शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

बुन्देली लघुकथा- डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव

बुंदेली लघुकथा के द्वार पर
डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव
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१. कुलच्छनी 
निकिता नें अपने पापा सें साफ़-साफ़ कै दई हती के ओको ब्याव बे जिते चाएं सो पक्को कर लैबें मनो दायजे में मोटर साइकिल नें दैबें भलेई बनत रिस्ता काएं नें टूट जाए। निकिता के लएं बाइक की आबाज और बाकी तेज रफ़्तार भोत दहसत पैदा कर देत हती। बाइक पे बैठबे के लयं तो बो कब्भू तैयार नें हो सकत ती। ओने अपने बचपना में सामने सें आते भए एक बाइसिकिल सबार को एंसो एक्सीडेंट देखो हतो कै अबै लौं सोचतइ सें थर्रा जात ती। नईं भूल पात कै कैसें बाइक कुलती मार केन आगी को गोला बन गयी हती, कैंसें ऊ लड़का के मूंड सें खून को फव्वारों छूटो हटो और कैंसें तो पिरान छोड़बे के पैले बो किलबिलानो हतो। ऐसो असर दिमाग पे हो गाओ हतो के बाइक की आवाज सेंई बा काँप जाए और आँख-कान मीच लेबे। डॉक्टरन नें 'साइक्लोफ़ोबिआ' बतला कें इलाज भी करो मनो ऊखो बाइक सेंई चिढ़ हो गई ती।
पापा नें भरोसो दओ के लड़काबारे मोटर साइकिल मान तो रए हते मनो इनकी सरत सुन केन राजी हो गय। बे तो एंसी बिटिया, ऐंसो घर देख केंइ मगन हो रए हैं। निकिता खों तसल्ली हो गई। बरात आई, खुसी-खुसी भाँवरें पर गईं। दूसरे दिना दूल्हा रोहित कुंअर कलेबा पै अड़ गओ कै बाइक मिलहै तबई कौर तोरहै। यार-दोस्त और हबा देंन लगे। निकिता के बाप-भाई नें भोत समझाओ मनो दूल्हा तो अंगद के पाँव घांईं टस्स सें मस्स नें होय, जब तक मोटर साइकिल नें आ गई, जिद्द करत रओ। इतईं सें निकिता के मन में अपने पति रोहित के लयं अनादर पैदा हो गओ। ओको पूरो उल्लास मिट गओ।
सादी की पैली रात नें रोहित ने निकिता की पूँछी, नें भबिस्य की बातें करीं बस अपनेई सेखी बघारत रओ के बाइक पे कैंसे-कैंसे करतब करत है और पुलिस सें उरझत है। निकिता पति के ओछेपन पे सर्मिन्दा और अपमानित महसूस करत रई, जैंसें बाको ब्याओ निकिता सें नईं मोटर साइकिल सें भओ होय। दोई दिना बाद रोहित अपने दोस्तों के बुलाबे पर नई बाइक लैकेन प्रदर्सन करबे चलो गओ, निकिता नें खुल केन बिरोध करो मनो कौनऊ  नें नईं सुनी। रोहित गओ और प्रदर्सन करत में ऐंसी चोट रीढ़ की हड्डी पी लगी के जीबन भरे के लाने ज़िंदा लहास बन कै रै गओ। निकिता अपनो फर्ज़ निभाबे के लंय सबा-सुस्रुसा में रहत है मनो सासू कैत आंय 'बहू कुलच्छन निकरी कहाई।'  
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२. कचोंट 
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सत्तनारान तिबारीजी बराण्डा में बैठे मिसराजी के घर की तरपीं देख रअे ते और उनें कल्ल की खुसयाली सिनेमा की रील घाईं दिखा रईं तीं। मिसराजी के इंजीनियर लड़का रघबंस को ब्याओ आपीसर कालोनी के अवस्थी तैसीलदार की बिटिया के संगें तै हो गओ तो। कल्ल ओली-मुंदरी के लयं लड़का के ममआओरे-ददयाओरे सब कहुँ सें नाते-रिस्तेदारों को आबो-जाबो लगो रओ। बे ओंरें तिबारीजी खों भी आंगें करकें समद्याने लै गअे ते। लहंगा-फरिया में सजी मोड़ी पूजा पुतरिया सी लग रई ती। जी जुड़ा गओ। आज मिसराजी कें सूनर मची ती। खबास ने बंदनबार बाँदे हते, सो बेई उतरत दुफैरी की ब्यार में झरझरा रअे ते।
इत्ते में भरभरा कें एक मोटर-साइकल मिसराजी के घर के सामनें रुकी। मिसराजी अपनी दिल्लान में बाहर खों निकर कें आय, के, को आय ? तबई्र एक लड़किनी जीन्स-सर्ट-जूतों में उतरी और एक हांत में चाबी घुमात भई मिसराजी के पाँव-से परबे खों तनक-मनक झुकी और कहन लगी - ‘पापाजी, रघुवंश है ?’ मिसराजी तो ऐंसे हक्के-बक्के रै गअे के उनको बकइ नैं फूटो। मों बांयं, आँखें फाड़ें बिन्नो बाई खों देखत रै गये। इत्ते में रघबंस खुदई कमीज की बटनें लगात भीतर सें निकरे और बोले - ‘पापा, मैं पूजा के साथ जा रहा हूँ। हम बाहर ही खा लेंगे। लौटने में देर होगी।’ मिसराजी तो जैंसई पत्थर की मूरत से ठांड़े हते, ऊँसई ठांडे़ के ठांड़े रै गय। मोटरसाइकल हबा हो गई। तब लौं मिसराइन घुंघटा सम्हारत बाहरै आ गईं - काय, को हतो ? अब मिसराजी की सुर्त लौटी - अरे, कोउ नईं, तुम तो भीतरै चलो। कहकैं मिसराइन खों ढकेलत-से भीतरैं लोआ लै गअे। तिबारी जी चीन्ह गअे के जा तो बई कन्या हती, जीके सगुन-सात के लयं गअे हते। तिबारी जी जमाने को चलन देखकैं मनइं मन मुस्कान लगे। नांय-मांय देखो, कोउ नैं हतौ कै बतया लेते। आज की मरयादा तो देखो। कैंसी बेह्याई है ? फिर कुजाने का खेयाल आ गओ के तिलबिला-से गअे। उनकें सामनें सत्तर साल पैलें की बातें घूम गईं। आज भलेंईं तिबारीजी को भरौ-पूरौ परिबार हतो, बेटा-बेटी-नाती-पोता हते, उनईं की सूद पै चलबे बारीं गोरी-नारी तिबारन हतीं, मनां बा कचोंट आज लौं कसकत ती।
सत्तनारान तिबारी जी को पैलो ब्याओ हो गओ तो, जब बे हते पन्दरा साल के। दसमीं में पड़त ते। आजी की जिद्द हती, जीके मारें; मनों दद्दा ने कड़क कें कै दइ ती कै हमाये सत्तू पुरोहितयाई नैं करहैं। जब लौं बकालत की पड़ाई नैं कर लैंहैं, बहू कौ मों नैं देखहैं। आज ब्याओ भलेंईं कल्लो, मनों गौनौ हूहै, जब सही समौ आहै। सो, ब्याओ तो हो गओ। खूब ढपला बजे, खूब पंगतें भईं। मनों बहू की बिदा नैं कराई गई। सत्तू तिबारी मेटरिक करकें गंजबसौदा सें इन्दौर चले गअे और कमरा लें कें कालेज की पड़ाई में लग गअे। उनके संग के और भी हते दो चार गाँव-खेड़े के लड़का, जिनके ब्याओ हो गअे हते, कइअक तो बाप सुंदां बन गअे हते। सत्तू तो बहू की मायाजाल में नैं परे ते, मनो समजदार तो हो गय ते। कभउँ-कभउँ सोच जरूर लेबें कै कैंसो रूप-सरूप हुइये देबासबारी को, हमाय लयं का सोचत हुइये, अब तो चाय स्यानी हो गई हुइये।
खबर परी कै देबास बारी खूबइ बीमार है और इन्दौर की बड़ी अस्पताल में भरती है। अब जौन भी आय, चाय देबास सें, चाय गंजबसौदा सें, सत्तू केइ कमरा पै ठैरै। सत्तू सुनत रैबें के तबीअत दिन पै दिन गिरतइ जा रइ है, सेबा-सम्हार सब बिरथां जा रइ है। सत्तू फड़फड़ायं कै हमइ देख आबें, मनों कौनउ नें उनसें नईं कई, कै तुमइ चलो। दद्दा आय, कक्का आय, बड़े भैया आय मनों आहाँ। जे सकोच में रय आय और महिना-दो महिना में सुनी कै डाकटरों ने सबखां लौटार दओ। फिर महीना खाँड़ में देबास सें जा भी खबर आ गई कै दुलहन नईं रई। जे गतको-सो खाकैं रै गअे।
एइ बात की कचोंट आज तलक रै गई कै जीखौं अरधांगनी बनाओ, फेरे डारे, सात-पाँच बचन कहे-सुने, ऊ ब्याहता को हम मों तक नैं देख पाय। बा सुइ पति के दरसनों खों तरसत चली गई और हम पोंचे लौं नईं, नैं दो बोल बोल पाय। हम सांगरे मरयादइ पालत रै गअे। ईसें तो आजइ को जमानो अच्छो है। संग-साथ क बचन तो निभा रय। हमें तो बस, बारा-तेरा साल की बहू को हांत छूबो याद रै गओ जिन्दगी-भर के लयं, जब पानीग्रहन में देबास बारी को हाथ छुओ तो।,,,,,,और बोइ आज लौं कचोंट रओ। 

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