नदियों के इस देश में, अपना यही वजूद।
पहले डूबा टेहरी, अब डूबा हरसूद।
चाहे वह हो सीकरी, चाहे वह हो ताज।
खाली घर में गूँजती, है भरी आवाज।
मन का रिश्ता भूलकर, तन का रिश्ता जोड़।
इस परदेसी शहर में, गंवई बातें छोड़।
पवन बसन्ती रात-दिन, मारे सूखी मार।
फिर भी लौटाए नहीं, मन जो लिया उधार।
सुधियों में फागुन गया, दुविधा गया सनेह।
भीगे मन की छाँव में, सगुन मनाती देह.
रूपाजीवी-साधू में, सदा रही तकरार।
कान्चीमठ से है खफा, इसीलिये सरकार।
आँगन में ही नीम था, किन्तु न समझा मोल।
रोगी था मधुमेह का, मरा खुली तब पोल।
***************************************************
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
दोहे डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून
चिप्पियाँ Labels:
देहरादून,
दोहे डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
आचार्य संजीव वर्मा सलिल
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें