शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

शिव कलकल जलधार हैं,
डिमडिम डमरू-नाद.
शिव मन-घटता मौन हैं,
शिव सत् से संवाद.
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कंठ काल से अलंकृत,
महाकाल हैं आप.
शिव विराटतम सूक्ष्मतम,
नाप न कोई माप.
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शिव नयनों में इंदु हैं.
इंदु बिंदु का धाम.
इंदुमुखी मुस्का रहीं,
करता जगत प्रणाम.
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शिव नयनों में शिवा के,
देख सकेगा कौन?
पलक मूँद छवि लें छिपा,
धुनी रमाए मौन.
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लीला करते लास की,
हास अधर पर मंद.
एक दूसरे के लिए,
सुमन और मकरंद.
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कांत कांति की कल्पना,
कांता को आमोद.
सलिल-धार में सत्यजित,
बिंब बढाए प्रमोद.
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अर्णव अरुण अछिन-अगिन,
शिव अपरोक्ष अतीत.
शिवा अजीती अबीती,
अभिनव-पुरा प्रतीत.
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पलक झपकते बीतते,
पल दिन युग कल्पान्त.
विनत जीव संजीव जी,
मन्वन्तर विक्रांत.
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साध ने साधन, साधना
ही काटे भव-पाश.
पैर जमा कर जमीं पर,
भक्त छुए आकाश.
...
29.12.2017

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