रविवार, 19 नवंबर 2017

chanchareek

स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'   
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ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि 
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि


कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश 
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएँ मथुरेश

महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना का सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन, मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खाँटी राजस्थानी बोली, छरहरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक रहे जिनकी पहचान और मूल्यांकन समय नहीं कर सका। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है।  वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।

ब्रम्ह आप ही प्रगट हो, करते रचना कर्म  
चंचरीक प्रभु-भक्ति को, पाते जीवन-मर्म 


सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। लीलाविहारी आनंदकंद गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शुक्ल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया।  
सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप 
शाकुंतल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप
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'चंचरीक' प्रभु चरण के, दैव कृपा के पात्र 
काव्य सृजन सामर्थ्य के, नित्य-सनातन पात्र 
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'नारायण' सा 'रूप' पा, 'जगमोहन' शुभ नाम 
कर्म कुशल कायस्थ हो, हरि को हुए प्रणाम
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'नारायण' ने 'सूर्य' हो, प्रगटाया निज अंश 
कुक्षि 'वासुदेवी' विमल, प्रमुदित पा अवतंश 
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सात नवंबर का दिवस, उन्निस-तेइस वर्ष 
पुत्र-रुदन का स्वर सुना, खूब मनाया हर्ष 
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जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चंद्र-बुध-शनि की युति ने नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दिया जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक  मिलता रहा।

बैठे चौथे भाव में, रवि शशि बुध शनि साथ 
भक्ति-सृजन पथ-पथिक से, कहें न नत हो माथ 
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रवि उजास, शशि विमलता, बुध दे भक्ति प्रणम्य 
शनि बाधा-संकट हरे, लक्ष्य न रहे अगम्य 
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'विष्णु-प्रकाश-स्वरूप' से, अनुज हो गए धन्य 
राखी बाँधें 'बसंती', तुलसी' स्नेह अनन्य  
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बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। 

विद्या गुरु भवदत्त से, मिली एक ही सीख 
कीचड़ में भी कमलवत, निर्मल ही तू दीख 
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रथखाना में प्राथमिक, शिक्षा के पढ़ पाठ 
दरबार हाइ स्कूल में, पढ़े हो सकें ठाठ 
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भक्तरत्न 'मथुरा' मुदित, पाया पुत्र विनीत 
भक्ति-भाव स्वाध्याय में, लीन निभाई रीत
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'मंदिर डिग्गी कल्याण' में, जमकर बँटा प्रसाद 
भोज सहस्त्रों ने किया, पा श्री फल उपहार 
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'गोविंदी' विधवा बहिन, भुला सकें निज शोक 
'जगमोहन' ने भक्ति का, फैलाया आलोक 
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पाठक सोहनलाल से, ली दीक्षा सविवेक 
धीरज से संकट सहो, तजना मूल्य न नेक 
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चित्र गुप्त है ईश का, निराकार सच मान 
हो साकार जगत रचे, निर्विकार ले जान 
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काया स्थित ब्रम्ह ही, है कायस्थ सुजान 
माया की छाया गहे, लेकिन नहीं अजान 
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पूज किसी भी रूप में, परमशक्ति है एक 
भक्ति-भाव, व्रत-कथाएँ, कहें राह चल नेक 
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१९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा पर चल पड़े जगमोहन। युवा जगमोहन का विवाह रामकिशोरी के साथ हुआ किंतु वे एक कन्या रत्न  को जन्म देकर इहलोक से प्रस्थान कर गईं।         

'रामकिशोरी' चंद दिन, ही दे पाईं साथ 
दे पुत्री इहलोक से, गईं थामकर हाथ 
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महाराज कॉलेज से, इंटर-बी. ए. पास 
किया, मिले आजीविका, पूरी हो हर आस 
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धर्म-पिता भव त्याग कर, चले गए सुर लोक 
धैर्य-मूर्ति बन दुःख सहा, कोई सका न टोंक 
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रचा पिता की याद में, 'मथुरेश जीवनी' ग्रंथ 
'गोविंदी' ने साथ दे, गहा सृजन का पंथ 
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'विद्यावती' सुसंगिनी, दो सुत पुत्री एक 
दे, असमय सुरपुर गयीं, खोया नहीं विवेक 
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महाराजा कॉलेज से, एल-एल. बी. उत्तीर्ण 
कर आभा करने लगे, अपनी आप विकीर्ण 
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मिली नौकरी किंतु वह, तनिक न आयी रास 
जुड़े वकालत से किये, अनथक सतत प्रयास 
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प्रगटीं माता शारदा, स्वप्न दिखाया एक 
करो काव्य रचना सतत, कर्म यही है नेक 
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'एकादशी महात्म्य' रच, किया पत्नि को याद 
व्यथा-कथा मन में राखी, भंग न हो मर्याद 
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रच कर 'माधव-माधवी', 'रुक्मिणी मंगल' काव्य 
बता दिया था कलम ने, क्या भावी संभाव्य 
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जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये।

संतानों-हित तीसरा, करना पड़ा विवाह 
संस्कार शुभ दे सकें, निज दायित्व निबाह 
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पा 'शकुंतला' हो गया, घर ममता-भंडार 
पाँच सुताएँ चार सुत, जुड़े हँसा परिवार 
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सावित्री सी सुता पा, पितृ-ह्रदय था मुग्ध 
पाप-ताप सब हो गए, अगले पल ही दग्ध 
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अधिवक्ता के रूप में, अपराधी का साथ 
नहीं दिया, सच्चाई हित, लड़े उठाकर माथ 
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दर्शन 'गलता तीर्थ' के, कर भूले निज राह 
'पयहारी' ने हो प्रगट, राह दिखाई चाह 
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महाकाव्य त्रयी का सृजन:
चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य 
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य

राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन 
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन
चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३ दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। 
'संतदास'-संपर्क से, पा आध्यात्म रुझान 
मन वृंदावन हो चला, भरकर भक्ति-उड़ान 
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'पुरुषोत्तम श्री राम चरित', रामायण-अनुवाद 
कर 'श्री कृष्ण चरित' रचा, सुना अनाहद नाद 
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'कल्कि विष्णु के चरित' को, किया कलम ने व्यक्त 
पुलकित थे मन-प्राण-चित, आत्मोल्लास अव्यक्त 
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प्रथम कृति में कथा विकास सहायक पदों तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। 
सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष 
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष

राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ) के आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा) में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि ( अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।

चंचरीक मधुरेश थे, मंजुल मृदुल मराल 
शंकर सम अमृत लुटा, पिया गरल विकराल 
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मोहन सोहन विमल या, वृन्दावन रत्नेश 
मधुकर सरस उमेश या , थे मुचुकुंद उमेश 
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प्रेमी गुरु प्रणयी वही, अंबु सुनहरी लाल 
थे भगवती प्रसाद वे, भगवद्भक्त रसाल
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सत्ताईस तारीख थी, और दिसंबर माह 
दो हजार तेरह बरस, त्यागा श्वास-प्रवाह 
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चंचरीक भू लोक तज, चित्रगुप्त के धाम 
जा बैठे दे विरासत, अभिनव ललित ललाम 
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उनमें प्रभु संजीव थे, भक्ति-सलिल में डूब 
सफल साधना कर तजा, जग दे रचना खूब 
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निर्मल तुहिना दूब पर, मुक्तामणि सी देख 
मन्वन्तर कर कल्पना, करे आपका लेख 
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जगमोहन काया नहीं, हैं हरि के वरदान 
कलम और कवि धन्य हो, करें कीर्ति का गान  
देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएँ चंचरीक सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में संपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक जी की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य सौभाग्य मिला।
कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़ 
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज

सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब 

चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब

चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान को देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर समग्र ग्रंथ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए। भारत सरकार को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में चंचरीक जी पर पीठ स्थापित की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए। चंचरीक जी की सभी संतानें प्रभु-कृपा से समर्थ और सम्पन्न हैं। पितृ ऋण चुकाना संतान का कर्तव्य है। सभी संतानें मिलकर एकमुश्त राशि बैंक में जमाकर उसके ब्याज से प्रति वर्ष ''चंचरीक अलंकरण'' किसी श्रेष्ठ साहित्यकार अथवा कृति को देने की व्यवस्था कर सकते हैं। चंचरीक जि जिस मंदिर में ईशाराधना करते थे, वहाँ कृष्ण लीला गायन प्रतिस्पर्धा का आयोजन कर श्रेष्ठ स्पर्धियों को पुरस्कृत कर स्वस्थ परंपरा स्थापित की जा सकती है।                    
चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत 
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत


दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम


चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य 
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य


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संपर्क: विश्व वाणी हिंदी शोध-साहित्य संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, www.divyanarmada.in  

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