मंगलवार, 28 नवंबर 2017

navgeet

नवगीत:
गीत पुराने छायावादी
मरे नहीं
अब भी जीवित हैं.
तब अमूर्त
अब मूर्त हुई हैं
संकल्पना अल्पनाओं की
कोमल-रेशम सी रचना की
छुअन अनसजी वनिताओं सी
गेहूँ, आटा, रोटी है परिवर्तन यात्रा
लेकिन सच भी
संभावनाऐं शेष जीवन की
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
बिम्ब-प्रतीक 
वसन बदले हैं
अलंकार भी बदल गए हैं.
लय, रस, भाव अभी भी जीवित 
रचनाएँ हैं कविताओं सी
लज्जा, हया, शर्म की मात्रा 
घटी भले ही
संभावनाऐं प्रणय-मिलन की  
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
कहे कुंडली 
गृह नौ के नौ 
किन्तु दशाएँ वही नहीं हैं 
इस पर उसकी दृष्टि जब पडी 
मुदित मग्न कामना अनछुई 
कौन कहे है कितनी पात्रा  
याकि अपात्रा?
मर्यादाएँ शेष जीवन की
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
***

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