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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

गजल ये रात लगती लुटी लुटी सी मैत्रेयी अनुरूपा


गजल 

ये रात लगती लुटी लुटी सी 
मैत्रेयी अनुरूपा
*
ये चांदनी के उदास गेसू
ये रोशनी कुछ बुझी बुझी सी
ये
लड़खड़ाती खमोशियां हैं
ये रात लगती लुटी लुटी सी
 
जो
बाद मुद्दत के तेरे लब पे
है आई मंजूरियत मगर क्यों
मुझे है लगता कही है तुमने
बस इक इबारत रटी रटी सी
 
वो
इत्र भीगे रुमाल से भी
हसीन मुझको लगी है नेमत
जो तुमने लब से छुआ के फ़ैकी
वो एक धज्जी कटी फ़टी सी
 
ये
पेच नजरों मे बस गये हैं
उसी का शायद असर है ऐसा
जो सामने है मुजस्समे सी
वो शै भी लगती बँटी बँटी सी
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maitreyee anuroopa <maitreyi_anuroopa@yahoo.com>
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