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रविवार, 1 मार्च 2009

फागुनी दोहे आचार्य संजीव 'सलिल'

फागुनी दोहे

आचार्य संजीव 'सलिल'

संजिव्सलिल।ब्लागस्पाट.कॉम / दिव्य नर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

दूरभाष: ०७६१ २४१११३१ / चलभाष: ९४२५१ ८३२४४

महुआ महका, मस्त हैं पनघट औ' चौपाल।

बरगद बब्बा झूमते, पत्ते देते ताल।

सिंदूरी जंगल हँसे, बौराया है आम।

बौरा-गौरा साथ लख, काम हुआ बेकाम।

पर्वत का मन झुलसता, तन तपकर अंगार।

वसनहीन किंशुक सहे, पञ्च शरों की मार। ।

गेहूँ स्वर्णाभित हुआ, कनक-कुञ्ज खलिहान।

पुष्पित-मुदित पलाश लख, लज्जित उषा-विहान।

बाँसों पर हल्दी चढी, बंधा आम-सिर मौर,

पंडित पीपल बांचते, लगन पूछ लो और।

तरुवर शाखा पात पर, नूतन नवल निखार।

लाल गाल संध्या किये, दस दिश दिव्य बहार।

प्रणय-पंथ का मान कर, आनंदित परमात्म।

कंकर में शंकर हुए, प्रगट मुदित मन-आत्म।

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2 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

It is remarkable, this amusing message

अनाम ने कहा…

It agree, rather useful phrase