रविवार, 19 नवंबर 2017

काव्य वार्ता 
नाम से, काम से प्यार कीजै सदा 
प्यार बिन जिंदगी-बंदगी कब हुई? -संजीव 
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बन्दगी कब हुई प्यार बिन जिंदगी 
दिल्लगी बन गई आज दिल की लगी
रंग तितली के जब रँग गयीं बेटियाँ
जा छुपी शर्म से आड़ में सादगी -मिथलेश
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छोड़ घर मंडियों में गयी सादगी
भेड़िये मिल गए तो सिसकने लगी
याद कर शक्ति निज जब लगी जूझने
भीड़ तब दुम दबाकर खिसकने लगी -संजीव
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