शनिवार, 23 दिसंबर 2017

lekh: hindi chunautiyan aur sambhavnayen

आलेख

हिंदी : चुनौतियाँ और संभावनाएँ
- आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

रचनाकार परिचय:-
शिक्षा: नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी. ई., एम. आई., एम. ए. (अर्थ शास्त्र, दर्शन शास्त्र), एल-एल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, डिप्लोमा कप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा।
प्रकाशित कृतियाँ: १. 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह, २.'लोकतंत्र का मकबरा' तथा ३. 'मीत मेरे' कविता संग्रह, ४.  'भूकंप के साथ जीना सीखें' लोकोपयोगी तकनीकी, ५. काल है संक्रांति का नवगीत संग्रह। संपादन: १. निर्माण के नूपुर, २. नींव के पत्थर, ३. राम नाम सुखदाई, ४. तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, ५. यदा-कदा, ६. द्वार खड़े इतिहास के, ७. काव्य मन्दाकिनी २००८, ८. समयजयी साहित्याकार भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'आदि पुस्तकों के साथ-साथ ६ पत्रिकाएं  व ११ स्मारिकाएं।
सम्मान: १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७५ सम्मान प्रमुख हैं : आचार्य, सरस्वती रत्न, २० वीं शताब्दी रत्न, संपादक रत्न, विज्ञान रत्न, कामता प्रसाद गुरु सम्मान, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। आप मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री / संभागीय परियोजना यंत्री पदों पर कुशलतापूर्वक कार्य कर चुके हैं।
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भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धति में शिशु को पूर्व प्राथमिक से ही अंग्रेजी के शिशु गीत रटाये जाते हैं। वह बिना अर्थ जाने अतिथियों को सुना दे तो माँ-बाप का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है। हिंदी की कविता केवल २ दिन १५ अगस्त और २६ जनवरी पर पढ़ी जाती है, बाद में हिंदी बोलना कोई नहीं चाहता। अंग्रेजी भाषी विद्यालयों में तो हिंदी बोलने पर 'मैं गधा हूँ' की तख्ती लगाना पड़ती है। इस मानसिकता में शिक्षित बच्चा माध्यमिक और उच्च्तर माध्यमिक में मजबूरी में हिंदी यत्किंचित पढ़ता है... फिर विषयों का चुनाव कर लेने पर व्यावसायिक शिक्षा का दबाव हिंदी छुटा ही देता है।
इस मानसिकता की आधार भूमि पर जब साहित्य रचना की ओर मुड़ता है तो हिंदी भाषा, व्याकरण और पिंगल का अधकचरा ज्ञान और हिंदी को हेय मानने की प्रवृत्ति उसे उर्दू की ओर उन्मुख कर देती है जबकि उर्दू स्वयं हिंदी की अरबी-फारसी शब्द बाहुल्यता की विशेषता समेटे शैली मात्र है।
गत कुछ दिनों से एक और चिंतनीय प्रवृत्ति उभरी है। राजनैतिक नेताओं ने मतों को हड़पने के लिये आंचलिक बोलियों (जो हिंदी की शैली विशेष हैं) को प्रान्तों की राजभाषा घोषित कर उन्हें हिंदी का प्रतिस्पर्धी बनाने का कुप्रयास किया है। अंतरजाल (नेट) पर भी ऐसी कई साइटें हैं जहाँ इन बोलियों के पक्षधर जाने-अनजाने हिंदी विरोध तक पहुँच जाते हैं जबकि वे जानते हैं कि क्षेत्र विशेष के बाहर बोलिओं की स्वीकृति नहीं हो सकती।
मैंने इस के विरुद्ध रचनात्मक प्रयास किया और खड़ी हिंदी के साथ उर्दू, बृज, अवधी, भोजपुरी, निमाड़ी, मालवी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुन्देली, सरायकी, आदि भाषारूपों में रचनाएँ इन साइटों को भेजीं, कुछ ई कविता के मंच पर भी प्रस्तुत कीं। दुःख हुआ कि एक बोली के पक्षधर ने किसी अन्य बोली की रचना में कोई रूचि नहीं दिखाई। इस स्थिति का लाभ अंग्रेजी के पक्षधर ले रहे हैं।
उर्दू के प्रति आकर्षण सहज स्वाभाविक है... वह अंग्रेजों के पहले मुग़ल काल में शासन-प्रशासन की भाषा रही है। हमारे घरों के पुराने कागजात उर्दू लिपि में हैं जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लिखा है। उर्दू की उस्ताद-शागिर्द परंपरा इस शैली को लगातार आगे बढ़ाती और नये रचनाकारों को शिल्प की बारीकियाँ सिखाती हैं। हिंदी में जानकार नयी कलमों को अतिउत्साहित, हतोत्साहित या उपेक्षित करने में गौरव मानते हैं। अंतरजाल आने के बाद स्थिति में बदलाव आ रहा है... किन्तु अभी भी रचना की कमी बताने पर हिंदी का कवि उसे अपनी शैली कहकर शिल्प, व्याकरण या पिंगल के नियम मानने को तैयार नहीं होता। शुद्ध शब्द अपनाने के स्थान पर उसे क्लिष्ट कहकर बचता है। उर्दू में पाद टिप्पणी में अधिक कठिन शब्द का अर्थ देने की रीति हिंदी में अपनाना एक समाधान हो सकता है।
हर भारतीय यह जानता है कि पूरे भारत में बोली-समझी जानेवाली भाषा हिंदी और केवल हिंदी ही हो सकती है तथा विश्व स्तर पर भारत की भाषाओँ में से केवल हिंदी ही विश्व भाषा कहलाने की अधिकारी है किन्तु सच को जानकर भी न मानने की प्रवृत्ति हिंदी के लिये घातक हो रही है।
हम रचना के कथ्य के अनुकूल शब्दों का चयन कर अपनी बात कहें... जहाँ लगता हो कि किसी शब्द विशेष का अर्थ सामान्य पाठक को समझने में कठिनाई होगी वहाँ अर्थ कोष्ठक या पाद टिप्पणी में दे दें। किसी पाठक को कोई शब्द कठिन या नया लगे तो वह शब्द कोष में अर्थ देख ले या रचनाकार से पूछ ले।
हिंदी के समक्ष सबसे बड़ी समस्या विश्व की अन्य भाषाओँ के साहित्य को आत्मसात कर हिंदी में अभिव्यक्त करने की तथा ज्ञान-विज्ञान की हर शाखा की विषय-वस्तु को हिंदी में अभिव्यक्त करने की है। हिंदी के शब्द कोष का पुनर्निर्माण परमावश्यक है। इसमें पारंपरिक शब्दों के साथ विविध बोलियों, भारतीय भाषाओँ, विदेशी भाषाओँ, विविध विषयों और विज्ञान की शाखाओं के परिभाषिक शब्दों को जोड़ा जाना जरूरी है।
एक सावधानी रखनी होगी। अंग्रेजी के नये शब्द कोष में हिंदी के हजारों शब्द समाहित किये गये हैं किन्तु कई जगह उनके अर्थ/भावार्थ गलत हैं... हिंदी में अन्यत्र से शब्द ग्रहण करते समय शब्द का लिंग, वचन, क्रियारूप, अर्थ, भावार्थ तथा प्रयोग शब्दकोष में हो तो उपयोगिता में वृद्धि होगी। यह महान कार्य सैंकड़ों हिंदीप्रेमियों को मिलकर करना होगा। विविध विषयों के निष्णात जन अपने विषयों के शब्द-अर्थ दें जिन्हें हिंदी शब्द कोष में जोड़ा जाए।
रचनाकारों को हिंदी का प्रामाणिक शब्द कोष, व्याकरण तथा पिंगल की पुस्तकें अपने साथ रखकर जब जैसे समय मिले पढ़ने की आदत डालनी होगी। हिंदी की शुद्धता से आशय उर्दू, अंग्रेजी या ने किसी भाषा/बोली के शब्दों का बहिष्कार नहीं अपितु भाषा के संस्कार, प्रवृत्ति, रवानगी, प्रवाह तथा अर्थवत्ता को बनाये रखना है चूँकि इनके बिना कोई भाषा जीवंत नहीं होती।
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