शनिवार, 30 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

शिव रमते हैं भाव में,
शिव में रमता भाव.
शिवा चाह हैं, चाव हैं,
शून्य अभाव प्रभाव.
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जटा-जूट शिव-शीश पर,
शोभित अगणित व्याल.
सोम संग अमृत-गरल,
चंदन चर्चित भाल.
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शिव अपने में लीन हैं,
कहता विश्व समाधि.
जो जन शिव में लीन हो,
मिटती उसकी व्याधि.
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शिव पर्वत-आकार हैं,
नभ-शशि शिखरासीन.
तरु-जड़ जटा, सलिल निरख,
वृषभ-सर्प तल्लीन.
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दावानल शिव-कोप सा,
रौद्र रूप विकराल.
आँधी-तूफ़ां भयंकर,
मानो आया काल.
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शान्त-स्निग्ध वातावरण,
ज्यों शिव परम प्रसन्न.
रुद्र अक्ष श्यामल छटा,
सुख-मंगल आसन्न.
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आतप-वर्षा-शीत त्रय,
शूल हुए शिव-मीत.
दसों दिशाएँ निनादित,
कर डमरू से प्रीत.
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सुमन सु-मन तितली भ्रमर,
पवन प्रवह दे शांति.
पर्वत-तनया सुंदरी,
प्रगटी ले शुचि कांति.
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मन-मयूर शोभा निरख,
कार्तिक में कर नृत्य.
गज-मुख गणपति संग हो,
करे अलौकिक कृत्य.
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शिवा प्रकृति, शिव मूल हैं,
जड़-चेतन संयुक्त.
सह जीवन ही पूर्णता,
होते शून्य वियुक्त.
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शक्तिवान शिव तभी जब,
शक्ति नहीं हों दूर.
शक्ति ने अपने आपमें
पूर्ण- कहे जो सूर
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30.12.2017

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