तुम जितने हो दूर भले।
मेरा मन तेरे साथ चले।’
और साथ चलने की आत्मीय यात्रा घर बनाने के जिस मुकाम पर पहुँचती है वहाँ वास्तु शिल्प के सारे सरंजाम (बिल्डिंग मेटेरियल) उपलब्ध हैं, किन्तु रोहित रुसिया एक दुर्लभ वस्तु की तलाश में लगते हैं-

‘चलो घर बनाने को 
मुस्कान ढूँढें’
मुस्कान ढूँढने की यह ख्वाहिश निजी अनुरक्ति में भी सामाजिक अपनत्व की ओर संकेत करती है। आज घरों की भौतिक सम्पन्नता के बीच से मुस्कान ही तो गायब हो गई है। काश! कि घरों में मुस्कान लौट आए। सुखों की काँटों भरी शय्या पर अनिद्रा और अशांति से तड़पते समाज को एक बार फिर आनन्दानुभूति से तृप्त कर जाए। गीत में ‘यादों को रूमानियत की तलाश जरूर होगी।

वर्तमान समय धीमे चलने का नहीं, उड़ाने भरने का है। सिर्फ उड़ानों की कामना से भरी दुनिया से धरती छूटती जाती है। परिन्दे को लक्षित कर एक सहल अभिव्यक्ति-
‘लेकर मिट्टी का सोंधापन
सावन का भीगी बदली बन
कब आओगी मेरे आँगन
फिर से तुम
गौरैया’

अथवा
‘घट रही हैं
अब नदी की धार-सी
संवेदनायें’

पेड़ कब से 
तक रहा
पंछी घरों को लौट आयें
और फिर 
अपनी उड़ानों की खबर
हमकों सुनायें

अनकहे से शब्द में
फिर कर रही आगाह
क्या सारी दिशायें
रक्त रंजित हो चली हैं
नेह की 
सारी ऋचायें

जीवन और रचना संसार के विकास की सीढ़ियों पर अपर्वगमन की यह सहल स्वाभाविक गति बताती है कि ऊर्जा और आकांक्षा का योग ही रचनाकार को वह दृष्टि देता है जिससे वह जड़ में जीवन और जीवन में जड़ता का विपर्यय देख पाता है। बाहर बहती नदी और मनुष्य के भीतर संवेदनाओं के घटने अर्थात् उतार से जीवन प्रवाह टूटने लगता है। प्रवाह के लिए नदी को जल और जीवन को संवेदनाओं की दरकार होती है। चारे की तलाश में घोंसले से बाहर उड़ गये परिन्दे और घर से बाहर चले गये मनुष्य की वापसी की प्रतीक्षा एक ही तरह की नहीं है। घोंसले वाले पेड़ में पक्षी के लौटने की आतुर प्रतीक्षा है, दिन भर की उड़ानों और उपलब्धियों को जानने की उत्कंठा है। दूसरी ओर समाज की स्थितियों का निःशब्द संकेत दिखाई पड़ रहा है, जो आगाह कर रहा है कि प्रस्थान की सारी दिशायें और नेह की सारी ऋचायें रक्त रंजित हो चली हैं। नदी की उतरती धार और अपनी गोद में घोंसलों के संरक्षक पेड़ की संवेदनाओं में जो तरलता और हरापन (जीवन्तता) है उसकी तुलना रक्त रंजित दिशाओं और ऋचाओं से करने के पीछे मनुष्य को संवेदित करने की मंशा है जिसे ऐसे काव्यार्थों और अभिव्यक्तियों में अनायास ही समझा जा सकता है।

सिकुड़ती, मरती संवेदनाओं का एक ऐसा ही साक्ष्य उनके इस गीत में भी देखा जा सकता है-
‘आदमी बढ़ता गया
चढ़ता गया
चढ़ता गया
और समय की होड़ में
खुद, आवरण मढ़ता गया
भूल बैठा, झर रही हैं
नींव की भी गिट्टियाँ
अब नहीं आतीं
किसी की चिट्ठियाँ’

दो चार पृष्ठों पर फैले स्नेह, प्रेम, श्रद्धा, संवेदना, सुख-दुख, आत्मीयता, उपालम्य, उलाहने वाले पत्रों के स्थान पर दो चार शब्दों के चल संवाद उतने अर्थवान अचल कैसे हो सकते हैं। पत्राचार की समाप्ति भी समकालीन रीति रिवाजों की एक पहचान बन गई है। चिट्ठियों की विरलता की शुरुआत के समय करीब ढाई दशक पहले मैंने एक गीत लिखा था जो ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ था-
‘चिट्ठियों के सिलसिले टूटे
आइने से दूर होकर रह गये चेहरे
लहर-सी आईं गईं तिथियाँ 
दिन किनारों से मगर ठहरे’
रोहित रुसिया ने चिट्ठियों के संदर्भ में नीव की गिट्टियों तक के सड़ने का दर्द कह कर ऐसे मनोभावों को ताजा कर दिया है।

रोहित रुसिया एक सजग सावधान कवि हैं। वह चीजों को किसी गली से नहीं भीड़ भरे महत्वपूर्ण चौराहे से देखते हैं। बहुआयामी लेखन के लिये दर्शक दीर्घा से लेकर राजमार्ग गली कूचे और पगडंडियों तक से होकर गुजरना पड़ता है। भारत को देश ही नहीं उपमहाद्वीप कहा जाता है। गाँव, कस्बे, शहर, महानगर तक जीवन के कितने ही रंगों रूपों को समेटे यहाँ की धरती कर्मभूमि, वीरभूमि, देवभूमि, तपोभूमि के रूप में पूज्य है। इस माता भूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ कहा गया है। रोहित रुसिया इस भूमि को पैनी दृष्टि से देखने और पहचानने की कोशिश करते हैं, इसलिए अपनी यात्रा में गाँव, नगर, प्रकृति और आध्यात्म तक के दर्शन और वर्णन से जुड़ते हैं। नगरों के आकर्षण ने बहुतेरों को गाँव से शहर का वासी बना दिया है, लेकिन गाँव की जड़ें, वहाँ की मिट्टी की सुगन्ध मिटने वाली नहीं होती, इसीलिए रोहत रुसिया में भी गाँव को छोड़ने का दर्द है, उसी सुगन्ध से सना हुआ-
‘सुविधा के मोह में
बहक गये पाँव
मेरा छूट गया गाँव’

गाँव छूटने के समय जो सुगन्ध साथ लाये वह कितने मोहक शब्दों में व्यक्त हुई -
‘शब्द मेरे गूँजते हैं
गीत बन कर
फूलों में
पत्तों में
कलियों में 
सावन में
भीनी रंगरलियों में
शब्द मेरे झूमते हैं प्रीत बनकर’

मन की इसी खिड़की से गाँव के आगे बढ़कर वह अपने देश को देखते हैं। आज की स्थितियों में देश के प्रति अनुराग और राष्ट्रप्रेम की भावात्मकता के साथ ही परम्पराओं और तर्कों की एक विस्तृत वैचारिक पृष्ठभूमि भी है, जहाँ वसुधैव कुटुम्बकम् और भूमण्डलीकरण के पुराने-नये चिन्तन की साम्यता का मानवीय बोध दिखाई पड़ता है। अपनी संस्कृति के संरक्षण और स्वायत्तता की बात करते समय विचारों को भी महत्व देते हैं, कवि से व्यापक चिन्तन की अभिव्यक्ति के लिये एक सार्वभौम भाषा की अपेक्षा की जाती है। रोहित रुसिया के देश दर्शन के पीछे इस भाषा के साथ उनके भावुक हृदय की कोमलता दिखाई पड़ती है। कोमलता की प्रतिछाया उन्हें यहाँ की धरती और उसकी प्राकृतिक सुषमा की ओर ले जाती है-

‘मेरे देश तुझको
मेरा नमन
कितनी सुहानी धरती तेरी
पावन तेरा गगन’

अथवा
‘वसुन्धरा-वसुन्धरा
अपनी प्यारी वसुन्धरा
इसके बिना न जीवन अपना
आओ सोचें जरा’

यहाँ राष्ट्रवाद, विश्ववाद और सब के साथ लगे विमर्शवाद को खोजने की गुंजाइश कम ही है, क्योंकि रोहित रुसिया अपनी आँखों की नमी, मासूमियत और भोलेपन को बचाये रखकर ही दुनिया को देखना चाहते हैं। उनकी दृष्टि में इन्हीं जन्मजात मानवीय गुणों से रिक्त होने के कारण ही विचारों का अप्रभावी वैभव और चमकती भौतिकता का अंधकार हम पर हावी हो रहा है। एक उदाहरण -
‘मेरी आँखों में
नमी है
चमकने दो इसे
चलो छोड़ो
न छीनो भोलापन
जरा मासूमियत 
जरा बचपन 
पंछी जो 
आज उड़े हैं
चहकने दो उन्हें’

मासूमियत की यह धड़कन कब संसार की निस्सारता से टकरा गई, यह तो रोहित रुसिया ही जाने -
‘राम की चिरैया
देखो
उड़ गई रे
जाने कब
अपना ये मन तो
जग है एक छलावा’

संभव है कि उन्हें लगा हो कि भारतीय धर्म-अध्यात्म का एक पक्ष अछूता ही रह जा रहा है। वास्तव में जग के इस छलावे के भीतर ही हम सब अपने हिस्से का अभिनय कर रहे हैं। अभिनय मूल्यवान, सार्थक और सफल हो, यह कोशिश ही अपनी कर्मभूमि में अपना साक्ष्य प्रस्तुत करती है।


घोर निराशा, अशांति, हठधर्म, कुतर्क, ईर्ष्या, अहंकार के अँधेरे में आकंठ डूबते जाते समाज को बच निकलने का विश्वास दिलाते हुए रोहित रुसिया इस मान्यता को बल देते हैं कि आदमी गिरने के लिए नहीं, उठने के लिए बना है। कवि के ये शब्द कितने आश्वस्तिदायक हैं -

‘जीतेंगे हम
पहुँचेंगे फिर उसी ठौर
आएगा जीवन में
फिर से अच्छा दौर
पेड़ों ने
पतझर पर
कब आँसू बहाये
पंछी कब
टूटे नीड़ों से
हार पाये
शाखों पर आयेगी
कोंपल, पत्ते, बौर
जीतेंगे हम
पहुँचेंगे फिर उसी ठौर’

और इस यात्रा, इस पहुँच में -
‘तुम्हारा साथ देंगे
दूर तक
प्रेम में भीगे हुए 
कुछ फूल
अपने सूखने के बाद भी’

दृढ़निश्चय के साथ निकलकर दूर तक जाती युवा कवि रोहित रुसिया की इस सर्जनात्मकता पर भरोसा करते, उन्हें धन्यवाद देते हुए आइये उनके इस नये संग्रह के नये गीतों के नये तेवर और नये स्वर का स्वागत करे।
१९.१०.२०१५ --------------------------
गीत- नवगीत संग्रह - नदी की धार सी संवेदनाएँ, रचनाकार- रोहित रूसिया, प्रकाशक- अंजुमन प्रकाशन,  इलाहाबाद।  प्रथम संस्करण- २०१४, मूल्य- रूपये १२०/-, पृष्ठ- ११२, समीक्षा - गुलाब सिंह।

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