शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

baal kavita

बाल रचना:
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लालू बन्दर ने कहा: 'काटो मेरे बाल'.
बेढब माँग सुनी हुए, शेषपाल जी लाल.
शेषपाल जी लाल, 'समझते हो क्या नउआ'?
बोला बन्दर 'अगर नहीं तो क्या कनकउआ?
बाल-पृष्ठ पर कर रहा, आज दान मैं बाल.
लिए नहीं तो लाऊँगा पल भर में भूचाल.'
अगर यहाँ साहित्य, सहित हित बाल दान लो.
जितना हित करना उतना ही नगद दान दो'
सिर पकड़े बैठे दद्दू सुन-सुन कर ताने.
'इससे बेहतर चला जाऊँ चुप पागलखाने'.
सुना लालू बोला 'जाओ तुम अभी जहन्नुम.
लेकर बाल नगद दो मुझको होगा उत्तम'.
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salil.sanjiv@gmail.com, ७९९५५५९६१८
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