मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

karyashala: navgeet

कार्यशाला
नवगीत
सुनीता सिंह
"ताजा हो ले" बोझ गिराकर हल्का हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले। रफ्ता रफ्ता धीरे-धीरे। तू कितनी दूर चला आया।। कैसी-कैसी पगडंडी से। चलकर नीम अकेला आया।। तू ही अपना राजा हो ले।। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।। आकर-जाते जाकर-आते । पल कैसे इतने बीत गये।। लड़ते भिड़ते रोते हँसते। युग सावन कितने रीत गये।। उम्मीदों का बाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।। उठते गिरते गिरते उठते। चलना तो तू भी सीख गया ।। तूफां फिसलन लाख करे पर। तू पाँव जमाना सीख गया।। तू अपना खुद ख्वाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।।
मूल रचना
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"ताजा हो ले"
प्यास बुझाने माजा हो ले। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले। रफ्ता-रफ्ता धीरे-धीरे। कितनी दूर चला आया।। कैसी-कैसी पगडंडी से नीम अकेला ही आया।। तन जा तन्नक राजा हो ले।। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले ।। आकर-जाते जाकर-आते । पल जैसे युग बीत गये।। लड़ते-भिड़ते रोते-हँसते सावन कितने रीत गये।। उम्मीदों का बाजा हो ले। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले ।। उठते-गिरते गिरते-उठते। चलना तू भी सीख गया ।। तूफां फिसलन लाख करे तू पाँव जमाना सीख गया।। खुद बन्दा, खुद ख्वाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।।
(कुछ बदलाव के बाद)
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