रविवार, 24 दिसंबर 2017

नवगीत: 
खोल दो खिड़की 
हवा ताजा मिलेगी

ओम की छवि 
व्योम में हैं देखना
आसमां पर
मेघ-लिपि है लेखना
रश्मियाँ रवि की
तनिक दें ऊष्णता
कलरवी चिड़ियाँ
नहीं तुम छेंकना
बंद खिड़की हुई तो
साँसें डँसेंगी
कब तलक अमरस रहित
माज़ा मिलेगी
.
घर नहीं संसद कि
मनमानी करो
अन्नदाता पर
मेहरबानी करो
बनाकर कानून
खुद ही तोड़ दो
आप लांछित फिर
भी निगरानी करो
छंद खिड़की हुई तो
आसें मिलेंगी
क्या कभी जनता
बनी राजा मिलेगी?
.

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