बुधवार, 15 नवंबर 2017

दोहा सलिला

जब तक मन में चाह थी,
तब तक मिली न राह.
राह मिली अब तो नहीं,
शेष रही है चाह.
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राम नाम की चाह कर,
आप मिलेगी राह.
राम नाम की राह चल,
कभी न मिटती चाह.
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दुनिया कहती युक्ति कर,
तभी मिलेगी राह.
दिल कहता प्रभु-भक्ति कर,
मिल मुक्ति बिन चाह.
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भटक रहे बिन राह ही,
जग में सारे जीव.
राम-नाम की राह पर,
चले जीव संजीव.
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