शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

श्याम - दोहान्जलि

मन-मन्जूषा में बसा, जब से राधा-रूप.
गोकुल का छोरा हुआ, सकल सृष्टि का भूप.
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यश न यशोदा का अमित, नंद नंद का लाल.
पल्लू बँध हर्षित बहुत, जसुदा मालामाल.
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गागर में सागर लिए, आँचल में गोपाल.
वसुमति जसुमति को निरख, भाव विभोर निहाल.
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मैया गैया दुह रही, बैठा कान्ह समीप.
दुग्ध रहा धारोष्ण पी, रहा आँगना लीप.
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जगपालक को पालती, मैया गैया मौन.
ठिठक भ्रमित नभ सोचता, किसका भर्ता कौन?
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