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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अप्रैल १४, लघुकथा, गीत, दोहे, गीतिका, समानिका छंद, सवैया, कुण्डलिया, मुक्तक, सॉनेट लिली


सलिल सृजन अप्रैल १४
*
सॉनेट
लिली 
० 
लिली के लावण्य की जय 
मोह मन इठला रही है। 
नव युवा लालित्य की जय 
रूपसी मुस्का रही है।।
पर्ण कोमल दीर्घ चिकने  
हरितिमा में है निमज्जित। 
स्वप्न शत लगते विकसने 
चहुँमुखी पुष्पों सुसज्जित।। 
गुलाबी आभा अनोखी 
श्वेत छवि मन-ताप हरती। 
पीत रंजित बसंती भी 
रक्त वर्णी हँस विचरती। 
किशोरी खुद से लजाती   
चिरैया सी चहचहाती।। 
(शेक्सपीयरी शैली)
००० 
ग़ज़ल
दोस्ती की दास्तानें, गढ़ रहीं इतिहास हैं।
आम लगती हैं भले, ये सभी खासमखास हैं।।
.
नफरतें हैं चाहतें हैं, ठोकरें हैं कोशिशें
कशिश कम होती नहीं, मन में लिए हुलास हैं।।
.
मंजिलों से आशिकी की, गिने तारे रात भर।
सुबह को आँखें लगीं, जग उठ किए प्रयास हैं।।
.
अमावस के अँधेरे कब रोक पाए हैं कदम।
जले जुगनू की तरह मन में लिए उजास हैं।।
.
कदम छोटे ही सही, उठ बढ़े तो बढ़ते गए।
अब रुकेंगे औ' यहाँ, झूठे हुए कयास हैं।।
छंद शाला
दोहा - रोला - कुंडलिया
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, खुलें तो सृष्टि निहारें।
नयन मुँदें तो मनस-लोक का रूप विचारें।।
नयन बंद हों मित्र, स्वजन रहें दुख में लीन।
नयन तजें तन मिलें, देवियाँ-देवता तीन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विलोकें सारी दुनिया।
वृद्ध-युवा नर-नार, चपल मुन्ना अरु मुनिया।।
जीवन-मरण विधान, देखते सकें ना रोक।
एक लोक में वास, नयन में हैं तीन लोक।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विगत अब आगत देखें।
सकल सृष्टि व्यवहार, उचित अनुचित नित लेखें।।
भेदभाव से दूर, न अपने-गैर हों नयन।
सबसे रख सम भाव, तीन लोक चौदह भुवन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, शिवा-शिव मिलन कराएँ।
पुष्प वाटिका विचर, सिया से राम मिलाएँ।
राधा-कान्हा रास, नयन लखे हो तल्लीन।
जमुन लहर हो मग्न, बजा रहीं तालें तीन।।
१४.४.२०२६ 
०००
लघुकथा : कार्य शाला
इन्हें पढ़ें, मन में कोई प्रश्न हो तो पूछें या इन पर अपनी राय दें।
लघुकथाएँ
१. झूठी औरत : विष्णु नागर
"मैं तंग आ गयी हूँ इन बच्चों से। जान ले लूँगी इनकी।"
यह कहनेवाली माँ अभी-अभी अपने पति से झगड़ रही थी, "बिना बच्चों के अकेली कहीं नहीं जाऊँगी।" ३० शब्द
*
२.
क़ाज़ी का घर :
एक गरीब भूखा काज़ी के यहाँ गया, कहने लगा - 'मैं भूखा हूँ, कुछ मुझे दो तो मैं खाऊँ।'
काज़ी ने कहा - "यह काज़ी का घर है - कसम खा और चला जा।" ३१ शब्द
*
३.
कहूँ कहानी : रमेश बतरा
ऐ रफ़ीक़ भाई! सुनो। उत्पादन के सुख से भरपूर नींद की खुमारी लिए जब मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही - "एक लाजा था, वो बौत गलीब है।" ३१ शब्द
*
४.
एकलव्य : संजीव वर्मा 'सलिल'
दूरदर्शन पर नेताओं की बहस चल रही थी।
'बब्बा जी ! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था?'
"हाँ बेटा।"
'काश, वह आज भी होता।' पोते ने कहा। ३३ शब्द
*
५.
आज़ादी : खलील जिब्रान
वह मुझसे बोले - "किसी गुलाम को सोते देखो तो जगाओ मत; हो सकता है वह आज़ादी का सपना देख रहा हो।"
'अगर किसी गुलाम को सोते देखो तो उसे जगाओ और आज़ादी के बारे में बताओ। मैंने कहा।" ३८ शब्द
*
६.
मुँहतोड़ जवाब : भारतेन्दु हरिश्चंद्र
एक ने कहा - 'न जाने इसमें इतनी बुरी आदतें कहाँ से आईं? हमें यकीन है कि हमसे इसने कोई बुरी बातें नहीं सीखीं।'
लड़का सच से बोल उठा - "बहुत ठीक है क्योंकि हमने आपसे बुरी आदतें पाई होती तो आपमें बहुत सी काम हो जातीं।" ४५ शब्द
 ७ . 
एकलव्य : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  
- बब्बा! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था ?  
= हाँ ,  बेटा ! 
- काश वह आज भी होता?
दूरदर्शनी बहस से ऊबे पोते ने कहा।  २८ शब्द  
००० 
गीत
*
आओ! कुछ काम करें
वाम से इतर
लोक से जुड़े रहें
न मीत दूर हों
हाजमोला खा न भूख
लिखें सू़र हों
रेहड़ीवाले से करें
मोलभाव औ'
बारबालाओं पे लुटा
रुपै क्रूर क्यों?
मेहनत पैगाम करें
नाम से इतर
सार्थक भू धाम करें
वाम से इतर
खेतों में नहीं; जिम में
पसीना बहा रहे
पनहा न पिएँ कोक-
फैंटा; घर में ला रहे
चाट ठेले हँस रहे
रोती है अँगीठी
खेतों को राजमार्ग
निगलते ही जा रहे
जलजीरा पान करें
जाम से इतर
पनघटों का नाम करें
वाम से इतर
शहर में न लाज बिके
किसी गाँव की
क्रूज से रोटी न छिने
किसी नाव की
झोपड़ी उजाड़ दे न
सेठ की हवस
हो सके हत्या न नीम
तले छाँव की
सत्य का सम्मान करें
दाम से इतर
छोड़ खास, आम वरें
वाम से इतर
***
मानवता पर दोहे
*
मानवता के नाम पर, मजलिस बनी कलंक
शहर शहर को चुभ रहा, यह तबलीगी डंक
*
मानवता कह रही है, आज पुकार पुकार
एकाकी रहकर करो, कोरोना पर वार
*
मानवता लड़ रही है, अजब-अनूठी जंग
साधनहीनों की मदद, मानवता का रंग
*
मानवता के घाट पर, बैठे राम-रसूल
एक दूसरे की मदद, करें न लड़ते भूल
*
मानवता के बन गए, तबलीगी गद्दार
रहम न कर सख्ती करे, जेल भेज सरकार
*
मानवता लिख रही है, एक नया अध्याय
कोरोना से जीतकर, बनें ईश पर्याय
*
मानवता को बचाते, डॉक्टर पुलिस शहीद
मिल श्रद्धांजलि दें करें, अर्पित होली ईद
***
गीतिका 
*
जब बसंत हो, मुदित रहें राधे माधव
सुनें सभी की, कहें कभी राधे माधव
हीरा-लाल सदृश जोड़ी मनबसिया की
नारीभूषण पुरुषोत्तम राधे माधव
अमर स्नेह अमरेंद्र मिले हैं वसुधा पर
अमरावति बृज बना रहे राधे माधव
प्रभा किशोरी की; आलोक कन्हैया का
श्री श्रीधर द्वय मुकुलित मन राधे माधव
नत नारीश पगों में नरपति मुस्काते
अद्भुत मनोविनोद करें राधे माधव
***
विनय
हम भक्तों की पीर हरें राधे माधव
हम निज मन में धीर धरें राधे माधव
तबलीगी मजलिस जमात से दूर रहें
मुस्लिम भाई यही करें राधे माधव
समझदार मिल मुख्य धार में आ जाएँ
समय कहे सद्भाव वरें राधे माधव
बने रहे धर्मांध अगर वे तो तय है
बिन मारे खुद मार मरें राधे माधव
मरने का मकसद हो पाक जरूरी है
परहित कर मर; क्यों न तरें राधे माधव
लगा अकल पर ताला अल्ला ताला क्यों?
गलती मान खुदी सुधरें राधे माधव
१४-४-२०२०
***
एक गीत
*
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
इस-उस दल के यदि प्यादे हो
जिस-तिस नेता के वादे हो
पंडे की हो लिए पालकी
या झंडे सिर पर लादे हो
जाति-धर्म के दीवाने हो
या दल पर हो निज दिल हारे
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
आम आदमी से क्या लेना?
जी लेगा खा चना-चबेना
तुम अरबों के करो घोटाले
स्वार्थ नदी में नैया खेना
मंदिर-मस्जिद पर लड़वाकर
क्षेत्रवाद पर लड़ा-भिड़ा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
जा विपक्ष में रोको संसद
सत्ता पा बन जाओ अंगद०
भाषा की मर्यादा भूलो
निज हित हेतु तोड़ दो हर हद
जोड़-तोड़ बढ़ाकर भत्ते
बढ़ा टैक्स फिर गला दबा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
१४-४-२०१९
***
समय साक्षी गीत:
तुमने स्वर दे दिया
*
१.
तुमने स्वर दे दिया
चीखें, रोएँ, सिसकी भर ये,
वे गुर्राते हैं दहाड़कर।
चिंघाड़े कोई इस बाजू
फुफकारे कोई गुहारकर।
हाय रे! अमन-चैन ले लिया
तुमने स्वर दे दिया
*
२.
तुमने स्वर दे दिया
यह नेता बेहद धाँसू है
ठठा रहा देकर आँसू है
हँसता पीड़ित को लताड़कर।
तृप्त न होता फिर भी दानव
चाकर पुलिस लुकाती है शव
जाँच रपट देती सुधारकर।
न हो योगी को दर्द मिया
तुमने स्वर दे दिया
*
३.
तुमने स्वर दे दिया
वादा कह जुमला बतलाया
हो विपक्ष यह तनिक न भाया
रख देंगे सबको उजाड़कर।
सरहद पर सर हद से ज्यादा
कटें, न नेता-अफसर-सुत पर
हम बैठे हैं चुप निहारकर।
छप्पन इंची छाती है, न हिया
तुमने स्वर दे दिया
*
४.
तुमने स्वर दे दिया
खाला का घर है, घुस आओ
खूब पलीता यहाँ लगाओ
जनता को कूटो उभाड़कर।
अरबों-खरबों के घपले कर
मौज करो जाकर विदेश में
लड़ चुनाव लें, सच बिसारकर।
तीन-पाँच दो दूनी सदा किया
तुमने स्वर दे दिया
*
तुमने स्वर दे दिया
तोड़ तानपूरा फेंकेंगे
तबले पर रोटी सेकेंगे
संविधान बाँचें प्रहारकर।
सूरत नहीं सुधारेंगे हम
मूरत तोड़ बिगाड़ेंगे हम
मार-पीट, रोएँ गुहारकर
फर्जी हो प्यादे ने शोर किया
तुमने स्वर दे दिया
१४.४.२०१८
(टीप: जांच एजेंसियाँ ध्यान दें कि इस रचना का भारत से कुछ लेना-देना नहीं है।
***
नवलेखन कार्यशाला
*
आ. गुरूजी
एक प्रयास किया है । कृपया मार्गदर्शन दें । सादर ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे वरदान दो
सद्बुद्धि दो संग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हों
अच्छे बुरे की पहचान दो ।
वाणी मधुर रसवान दो
मैं मैं का न गुणगान हों
बच्चे अभी नादान हम
निर्मल एक मुस्कान दो
न जाने कि हम कौन हैं
हमें अपनी पहचान दो
अल्प ज्ञानी मानो हमें
बस चरण में तुम स्थान दो ।।
कल्पना भट्ट
*
प्रिय कल्पना!
सदा खुश रहें।
मधुमालती १४-१४ के दो चरण, ७-७ पर यति, पदांत २१२ ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे! वरदान दो
सदबुद्धि दो, सँग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हो
शुभ-अशुभ की पहचान दो।
वाणी मधुर रसवान दो
'मैं' का नहीं गुण गान हो
बच्चे अभी नादान हैं
निर्मल मधुर मुस्कान दो
किसको पता हम कौन हैं
अपनी हमें पहचान दो
हम अल्प ज्ञानी माँ! हमें
निज चरण में तुम स्थान दो ।।
१४-४-२०१७
***
छंद बहर का मूल है: २
*
छंद परिचय:
ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद।
सप्तवार्णिक उष्णिक जातीय समानिका छंद।
संरचना: SIS ISI S
सूत्र: रगण जगण गुरु / रजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं ।
*
सूर्य आप भी बने
*
सत्य को न मारना
झूठ से न हारना
गैर को न पूजना
दीन से न भागना
बात आत्म की सुनें
सूर्य आप भी बने
*
काम काम से रखें
राम-राम भी भजें
डूब राग-रंग में
धर्म-कर्म ना तजें
शुभ विचार कर गुनें
सूर्य आप भी बने
*
देव दैत्य आप हैं
पुण्य-पाप आप हैं
आप ही बुरे-भले
आप ही उगे-ढले
साक्ष्य भाव से जियें
सूर्य आप भी बने
१४.४.२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २५ : १४-०४-२०१६
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
सरस सवैया रच पढ़ें
गण की आवृत्ति सात हों, दो गुरु रहें पदांत।
सरस सवैया नित पढो, 'सलिल' न तनिक रसांत।।
बाइस से छब्बीस वर्णों के (सामान्य वृत्तो से बड़े और दंडक छंदों से छोटे) छंदों को सवैया कहा जाता है। सवैया वार्णिक छंद हैं। विविध गणों में से किसी एक गण की सात बार आवृत्तियाँ तथा अंत में दो दीर्घ अक्षरों का प्रयोग कर सवैये की रचना की जाती है। यह एक वर्णिक छन्द है। सवैया को वार्णिक मुक्तक अर्थात वर्ण संख्या के आधार पर रचित मुक्तक भी कहा जाता है। इसका कारन यह है की सवैया में गुरु को लघु पढ़ने की छूट है। जानकी नाथ सिंह ने अपने शोध निबन्ध 'द कंट्रीब्युशन ऑफ़ हिंदी पोयेट्स टु प्राजोडी के चौथे अध्याय में सवैया को वार्णिक सम वृत्त मानने का कारण हिंदी में लय में गाते समय 'गुरु' का 'लघु' की तरह उच्चारण किये जाने की प्रवृत्ति को बताया है। हिंदी में 'ए' के लघु उच्चारण हेतु कोई वर्ण या संकेत चिन्ह नहीं है। रीति काल और भक्ति काल में कवित्त और सवैया बहुत लोकप्रिय रहे हैं. कवितावलि में तुलसी ने इन्हीं दो छंदों का अधिक प्रयोग किया है। कवित्त की ही तरह सवैया भी लय-आधारित छंद है।
विविध गणों के प्रयोग के आधार पर इस छन्द के कई प्रकार (भेद) हैं। यगण, तगण तथा रगण पर आधारित सवैये की गति धीमी होती है जबकि भगण, जगण तथा सगण पर आधारित सवैया तेज गति युक्त होता है। ले के साथ कथ्य के भावपूर्ण शब्द-चित्र अंकित होते हैं। श्रृंगार तथा भक्ति परक वर्ण में विभव, अनुभव, आलंबन, उद्दीपन, संचारी भाव, नायक-नायिका भेद आदि के शब्द-चित्रण में तुलसी, रसखान, घनानंद, आलम आदि ने भावोद्वेग की उत्तम अभिव्यक्ति के लिए सवैया को ही उपयुक्त पाया। भूषण ने वीर रस के लिए सवैये का प्रयोग किया किन्तु वह अपेक्षाकृत फीका रहा।
प्रकार-
सवैया के मुख्य १४ प्रकार हैं।
१. मदिरा, २. मत्तगयन्द, ३. सुमुखि, ४. दुर्मिल, ५. किरीट, ६. गंगोदक, ७. मुक्तहरा, ८. वाम, ९. अरसात, १०. सुन्दरी, ११. अरविन्द, १२. मानिनी, १३. महाभुजंगप्रयात, १४. सुखी सवैया।
मत्तगयंद (मालती) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरण होते हैं। हर चरण में सात भगण (S I I) के पश्चात् अंत में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं।
उदाहरण:
१.
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैंसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत-खात फिरें अँगना, पग पैंजनिया, कटी पीरि कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ली गयो माखन-रोटी।।
२.
यौवन रूप त्रिया तन गोधन, भोग विनश्वर है जग भाई।
ज्यों चपला चमके नभ में, जिमि मंदर देखत जात बिलाई।।
देव खगादि नरेन्द्र हरी मरते न बचावत कोई सहाई।
ज्यों मृग को हरि दौड़ दले, वन-रक्षक ताहि न कोई लखाई।।
३.
मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गले पहिरौंगी।
ओढ़ी पीताम्बर लै लकुटी, वन गोधन गजधन संग फिरौंगी।।
भाव तो याहि कहो रसखान जो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
दुर्मिल (चन्द्रकला) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरणों में से प्रत्येक में आठ सगण (I I S) और अंत में दो गुरु मिलाकर कुल २५ वर्ण होते हैं.
उदाहरण:
बरसा-बरसा कर प्रेम सुधा, वसुधा न सँवार सकी जिनको।
तरसा-तरसा कर वारि पिता, सु-रसा न सुधार सकी जिनको।।
सविता-कर सी कविता छवि ले, जनता न पुकार सकी जिनको।
नव तार सितार बजा करके, नरता न दुलार सकी जिनको।।
उपजाति सवैया (जिसमें दो भिन्न सवैया एक साथ प्रयुक्त हुए हों) तुलसी की देन है। सर्वप्रथम तुलसी ने 'कवितावली' में तथा बाद में रसखान व केशवदास ने इसका प्रयोग किया।
मत्तगयन्द - सुन्दरी
प्रथम पद मत्तगयन्द (७ भगण + २ गुरु) - "या लटुकी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुरको तजि डारौ"। तीसरा पद सुन्दरी (७ सगन + १ गुरु) - "रसखानि कबों इन आँखिनते, ब्रजके बन बाग़ तड़ाग निहारौ"।
मदिरा - दुर्मिल
तुलसी ने एक पद मदिरा का रखकर शेष दुर्मिल के पद रखे हैं। केशव ने भी इसका अनुसरण किया है। पहला मदिरा का पद (७ भगण + एक गुरु) - "ठाढ़े हैं नौ द्रम डार गहे, धनु काँधे धरे कर सायक लै"। दूसरा दुर्मिल का पद (८ सगण) - "बिकटी भृकुटी बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छवि है"।
मत्तगयन्द-वाम और वाम-सुन्दरी की उपजातियाँ तुलसी (कवितावली) में तथा केशव (रसिकप्रिया) में सुप्राप्य है। कवियों ने भाव-चित्रण में अधिक सौन्दर्य तथा चमत्कार उत्पन्न करने हेतु ऐसे प्रयोग किये हैं।
आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, लक्ष्मण सिंह, नाथूराम शंकर आदि ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है। जगदीश गुप्त ने इस छन्द में आधुनिक लक्षणा शक्ति का समावेश किया है।
१४-४-२०१६
***
एक दोहा
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक शुभ उपहार
***
मुक्तक :
आपने आपको साथ में लेकर आपके साथ ही घात किया है
एक बनेंगे नेक बनेंगे वादा भुला अपराध किया है
मौक़ा न चूकें, न फिर पायेंगे, काम करें मिल-बाँट सभी जन
अन्ना के सँग बैठ मिटा मतभेद न क्यों मन एक किया है?
***
हिंदू देवी-देवता : ३३ कोटि (प्रकार)
१२ आदित्य(धाता, मित, आर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था, विष्णु)
८ वसु (धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभाष)
११ रूद्र (हर, बहुरूप, त्रयंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शंभु, कपार्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्वा, कपाली)
२ अश्विनी-कुमार
१४.४.२०१५
***
मुक्तक सलिला:
बोल जब भी जबान से निकले,
पान ज्यों पानदान से निकले।
कान में घोल दे गुलकंद 'सलिल-
ज्यों उजाला विहान से निकले।।
*
जो मिला उससे है संतोष नहीं,
छोड़ता है कुबेर कोष नहीं।
नाग पी दूध ज़हर देता है-
यही फितरत है, कहीं दोष नहीं।।
*
बाग़ पुष्पा है, महकती क्यारी,
गंध में गंध घुल रही न्यारी।
मन्त्र पढ़ते हैं भ्रमर पंडित जी-
तितलियाँ ला रही हैं अग्यारी।।
*
आज प्रियदर्शी बना है अम्बर,
शिव लपेटे हैं नाग- बाघम्बर।
नेह की भेंट आप लाई हैं-
चुप उमा छोड़ सकल आडम्बर।।
*
ये प्रभाकर ही योगराज रहा,
स्नेह-सलिला के साथ मौन बहा।
ऊषा-संध्या के साथ रास रचा-
हाथ रजनी का खुले-आम गहा।।
*
करी कल्पना सत्य हो रही,
कालिख कपड़े श्वेत धो रही।
कांति न कांता के चहरे पर-
कलिका पथ में शूल बो रही।।
१८-४-२०१४
***

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

अप्रैल १६, लक्ष्मी, कुण्डलिया, सारंग, वास्तु, दोहा-जनक छंद, भक्ति गीत, कुंडल छंद, लिली

सलिल सृजन अप्रैल १६
*

पूर्णिका 
बगिया में लिली 
आँगन में लली 
बढ़ाती शोभा 
नाज़ों से पली 
लाड़ पाए-दे 
मिसरी की डली 
.
उदास हो लगे 
विकल साँझ ढली 
रखो दूर शूल 
है कोमल कली
न रुचे बुराई
भोली अरु भली
मेहनत न व्यर्थ 
नेक नियत फली
 १६.४.२०२५ 
००० 
बेला कहि रह्यौ बेला भई रे जे साजन के आवन की।
फगुनाई में महक रह्यो मन जैसे ऋतु हो सावन की।।
नैन बोल रए निशा निमंत्रण पायो साँसें धन्न भईँ-
मिल आँखोँ से आँख बसा रईँ मन में छब मनभावन की।।
१६.४.२०२५ 
मुक्तक
आमंत्रण या आवश्यकता अगर नहीं तो चुप ही रहिए।
सीख सीखिए, मत सिखाइए, नहीं सहारा नाहक गहिए।।
बिन माँगे सलाह बेमानी, कोई उस पर गौर न करता-
हो संजीव जीव सब लखिए, जो हो श्रेष्ठ उसी को तहिए।।
***
विमर्श :
हिंदी धर्म में कन्या को लक्ष्मी कहा जाता है तो कन्यादान क्यों किया जाता है?
कुण्डलिया
सुता लक्ष्मी सत्य है, करिए उसका दान।
नहीं किया तो टैक्स भर, हो जाएँ हैरान।।
हो जाएँ, हैरान, लगे जी एस टी भारी।
वैल्थ टैक्स दे लगे, भार कन्या बेचारी।।
सौंप और को भार, हुआ बेफिक्र हर पिता।
शीघ्र खोज दामाद, सौंपिए योग्य को सुता।
चंचल होती लक्ष्मी, बंधन देती तोड़।
जहाँ न हो उपयोग वह, घर देती है छोड़।।
घर देती है छोड़, बेहतर विदा कीजिए।
साँस चैन की आप, बैठ मौन हो आप लीजिए।।
गृह-लक्ष्मी बेचैन, पल-पल नाथ रखे विकल।
रह प्रसन्न दिन-रैन, लक्ष्मी हो जाती अचल।।
१६-४-२०२३
***
जीवन में अनमोल क्या है?
कुण्डलिया
जीवन में अनमोल है, आती-जाती श्वास।
रंग श्वास में भर रही, मन में पलती आस।।
मन में पलती आस, सास साली अरु सलहज।
अगर न हों तो, करें किस तरह श्वसुरालय हज।।
कहता कवि संजीव, पत्नि बिन सकल सृष्टि वन।
खटिया करती खड़ी, मगर संजीवित जीवन।।
१६-४-२०२३
***
गीत:
जीवन के ढाई आखर को
*
बीती उमर नहीं पढ़ पाए, जीवन के ढाई आखर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
रूप-रंग, रस-गंध चाहकर, खुदको समझे बहुत सयाना
समझ न पाये माया-ममता, मोहे मन को करे दिवाना
कंकर-पत्थर जोड़ बनाई मस्जिद, जिसे टेर हम हारे-
मन मंदिर में रहा विराजा, मिला न लेकिन हमें ठिकाना
निराकार को लाख दिये आकार न छवि उसकी गढ़ पाये-
नयन मुँदे मुस्काते पाया चित्रगुप्त को, नटनागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
श्लोक-ऋचाएँ, मंत्र-प्रार्थना, प्रेयर सबद अजान न सुनता
भजन-कीर्तन,गीत-ग़ज़ल रच, मन अनगिनती सपने बुनता
पूजा-अनुष्ठान, मठ-महलों में रहना कब उसको भाया-
मेवे छोड़ पंजीरी फाँके, देख पुजारी निज सर धुनता
खाए जूठे बेर, चुराए माखन, रागी परम विरागी
एक बूँद पा तृप्त हुआ पर है अतृप्त पीकर सागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
अर्थ खोज-संचित कर हमने, बस अनर्थ ही सदा किया है
अमृत की कर चाह गरल का, घूँट पिलाया सतत पिया है
लूट तिजोरी दान टके का कर खुद को पुण्यात्मा माना-
विस्मित वह पाखंड देखकर मनुज हुआ पाषाण-हिया है
कैकट्स उपजाये आँगन में, अब तुलसी पूजन हो कैसे?
देश निकाला दिया हमीं ने चौपालों पनघट गागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
१६-४-२०२१
...
पुस्तक सलिला
'सही के हीरो' साधारण लोगों की असाधारणता की मार्मिक कहानियाँ
*
[पुस्तक विवरण- सही के हीरो, कहानी संग्रह, ISBN 9789385524400, डॉ. अव्यक्त अग्रवाल, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण पेपर बैंक बहुरंगी, कहानीकार संपर्क- डी ७ जसूजा सिटी, जबलपुर ४८२००३]
*
मनुष्य में अनुभव किये हुए को कहने की अदम्य इच्छा वाक् क्षमता के रूप में विकसित हुई। अस्पष्ट स्फुट ध्वनियाँ क्रमशः सार्थक संवादों के रूप में आईं तो लयबद्ध कहन कविता के रूप में और क्रमबद्ध कथन कहानी के रूप में विकसित हुए। कहानी, कथा, किस्सा, गल्प, गप्प और चुटकुले विषयवस्तु के आकार और कथ्य के अनुरूप प्रकाश में आये। गद्य में निबन्ध, संस्मरण, यात्रावृत्त, व्यंग्य लेख, आत्मकथा, समीक्षा आदि विधाओं का विकास होने के बाद भी कहानी की लोकप्रियता सर्वकालों में सर्वाधिक थी, है और रहेगी। कहानी वह जो कही जाए, अर्थात उसमें कहे जाने और सुने जाने योग्य तत्व हों। वर्तमान पूँजीवादी राजनीति-प्रधान व्यक्तिपरक जीवन शैली में साहित्य संसाधनों और पहुँच के सफे पर हाशिये में रखे जा रहे जीवट और संघर्ष को पुनर्जीवन दे रहा है।
स्वतंत्रता के पश्चात अहिंसा की माला जपते दल विशेष ने सत्ता पर और हिंसा पर भरोसा करनेवाले अन्य दल विशेष ने शिक्षा संस्थानों और साहित्यिक अकादमियों पर कब्ज़ा कर साहित्यिक विधाओं में वैषम्य और विसंगतियों के अतिरेकी चित्रण को सामने लाकर सामाजिक संघर्ष को तेज करनेवाले साहित्य और साहित्यकारों को पुरस्कृत किया। फलतः, आम आदमी के नाम पर स्त्री-पुरुष, संपन्न-विपन्न, नेता-जनता, श्रमिक-उद्योगपति, छात्र-शिक्षक, हिन्दू-मुस्लिम आदि के नाम पर टकराव ने सद्भाव, सहयोग, सहकार, विश्वास, निष्ठा आदि को अप्रासंगिक बनने का काम किया। इस पृष्ठभूमि में अत्यन्त अल्प संसाधनों और पिछड़े क्षेत्र से संघर्ष कर स्वयं को विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में स्थापित कर, अपने मरीजों के इलाज के साथ-साथ उनके जीवन-संघर्ष को पहचान कर मानसिक संबल देनेवाले डॉ. अव्यक्त अग्रवाल ने निर्बल का बल बनने के अपने महाभियान में विवेच्य कहानी संग्रह के माध्यम से पाठकों को भी सहभागी बनने का अवसर दिया है।
इस कहानी संग्रह के अधिकांश पात्र निम्न जीवन स्तर और विपन्नता की मेंड़ पर लगातार चुभ रहे काँटों के बीच पैर रखते हुए आगे बढ़ते हैं। नियति ने भले ही इन्हें मरने के लिए पैदा किया हो पर अपनी जिजीविषा के सहारे ये मौत के अनुकूल परिस्थितियों से जूझकर जीवन का राजमार्ग तलाश पाते हैं। साहित्य के प्रभाव, उपयोगिता और पठनीयता पर प्रश्न उठानेवाले इस संग्रह को पढ़ें तो उनके जीवन की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता का वरण कर सकेगी। परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँसकर लहूलुहान होते हुए भी ऊपर उठने और आगे बढ़ने को प्रेरित करते इस कथा-संग्रह में कथाकार शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता है। कहानी के पात्र पारिस्थितिक वैषम्य और विसंगति के हलाहल को कंठ में धारकर अपने सपने पूरे होते देखने का अमृत पान करते हुए कहीं काल्पनिक प्रतीत नहीं होते। ये कहानियाँ वास्तव में कल से प्राप्त विरासत को आज सँवार-सुधार कर कल को उज्जवल थाती देने का सारस्वत अनुष्ठान हैं।
'सही के हीरो' शीर्षक और मुखपृष्ठ पर अंकित देबाशीष साहा द्वारा निर्मित चित्र ही यह बता देता कि आम आदमियों के बीच में से उभरते हुए चरित नायक अपनी भाषा, भूषा, सोच और संघर्ष के साथ पाठक से रू-ब-रू होंगे। मर्मस्पर्शी कहानियाँ तथा प्रेरक कहानियाँ और संस्मरण दो भागों में क्रमशः १० + १८ कुल २८ हैं। संस्मरणात्मक कहानियाँ, पाठक को देखकर भी अनदेखे किये जाते पलों और व्यक्तियों से आँखें मिलाने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं। पात्रों और परिवेश के अनुकूल शब्द-चयन और वाक्य-संरचना कथानक को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। अंतर्जाल पर सर्वाधिक बिकनेवाले संग्रहों में सम्मिलित इस कृति की प्रथम कहानी 'लाइफगार्ड' के नायक एक बेसहारा बच्चे विक्टर को फ्रांसिस पालता है, युवा विक्टर अन्य बेसहारा बच्चे एडम को अपना लेता है और उसे विमाता से बचाने के लिए अपनी प्रेमिका से विवाह करने से कतराता है। डूबते फ्रांसिस को बचाते हुए मौत के कगार पर पहुँचे विक्टर की चिकित्सा अवधि के मध्य विक्टर की प्राणरक्षा की दुआ माँगते एडम और मारिया एक दूसरे के इतने निकट आ जाते हैं कि नन्हा एडम विक्टर से मारिया मम्मी की माँग कर उसे नया जीवन देता है।
कहानी 'चने के दाने' एक न हो सके किशोर प्रेमियों के पुनर्मिलन की मर्मस्पर्शी गाथा है। कठोर ह्रदय पाठकों की भी ऑंखें नम कर सकने में समर्थ 'आधी परी' तथाकथित समझदारों द्वारा स्नेह-प्रेम की आड़ में अल्पविकसित का शोषण करने पर आधारित है। तरुणी प्रीति के बहाने जीवनसाथी चुनते समय स्वस्थ्य - समझ का संदेश देती है 'पासवर्ड' कहानी। 'एक अलग प्रेम कहानी' साधनहीन ग्रामीण दंपति के एकांतिक प्रेम के समान्तर चिकित्सक-रोगी के बीच महीन विश्वास तन्तु के टूटने तथा बढ़ते व्यवसायीकरण को इंगित करती व्यथा-कथा है। पारिवारिक रिश्तों के बिखरने पर केंद्रित चलचित्र 'बावर्ची' में नायक घरेलू नौकर बनकर परिवार के सदस्यों के बीच मरते स्नेह बंधन को जीवित करता है। कहानी जादूगर में नायिका के कैशोर्य काल का प्रेमी जो अब मनोचिकित्सक है, नायिका में उसके पति के प्रति घटते प्रेम को पुनर्जीवित करता है। 'बहुरुपिया' में साधनहीन भाई-बहिन का निर्मल प्रेम, 'आइसक्रीम कैंडी' में राजनेताओं के कारण आहत होते आमजन, 'ज़िंदगी एक स्टेशन' में बदलते सामाजिक ढाँचे के कारण स्थापित व्यवसायों के अलाभप्रद होने की समस्या और समाधान तथा 'मेरा चैंपियन' में पिता के सपने को पूरा करते पुत्र की कहानी है।
दूसरे भाग में 'सही का हीरो' एक साधनहीन किन्तु अपने सपने साकार करने के प्रति आत्मविश्वास से भरे बच्चे की कथा है। 'गूगल' किसी घटना को देखने के दो भिन्न दृष्टिकोण, 'मैं ठीक हूँ' मौत के मुख से लौटी नन्हीं बच्ची द्वारा जीवन की हर साँस का आनंद लेने की सीख, 'दुश्वारियाँ एक अवसर' अपंग बच्चे के संकल्प और सफलता, 'सफलता मंत्र' जीवन का आनंद लेने, 'मेरी पचमढ़ी और मैं' संस्मरण, 'आसान है' में सच को स्वीकार कर औरों को ख़ुशी देने, 'उमैया एक तमाशा' विपन्न बच्चों में छिपी प्रतिभा, 'एक और सुबह' बचपन की यादों, 'फाँस' जीवनानंद की खोज, 'लोकप्रियता का रहस्य' अपनी क्षमताओं की पहचान, 'वो अधूरी कहानी' जीवन के उद्देश्य की पहचान, 'सफलता सबसे शक्तिशाली मंत्र ' निज सामर्थ्य से साक्षात्, 'स्वतः प्रेरणा' मन की आवाज़ सुनने, 'हम सब रौशनी पुंज' निराशा में आशा, 'हवा का झौंका समीर' में बेसहारा बच्चों के लालन-पालन तथा 'ज़िन्दगी एक चैस बोर्ड' में अपने उद्देश्य की तलाश को केंद्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना गया है।
'सही का हीरो' कहानी संग्रह की विशेषता इसमें साधारणता का होना है। अधिकांश कहानियाँ जीवन में घटी वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं। यथार्थ को कल्पना का आवरण पहनाते समय यह ध्यान रखा गया है कि मूल घटना और पात्रों की विश्वसनीयता, उपयोगिता और सन्देशवाहकता बनी रहे। अधिकांश घटनाएँ और पात्र पाठक के इर्द-गिर्द से ही उठाये गए हैं किन्तु उन्हें देखने की दृष्टि, उनके मूल्याङ्कन का नज़रिया और उसने सीख लेने का हौसला बिलकुल नया है। इन कहानियों में अभाव-उपेक्षा, टकराव-बिखराव, सपने-नपने, गिराव-उठाव, निराशा-आशा, अवनति-उन्नति, विफलता-सफलता, नासमझी और समझदारी अर्थात जीवन रूपी इंद्रधनुष का हर रंग अपनी चमक और चटख के साथ उपस्थित है। नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय, पाठक को लड़ने, बदलने और जीतने का सन्देश देती है। शिल्प की दृष्टि से ये रचनाएँ कहानी, लघुकथा, संस्मरण, शब्द चित्र आदि विधाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
डॉ. अव्यक्त अग्रवाल की भाषा सहज, सरस, सुगम, विषय, पात्र और परिवेश के अनुकूल है। किसी पहाड़ी से नि:सृत निर्झर की तरह अनगढ़पने में देने की आकुलता, नया ग्रहण करने की आतुरता और सबको अपना लेने की उत्सुकता पात्रों को जीवंत और प्रेरणादायी बनाती है। अव्यक्त जी खुद घटना को व्यक्त नहीं करते, वे पात्र या घटना को सामने आने देते हैं। कम से कम में अधिक से अधिक कहने का कौशल सहज नहीं होता किन्तु अव्यक्त जी इसे कुशलतापूर्वक साध सके हैं। वे पात्र के मुँह में शब्द ठूँसने या कहलाने का कोई प्रयास नहीं करते। उनके पात्र न तो भदेसी होने का दिखावा करते हैं, न सुसंस्कृत होने का पाखण्ड। कथ्य संक्षिप्त - गठा हुआ, संवाद सारगर्भित, भाषा शैली सहज - प्रचलित, शब्द चयन सम्यक - उपयुक्त, मुहावरों का यथोचित प्रयोग, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन के अनुसार प्रयोग पाठक को बाँधता है। इस उद्देश्यपूर्ण कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्य में शुमार होना आश्वस्त करता है कि हिंदी तथा साहित्य के प्रेमी पाठकों का अभाव नहीं है। सही के हीरो' ही देश और समाज का गौरव बढ़ाकर मानवता को परिपुष्ट करते हैं। अव्यक्त जी को इस कृति हेतु
बधाई
। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
------
दोहा सलिला
*
अरुणचूर दे रहा है, अरुण देखकर बाँग
जो सोये वे कह रहे, व्यर्थ अड़ाता टाँग
*
कन्याएँ धरना धरे, पूर्ण कीजिए माँग
क्वाँरे झट सिंदूर ले, पहुँचे भरने माँग
*
वह बोली यह टाँग दे, वह भागा हो भीत
टाँग न दूँ मैं तो कभी, कैसी है यह रीत
१६-४-२०२०
***
दोहा रत्न :
दोहे का वैशिष्ट्य है उक्ति वैचित्र्य और अर्थ गांभीर्य। इस दोहे में लक्ष्मी की कृपा अनवरत बनी रहे, इस भाव को असाधारण ढंग से कहा गया है। ऐसे दोहों को समझ पाना सबके बस की बात नहीं है।
अम्बुज अरि पति ता सुता ता पति उर को हार।
ता अरि पति कि भामिनी आई बसै यही द्वार।।
अर्थ "पान (ताम्बूल) के शत्रु हिम (बर्फ) के स्वामी हिमालय की पुत्री पार्वती के पति भगवान शंकर के हार नाग (सर्प) के शत्रु गरुण के स्वामी भगवान विष्णु की भार्या लक्ष्मी मेरे द्वार पर सदैव विराजमान रहें।"
शब्दों के अर्थ -
सारंग -पान, हिन्दी में इसके अनेकानेक अर्थ होते हैं।
सारंग अरि - हिम, बर्फ
सारंग अरिपति - हिमालय
सारंग अरिपति ता सुता - पार्वती
सारंग अरिपति ता सुता ता पति -शंकर
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार -नाग, सर्प
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरि -गरुण
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरिपति -विष्णु
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरिपति की भामिनी -लक्ष्मी
***
वास्तु विमर्श
*
पूर्व, पूर्वोत्तर व उत्तर दिशा में भगवान का चित्र स्थापित कर, उसकी ओर मुँह कर पूजन करें।
पूर्व सूर्य भगवान के प्रागट्य की दिशा है।
उत्तर में दिशादर्शक ध्रुवतारा है।
एक दिन में पथ प्रदर्शन करता है दूसरा रात में राह दिखाता है। दोनों के मध्य ईशान दिशा को ईश का स्थान मानता है वास्तुशास्त्र।
यह विग्यान सम्मत भी है। सूर्य प्रकाश और ऊर्जा के अक्षय स्रोत हैं। वे जीवनदाता हैं। सूर्य किरणें प्रकाश देती हैं, विषाणुओं को नष्ट करती हैं, विटामिन डी देती हैं, आतिशी शीशे का प्रयोग कर इनसे आग सुलगाई जा सकती है।
विश्व के प्रतापी राजवंश खुद को सूर्यवंशी कहते रहे हैं।
'भा' धातु का अर्थ प्रकाशित करना है इसलिए सूर्य भास्कर और हमारा देश 'भारत' है। हमें इंडिया नहीं होना है।
सूर्योपासना कुष्ठ रोग निवारक बताई गई है।
वास्तु के अनुसार आवास में सूर्य प्रकाश आना आवश्यक है। यदि न आता हो तो यथासंभव रोज या सप्ताह में एक दिन धूप में कुछ घंटे बिताएँ। पश्चिमी देशों में लोग समुद्र तट पर जाकर 'सन बाथ' लेते हैं अर्थात नयूनतम वस्त्रों में देह को सूर्य प्रकाश ग्रहण कराते हैं। यह फैशन या निर्लज्जता नहीं, प्राकृतिक चिकित्सा है। हमारे गाँवों में पनघट, नदी, तालाब या कुएँ पर स्नान करने की परंपरा इसीलिए है कि शुद्ध प्राणवायु और सूर्यप्रकाश का मणिकांचन संयोग हो सके।
कुंभादि पर्वों पर अगणित मनुष्यों के स्नान के समय सूर्य किरणें विषाणु नष्ट करती रहती हैं। वर्तमान कोरोना संकट का विकरालतम रूप वहीं है जहाँ सूर्य देव की कृपा कम है। हम रोज सवेरे सूर्योदय के समय उन्हें प्रणाम कर दीर्घ - निरोगी तथा कर्मप्रधान जीवन की कामना करें। सूर्य स्वानुशासन, कर्मठता, नियमितता तथा निष्काम कर्म के जीवंत प्रतीक हैं।
*
नव प्रयोग
दोहा-जनक छंद
*
विधि-विधान से कार्य कर, ब्रह्मा रहें प्रसन्न
याद रखें गुरु-सीख तो, विपद् न हो आसन्न
बात मीठी ही कहिए
मुकुल मन हँसते रहिए
स्नेह सलिला सम बहिए
*
मुक्तक
*
पंडित को पेट हेतु राम की जरूरत है
मंदिर को छत हेतु खाम की जरूरत है
सीता को दंडित कर राजदंड ठठा रहा
काल कहे नाश परिणाम की जरूरत है
*
रोजी और रोटी ही अवाम की जरूरत है
हाथों को भीख नहीं काम की जरूरत है
स्वाति सलिल मोतियों के ढेर लगा देंगे पर
मोल लेने के लिए दाम की जरूरत है
*
शीत कहे सूर्य तपो घाम की जरूरत है
जेठ कहे अब न तपो शाम की जरूरत है
सूर्य ठिठक सोच रहा, जो कहते कहने दो
पहले कर काम फिर आराम की जरूरत है
*
आधुनिका को चिकने चाम की जरूरत है
मद्यप को साकी को जाम की जरूरत है
सत्ता को अमन-चैन से न रहा वास्ता
कैसे भी, कहीं भी हो लाम की जरूरत है
*
कोरोना को तुरत लगाम की जरूरत है
घर में खुश रह कहें विराम की जरूरत है
मदद करें यथाशक्ति, पढ़ें-लिखें, योग करें
साहस सुख शांति दे, अनाम की जरूरत है
*
१६-४-२०२०
***
भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***
दोहा दुनिया
*
नेह-नर्मदा नहा ले, गर्मी होगी शांत
जी भर जलजीरा गटक, चित्त न पित्त अशांत
*
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, एक नहीं कई बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव
*
***
छंद बहर का मूल है: ४
कुंडल छंद
*
छंद परिचय:
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद
चौदह वार्णिक शर्करी जातीय छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI SS
सूत्र: रजरजगग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ऊलुं।
*
प्रात, शाम, रात रोज आप ही सुहाए
मौन हेरता रहा न आज आप आए
*
छंद-गीत, राग-रीत कौन सीखता है?
शारदा कृपा करें तभी न सीख पाए
*
है कहाँ छिपा हुआ, न चाँद दीखता है
दीप बाल-बाल रात ही न हार जाए
*
दूर बैठ ताकती , न भू भुला सकी है
सूर्य रश्मि-रूप धार श्वास में समाए
*
आसमान छेदता, दिशा-हवा न रोके
कामदेव चित्त को अशांत क्यों बनाये?
*
प्रेमिका न ज्ञान-दान प्रेम चाहती है
रुठती न, रूठना दिखा-दिखा खिझाए
*
हारता न, हार-हार प्रेम जीतता है
जीतता न जीत-जीत, प्रेम ही हराए
*
१६.४.२०१७
***
* शादी या बर्बादी **
1. आ बैल मुझे मार = पत्नी से पंगा लेना।
2. दीवार से सिर फोड़ना = पत्नी को कुछ समझाना।
3. चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात = पत्नी का मायके से वापस आना।
4. आत्महत्या के लिए उकसाना = शादी की राय देना।
5. दुश्मनी निभाना = दोस्तों की शादी करवाना।
6. खुद का स्वार्थ देखना = शादी ना करना।
7. ओखली में सिर देना = शादी के लिए हां करना।
8. दो पाटों में पिसना = दूसरी शादी करना।
9. खुद को लुटते हुऐ देखना = पत्नी को पर्स से पैसे निकालते हुए देखना।
10. पैरों तले जमीन खिसकना = पत्नी का अचानक साक्षात सामने आना।
11. सिर मुंडाते ही ओले पड़ना = परीक्षा में फेल होते ही शादी हो जाना।
12. शादी के लिए हां करना = स्वेच्छा से जेल जाना।
13. साली आधी घर वाली = वह स्कीम जो दूल्हे को बताई जाती है लेकिन दी नहीं जाती।
आभार: गुड्डो दादी
***
नवगीत
.
बांसों के झुरमुट में
धांय-धांय चीत्कार
.
परिणिति
अव्यवस्था की
आम लोग
भोगते.
हाथ पटक
मूंड पर
खुद को ही
कोसते.
बाँसों में
उग आये
कल्लों को
पोसते.
चुभ जाती झरबेरी
करते हैं सीत्कार
.
असली हो
या नकली
वर्दी तो
है वर्दी.
असहायों
को पीटे
खाखी हो
या जर्दी.
गोलियाँ
सुरंग जहाँ
वहाँ सिर्फ
नामर्दी.
बिना किसी शत्रुता
अनजाने रहे मार
.
सूखेंगे
आँसू बह.
रक्खेंगे
पीड़ा तह.
बलि दो
या ईद हो
बकरी ही
हो जिबह.
कुंठा-वन
खिसियाकर
खुद ही खुद
होता दह
जो न तर सके उनका
दावा है रहे तार
***
नवगीत:
.
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
कथ्य अमरकंटक पर
तरुवर बिम्ब झूमते
डाल भाव पर विहँस
बिम्ब कपि उछल लूमते
रस-रुद्राक्ष माल धारेंगे
लोक कंठ बस छंद कन्त रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
दुग्ध-धार लहरें लय
देतीं नवल अर्थ कुछ
गहन गव्हर गिरि उच्च
सतत हरते अनर्थ कुछ
निर्मल सलिल-बिंदु तर-तारें
ब्रम्हलीन हों साधु-संत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
विलय करे लय मलय
न डूबे माया नगरी
सौंधापन माटी का
मिटा न दुनिया ठग री!
ढाई आखर बिना न कोई
किसी गीत में तनिक तंत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
***
नव गीत:
.
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
इसको-उसको परखा फिर-फिर
धोखा खाया खूब
नौका फिर भी तैर न पायी
रही किनारे डूब
दो दिन मन में बसी चाँदनी
फिर छाई क्यों ऊब?
काश! न होता मन पतंग सा
बन पाता हँस दूब
पतवारों के
वार न सहते
माँझी होकर सूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
एक हाथ दूजे का बैरी
फिर कैसे हो खैर?
पूर दिये तालाब, रेत में
कैसे पायें तैर?
फूल नोचकर शूल बिछाये
तब करते है सैर
अपने ही जब रहे न अपने
गैर रहें क्यों गैर?
रूप मर रहा
बेहूदों ने
देखा फिर-फिर घूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
संबंधों के अनुबंधों ने
थोप दिये प्रतिबंध
जूही-चमेली बिना नहाये
मलें विदेशी गंध
दिन दोपहरी किन्तु न छटती
फ़ैली कैसी धुंध
लंगड़े को काँधे बैठाकर
अब न चल रहे अंध
मन की किसको परख है
ताकें तन का नूर
१६-४-२०१५
***
छत्तीसगढ़ी दोहा
*
हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान..
*
जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..
*
महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पैयाँ परत हौं. मूंडा पर धर हात..
*
जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
*
बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', मावस दूबर चंद..
१६.४.२०१०
***
आरोग्य-आशा:
स्व. शान्ति देवी वर्मा के नुस्खे
पारंपरिक चिकित्सा-विधि
*
आपको ऐसे नुस्खे ज्ञात हों तो भेजें। इनका प्रयोग स्वविवेक से करें।
वायु भगाएँ दूर :
एक चुटकी अजवाइन में नीबू रस की कुछ बूँदें डालकर थोड़े से नमक के साथ मिलाकर रगड़ लें। आधा कप पानी के साथ सेवन करने पर कुछ देर बाद वायु निकलना प्रारम्भ हो जायेगी।
पांडु रोग / पीलिया :
अदरक की पतली-पतली फाँकें नीबू के रस में डूबा दें। इसमें अजवाइन के दाने तथा स्वाद के अनुसार नमक मिला दें. अदरक का रंग लाल होने पर तीन-चार बार सेवन करने पर पांडु रोग में लाभ होगा.
इसक् साथ रोज सवेरे तथा शाम को किसी बगीचे या मैदान में जहाँ खूब पेड़-पौधे हों घूमना लाभदायक है। बगीचे में खूब गहरी-गहरी साँसें लें ताकि अधिक से अधिक ओषजन वायु शरीर में पहुँचे।
जोड़ों का दर्द:
सरसों के तेल में लहसुन तथा अजवाइन दल कर आग पर गरम करें। लहसुन काली पड़ने पर ठंडा कर छान लें और किसी शीशी में भर लें। इसकी मालिश करते समय ठंडी हवा न लगे। धीरे-धीरे दर्द कम होकर आराम मिलेगा।
यह तेल कान के दर्द को भी दूर करेगा. दाद, खारिश, खुजली में इसके उपयोग से लाभ होगा. कब्ज से बचें तथा कढ़ी, चांवल जैसा वायु बढ़ने वाला आहार न लें.

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*सरस्वती वंदना* (*छत्तीसगढ़ी*)

देश के विकास बर सबन उजास बर, सुरसति दाई! माई!! दया बरसाय दे।

नवां नवां काम होय देश स्वर्ग धाम होय, धरती में धान बोय फसल उगाय दे।।

टूरा-टूरी गुनी होय मिहनती धुनी होय, जीवन जीने का सही सलीका सिखाए दे।

डौका-डौकी चाह पाल, हाथन में हाथ डाल डाल, ऊँचा ही रखे कपाल, रीत नव बनाय दे।।

(घनाक्षरी: ८-८-८-७ वर्णों पर यति)

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