रविवार, 17 दिसंबर 2017

muktika

कार्य शाला - नए हस्ताक्षर
मुक्र्तिका
सुनीता सिंह

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सर्दी की आहट से घर में निकले कंबल। कुहरे की आमद से कम सांझ सुबह हलचल।। शबनम के मोती की झीनी चादर सजती। मग्न हुई कुदरत भी बज्म अनोखी बेकल।। मंद मंद पुरवाई जैसे हो ठंडाई। शरद आगमन से पुलकित होता गुल हर पल।। गुनगुनी धूप अब तो भाने लगी सभी को। रुखसत दिल की तपिश हुई गम के तल से निकल।। पीली सरसों के गुल की रानाई बेहद। पतझड़ के पीले पत्ते बनते बीता पल।।
* सर्दी की आहट से घर में निकले कंबल।
२२ २ २११ २ ११ २ ११२ २११ कुहरे की आमद से कम हो सबकी हलचल।। शबनम के मोती की झीनी चादर सजती। मग्न हुई कुदरत भी बज्म अनोखी बेकल।। धीमी-धीमी पुरवाई जैसे हो सुखकर । सूरज ऊगे तो पुलकित होता गुल हर पल।। धूप गुनगुनी भाने लगी सभी को अब तो।* रुखसत दिल की तपिश हुई लख गम के बादल।। पीली सरसों के गुल की रानाई बेहद। पतझड़ के पीले पत्ते बनते बीता पल।।
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