मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

कृति चर्चा : मौन की झंकार, संध्या सिंह

कृति चर्चा:
मौन की झंकार : गीतीय परिवर्तन का सत्कार
चर्चाकार: संजीव
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[कृति विवरण: मौन की झंकार, गीत संग्रह, संध्या सिंह, वर्ष २०१७, ISBN ९७८-९३-८४७७३-४१-०, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, आकार २२.५ से.मी. x  १४.५ से.मी., पृष्ठ ८८, मूल्य १५०/-, अनुभव प्रकाशन ई २८ लाजपत नगर, सहिबाबाद, गाजियाबाद  ५, ०९९१११७९३६८, ०९८११२७९३६८, लेखिका संपर्क- डी १२२५ इंदिरा नगर लखनऊ, ७३८८१७८४५९, ७३७६०६१०५६ ] 
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                               परिवर्तन ही जीवन है। कोई भी वस्तु जड़ होकर जीवन नहीं रह सकती। साहित्य वह जिसमें सबका हित समाहित हो। हित परिस्थिति सापेक्ष होता है। परिस्थिति बदलने पर हित और अहित भी बदलते हैं। साहित्य का सर्वाधिक संवेदनशील, सरस और सारगर्भित रूप गीति काव्य है। प्रकृति में गीति तत्व नदी की कलकल, परिंदों के कलरव, मेघ के गर्जन, पवन की सनसनाहट, शिशु के रुदन और माँ की लोरी में अंतर्निहित है। काव्य का उत्स करुणा और गीति का उत्स प्रेम है। आपने प्रेमियों को गुनगुनाते हुए ही चित्रित किया जाता है। प्रेम 'स्व' को खोकर 'पर' को पाने की प्रक्रिया है। द्वैत का अंत और अद्वैत का जन्म ही प्रेम है। गीति काव्य का स्वरूप देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप निरंतर परिवर्तित होता रहा है। तदनुरूप उसके अन्तर्निहित तत्व और रचना विधान का बदलना स्वाभाविक है। गीति-शिल्प का अनन्य भाग छंद ( गति, यति, लय) है। छांदस गीति का एक रूप गीत / नवगीत है। समकालिक गीति काव्य में गीत / नवगीत का सम्बन्ध वृक्ष और शाखा का सा है।  
                               'मौन की झंकार' शाने-अवध लखनऊ निवासी सजग रचनाधर्मी संध्या सिंह की सद्य विमोचित गीत कृति है। नवगीत है या नहीं है के अवांछित विवाद से बचने के लिए संध्या जी ने इसे 'गीत संग्रह' ही कहा है किंतु इसकी कई रचनाएँ नवगीत, कई गीत नवगीत की संधिरेखा पर तथा कुछ गीत हैं। गीत-नवगीत के मध्य दो देशों की तरह अनुल्लन्घ्य सीमा रेखा न थी, न है, न होगी। रचनाकार के लिए ऐसा विभाजन कोई  महत्त्व भी नहीं रखता क्योंकि उसे कथ्य के भाव को अभिव्यक्त करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द और छंद का चयन करना होता है। संध्या जी के गीत समाज को व्यक्ति मान कर घटना क्रम पर चिंतन कर वैचारिक मंथन के पश्चात कथ्य का निर्धारण कर, निहित भाव एवं रस के अनुरूप लय,  लय के अनुरूप छंद, छंद के अनुरूप गति-यति तथा यथावश्यक शब्द चयन करती हैं। वे शिल्प पर भाव को वरीयता देती हैं। पूर्णिमा बर्मन जी ने ठीक ही कहा है ''उनकी पंक्तियाँ प्रकृति और समाज से बिंब और उपमानों का सुंदर सृजन करती है। उनकी रचनाओं में लय और कथ्य का सुंदर सामंजस्य देखने को मिलता है।'' 
                               उन्नीसवीं सदी के छठवें दशक से क्रमश: अधिकाधिक चर्चित होता गया नवगीत बीसवीं सदी के प्रथम दशक के अंत तक तथाकथित प्रगतिवादी कविता को उसकी औकात दिखाते हुए सर्वाधिक लोकप्रिय विधा के रूप में जनगण के मन में आसीन हो गया। श्री माहेश्वर तिवारी के अनुसार ''पिछले दिनों के गीत जनपद के नागरिकों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि उनका स्वभाव बदला है, कथन की भंगिमाएँ बदली हैं और कभी-कभी तो इतना वेगवान हो गया है कि कुछ गीत कथ्य को नवता से भरने के क्रम में इतने उत्तर आधुनिक हो गए हैं कि उनका सोच, उसकी रचना प्रक्रिया तो गद्यात्मक हो गयी और आधारभूत स्वरूप गीत का ही बना रहा और कुछ लोग शब्द की लय, अर्थ की लय को इस तरह अपने से जोड़े रहे कि गद्य रचते हुए भी कथ्य की आधुनिक समकालीनता के बावजूद छांदस बने रहे। उन्हीं में से एक नाम है गीत-कवयित्री संध्या सिंह का।.... वे मुक्त छंद से लेकर छन्दस कविता गीत के जनपद की नागरिक बनी हैं। ''
                               श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार और समीक्षक नचिकेता ''नए छंद-प्रयोग और प्रयोगधर्मी नव्यता के विभ्रम में फँसकर आधुनिक गीतों की लय संरचना एवं छंद विन्यास को क्षत-विक्षत और लहूलुहान'' करते हुए नवगीत के घर में सेंध लगनेवाली प्रयोगधर्मी नव्यता से उत्पन्न हो रहे खतरे को भाँपकर निजात पाने का परामर्श देते हुए संध्या जी के गीतों में ''अपने समय की सामाजिक समस्याओं, विसंगतियों और विडंबनाओं से साक्षात्कार की चिंता'' देखते हैं। 
                               ख्यात साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी के सम्पादक और सुरीले गीतकार धनञ्जय सिंह के मत में संध्या जी की ''रचनाधर्मिता के स्वरूप-संवेदन-सरोकार और शिल्प को जाँचा-परखा जाए तो हमें वह गीत-नवगीत की वयस्संधि की चौखट पर खड़ी हुई प्रतीत होती हैं.... नए-पुराने गीत के बीच एक पुल बनाती दिखाई देती हैं।'' उल्लेखनीय है कि श्री सिंह नवगीत के 'नव' को संज्ञा नहीं विशेषण के रूप में देखते हैं। 
                               स्वयं संध्या जी के अनुसार ''जहाँ एक ओर कविता मुक्त होकर नए-नए प्रयोग के चलते अपनी लय और प्रवाह से भी हाथ धो बैठी वहीं दूसरी ओर गीत भी, गीत और नवगीत के खेमों में बँटकर कमजोर हुआ है।'' वे इस गीत संग्रह को ''मुक्त कविताओं के बाद लय, प्रवाह, मात्रा और तुकांत पर खरा उतरने की चुनौती स्वीकार करते हुए अपनी बात आप (पाठकों) तक पहुँचाने का यथासंभव प्रयास'' कहती हैं।  
                               विवेच्य कृति पर अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया देने के पूर्व पुरोवाक में उपस्थित उक्त अभिमतों को अपने पाठकों के सम्मुख लाना आवश्यक प्रतीत हुआ। गीत-नवगीत के तत्वों, प्रवृत्तियों, विधान और प्रभाव पर विस्तृत चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं है किंतु 'गद्य रचते हुए छान्दस बने रहना

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