गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

दोहा

दोहा 
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गौ माता है, महिष है असुर, न एक समान
नित महिषासुर मर्दिनी का पूजन यश-गान

करते हम चिरकाल से, देख सके तो देख
मिटा पुरानी रेख मत, कहीं नई निज रेख
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रुद्ध द्वार पर दीजिए दस्तक, इतनी बार 
जो हो भीतर खोल दे, खुद ही हर जिद हार
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अपने राम जहाँ रहें, वहीं रामपुर धाम 
शब्द ब्रम्ह हो साथ तो, क्या नगरी क्या ग्राम ?
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कार्यशाला 
दोहा वार्ता 
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छाया शुक्ला 
सम्बन्धों के मूल्य का, कौन करे भावार्थ ।
अब बनते हैं मित्र भी, लेकर मन मे स्वार्थ ।।
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संजीव
बिना स्वार्थ तृष्णा हरे, सदा सलिल की धार
बिना मोह छाया करे, तरु सर पर हर बार
संबंधों का मोल कब, लें धरती-आकाश
पवन-वन्हि की मित्रता, बिना स्वार्थ साकार
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