शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

चर्चा: अखबारों और दूरदर्शनी खबरियों का दायित्व

चर्चा: अखबारों और दूरदर्शनी खबरियों का दायित्व 
 कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया। भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार कांड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।
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महेश चन्द्र द्विवेदी 




रेप -कांड के आन्दोलन में अभियुक्तों को फँसी की सजा की अनुचित ढंग से मांगने वालों ने एक सिपाही कीजान  ले ली।
मैंने जब इसकी चर्चा छेड़नी चाही, तो एक खाते-पीते  घर की महिला ने शिकायत की की पुलिस ने इतनी ठण्ड में 
पानी की बौछार कर कितना बड़ा अत्याचार किया।
ज़रा सोचिये की हमारी सोच कितनी पूर्वाग्रहग्रस्त हो सकती है।
mcdewedy@gmail.com
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संजीव 'सलिल'
आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। मीडिया और प्रेस ने अतिरेकी अतिशयोक्तिपूर्ण समाचार प्रसारित कर लोगों को भ्रमित और उत्तेजित किया। दिशाहीन भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस की विवशता है। क्या वह भीड़ हाथ जोड़कर निवेदन करने से लौट जाती भीड़ की मांग पर सरकार फंसी कैसे दे सकती है? सजा देना या न देना या कितनी देना न्यायालय का काम है। दिवंगत पुलिसवाले की मौत और राष्ट्रीय क्षति का jजिम्मेवार मीडिया है। पत्रकारों पर नियंत्रण किया जाना आवश्यक है।
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डॉ. दीप्ति गुप्ता, पुणे




पुलिस की  स्थिति को तो कोई भी गंभीरता  से  लेता ही नहीं ! उनकी  reputation  बिगाडने , जान जाने के असली जिम्मेदार  ये राजनेता लोग हैं  जो कहीं भी  उन्हें action oriented robot   की  तरह  depute  कर देते हैं बिना  किसी सुरक्षा के ! उनकी सुरक्षा के  जो उपयुक्त  'संसाधन '  सरकार को   उपलब्ध  कराने चाहिए, उसमें वे कोताही करते हैं !  क्योंकि  नेताओं को  सब विभागों  के  बजट  खा  जाने   के ज़रूरी काम जो करने होते हैं !  मुम्बई  ब्लास्ट में  जो  तीन पुलिस अधिकारी बेमौत मारे गए - अगर  वे life jacket  पहने होते  तो मरते नहीं !
राजनेता चाहे तो आसानी से  शांति से  प्रोटेस्ट करने वाले समूह में से  दो-तीन प्रतिनिधियों  को विश्वास   में लेकर  और  गंभीर मसले  पर  वार्ता करके उन्हें १०-१५ दिन का समय देकर शांत कर सकते थे !  पुलिस को ज़रा  सी  भी   आँसूं  गैस छोडने  या  पानी  छोडने की ज़रूरत न पडती ! लेकिन  नेता  समझदारी  और   (आहत  भीड़ के प्रति)  मनोवैज्ञानिक ढंग से  सक्रिय  न होकर,  अपनी  जिम्मेवारी पुलीस को सौंप कर  आराम  से  A.C  कमरों में पसर जाते  हैं  !  खुद Body Guard   के साथ  बाहर कदम निकालते हैं !  ये नेता  ही हैं जो पुलिस   से हिंसा की शुरुआत करवाते   है  और उसके बाद  जो घटता  रहा  है  आज तक-   उसका  इतिहास साक्षी है !

सो  शरीर और  अक्ल से स्थूल  ये सारे राजनीतिज्ञ  असली  अपराधी है   -  जिनके कारण जनता, पुलिस, डाक्टर, इंजीनियर्स (लखनऊ के कितने अभियंता  जान  से गए - राजनीतिक हथकंडों की वजह से ) , सामजिक कार्यकर्ता (अन्ना) ,योगी (बाबा रामदेव) , सब  की  जान को  खतरा   बना  रहता है !  *
आसान बहुत है काम ,  ख़ाकी पर इल्ज़ाम .........
 विजेंद्र शर्मा

सीमा सुरक्षा बल ,बीकानेर
का 
मेल ………पढिये इसे …………और जानिये कौन है दोषी ?   
पुलिस , हम या सरकार?
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इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली गैंग - रेप के हादसे ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया ! दरिन्दगी का ऐसा घिनोना कृत्य शायद ही इससे पहले किसी ने सुना हो ! दिल - दहला देने वाले इस हादसे ने उन लोगों के अन्दर भी संवेदना के बीज अंकुरित कर  दिए जिनका संवेदना से दूर - दूर तक कोई सरोकार ही नहीं था ! पूरे देश का सोया हुआ हस्सास इस घटना से एका-एक जाग गया ! ऐसी घटना सभ्य समाज के माथे पे कभी ना मिटने वाला कलंक है !

ऐसी वीभत्स घटना के बाद आवाम का ग़ुस्सा जायज़ था , लोगों ने अपने इस आक्रोश को ज़ाहिर भी किया मगर आरोप – प्रत्यारोप के बीच अगर सब से ज़ियादा किसी पे गाज गिरी तो वो गिरी दिल्ली पुलिस पर ! ख़ाकी की यहाँ, मैं इस लिए पैरवी नहीं कर रहा कि मेरा त-अल्लुक़ भी ख़ाकी से है !

एक क्षण के लिए सोचिये इस घटना के बाद अगर वो भेड़िये ना पकड़े जाते तो हिन्दुस्तान की जम्हूरियत(लोकतंत्र )के मरकज़ (केंद्र ) राजपथ पर हज़ारों लोग किन्हें फांसी पे चढाने की आवाज़ बुलंद करते !

सोयी हुई हुकूमत को जगाने वाले प्रदर्शनकारियों की हर तख्ती पर लिखा था “ बलात्कारियों को फांसी दो “ अगर वे दरिन्दे हाथ ना आते तो शायद इस जन- आन्दोलन का स्वरुप आज कुछ और ही होता !

उस मासूम सी लड़की के जिस्म और रूह को नौचने के बाद उन दरिंदों ने उसे और उसके साथी को तक़रीबन मरे हुए समझकर महिपालपुर की पहाड़ियों के क़रीब फैंक दिया था ! लड़की के साथी ने बेहोशी की सी हालत में पुलिस को सिर्फ़ इतना बताया कि बस के ऊपर “ यादव “ लिखा था ! इस लीड के अलावा दिल्ली पुलिस के पास कोई भी और क्लू नहीं था ! पुलिस पर अक्सर संवेदनहीन होने का आरोप लगता है , हो सकता है कोई और केस होता तो पुलिस इतना मश्क नहीं करती पर कहीं ना कहीं दिल्ली पुलिस की उस टीम में संवेदना थी जो उस बच्ची की वो हालत देखकर उन्होंने अपनी एडी – चोटी का ज़ोर लगा दिया ! आधे घंटे तक पास से गुज़रने वाले लोगों ने उनकी पुकार नहीं सुनी, दो फ़रिश्ते ( फ़रिश्ते इस लिए लिखा क्यूंकि इंसान तो रुके ही नहीं ) अपनी बाइक पर जा रहे थे उन्होंने जब एक लड़के के कराहने की आवाज़ सुनी तो वे रुके उन्होंने 100 नंबर पे पी.सी.आर को फोन किया ! उनके फोन करने के ठीक साढ़े पांच मिनट के बाद पुलिस की गाड़ी आ गयी ,पुलिस वालों ने अपनी जैकट से उनके जिस्म को ढका ,वो दोनों फ़रिश्ते पास के एक ढाबे से चद्दर लेकर आये जिसमे लपेट कर पीड़िता और उसके साथी को अस्पताल ले जाया गया !

इसके फ़ौरन बाद मुआमले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने अपनी कई टीमें गठित की जिन्होंने अपना काम शुरू कर दिया !

दिल्ली में जितनी भी चार्टड बसे चलती है रात भर उनका रिकॉर्ड खंगाला गया , पता चला लगभग ऐसी 370 बसें है जिन पर यादव लिखा है ! सोलह दिसंबर की उस सर्द और सियाह रात में पुलिस की टीम एक – एक बस ,उसके मालिक और बसों के ड्राइवरों को ढूंढती रही ! पूरी रात की मशक्कत के बाद सुबह तक पुलिस उस बस को ढूंढ पाने में कामयाब हो गयी जिस बस में हैवानियत का गंदा नाच हुआ था ! मुख्य आरोपी राम सिंह के गिरफ़्त में आने के बाद पुलिस के लिए बाक़ी भेड़ियों को पकड़ने की राह आसान हो गयी ! अगले दिन शाम तक पुलिस ने चार आरोपी अदालत में पेश कर दिए ! एक नाबालिग आरोपी राजू को पकड़ने में भी दिल्ली पुलिस ने अपनी सूझ –बुझ का परिचय दिया केवल राम सिंह उसे पहचानता था उसका न कोई पता था न कोई मोबाईल नंबर ! राजू को दो दिन की भाग –दौड़ के बाद दिल्ली के आनंन्द विहार इलाके से पकड़ा गया जिसके पास पीड़ित बच्ची का ऐटीएम् कार्ड और पर्स मिला !

किसी ब्लाइंड केस को इस तरह दिल से सुलझाने की ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है !

ये भी सच है कि जज़्बात का चश्मा हमे हर चीज़ साफ़ - साफ़ नहीं दिखाता, लोग शानदार जांच और इतनी जल्द समाज के दुश्मनों को पकड़ने वालों के ऊपर ही इल्ज़ाम लगाने लगे !

अमेरिका में छुटियाँ मना रहे दिल्ली के उप राज्यपाल ने आते ही दिल्ली पुलिस के दो सहायक कमिश्नर बर्खाश्त कर दिए ! पुलिस पर दवाब बना कर काम करवाने वाले हुक्मरानों ने इतना भी नहीं सोचा कि ऐसा करने से उन पुलिसवालों के मनोबल पे क्या असर पड़ेगा जो इस हादसे के बाद 36 घंटों तक लगातार बिना सोये इस केस के लिए काम करते रहे ! कमज़ोर सियासत का वर्दी पर इस तरह इल्ज़ाम ढोल देना कोई नई बात नहीं है !

जितने लोग उतनी बातें , किसी ने कहा की दरिन्दे दो घंटे तक दिल्ली की सड़कों पर बस घुमाते रहे पुलिस उस वक़्त क्या सोयी रही ? इस बात का जवाब वो लोग आसानी से समझ सकते है जो दिन – रात दिल्ली की सड़कों पर सफ़र करते हैं ! उस चार्टड बस में परदे लगे थे , अन्दर से बस की लाइट्स बंद थी ! दिल्ली की सड़कों पर वाहन कीड़े – मकोड़ों की तरह चौबीसों घंटे रेंगते रहते है ऐसा प्रायोगिक रूप से कतई संभव नहीं है कि बस को किसी चेक पोस्ट या लाल बत्ती पर जांच के लिए रोका जाता ! यूँ तो बस के क़रीब से भी कई वाहन गुजरें होंगे ..क्या उन्हें नहीं दिखा ये सब ? दिखता कैसे ये सब तो संभव नहीं था ! जो लोग वहाँ रोज़ सफ़र करते है वे ये बात समझ सकते है ! जनता के आक्रोश के सामने दिल्ली पुलिस का तमाम मुल्ज़िमों को इतने कम समय में सलाखों के पीछे कर देने का काम किसी को दिखाई ही नहीं दिया ! मुझे हैरत इस बात की भी हुई कि पुलिस की कार्य - प्रणाली समझने वाले भी पुलिस को ही इस हादसे का ज़िम्मेदार ठहराने लगे ! हमारे समाज और पुलिस के बीच आंकडा वैसे भी 36 से कम होता ही नहीं है यही वज़ह है कि समाज पुलिस को कभी उसके अच्छे काम के लिए भी शाबाशी नहीं देता !

पुलिस पे इल्ज़ाम धर देना बड़ा आसान है मगर ऐसे हादसे क्यूँ होते हैं इस पर समाज कभी गौर नहीं करता ! अदालतों में हज़ारों बलात्कार के मुआमले लंबित है ऐसा नहीं है कि ये तमाम केस पुलिस की अकर्मण्यता के कारण किसी अंजाम तक नहीं पहुँच पा रहे है ! राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड संस्थान के आंकड़ों के अनुसार देश में ९० % बलात्कार महिला के जानकार या किसी सगे संबंधी के द्वारा किये गए हैं ! दिल्ली गैंग रेप अपने आपमें एक अलग और राष्ट्रीय शर्म का केस है !

ये बात मेरी समझ से परे है कि किसी महिला से उसके घर में किसी रिश्तेदार या जानकार द्वारा ये घृणित कृत्य किया जाता है तो इसमें पुलिस कहाँ दोषी हो जाती है ?

पीड़ित महिला को इन्साफ़ देरी से मिलता है इसके लिए हमारी न्यायिक प्रक्रिया भी बराबर की कुसूरवार है ! अभी तक “बलात्कार “ की परिभाषा भी हमारा क़ानून ठीक से गढ़ नहीं पाया है ! एक तो किसी की अस्मत लूट ली जाती है उस पर घटना के बाद पीड़िता से इन्साफ़ के मंदिर अदालत में ऐसे ऐसे सवाल किये जाते हैं जैसे उसी ने ही बलात्कार किया हो ! बकौल राहत इन्दौरी :--

इन्साफ़ जालिमों की हिमायत में जाएगा

ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा

मगर दिल्ली गैंग रेप की इस घटना ने इंसाफ़ को भी सोचने पे मजबूर किया है ! हमारी पुलिस , सियासत , आवाम और समाज का सर वाकई शर्म से झुक गया है ! सच तो ये है की इस घटना के बाद हम अपने आप से भी नज़र नहीं मिला पा रहे हैं !

इंसानियत को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसके लिए हम ख़ुद अपने गिरेबान में झांके ना कि पुलिस पे दोष मंढ कर हम हक़ीक़त से पल्ला झाड़लें ! समाज को ख़ुद सजग होना पडेगा , हमे अपने बच्चों, ख़ास तौर पे लड़कों को ऐसे संस्कार देने होंगे कि उनकी निगाह किसी महिला की तरफ़ जब भी उठे तो इज्ज़त ओ एहतराम के साथ उठे ! अपने इर्द-गिर्द ऐसी फ़िज़ां हमे बनानी होगी जिससे कि मनचलों का मन जब भी चले तो सही दिशा में चले !

भौतिकवादी इस दौर में हमलोग चाहते है कि हमारे बच्चे डाक्टर बने इंजिनीयर बने हम ये क्यूँ नहीं चाहते कि हमारी नस्ल कबीर बने , नानक बने , गौतम बने , भगत सिंह बने ,बोस बने ,अशफ़ाक़ बने ! इस दौरे-तरक्क़ी की सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि हम लोग अपने बच्चों का कैरियर बनाने में मसरूफ हैं ना कि किरदार बनाने में ! बच्चों को किरदार बनाने की तालीम ना तो स्कूल कॉलेज में दी जा रही है ना ही घरों में ऊपर से रही सही कसर टी.वी , मोबाईल , इंटरनेट ने पूरी कर दी है ! अपने आप को आधुनिक समझने और ज़माने से आगे निकलने के चस्के में हमे ख़बर ही नहीं है कि हमारे बच्ची क्या पढ़ रहें हैं और उन्हें क्या परोसा जा रहा है !

अपनी आबरू की कुर्बानी देकर दिल्ली गैंग रेप की शिकार इस बच्ची ने हमारे मृत पड़े ज़मीर को जीवित किया है , पूरा राष्ट्र आज एक स्वर में बोल रहा है ! हमारी सियासत कितनी संवेदनशील है हमने देख लिया , इंडिया गेट पर हुए जन आन्दोलन के दवाब के बिना अगर हुकूमत कोई कठोर क़दम उठाती तो बात कुछ और होती !

इतवार के रोज़ राजपथ पर ज़बरदस्त आन्दोलन हुआ , सरकार आवाम की भावनाओं का सम्मान नहीं कर पायी ,बड़ी बर्बरता के साथ लाठी-चार्ज हुआ ,कंपकंपाती ठण्ड में छात्र – छात्राओं पर पानी की बौछारें , यहाँ तक उम्रदराज़ महिलाओं पर भी लाठी-चार्ज किया गया ! इन सब के लिए भी आरोप दिल्ली पुलिस पर लगा दिया गया , एक चीज़ लोगों को समझनी चाहिए की पुलिस को भी कहीं से हुक्म मिलते है , पुलिस की अपनी मजबूरियां है , मैं सुरक्षा बल की उस कार्यवाही को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ पर मोब को नियंत्रण में करना उतना आसान नहीं है जितना बाहर से दिखता है ! प्रदर्शन-कारियों में कुछ सियासी रोटिया सेकने वाले भी घुस गए और हालात बिगड़ते गए कुछ ज़ियादती सुरक्षा बल से भी हुई ! इस पूरे प्रदर्शन में पुलिस ने भी अपना एक जवान सुभाष तोमर खो दिया !

पुलिस समाज से अलग नहीं है , एक पुलिस वाला भी एक भाई है, एक बाप है, एक बेटा है उसकी भी रगों में लाल रंग का ही खून दौड़ता है हाँ अगर कहीं कोई कमी है तो वो है हम में और पुलिस में आपसी एतबार की ! सबसे पहले पुलिस और समाज को ये एतबार बहाल करना होगा !

बहरहाल, इन तमाम बातों से हटकर मेरी एक गुज़ारिश है कि हम सब मिलकर ऐसा माहौल बनाए की इस तरह की घटनाएं मुस्तक़बिल में ना हों ..और पुलिस को हम अपने समाज का ही हिस्सा समझें ना कि कोई छूत की बिमारी ! हमारी पुलिस अपनी मेहनत और जांबाज़ी से जब कोई अछा काम करे तो हमे उसकी पीठ भी थप-थपानी चाहिए ना कि पूर्वा-ग्रहों से ग्रसित हो हम उसपे आरोप ही आरोप थौंपते रहें !

आख़िर में ईश्वर से यही प्रार्थना कि अभी तक बहादुरी के साथ मौत से जंग लड़ने वाली उस बच्ची को इतनी हिम्मत और हौसला दे ताकि वो पूरी तरह ठीक होकर अपनी आँखों से उन भेड़ियों का हश्र देख सके और हमारे मुंसिफ़ों की क़लम में ईश्वर वो ताक़त दे जिससे कि वे उन दरिंदों के हक़ में मौत से भी बदतर सज़ा लिख सकें !..आमीन

हाकिम हो गर मुल्क के , जल्द करो इन्साफ़ !

वरना तुमको बेटियाँ , नहीं करेंगी माफ़ !!

Vijendra.vijen@gmail.com 
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सत्यनारायण शर्मा 'कमल'
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  अभी  तक प्राप्त समाचारों से लगता है पुलिस वाले की मृत्यु हार्ट-फेल से हुई । जितनी चोटें आन्दोलनकारियों ने सहीं पुलिसवाले पर नहीं मिलीं । ऐसी अवस्था में आन्दोलनकारियों को दोष देना समझ में नहीं आता । पुलिस भी सच्चाई पर पर्दा डालने में पीछे नही। पुलिस ने लड़की के बयान उपजिलाधिकारी  द्वारा लेने पर भी हस्तक्षेप किया । 
सुप्रेअम कोर्ट का आदेश की गाड़ियों पर काली शीत न चढ़ाई जाय ऐसी प्राइवेट और बसें खुले आम सड़कों पर कैसे चल रही हैं ?
क्या ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस जिम्मेदार नहीं जबकि वह बस तीन तीन पुलिस पिकेटों से गुज़री । अब  पुलिस आला अफसर
आँख में धुल झोंकने का काम कर रहे हैं ।_________________

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