शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

पराक्रम और शहादत: कायस्थों की विरासत

पराक्रम और शहादत: कायस्थों की विरासत
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बुद्धिजीवी माने जा रहे कायस्थजन मूलत: जुझारू रहे हैं। वे अपने प्राण संकट में डालकर देश, समाज और मानवता की रक्षा करने के लिए ख्यात रहे हैं। इसका प्रमाण उनके कुलनाम हैं। कुछ कुलनामों का अर्थ जानें-
वर्मा, वर्मन, बर्मन: संस्कृत की 'वर्म' धातु से बना अर्थ दूसरों की रक्षा करने वाला, दूसरों के लिए जान देनेवाला।
सक्सेना; शक सेनाओं का संहार कर देश की रक्षा करनेवाले।
भटनागर: भट अर्थात वीर, जुझारू, नागर अर्थात सभ्य, सुसंस्कृत।
श्रीवास्तव: वास्तव में श्री (भुजबल, बुद्धिबल, धनबल) रखने वाले।
खरे: ईमानदारी पूर्ण आचरण करनेवाले।
अम्बष्ट: युद्ध की अधिष्ठात्री अम्बा देवी को उपास्य माननेवाले।
निगम: आगम और निगम ग्रंथों के विद्वान्।
माथुर: मथुरा क्षेत्र के स्वामी।
कुलश्रेष्ठ: जिनके कुल श्रेष्ठ अर्थात द्विज (ब्रह्म और युद्धविद्या में निपुण) हो।
सूर्यध्वज: वे जिनके यश की किरणें सूर्य के प्रकाश की तरह फैली हों।
गौड़: सेना के अन्य (गौड़) कार्य जैसे आयुध प्रदाय, चिकित्सा आदि करना।
कर्ण: महावीर कर्ण की तरह पराक्रमी और दानी।
वाल्मीकि: शब्दार्थ दीमक की बांबी, भावार्थ दीमक की तरह दुश्मन को नष्ट होने तक न छोड़नेवाले।
सरकार: जो किसी शासन की तरह सुरक्षा और शांति बनाये रख सकें।
विश्वास: जिनके वीरता पर उनके आश्रित भरोसा करें।
चौधरी: जो मुखिया की तरह आश्रितों की रक्षा करें।
राय (रे अंगरेजी रूप): जिनसे शासक परामर्श करते थे।
दे (डे अंगरेजी रूप): दानवीर।
मित्र: सबका हित करनेवाला।
चंद्र: चंद्र को इष्ट माननेवाले, अपने लोगों में प्रमुख।
भद्रधर: सज्जनों को आश्रय देनेवाले।
सेनगुप्त; जिनके सैन्य बल की जानकारी गुप्त हो।
कुंद: कुबेर की नौ निधियों में से एक अर्थात समृद्धिवान।
कुंडु: कुंड अर्थात तालाब की तरह सबको तृप्त करनेवाला।
दास: ईश्वरभक्त।
नंदन: पुत्र की तरह सबका प्रिय।
घोष: जिसकी सामर्थ्य की जय-जयकार होती है।
बसु (बोस): वसु अर्थात पृथ्वी के स्वामी या देव।
दत्त: भगवान् से प्राप्त विशेष मानव।
नाग: सर्प की तरह आक्रामक और बदला लेने वाला।
मलिक: मालिक का देशज रूप।
देव: पूज्य, मान्य।
भद्र: सज्जन।
पाल: पालवाली नावों के स्वामी, पालन करनेवाला। ७७५ ईस्वी से ११६१ ईस्वी तक बंगाल और मगध के शासक।
साहा: शाह का देशज रूप।
नंदी नंद अर्थात राजा का प्रतिनिधि।
नाथ: स्वामी।
चक्रवर्ती: परम पराक्रमी।
गुहा: विष्णु की तरह छिपकर युद्ध करनेवाला।
कर: हाथ की तरह सबके काम आनेवाला।
प्रधान: मुखिया, सबसे बड़ा।
सिन्हा, सिंह: शेर की तरह बहादुर।
वैद्य: रोग से प्राणरक्षा करने की विद्या जाननेवाला।
चित्रे: सगुन ब्रम्ह के उपासक।
सुले: भविष्य बताने, बनाने, बदलने में सक्षम।
राजे: राज्य करनेवाले।
ठाकरे: ठाकुर यानी स्वामी का संशोधित रूप।
चंद्रसेनी / चंद्र प्रभु: चन्द्रमा को इष्ट माननेवाले सैन्य दल के स्वामी।
राव: प्रमुख।
पटनायक: प्रमुख नायक।
मुंशी:लिखा-पढ़ी करनेवाला।
राय , रायज़ादा: विद्वान् जिनसे शासक राय लेता था।
कानूनगो: कानून जानने और बनाने वाला।
पाटस्कर: नदी तट पर कर लेनेवाला।
मोहंती: ईशभक्त।
बरियार, वाडियार: बलवान।
देशपांडे: देश अर्थात स्थान का मुखिया।
कुलकर्णी: कर्ण के कुल के तरह अर्थात वीर और दानी।
कोटनीस: कोट अर्थात किले का प्रमुख।
फडणवीस: फड़ अर्थात लेन-देन के स्थान का स्वामी।
चिटणवीस: लिखित राजाज्ञा जारी करने के अधिकारी।
समर्थ: सक्षम।
जयवंत: विजयी रहनेवाले।
अस्थाना: बहुत गहराई रखनेवाले।
अधौलिया: आधा औलिया, वीतरागी।
प्रसाद: ईश्वर से प्राप्त वरदान की तरह सबकी मनोकामना पूरी करनेवाले।
कायस्थ, पुरकायस्थ: जिनकी काया में ईश्वर स्थित है भावार्थ पूज्य।
बिसारिया, बरूआ, मिरासी: निरभिमानी, वीतरागी।
दलेला: सिपाहियों को दंड देनेवाले।
जौहरी: परख करनेवाले।
अधिकारी: राज्याधिकार रखनेवाले।
पांडे: पूज्य।
अग्निहोत्री: अग्निहोत्र करनेवाले।
कर्णिक, करणीगर, मुंशी: लेखक, लिपिक।
श्रेष्ठ: उत्तम।
सारंग: उत्तम कलाकार।
बख्शी: जिनकी प्रबंध योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें जागीरें अथवा लगान बख्श दिया गया।
कश्यप: कायस्थों का गोत्र जिनके पूर्वज कश्यप ऋषि से शिक्षित हुए।
बल्लभ जी, बल्लभी: कृष्ण भक्त बल्लभाचार्य पंथ के अनुयायी।
शास्त्री: शास्त्र में निपुण।
आलिम: विद्वान, पंडित।
फ़ाज़िल: गुणी, विद्वान्।
कामिल: ज्ञाता, सिद्ध।

कुलनामों से कायस्थों के गुणों विद्वता, शौर्य, दानशीलता, प्रबंधन। कलाप्रेम आदि की जानकारी होती है। वे राग और विराग दोनों में प्रवीण होते हैं। वे हर काल में अपने देश और समग्र समाज के लिए आत्मोत्सर्ग करते रहे हैं। दशरथ के महामंत्री सुमंत्र, रावण के वैद्य सुषेण, नंद वंश व चन्द्रगुप्त मौर्य के महामात्य राक्षस, से लेकर आधुनिक काल के क्रांतिकारियों वीरेंद्र कुमार घोष, उल्लासकर दत्त, पुलिनबिहारी दास, शैलेन्द्रनाथ घोष, रास बिहारी बोस, राजकुमार सिन्हा, महर्षि अरविन्द घोष, यतीन्द्रनाथ दास, सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण, प्रभावती नारायण आदि का सूर्य-पराक्रम इतिहास की थाती है। भारतीय सेना को नेतृत्व देनेवाले सुयोग्य सेनानायक लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा का योगदान अविस्मरणीय है।


कैप्टन नीलकंठन जयचंद्रन नायर
मराठा बटालियन में शामिल नीलकंठन जयचंद्रन नायर को 1993 में नागा विद्रोहियों से सामना करने के लिए नागालैंड भेजा गया था। वहाँ उन्होंने अपनी आहुती देकर पूरे बटालियन को सफलतापूर्वक उपलब्ध कराया था। इनकी हिम्मतुरी को अभी भी लोग याद करते हैं।

अर्जुन कुमार वैद्य

महावीर चक्र से सम्मानित अर्जुन कुमार वैद्य देश के सच्चे वीर हैं। को कई मौकों पर देश को अपनी सेवा दी। पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ और ऑपरेशन ब्लू स्टार में वह काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

कैप्टन अनुज नायर
आन्दोलन को रोकना।

देश के बुर सैनिक कैप्टन अनुज (पिता श्री इस दौरान। नायर) को 1999 के कारगिल युद्ध में सबसे ऊंची घाटी को अपने कब्ज़े में लेने को कहा गया था। वे अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे थे, तभी पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके शरीर को भेद दिया, फिर भी कैप्टन ने अंतिम सांसों तक अपना टार्गेट पूरा कर लिया। LOC फ़िल्म में सैफ़ अली ख़ान ने इनका रोल किया था।

पुलवामा हैड कॉन्स्टेबल संजय सिन्हा बिहार, हैड कॉन्स्टेबल नारायण लाल रेजिस्टेंट, कॉन्स्टेबल सुदीप बिस्वास पश्चिम बंगाल,



नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था।



कायस्थों में सैन्य परंपरा के वाहक लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा

जनरल लेफ्टिनेंट श्रीनिवास कुमार सिन्हा (7.1.1 926-17.11.2016 ) ने भारतीय सेना के उपसेना प्रमुख (1.1.1 983-1.6.19 83 ) सेवा निवृत्ति पद से के बाद में में में राज्यपाल असम (1 997- २०३००) और राज्यपाल जम्मू-कश्मीर (२००३-२००८) के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया । बिहार के पहले पुलिस महानिरीक्षक मिथिलेश कुमार सिन्हा के बेटे और ब्रिटिश भारत के पहले महानिरीक्षक अलख कुमार सिन्हा के पोते श्रीनिवास कुमार सिन्हा का जन्म १ जनवरी १ ९ २६ को पटना में हुआ था। वे 1 9 43 में पटना विश्वविद्यालय से आनर्स के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त कर अधिकारी प्रशिक्षण विद्यालय, बेलगाम से श्रेष्ठ कैडेट के रूप में उत्तीर्ण होने के बाद में भारतीय सेना में 5 गोरखा राइफल्स (न्यू मेजर्स) में 1 सितंबर 1 955 को कप्तान बने। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा, इंडोनेशिया में और भारत के स्वतंत्र होने के बाद, कश्मीर नगालैंड और मणिपुर में दो आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लिया गया। सिन्हा के चार बच्चे मीना, यशवर्धन, मृणालिनी और मनीषा हैं। मृणालिनी और मनीषा दोनों इतिहासकार हैं। मृणालिनी सिन्हा मिशिगन विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में एलिस फ्रीमैन पालर प्रोफेसर हैं। मनीषा सिन्हा कनेक्टिकटविश्वविद्यालय में अमेरिकी इतिहास में ड्रेपर चेयर हैं।

सिन्हा ने यूनाइटेड पेरू के संयुक्त सेवा स्टाफ कॉलेज में, भारत में डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेजमें १ ९ ६२ में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। उन्होंने सेना में सक्रिय कमान के सभी स्तरों को पलटन से लेकर विंग आर्मी तक रखा था। उन्हें ९ जून १ ९ ६५ को लेफ्टिनेंट-कर्नल के रूप में प्रस्तुत करना हो गया है। उन्होंनेलद्दाखमेंएकबटालियन,मणिपुरमें एक ब्रिगेड,असममें एक पर्वत प्रभाग,जम्मूमें एक पैदल सेना प्रभाग,पंजाबमें एक वाहिनीऔरपश्चिमी सेना की कमान संभाली । उन्होंने प्रमुख कर्मचारियों और निदेशक पदों का आयोजन किया। उन्होंने सेना मुख्यालय में निदेशक, सैन्य खुफिया , एडजुटेंट जनरल और वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के रूप में कार्य किया । उन्होंने महू और स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में प्रशिक्षक के रूप में भी काम किया । अपने आर्मी करियर के दौरान वे पहले दिन सेज-कश्मीर से जुड़े रहे। अक्टूबर १ ९ ४११ में दिल्ली से श्रीनगर तक बड़े पैमाने पर एयरलिफ्ट के आयोजन में वे एक जूनियर स्टाफ ऑफिसर के रूप में शामिल थे। १ ९ ४ ९ में, उन्हें संयुक्त राष्ट्र द्वारा बुलाई गई बैठक में कश्मीर में संघर्ष विराम रेखा के परिसीमन पर भारतीय अभ्यावेदन का सचिव नियुक्त किया गया है। भारत-पाकिस्तान युद्ध १ ९ में २ में उन्होंने अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया। उन्होंने १ ९ १२ में किया युद्ध के लिए मानवाधिकारों के आवेदन पर एक सम्मेलन के लिए इटली में भारतीय अधिकारियों की अगुवाई की । उन्हें १ ९ १३ में परम विशिष्ट सेवादल से सम्मानित किया गया किया गया था। 2 दिसंबर को भारत के राष्ट्रपति का मानद एडीसी बनाया गया था। उ न् ने गोरखा ब्रिगेड के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। प्रसिद्ध दक्षिण अमेरिकी विशेषज्ञ स्टीफन एफ। कोहेन द्वारा अमेरिका में एक प्रकाशन में , उन्हें भारत के सबसे उत्कृष्ट पोस्ट-फ्रीडम जनरलों में से एक के रूप में उद्धृत किया गया है।


कायस्थों की कहानी

संजय निरूपम

हाल ही में महाराष्ट्र के जाने के साथ समाज सेवक और लेखक-पत्रकार प्रबोधनकर ठाकरे की आत्मकथा के एक पृष्ठों की कुछ पंक्तियों की चर्चा हुई, जिस पर राजनीतिक घमासान हो गया है। प्रबोधनकर ठाकरे का मूल नाम केशव सीताराम ठाकरे है। वे शिवसेना के सर्वोच्च नेता बाला साहेब ठाकरे के पिता हैं। में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनका समाज मूलत: महाराष्ट्र का नहीं है और हजारों साल पहले मगध से आया है। वाया चित्तलगढ़ और भोपाल होते हैं। यह जानकारी कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने दी। इनका उद्देश्य यह साबित करना था कि ठाकरे परिवार मूलत: अप्रवासी है और उस पर भी द्विआधारी।
जाहिर है इस पर बवाल होना था क्योंकि मुंबई में रहने वाले अप्रवासी बिहारियों को सशक्त लक्षित बनाने वाले ठाकरे परिवार के लोग अगर मूलत: बिहार के हैं। और यह निष्कर्ष किसी साधारण शोधकर्ता के शोध में उपलब्ध नहीं है, लेकिन आज के उद्धव और राज ठाकरे के विद्वान दादा प्रबोधनकर ठाकरे के लेखन में उपलब्ध है, तो यह अस्वीकार करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि यह उनके समाज के बारे में सही है, परिवार के बारे में नहीं। समाज और परिवार को कितना अलग किया जा सकता है, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।

वास्तव में इस तर्क को काटने के लिए ठाकरे परिवार के पास कोई तथ्य नहीं है। इसलिए कुतर्कों का सहारा लिया जा रहा है। तो सच क्या है? ठाकरे परिवार की सामाजिक और जातिगत पृष्ठभूमि क्या है? उत्तर भारत में जो कायस्थ जाति है, उसे महाराष्ट्र में सीकेपी कहते हैं। अर्थात चंद्रसेन कायस्थ अधिभूत। ठाकरे परिवार सीकेपी है। प्रबोधनकर ठाकरे ने अपनी आत्मकथा में इसी सीकेपी समाज के अनवरत विस्थापन की कथा सुनाई है। एक कथा के अनुसार चंद्रसे नाम की एक महारानी थे। जिन दिनों वह गर्भवती थी, उनके पति की हत्या कर दी गई थी। कब, कहां और किसने, इस पर अलग-अलग मत हैं। पति की हत्या के बाद महारानी चंद्रसे ने विस्थापन का सहारा लिया। उन्हीं के वंशज सीकेपी हैं। पुराणों में चंद्रसे को देवी माना गया है।

प्रबोधनकर ने लिखा है कि उनका समाज राजा महापद्मनंद के जमाने में मगध में रहता था। यह दो हजार साल से ज्यादा पुरानी बात है। वह चंद्र गुप्त काल है। चंद्र गुप्त से पहले मगध पर नंद वंश का राज था। नंद वंशगतचारों और कुशासन के लिए कुख्यात था। केवल चाणक्य ने चंद्र गुप्त का सृजन किया था। प्रबोधनकर लिखते हैं कि नंद वंश के राजा के अत्याचारों से त्रस्त होकर उनका समाज मगध से विष्णु हुआ।] फिर प्रकारांतर में चित्तौड़गढ़, भोपाल होते हुए महाराष्ट्र पहुंचे। हो सकता है महारानी चंद्रसे पर हुई जुल्मों की कहानी प्रबोधनकर के इस शोध का आधार हो। सीकेपी महाराष्ट्र का एक शिक्षित, बुद्धिजीवी और सभ्य समाज माना जाता है। बड़े लेखक, पत्रकार और प्रशासक इस समाज ने दिए हैं। इसी समाज के जनरल अरुण कुमार वैद्य भी थे।

उत्तर भारत में अच्छी तादाद में पाए जाने वाले कायस्थ समाज और सीकेपी में काफी समानता है। दोनों समाज अपनी बुद्धिजीविता और प्रशासनिक कौशल के लिए जाना जाता है। इन्हीं कायस्थों की एक शाखा में सीकेपी है। लेकिन कायस्थ जाति की मूल भूमि ऐतिहासिक तौर पर मगध प्रांत का वह क्षेत्र है, जो आज बिहार उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है। चाहे महाराष्ट्र हो या बंगाल या उड़ीसा या असम या राज्य-मध्य प्रदेश, यहां के कायस्थ मूलत: उत्तर भारत से राहत रखते हैं। आज उनके उपनाम भिन्न हैं, पर उनकी फितरत समान है। कहते हैं, ब्रह्मा की काया से उत्पन्न हुए कायस्थ थे। उनके आराध्य देवता चित्रगुप्त हैं। पुराणों के अनुसार भगवान चित्रगुप्त स्वर्ग के मुनीम थे। वे मनुष्य जाति के पाप-पुण्य का हिसाब रखते थे।उनके वंशज भी परंपरा से हिसाब-किताब रखने का काम करते रहे हैं। पुराने जमाने के तमाम राजाओं के पास मुनीमगिरी करने के लिए जो वर्ग सबसे पसंदीदा था, समान कायस्थ समाज है। मगध काल में इसे पहली मान्यता मिली। फिर मुगलों के जमाने में और अंग्रेजों के शासनकाल में यह समाज विश्वसनीय प्रशासक बनकर सामने आ गया। सम्राट अकबर के मंत्री टोडरमल इसी समाज के थे। उन्हें मुंशी जी ने कहा था। साहित्य के योग पर आरूढ़ होने के बाद भी धनपत राय को मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना गया।

लिखने-पढ़ने, हिसाब-किताब और सभ्य और सभ्य आदित्य नफासत की जिंदगी जीने के लिए मशहूर कायस्थ समाज ने देश को कई महापुरुष दिए हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेंद प्रसाद, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, सच्चिदानंद सिन्हा, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा इत्यादि। नेता जी सुभाष चंद बोस और ज्योति बसु बंगाल के कायस्थ थे। उड़ीसा के पटनायक मूलत: कायस्थ समाज के हैं। चाहे वे जेबी पटनायक हों या बीजू पटनायक।

आधुनिक कायस्थ समाज का मूल उद्भव स्थल क्या है? इस पर शोध हुआ है और अभी भी है। इस समाज की फितरत के दो पहलुओं को समझा जाए तो स्वयं स्पष्ट हो जाता है। एक तो यह समाज नौकरीपेशा है। दूसरा, इसकी घुमंतू प्रवृत्ति है। जैसे आज के अफसर सदा तबादले के शिकार होते रहे हैं, उसी तरह उस जमाने के कायस्थ या तो स्वयं एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते थे या उन्हें भेजा जाता था। या वे पड़ोसी राज्यों द्वारा मंगवा गए थे। मगढ़ के कायस्थ अपनी प्रशासनिक क्षमता के लिए कलिंगा बुलवाए गए हैं, जो आज के पटनायक और नंदा के तौर पर जाने जा रहा है। प्रागैतिहासिक काल के बाद आधुनिक प्रशासन का पहला ऐतिहासिक दस्तावेज मगध काल में मिलता है। राजधानी पाटलिपुत्र था, जो आज का पटना है।उस जमाने में नक्शे पर दिल्ली और मुंबई पर तो राष्ट्रीय महत्व पाटलिपुत्र का था। तमाम राष्ट्रीय घटनाओं का केंद व आकर्षण पटना था। वहाँ लोग काम की तलाश में जाते थे और वहाँ से भारत की दूसरी रियासतों में भी जाते थे।


आज भी देशभर में अफ़सरों की कुल संख्या में अधिकांश कायस्थ ही हैं। और कायस्थों में भी बड़ी संख्या में नौकरीपेशा लोगों की है। व्यवसाय या खेती कायस्थों की फितरत में बहुत कम ही रही है। यह समाज की हर दूसरी पीढ़ी अपने गाँव या शहर को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर सौ-सद के लिए बस जाने के लिए विख्यात है। यही कारण है कि पाकिस्तान में भी कायस्थ पाए जाते हैं। धर्मांतरित मुस्लिमों में भी कायस्थों की एक अलग धारा है। दक्षिण भारत में भी नायर उपनाम के कायस्थ पाए जाते हैं। लेकिन शोध किया जाए तो सबके मूल में मगध का कनेक्शन मिलता है। मसलन प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतिश नंदी बंगाली कायस्थ हैं, पर उनका मूल गांव भागलपुर है। जिन कायस्थों को बिहार या यूपी में मुंशी कहा जाता है, वे बंगाल में दासमुंशी के नाम से जाने गए।




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