रविवार, 31 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

शिव शुभ कर हरते अशुभ,
भोले रहते शांत.
शंकर शंका मिटा दें,
बम विश्वास प्रशांत.
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निन्गा कहते पिंड से,
उपजे सारी सृष्टि.
बसे-लीन हो अंड में,
देखे सात्विक दृष्टि.
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घट भीतर आकाश है,
घट बाहर आकाश.
बड़ादेव सर्वत्र हैं,
भज कट जाएँ पाश.
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महादेव को पूजते,
सुर नर असुर हमेश.
शशि हैं शोभित शीश पर,
दीपक बने दिनेश.
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मोह वासना लोभ की,
त्रिपुरी करते नष्ट.
त्रिपुरारी निज भक्त के,
पल में हरते कष्ट.
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काम जीत कामारि हैं,
चंद्र-नाथ सोमेश.
नाग-इष्ट नागेश प्रभु,
गगन-व्याप्त व्योमेश.
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उमा विवाहीं मिल गई,
संग्या नई उमेश.
हो सतीश प्रिय सती के,
भव-तारें भुवनेश.
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31.12.2017

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