शनिवार, 18 नवंबर 2017

navgeet

नवगीत: navgeet
अपना राग 

*
मौन सुनो सब, गूँज रहा है
अपनी ढपली
अपना राग
तोड़े अनुशासन के बंधन
हर कोई मनमर्जी से
कहिए कैसे पार हो सके
तब जग इस खुदगर्जी से
भ्रान्ति क्रांति की
भारी खतरा
करे शांति को नष्ट
कुछ के आदर्शों की खातिर
बहुजन को हो कष्ट
दोष व्यवस्था के सुधारना
खुद को उसमें ढाल
नहीं चुनौती अधिक बड़ी क्या
जिसे रहे हम टाल?
कोयल का कूकना गलत है
कहे जा रहा
हर दिन काग
संसद-सांसद भृष्ट, कुचल दो
मिले न सहमत उसे मसल दो
पिंगल के भी नियम न माने
कविपुंगव की नयी नसल दो
गण, मात्रा,लय,
यति-गति तज दो
शब्दाक्षर खुद
अपने रच लो
कर्ता-क्रिया-कर्म बंधन क्यों?
ढपली ले,
जो चाहो भज लो
आज़ादी है मनमानी की
हो सब देख निहाल
रोक-टोक मत
कजरी तज
सावन में गायें फाग
*
एक हास्य मुक्तक
*
कविता उबालें, भूनें, तलें तो, धोना न भूलें यही प्रार्थना है
छौंकें-बघारें तो हो आँच मद्दी, जला दिल न लेना यही कामना है
जो चटनी सी पीसो तो मिर्ची भी डालो, सम्हलना न ज्यादा खटाई ज़रा हो
पुदीना मिला लो, ढेली हो गुड़ की, चटखारे लेना सफल साधना है
***
salil.sanjiv@gmail.com, ७९९९५५९६१८
www.divyanarmada.in, #हिंदी_ब्लॉगर
स्वास्थ्य दोहा सलिला 
*
स्वास्थ्य संपदा है सलिल, सचमुच ही अनमोल 
वह खाएँ जो पच सके, रखें याद यह बोल 
*

अदरक थोड़ी चूसिये, अजवाइन के साथ
हो खराश से मुक्ति तब, कॉफ़ी भी लें साथ

*
दोहा दर्शन 
*
गौ-भाषा दोहा दुहे, ले सहेज निहितार्थ.
सूक्ति लक्षणा-व्यंजना, सहित गहे वागार्थ 
*
जैसी भी है ज़िन्दगी, जिएँ मजा ले आप.  
हँसे-हँसाया यदि नहीं, बन जाएगी शाप.
*
सुख पाने के हेतु कर, हर दिन नया उपाय.
मन न पराजित हो अगर, विधना हो निरुपाय.
*
मिश्र न हो सुख-दुख अगर, जीवन हो रसहीन.
बने 'सलिल' रसखान यदि, रहे सदा रसलीन.
*
हो प्रशांत मन तो 'सलिल', करे शक्ति से काम. 
मन अशांत तो समझ ले, हुए विधाता वाम .
*

*
एक कुण्डलिनी-
कविता मेरी प्रेरणा, रहती पल-पल साथ 
कभी मिलाती है नज़र, कभी थामती हाथ
कभी थामती हाथ, कल्पना-कांता के सँग
कभी संग मिथलेश-विनीता दोहा की 
'सलिल'-साधना संग, रहे हो रजनी सविता 
सांस-सांस में रहे, समाहित खुद ही कविता
*
षट्पदी
संजीवनी मिली कविता से सतत चेतना सक्रिय है
मौन मनीषा मधुर मुखर, है, नहीं वेदना निष्क्रिय है 
कभी भावना, कभी कामना, कभी कल्पना साथ रहे 
मिली प्रेरणा शब्द साधना का चेतन मन हाथ गहे
व्यक्त तभी अभिव्यक्ति करो जब एकाकार कथ्य से हो
बिम्ब, प्रतीक, अलंकारों से रस बरसा नव बात कहो
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नवगीत:
मौन सुनो सब, गूँज रहा है
अपनी ढपली
अपना राग
तोड़े अनुशासन के बंधन
हर कोई मनमर्जी से
कहिए कैसे पार हो सके
तब जग इस खुदगर्जी से
भ्रान्ति क्रांति की
भारी खतरा
करे शांति को नष्ट
कुछ के आदर्शों की खातिर
बहुजन को हो कष्ट
दोष व्यवस्था के सुधारना
खुद को उसमें ढाल
नहीं चुनौती अधिक बड़ी क्या
जिसे रहे हम टाल?
कोयल का कूकना गलत है
कहे जा रहा
हर दिन काग
संसद-सांसद भृष्ट, कुचल दो
मिले न सहमत उसे मसल दो
पिंगल के भी नियम न माने
कविपुंगव की नयी नसल दो
गण, मात्रा,लय,
यति-गति तज दो
शब्दाक्षर खुद
अपने रच लो
कर्ता-क्रिया-कर्म बंधन क्यों?
ढपली ले,
जो चाहो भज लो
आज़ादी है मनमानी की
हो सब देख निहाल
रोक-टोक मत
कजरी तज
सावन में गायें फाग
*

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