बंगाली भाषा की हम सब करें वंदना
देश एक हो परम पिता से करें प्रार्थना
.
प्रमुख आर्य भाषा जनगण के मन को भाती
मधुर 'साधुभाषा' साहित्यिक युग की थाती
'प्रमिता' मानक रूप बांग्ला का कहलाता-
'चलताभाषा' बोल-चाल में बोली जाती
बंग निवासी सभ्य सरल मिल करें साधना
बंगाली भाषा की हम सब करें वंदना
देश एक हो परम पिता से करें प्रार्थना
.
प्राकृत-मगधी से विकसित भाषा आती सुंदर
चौदह स्वर, तैंतिस व्यंजन जानें कह सस्वर
गहें विरासत कल की, कल को दे पाएँ हम
ब्राह्मी से विकसित लिपि जान अनवरत पढ़कर
अक्षर शब्द वाक्य कविता रच भाव समझना
बंगाली भाषा की हम सब करें वंदना
देश एक हो परम पिता से करें प्रार्थना
.
परमहंस गुरुदेव शरत अरबिंदो बंकिम
केशव बाघा बोस गरजते, डरते हाकिम
उठो-जगो का मंत्र विवेकानंद दे गए
नेताजी ने सब जग में फहराया परचम
हिन्दी से मिल गले, दूर परभाषा रखना
बंगाली भाषा की हम सब करें वंदना
देश एक हो परम पिता से करें प्रार्थना
०००
भारतीय स्वातंत्र्य समर में बंगालियों का अवदान १
आचार्य इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भारतीय राष्ट्रवाद का प्रखर और उग्र रूप बंगाल की माटी, लोक, भाषा और संस्कृति में सनातन काल से विद्यमान रहा है। २३ जून १७५७ को प्लासी और १७६४ में बक्सर युद्धों में हार के बाद बंगाल-बिहार का पूर्व मुगल प्राँत १७७२ में सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। १९१० तक कलकत्ता भारत में ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों के साथ-साथ बंगाल प्राँत की राजधानी तथा शिक्षा का केन्द्र था। १७७५ से १९४१ तक बंगाल में पुनर्जागरण (राजा राम मोहन राय के जन्म से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु तक) का उदय देखा गया। इसका प्रभाव बंगाली राष्ट्रवाद अभ्युदय के रूप में हुआ। पश्चिमी संस्कृति, विज्ञान और शिक्षा के प्रसार से बंगाली समाज आधुनिक संस्कृति, बौद्धिक और वैज्ञानिक गतिविधियों, राजनीति और शिक्षा का केंद्र बन गया। ब्रह्म समाज और रामकृष्ण मिशन जैसे सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण के आंदोलन बंगाल के घर घर तक पहुँचे। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, राजा राम मोहन रॉय, महर्षि अरबिंदो घोष, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, बंकिम चंद्र चटर्जी, देबेंद्रनाथ ठाकुर, माइकल मधुसूदन दत्त, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, जीबनानंद दास, सत्येन्द्र नाथ बोस, जगदीश चंद्र बोस, काजी नजरूल इस्लाम आदि के कार्यों के साथ बंगाली साहित्य, कविता, धर्म, विज्ञान और दर्शन का व्यापक विस्तार हुआ। यंग बंगाल और जुगाँतर आंदोलनों और अमृता बाजार पत्रिका जैसे समाचार पत्रों ने भारत के बौद्धिक विकास का नेतृत्व किया। कलकत्ता स्थित भारत के आरंभिक राजनीतिक संगठन थे। जान हथेली पर लेकर अंग्रेज शासन से टकरानेवाले भारतीय स्वतंत्रता सेनानी बंगाली क्रांतिकारी बाघा जतीन, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल कुमार चाकी, वीणा दास, प्रीतिलता वद्देदार, और बटुकेश्वर दत्त आदि अनगिनत ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों ने इंडियन नेशनल एसोसिएशन, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन, युगान्तर और अनुशीलन समिति (स्थापना २४ मार्च १९०३) जैसे संगठनों के माध्यम से देश को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। आयी, इनमें से कुछ क्रांतिकारियों की चर्चा कर सबको श्रद्धा सुमन समर्पित हैं।
एक वे थे जो मुल्क पर कुर्बान हो गए
एक हम हैं जो उनका नाम तक नहीं लेते
केशव चन्द्र सेन
केशव चन्द्र सेन (१९ नवम्बर १८३८- ८ जनवरी १८८४) के दादा रामकमल सेन एक लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार और शिक्षाविद तथा पिता ईस्ट इण्डिया कम्पनी के निष्ठावान अधिकारी थे, माँ शारदा देवी ने अपने पुत्र को धार्मिक शिक्षा दी। केशव ने वर्ष १८५६ में उन्होंने हिन्दू कॉलिज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। १८६० में ब्रह्म समाज से जुड़े केशव अंग्रेजी, बंगाली और संस्कृत साहित्य के एक प्रकाण्ड विद्वान थे।वे नैतिक, अध्यात्मिक और मानवीय शिक्षा, छूआछूत उन्मूलन एवं जाति व्यवस्था, महिलाओं में शिक्षा का प्रचार करने, देशी भाषा के प्रचार करने तथा शिक्षा और आत्मसंयम पर जोर देने आदि के विकास के हिमायती थे। केशवचन्द्र सेन ने ही आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती को सलाह दी की वे सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी में करें। सन् १८६२ में उन्होंने ब्रह्म समाज के अन्तर्गत प्रथम अन्तर्राजीय विवाह किया। उन्होंने अथक प्रयास कर अंग्रेजसरकार से १८७२ में ब्रह्म विवाह अधिनियम को लागू करवाया। केशव सेन ने इण्डियन मिरर, धर्मतत्व, बालबोधिनी पत्रिका, सुलभ समाज, मैड का गुरल, धर्म, साधना, बालकबन्धु, परिचारिका और न्यू डिसपेनसन आदि का संपादन-प्रकाशन कर समाज को जाग्रत किया। १८५७ से १८८४ तक उन्होंने लगभग सम्पूर्ण भारत का दौरा किया। कूच बिहार के राजकुमार से उनकी छोटी पुत्री के विवाह को लेकर उनके अनुयायियों के साथ उनका मतभेद हो गया। इस घटना ने ब्रह्म समाज में दूसरे विभाजन को जन्म दिया। सन् १८६६ में केशव सेन ने पुराने ब्रह्म समाज के स्थान पर भारत में नये ब्रह्म को स्थापित किया। सन् १८७० में वे इंग्लैण्ड गये। इंग्लैण्ड में उनका गरम जोशी से स्वागत किया गया। उन्होंने असंख्य लोकप्रिय नेताओं से भेंट की तथा नवीन विक्टोरिया के साथ मुलाकात की।
प्रताप चन्द्र मजूमदार
प्रताप चन्द्र मजूमदार ( १८४० हुगली - २४.५.१९०५ कलकत्ता) का जन्म एक उच्च मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी सन् १८५९ में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलिज में प्रवेश ले लिया, जल्दी ही वे देवेन्द्रनाथ टैगोर तथा केशव चंद्र सेन के शिष्य होकर ब्रह्म समाज की तरफ प्रवृत्त हुए। बंकिम चंद्र चटर्जी और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी इनके निकट के सहयोगी थे।उन्होंने भारत और विदेशों की व्यापक स्तर पर यात्रा की तथा सन् १८९३ में शिकागो में एक धार्मिक संसद को संबोधित किया। वे ब्रह्म समाज के संदेश और प्रचार को भारत के विभिन्न भागों में अखबार और पत्रों के माध्यम से फैलाने में महत्त्वपूर्ण कारक थे। उन्होंने अनेक पत्रों को सहयोग दिया तथा ब्रह्म समाज की नव विधान शाखा के सबसे महत्त्वपूर्ण अगुवा बन गये। वे उदारवादी शिक्षा और समाज सुधारों के लिए सुदृढ़ रहे। ये समाज में जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते थे। इन्होंने युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए एक संस्था की स्थापना की थी जो बाद में कोलकाता विश्वविद्यालय का हिस्सा बन गई। इन्होंने कई ग्रंथों की रचनाएं भी की थी।
रामानन्द चैटर्जी
रामानन्द (२९ मई, १८६५ बांकुड़ा - ३० सितंबर १९४३ कलकत्ता) ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से सन १८९० में अंग्रेजी में स्नात्तकोत्तर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वे आचार्य जगदीश चन्द्र बोस, शिवनाथ शास्त्री व ब्रह्म समाज से अत्यंत प्रभावित हुए। भारतीय पत्रकारिता के जनक रामानंद ने ने प्रवासी, बंगाल भाषा, मॉडर्न रिव्यु (अंग्रेजी) तथा 'विशाल भारत' जैसी पत्रिकाएँ निकाली। उन्हें रामानन्द लीग ऑफ नेशनल्स द्वारा निमन्त्रण मिला और वे सन् १९२६ में जेनेवा दौरे पर गए। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रबल समर्थक थे। कुछ वर्ष पश्चात् उन्होंने कांग्रेस राष्ट्रवादी पार्टी और हिन्दू सभा का सहयोग दिया। रामानन्द सम्पादकीय विचार की स्वाधीनता के प्रबल समर्थक थे। उनकी पत्रकारिता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली। राष्ट्र संघ ने उन्हें अपनी कार्यवाही का अवलोकन करने के लिए जिनेवा आमंत्रित किया। उन्होंने यूरोप के कई देशों की यात्रा की और लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नज़दीक से समझा। रूस से भी उन्हें निमंत्रण मिला, लेकिन वहाँ अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों को देखते हुए उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। यह निर्णय उनके सिद्धांतवादी स्वभाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का प्रमाण था।
बाघा जतीन (जोतिन)

यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय (जतीन्द्रनाथ मुखर्जी ०७ दिसम्बर १८७९ जैसोर - १० सितम्बर १९१५) के पिता का देहावसान पाँच वर्ष की अल्पायु में ही हो गया। माँ ने बड़ी कठिनाई से उनका लालन-पालन किया। १८ वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली और परिवार के जीविकोपार्जन हेतु स्टेनोग्राफी सीखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए। वह बचपन से बहुत बलिष्ठ थे। २७ वर्ष की आयु में जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक बाघ (रॉयल बेन्गाल टाइगर) से हो गई। उन्होंने बाघ को अपने हँसिए से मार गिराया तथा "बाघा जतीन" नाम से विख्यात हो गए। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय दार्शनिक क्रान्तिकारी व प्रमुख क्रांतिकारी संगठन युगान्तर पार्टी के मुख्य नेता थे। अंग्रेजों की बंग-भंग की योजना की बंगालियों ने विरोध खुल कर किया। यतींद्र नाथ मुखर्जी ने साम्राज्यशाही की नौकरी को लात मारकर आन्दोलन की राह पकड़ी। सन् १९१० में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करते वक्त यतींद्र नाथ 'हावड़ा षडयंत्र केस' में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें साल भर की जेल काटनी पड़ी। जेल से मुक्त होने पर वह 'अनुशीलन समिति' के सक्रिय सदस्य बन गए और 'युगान्तर' का कार्य संभालने लगे। उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-' पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है। देसी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी माँग है।' क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था। दुलरिया नामक स्थान पर भीषण डकैती के दौरान अपने ही दल के एक सहयोगी की गोली से क्रांतिकारी अमृत सरकार घायल हो गए। विकट समस्या यह हुई कि धन लेकर भागे या साथी के प्राणों की रक्षा करें? अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर भागो। जतींद्र नाथ इसके लिए तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- 'मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।' इन डकैतियों में 'गार्डन रीच' की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है। इसके नेता यतींद्र नाथ मुखर्जी थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौर में कलकत्ता में राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कम्पनी की एक गाड़ी रास्ते से गायब कर क्रांतिकारियों को ५२ मौजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सरकार हो ज्ञात हो चुका था कि 'बलिया घाट' तथा 'गार्डन रीच' की डकैतियों में यतींद्र नाथ का हाथ था।
९ सितंबर १९१५ को पुलिस ने जतींद्र नाथ का गुप्त अड्डा 'काली पोक्ष' (कप्तिपोद) से राज महन्ती नमक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की। बढ़ती भीड़ को तितर-बितर करने के लिए यतींद्र नाथ ने गोली चला दी। राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार पाकर बालासोर का जिला मजिस्ट्रेट किल्वी दल-बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर 'पानी-पानी' चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- 'गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। 'इसके अगले दिन भारत की आज़ादी के इस महान सिपाही ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं।
वारीन्द्र घोष (बारिन घोष)
बारिन घोष (५.१.१८८०-१८.४.१९५९) महर्षि अरबिंदो के छोटे भाई थे और बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों के जनक थे। वे 'युगांतर' और 'दैनिक वसुमति' प्रकाशनों से जुड़े, पत्रकारिता की, पेरिस से बम बनाने की विधि सीखकर आए, साथियों के साथ ११ रिवॉल्वर, ४ राइफल और १ बंदूक एकत्र की उल्लास कर दत्त, हेम चंद्र दास आदि ने बम बनाना आरंभ किया। कुछ अत्याचारी अंग्रेज अधिकारियों का अंत कर दिया गया। बंदी बनाए गए मुकेश चंद्र पाल की रिहाई के लिए मद्रास में आंदोलन किया गया। अलीपुर बम कांड में मृत्यु दंड की सजा मिली जिसे बदल कर आजीवन कारावास कर दिया गया, अंडमान की सेल्यूलर जेल में बंदी रहे, आजीवन कारावास की सज़ा काट कर लेखन की ओर मुड़ गए।आत्मकथा 'कारा काहिनी' लिखी। आध्यात्म की ओर मुड़े और ठाकुर अनुकूल चंद्र के शिष्य बने।
भूपेन्द्रनाथ दत्त
भूपेन्द्रनाथ दत्त स्वामी विवेकान्द के भाई थे उनका जन्म ४ सितम्बर १८८० को हुआ। भुपेन्द्रनाथ ने पण्डित ईश्वर चन्द्र द्वारा स्थापित स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा सम्पन्न की। वे सन १९०२ में बंगाल रिवोल्यूश्नरी सोसइटी से जुड़े तथा १९०७में युगान्तर के सम्पादक नियुक्त हुए। उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। रिहाई के पश्चात् उन्हें विदेशों में जाने की सलाह दी गयी। तदन्तर वे अमेरिका प्रस्थान कर गये। उन्होंने न्यूयार्क विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा ब्रूम विश्वविद्यालय से सन १९१४ में स्नातकोतर की परीक्षा उत्तीण की। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे जर्मनी से कार्यरत थे। अमेरिका में उन्होंने स्वयं को गदर पार्टी के निकट रखा तथा १९२५ में भारत लौटकर १९२५ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए। ट्रेड यूनियन लीडर तथा सशक्त लेखक भूपेन्द्रनाथ की प्रमुख रचनाएँ डाइलेक्टीस ऑफ हिन्दू रिट्यूलिज्म, स्वामी विवेकान्द पेट्रिआट प्रोफेट, ओरिजन एण्ड डेवलपमेन्ट आफ इण्डियन साशल पॉलाइटी आदि हैं। २५ दिसम्बर, १९६१ को उनका देहान्त हो गया।
रास बिहारी बोस
रास बिहारी बोस (२५ मई १८८६ सुबलदाहा, बर्धमान -
२१ जनवरी १९४५) के पिता बिनोद बिहारी बोस और माता भुवनेश्वरी अपने चाचा कालीचरण बोस की विधवा बिधुमुखी के घर में रहते थे। टिंकोरी दासी रास बिहारी बोस की पालक माता थीं। बोस और उनकी बहन सुशीला की प्रारंभिक शिक्षा कालीचरण की देखरेख में हुई। अपने दादा और शिक्षक (बक्केश्वर) से क्रांतिकारी आंदोलन की कहानियाँ सुनकर बोस इस ओर आकर्षित हुए। वे पूरे गांव के चहेते थे और अपने जिद्दी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनका उपनाम रसू था। गांव वालों से पता चलता है कि वे 12 या 14 साल की उम्र तक सुबलदाहा में रहे। पिता की हुगली जिले में तैनाती के समय बोस चंदननगर स्थित अपने ननिहाल में रहे और चचेरे भाई श्रीश चंद्र घोष के साथ डुप्लेक्स कॉलेज में पढ़े । प्रधानाचार्य चारु चंद्र रॉय ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कलकत्ता के मॉर्टन स्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। १९०८ के अलीपुर बम कांड के मुकदमों से बचने के लिए वे बंगाल छोड़कर वन अनुसंधान संस्थान देहरादून में मुख्य क्लर्क हो गए। वहाँ, जुगंतर के अमरेंद्र चटर्जी के माध्यम से वे गुप्त रूप से बंगाल के क्रांतिकारियों से जुड़े। १९१२में लॉर्ड हार्डिंग पर जानलेवा हमला में, उन्होंने अनुशीलन समिति के बसंत कुमार बिस्वास के साथ मिलकर लॉर्ड हार्डिंग के काफिले पर एक स्वयंनिर्मित बम फेंका, जिससे वायसराय गंभीर रूप से घायल हो गए। वे रात की ट्रेन से देहरादून लौटकर अगले दिन कार्यालय में ऐसे शामिल हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने वायसराय पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले की निंदा करने के लिए नागरिकों की एक बैठक आयोजित की। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान, बोस का संपर्क जतिन मुखर्जी से हुआ, जिनमें उन्हें "एक सच्चा नेता" नज़र आया, जिसने बोस के कम होते उत्साह को "एक नई प्रेरणा" दी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे गदर विद्रोह १९१५ के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। क्रांति विफल रही और अधिकांश क्रांतिकारी किध किए गए। बोस ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों से बचकर वींद्रनाथ टैगोर के रिश्तेदार प्रियनाथ ठाकुर के छद्म नाम सेजापान पहुँच गए। वहाँ बोस ने विभिन्न अखिल एशियाई समूहों के साथ शरण ली। ब्रिटिश सरकार उनके प्रत्यर्पण के लिए जापानी सरकार पर लगातार दबाव डाल रही थी। बचने के लिए उन्होंने टोक्यो में नाकामुराया बेकरी के मालिक और अखिल एशियाई समर्थक आइज़ो सोमा और कोक्को सोमा की बेटी तोशिको सोमा (निधन १९२४) से शादी की और १९२३ में जापानी नागरिक बनकर पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे। उन्होंने जापान में भारतीय करी को लोकप्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके दो बच्चे बेटा मसाहिदे बोस (भरतचंद्र जन्म १९२०, द्वितीय विश्व युद्ध में २४ वर्ष की आयु में मृत्यु) तथा बेटी तेत्सुको (जन्म १९२२)थे। बोस ने ए.एम. नायर के साथ मिलकर जापानी अधिकारियों को भारतीय क्रांतिकारियों का समर्थन करने के लिए राजी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने २८-३० मार्च १९४२ को टोक्यो में एक सम्मेलन आयोजित कर भारतीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक सेना गठित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने २२ जून १९४२ को बैंकॉक में लीग के दूसरे सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और अध्यक्ष के रूप में कमान संभालने के लिए आमंत्रित करने का प्रस्ताव पारित कराया। मलाया और बर्मा मोर्चों पर जापानियों द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय युद्धबंदियों को भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल होने और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के सैनिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। १ सितंबर १९४२ को रास बिहारी बोस की भारतीय राष्ट्रीय लीग की सैन्य शाखा के रूप में भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया गया था। उन्होंने आज़ाद हिंद आंदोलन के लिए ध्वज का चयन किया और ध्वज तथा सत्ता सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी जो 'आज़ाद हिंद फौज' बनी। तपेदिक से उनकी मृत्यु से पहले, जापानी सरकार ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया।
कन्हाई लाल दत्त
कन्हाई लाल दत्त (३० अगस्त १८८८ जन्माष्टमी चंदन नगर, हुगली - १० नवंबर १९०८, अलीपुर, मूल नाम सर्वतोष) का जन्म जन्माष्टमी को मामा के घर में हुआ। उनका आर्किशिक नाम सर्वतोष था। चंदन नगर टैब फ्रांसीसी उपनिवेश था। उनका पैतृक घर बंगाल के श्रीरामपुर में था। चार साल के कन्हाई को उनके पिता चुन्नीलाल दत्त जो सरकार की सेवा में थे, उन्हें बंबई ले गए। ५ साल मुंबई में रहने के बाद ९ साल की उम्र में वह वापस चंदन नगर आ गए और डुप्ले कॉलेज से स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। उनकी राजनीतिक गतिविधियों के चलते ब्रिटिश सरकार ने उनकी डिग्री रोक ली। चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रांति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था। चंदन नगर में क्रांति की योजना बनाने वाले ब्रम्ह बाँधव उपाध्याय के संपर्क में कन्हाई युगांतर कार्यालय में काम करने लगे, अपने घर में ही कोलकता की अनुशीलन समिति की एक शाखा बनाई और बाद में अपने क्षेत्र में पाँच अन्य संस्थाओं की भी स्थापना की। इनमें व्यायाम और लाठी आदि की शिक्षा दी गई थी। खुदीराम बोस द्वारा पुराने ज्वालामुखी बम कांड के कारण चौकन्ने अंग्रेजी शासन को मानिकतल्ला की एक गोदाम में क्रान्तिकारियों के अड्डे का पता चला। यह बागान अरविंद घोष के भाई सिविल सर्जन डॉक्टर वारिन्द्र घोष का था। दुर्भाग्य से क्रांतिकारी गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे। १९०५ के बंगाल विभाजन विरोधी आन्दोलन में कनाईलाल ने भाग लिया तथा आन्दोलन के नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के सम्पर्क में आए। अप्रैल १९०८ को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर हमला किया। इस हमले के आरोपी के रूप में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष और बारीन्द्र कुमार आदि को गिरफ्तार किया गया। उन्हीं के बीच का एक साथी नरेन गोस्वामी सरकारी मुखबिर बन गया। इस मुखबिर से उसके बयान के पूर्व बदला लेने के लिए कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस ने मुलाकात के समय कटहल और मछली में छिपकर गुप्त रूप से जेल में रिवाल्वर और कारतूस मँगवाए। योजनानुसार पहले सत्येन बोस, उसके बाद कनाईलाल बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए। दोनों ने अस्पताल के स्टाफ का विश्वास जीता। सत्येन ने मुखबिर नरेन गोस्वामी के पास खुद को सरकारी गवाह बनने का संदेश भिजवाया। नरेन प्रसन्न होकर सत्येन से मिलने जेल अस्पताल पहुँचा। ३१ अगस्त सन १९०८ को कनाईलाल और सत्येन बोस ने उसे गोलियों से ढेर कर दिया। दोनों को मृत्युदंड मिला। कन्हाई को १० मार्च १९०८ को तथा सत्येन्द्र को दो दिन बाद प्राण दंड दिया गया। जन आक्रोश के भी से सरकार ने कन्हाई का अंतिम संस्कार जेल में ही कराया।
प्रफुल्ल चंद्र चाकी
प्रफुल्ल चाकी का जन्म उत्तरी बंगाल के जिले बोगरा के एक गांव में १० दिसंबर १८८८ को वर्तमान बांग्लादेश के बोगरा ज़िले में हुआ। वे मध्यवर्गीय हिन्दू कायस्थ परिवार से थे। वे माता सवर्णोमोई देवी तथा पिता राज नारायण की पाँचवी संतान थे। मात्र ९ वर्ष की अवस्था में उनके सिर से पिता का साया उठ गया। माँ ने अनेक कठिन समस्याओं का सामना कर पुत्र को हाई स्कूल तक पढ़ाया। किशोर प्रफुल्ल दिनेश चंद्र रॉय कर नाम से भी जाने जाते थे। वे कलकत्ता के जगन्तर क्रांतिकारी समूह में बिरेन्द्र कुमार के निकट सम्पर्क में आए। एक क्रूर अंग्रेज अधिकारी किंग्स फोर्ड के दमन को मिटाने के लिए प्रफुल्ल को उसकी हत्या की जिम्मेवारी दी गई। चाकी तथा खुदी राम बोस नेकिंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखी किन्तु ३० अप्रैल १९०८ गलती से किसी अन्य वाहन को विस्फोट से उड़ा दिया। १ मई १९०८ को रेलगाड़ी से समस्तीपुर से मोकामा पहुँचे प्रफुल्ल को पहचानकर पुलिस अधिकारी नंद लाल बैनर्जी ने गिरफ्तार करना चाहा तो उन्होंने स्वयं को गोली मार ली और मातृभूमि पर शहीद हो गए। वर्ष २०१० में शहीद प्रफुल्ल चंद्र चाकी पर डाक टिकिट जारी किया गया।
शरत चन्द्र बोस
शरत चन्द्र बोस (६ सितम्बर १८८९ कलकत्ता-२० फरवरी १९५०) को हुआ। उनके पिता जानकी नाथ बोस उड़ीसा में कटक के एक प्रमुख अधिवक्ता थे। वे सुभाष चन्द्र बोस के बड़े भाई थे, दोनों भाई एक-दूसरे के प्रति अत्यन्त समर्पित थे। शरत चन्द्र की शिक्षा-दीक्षा कटक तथा कलकत्ता में सम्पन्न हुई। उन्होंने इंग्लैण्ड से कानून में शिक्षा प्राप्त की तथा घर वापिस लौटकर उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट से अपनी वकालत शुरू कर दी। शरत की वकालत दिन पर दिन फलने-फूलने लगी। शरत चंद्र ने सी.आर. दास के निर्देशन में अपने कैरियर की शुरुआत की तथा कलकत्ता निगम के कार्यों में वर्षों तक चर्चित रहे। उन्होंने 'ओरिएंट न्यूज़ एजेंसी' (१९२९) और 'डोनेशन' अखबार (१९४०) की स्थापना की।अहिंसा में विश्वास रखने के बावजूद उनका क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति का दृष्टिकोण था। वे काँग्रेस कार्यकारी समिति के सदस्य थे तथा बंगाल विधान सभा में काँग्रेस संसदीय पार्टी के नेता थे। उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर INA (इंडियन नेशनल आर्मी) के गठन में मदद की और बाद में उसकी जिम्मेदारी संभाली। वे अगस्त १९४६ में केंद्र की अंतरिम सरकार में खान व ऊर्जा मंत्री बने। शरत ने बंगाल विभाजन का विरोध किया था। वे बंगाल को भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वाधीन राज्य बनाना चाहते थे किंतु इसमें असफल रहे।
खुदीराम बोस
खुदीराम बोस (३.१२.१८८९-११.८.१९०८) का जन्म जिला मिदनापुर के हबीबपुर गाँव में हुआ। केवल, सात वर्ष की आयु में उनके पिता का देहान्त होने पर पालन-पोषण उनकी बड़ी बहन अपरूपा राय ने किया। खुदीराम बोस ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में प्राप्त की तथा बाद में बिरदानपुर से ग्रहण की। खुदीराम बोस का ध्यान बंगाल विभाजन के विद्रोह ने सतेन बोस के मागदर्शन में स्वाधीनता की ओर खींचा। खुदी रामबोस तथा चाकी ने मिलकर मुजफ्फरपुर के सेशन जज श्री किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई परन्तु गलती से उन्होंने दो महिलाओं को ले जाने वाली बग्घी के बम से चिथड़े उड़ा दिये। खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया उन्होंने बम फैंकने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गयी तथा १९०८ को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया।
सूर्य सेन (मास्टर दा)
सूर्य कुमार सेन (२२ मार्च १८९४ नोआपारा, चटगाँव – १२ जनवरी १९३४) के पिता राम निरंजन सेन (वैद्य परिवार) शिक्षक थे। सूर्य सेन १९१६ में मुर्शिदाबाद के बेरहामपुर कॉलेज (कृष्णनाथ कॉलेज) में बी.ए. के छात्र थे, तब उन्होंने अपने शिक्षक सतीश चंद्र चक्रबर्ती से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की जानकारी पाई। सेन १९१८ में चटगांव आए और स्थानीय राष्ट्रीय विद्यालय में शिखसक होकर 'मास्टर दा' कहलाए। वे १९१८ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की चटगाँव शाखा के अध्यक्ष तथा असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदार थे। उन्होंने युवा जोशीले क्रांतिकारियों का 'चटगांव समूह' संगठित किया। इसमें अनंत सिंह, गणेश घोष और लोकेनाथ बाल शामिल थे जिन्होंने
आंदोलन को गति देने के लिए असम-बंगाल रेलवे के खजाने से नकदी लूटी, उन्हें साथी क्रांतिकारी अंबिका चक्रबर्ती के साथ १९२६ से १९२८ तक कारावास भोगा। सेन कहते थे- " मानवतावाद एक क्रांतिकारी का विशेष गुण है।" १८ अप्रैल १९३० को
सेन ने क्रांतिकारियों के एक समूह का नेतृत्व कर चटगाँव में पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागारों पर छापा मारा। योजना शस्त्रागार से हथियार लूटन और शहर की संचार व्यवस्था (टेलीफोन, तार और रेलवे सहित) नष्ट करचटगांव को ब्रिटिश राज के बाकी हिस्सों से अलग करना उनका लक्ष्य था। समूह ने हथियार लूट लिए लेकिन वे गोला-बारूद पर कब्जा करने में असफल रहे। उन्होंने शस्त्रागार परिसर में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया और भाग निकले। कुछ दिनों बाद, क्रांतिकारी समूह के एक बड़े हिस्से को जलालाबाद पहाड़ी पर ब्रिटिश भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने घेर लिया। इसके बाद हुए भीषण युद्ध में ८० से अधिक ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिक और १२ क्रांतिकारी मारे गए, सेन और अन्य बचे क्रांतिकारी छोटे-छोटे समूहों में पड़ोसी गाँवों में छिप गए और सरकारी कर्मचारियों और संपत्ति पर हमले किए।
सेन छिपकर रहे और एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे। कभी उन्होंने मजदूर, किसान, पुजारी, घरेलू कामगार के रूप में काम किया या फिर एक धर्मनिष्ठ मुसलमान के रूप में भी छिपे रहे। इस तरह वे अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने से बचते रहे। अपने करीबी खिरोदप्रोवा बिस्वास के घर में छिपे हुए थे।
बिस्वास के रिश्तेदार नेत्र सेन की सूचना पर सेन को १६ फरवरी १९३३ को पुलिस गिरफ्तार किया और १२ जनवरी १९३४ को
तारकेश्वर दस्तीदार नामक क्रांतिकारी के साथ फाँसी दे दी गई। उनके कई साथी क्रांतिकारियों को लंबी अवधि के कारावास की सजा सुनाई गई।
किरणमय सेन और रबींद्र नंदी नामक क्रांतिकारियों ने गद्दार नेत्र सेन के घर में घुसकर एक लंबी छुरी से उसका सिर काट दिया। नेत्र सेन की पत्नी सूर्य सेन की समर्थक थीं, उन्होंने नेत्र सेन की हत्या करनेवाले क्रांतिकारियों के नाम कभी नहीं बताए। अपने आखिरी पत्र में उन्होंने लिखा- "मृत्यु मेरे द्वार पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनंत काल की ओर विचरण कर रहा है। ऐसे सुखद, ऐसे गंभीर और ऐसे पवित्र क्षण में, मैं तुम्हारे लिए क्या छोड़ जाऊँगा? केवल एक ही चीज़, वह है मेरा सपना, एक सुनहरा सपना - स्वतंत्र भारत का सपना। १८ अप्रैल, १९३० की तारीख को कभी मत भूलना, चटगाँव में पूर्वी विद्रोह का दिन। भारत की स्वतंत्रता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले देशभक्तों के नाम लाल अक्षरों में लिख लेना।" भारतीय फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने सेन के जीवन पर आधारित फिल्म 'खेलें हम जी जान से ' (२०१०) का निर्देशन किया। अभिनेता अभिषेक बच्चन ने सेन की भूमिका निभाई। एक अन्य फिल्म, 'चिट्टागोंग ' (२०१२), का निर्देशन बेदाब्रता पेन ने किया था , सेन के शस्त्रागार छापे पर आधारित थी। मनोज बाजपेयी ने मुख्य भूमिका निभाई। सूर्य सेन बांग्लादेश और भारत दोनों में एक अत्यंत सम्मानित व्यक्ति हैं। ढाका विश्वविद्यालय और चटगाँव विश्वविद्यालय दोनों में उनके नाम पर आवासीय हॉल का नाम रखा गया है । कोलकाता में एक मेट्रो रेलवे स्टेशन और एक सड़क का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है।
सुभाषचन्द्र बोस (२३ जनवरी १८९७ कटक उड़ीसा - १६ सितंबर १९८५ अयोध्या) के पिता रायबहादुर जानकीनाथ बोस और माँ प्रभावती कुलीन कायस्थ परिवार से थे।उनकी ६ बेटियों और ८ बेटों में सुभाष ९वीं सन्तान और ५ वें बेटे थे। सुभाष ने कटक के प्रोटेस्टेण्ट स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर १९०९ में रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया, १५ वर्ष की आयु में विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया, १९१६ में दर्शन शास्त्र (ऑनर्स) बी.ए. में छात्रों का नेतृत्व संभाला, उन्हें एक साल के लिये निकाल दिया गया। वे १९१९ में बीए (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम श्रेणी कलकत्ता विश्वविद्यालय में द्वितीय आए। आईसीएस परीक्षा हेतु १५ सितम्बर १९१९ को वे इंग्लैण्ड चले गये था १९२० में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए पास कर ली। अंग्रेजों की गुलामी असह्य होने के कारण २२ अप्रैल १९२१ को भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा तथा जून १९२१ में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आए रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह परवे २० जुलाई १९२१ को गाँधी जी से मुंबई में मिले। गाँधी द्वारा ५ फरवरी १९२२ को चौरीचौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन बंद करने के विरोध में १९२२ में देशबंधु चितरंजन दास ने स्वराज पार्टी बनाकर कोलकाता महापालिका का चुनाव जीता, वे कोलकाता के मेयर तथा सुभाष प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने। जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाष ने इण्डिपेण्डेंस लीग बनकर १९२७ में साइमन कमीशन को काले झण्डे दिखाए। भारत का भावी संविधान बनाने हेतु गठित आठ सदस्यीय आयोग (मोतीलाल नेहरू अध्यक्ष,सुभाष एक) ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। कांग्रेस वार्षिक अधिवेशन १९२८ में अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिये एक साल का वक्त दिया गया। अंग्रेज़ सरकार ने यह माँग पूरी नहीं की। इसलिये १९३० में कांग्रेस अधिवेशन लाहौर (जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष) में २६ जनवरी स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मने का निर्णय लिया गया। २६ जनवरी १९३१ को कोलकाता में राष्ट्रध्वज फहराकर सुभाष एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे,पुलिस ने उन पर लाठी प्रहार कर उन्हें घायल कर जेल भेज दिया। जब सुभाष जेल में थे तब गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया पर सरकार ने भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को रिहा न किया। सुभाष गाँधी और कांग्रेस के तरीकों से नाराज हो गये। अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को ११ बार कारावास हुआ। सन् १९३३ से १९३६ तक सुभाष यूरोप में रहे। वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वलेरा सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये। १९३४ में पिता की मृत्यु होने कराची होते हुए कोलकाता लौटे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर वापस यूरोप भेज दिया। १९३४ में ऑस्ट्रिया में पुस्तक लिखने हेतु अंग्रेजी टाइपिस्ट ऑस्ट्रियन महिला एमिली शेंकल को रखा। उनमें प्रेम हो गया। नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने १९४२ में बाड गास्टिन में हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया। वियेना में एमिली ने एक पुत्री अनिता बोस (अब अनीता फाफ) को जन्म दिया। १९३८ में कांग्रेस वार्षिक अधिवेशन में चुने गए अध्यक्ष सुभाष का स्वागत ५१ बैलों द्वारा खींचे गए रथ में किया गया। सुभाष ने योजना आयोग तथा विज्ञान परिषद की स्थापना कर क्रमश: जवाहरलाल नेहरू व सर विश्वेश्वरय्या को इनका अध्यक्ष बनाया। १९३८ में अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष गाँधी जी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हराकर जीत गए। १९३९ में त्रिपुरी जबलपुर में कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष तेज बुखार में स्ट्रेचर पर लिटाकर अधिवेशन में ले जाए गए। गाँधी जी का सहयोग न मिलने पर सुभाष ने २९ अप्रैल १९३९ को इस्तीफा देकर ३ मई १९३९ को फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। ३ सितम्बर १९३९ को ब्रिटेन - जर्मनी में युद्ध छिड़ने पर जुलाई १९४० को भारत की गुलामी का प्रतीक हालवेट स्तम्भ कलकत्ता सुभाष की यूथ ब्रिगेड ने रातों-रात मिट्टी में मिला दिया। फलत:, सुभाष सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी नेता कैद कर लिए गए। जेल में आमरण अनशन में स्वास्थ्य गंभीर होते ही सरकार ने उन्हें रिहा कर घर पर नजरबन्द कर दिया। १६ जनवरी १९४१ को पुलिस को चकमा देकर सुभक्ष पठान मोहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश में अपने घर सेगोमोह, धनबाद, पेशावर, काबुल होकर आरलैण्डो मैजोन्टा नामक इटालियन व्यक्ति के छद्म वेष में मास्को होते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे, रिबेन ट्रोप आदि नेताओं से मिले, भारतीय स्वतन्त्रता संगठन और आज़ाद हिन्द रेडियो की स्थापना की, जर्मन सरकार के एक मन्त्री एडॅम फॉन ट्रॉट से मित्रता कर २९ मई १९४२ को जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। हिटलर से सहायता न मिलने पर ८ मार्च १९४३ को जर्मनी के कील बन्दरगाह से आबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में मैडागास्कर (हिन्द महासागर) से तैरकर जापानी पनडुब्बी द्वारा पादांग बन्दरगाह इंडोनेशिया पहुँचे। वयोवृद्ध क्रांतिकारी रस बिहारी बोस ने सुभाष को सिंगापुर के एडवर्ड पार्क में स्वेच्छा से स्वतन्त्रता परिषद का नेतृत्व सुभाष को सौंप दिया। जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया। कई दिन पश्चात् नेताजी ने जापान की संसद (डायट) के सामने भाषण दिया। २१ अक्टूबर १९४३ को नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने। इस सरकार को जर्मनी, जापान, फ़िलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये।आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। पूर्वी एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण देकर वहाँ के स्थायी भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद देने का आह्वान किया। उन्होंने अपने आह्वान में यह सन्देश भी दिया - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।" द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने " दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परन्तु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसन्द किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श प्रस्तुत किया। ६ जुलाई १९४४ को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधी जी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने गान्धीजी को 'राष्ट्रपिता' तथा गाँधी जी ने उन्हें 'नेताजी' कहा। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी रूस से सहायता लेने १८ अगस्त १९४५ को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ रवाना हुए। २३ अगस्त १९४५ को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आते समय १८ अगस्त को ताइहोकू हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटना में जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट तथा कुछ अन्य मारे गए, नेताजी गम्भीर रूप से जल गए थे। उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया। कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया। सितम्बर के मध्य में उनकी अस्थियाँ संचित करके जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मन्दिर में रख दी गयीं।भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज़ के अनुसार नेताजी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात्रि २१ बजे बजे हुई थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिये १९५६ और १९७७ में दो आयोग बनाए। दोनों के अनुसार नेताजी उस विमान दुर्घटना में शहीद हो गये। १९९९ में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरे आयोग को २००५ में ताइवान सरकार ने बताया कि १९४५ में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। २००५ में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को दी अपनी रिपोर्ट में कहा कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं है। भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने स्वतन्त्रता के उपरान्त देश के क्रांतिकारियों के एक सम्मेलन का आयोजन किया था और उसमें अध्यक्ष के आसन पर नेताजी के तैलचित्र को आसीन किया था। यह एक क्रान्तिवीर द्वारा दूसरे क्रान्ति वीर को दी गयी अभूतपूर्व सलामी थी। नेताजी ने अपनी अपूर्ण आत्मकथा ऐन इंडियन पिलग्रिम (एक भारतीय यात्री) तथा दो खंडों में द इंडियन स्ट्रगल (भारत का संघर्ष) लिखी । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भूतपूर्व सरसंघचालक स्व. के. एस. सुदर्शन ने अयोध्या में अज्ञातवास में रहे गुमनामी बाबा को नेताजी मानते हु एक किताब की भूमिका लिखी थी। उनकी मृत्यु १६ सितंबर १९८५ को अयोध्या में हुई, और उनकी समाधि वहीं राम भवन में है।
गोपीनाथ साहा / गोपी मोहन साहा
क्रांतिकारी गोपीनाथ साहा (७ दिसंबर १९०५ सेरामपुर, हुगली – १ मार्च १९२४) पर सन 1901 में हुआ था। गोपीनाथ ने प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करअसहयोग आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया तथा अनेक बार जेल भी गए, किंतु आंदोलन के स्थगन से निराश होकर क्रांतिकारी गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़ गए। कलकत्ता में पुलिस डिटेक्टिव चीफ चार्ल्स टेगार्ट ने क्रान्तिकारियों पर बहुत ज़ुल्म कर रहा था। उसके कारण की क्रान्तिकारि फाँसी पर लटकाए जा चुके थे। १२ जनवरी १९२४ को चौरंगी रोड पर टेगार्ट के आने का समाचार पाकर घात लगाकर गोपीनाथ ने आगंतुक अंग्रेज़ को चार्ल्स टेगार्ट है समझ कर मार दिया। बाद में पता चला कि वह सिविलियन अंग्रेज़ अर्नेस्ट डे किसी कम्पनी में कार्य करता था। गोपीनाथ पर केस चला। २१ जनवरी १९२४ को पेशी पर उन्होंने जज से मुख़ातिब होकर बड़ी बेबाक़ी और बहादुरी से कहा, ‘कंजूसी क्यों करते हैं, दो-चार धाराएँ और भी लगाइए’। उच्च अदालत में पेशी पर उन्होंने कहा- "मैं तो चार्ल्स टेगार्ट को ठिकाने लगाना चाहता था, क्योंकि उसने देश-प्रेमी क्रान्तिकारियों को तंग कर रखा था लेकिन उसकी क़िस्मत अच्छी थी कि वह बच निकला और इस बात का दु:ख है कि एक मासूम व्यक्ति मारा गया। परन्तु मुझे विश्वास है कि कोई न कोई क्रान्तिकारी मेरी इस इच्छा को ज़रूर पूरी करेगा।" अदालत ने उनके इस बयान पर उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई। सज़ा सुनते ही वे खिलखिलाकर हँसे और बोले- "मैं फाँसी की सज़ा का स्वागत करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूँद भारत के प्रत्येक घर में आज़ादी के बीज बोए। एक दिन आएगा, जब ब्रिटिश हुक़ूमत को अपने अत्याचारी रवैये का फल भुगतना ही पड़ेगा।" १६ फरवरी १९२४ को गोपीनाथ को फाँसी की सजा सुना दी गई और एक मार्च १९२४ को ओल्ड अलीपुर जेल में उन्हें फाँसी दी गई। फाँसी के तख्ते पर गोपीनाथ प्रसन्न मुद्रा में पहुँचा। काल-कोठरी से लाने से कुछ क्षण पहले ही उन्होंने अपनी माँ को पत्र लिखा था- "तुम मेरी माँ हो, यही तुम्हारी शान है। काश! भगवान हर व्यक्ति
को ऐसी माँ दे जो ऐसे साहसी सपूत को जन्म दे।"
जितेन्द्रनाथ दास जितेन्द्रनाथ दास (२७ अक्टूबर १९०४ कलकत्ता – १३ सितंबर १९२९) मध्यवर्गीय कायस्थ परिवार से थे। उन्होंने विद्यासागर कालेज में बी.ए. में प्रवेश लिया किन्तु राजनैतिक गतिविधियों के चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस समिति के सदस्य चयनित हुए। कलकत्ता में १९२८ में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्हें स्वयंसेवी सेना का प्रमुख पद दिया गया। जतिन उत्तरी भारत में क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे तथा क्रांतिकारी पार्टी दल के लिए बम तैयार किया। उन्हें १४ जून, १९२९ को गिरफ्तार कर लाहौर भेज दिया गया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए १३ जुलाई १९२९ को ६३ दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद लाहौर की बोर्स्टल जेल में उनका १३ सितम्बर १९२९ को उनका प्राणोत्सर्ग हो गया। उनके पार्थिव शरीर को दाह-संस्कार हेतु कलकत्ता भेज दिया गया। उनके अंतिम संस्कार में पाँच लाख से अधिक लोग शामिल हुए।
गोपाल सेन
गोपाल सेन एक भारतीय क्रांतिकारी और बंगाल स्वयंसेवकों के सदस्य थे जिन दिनों बर्मा में आजाद हिंद फौज सक्रिय थी, गोपाल सेन को उससे संपर्क स्थापित करने में सफलता मिल गई थी। वह किसी बड़े षड्यंत्र की संरचना कर रहे थे; लेकिन पुलिस को उनकी गतिविधियों का पता चल गया और २९ सिंतबर १९४४ को कलकत्ता स्थित उनके मकान पर छापा मारा गया। वह छत के ऊपर पहुँच गए। पुलिस भी छत पर पहुँच गई। पुलिस ने उन्हें जीवित गिरफ्तार करना चाहा; पर वह उन लोगों के लिए अकेले ही भारी पड़ रहे थे। आखिर पुलिस के कुछ लोगों ने उन्हे पकड़कर तीन मंजिल मकान की छत से नीचे सड़क पर फेंक दिया। उसी दिन गोपाल सेन की मृत्यु हो गई।
बटुकेश्वर दत्त
 |
| पत्नी अंजली और पुत्री भारती के साथ बटुकेश्वर दत्त |
पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेंट अज्ञातवास में रह रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी। सूर्य सेन का एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था जिसे फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। उससे मिलना आसान नहीं था लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर संशय भी नहीं हुआ। यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण। इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी। पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियों में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया। अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये। सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते-लड़ते भाग गए। क्रांतिकारी सूर्यसेन पर १० हजार रुपये का इनाम घोषित था। दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे। वह महिला क्रान्तिकारियों को आश्रय देने के कारण अंग्रेजों का कोपभाजन बनी। सूर्यसेन ने अपने साथियों का बदला लेने की योजना बनाई कि पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच-गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए। प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी २४ सितम्बर १९३२ की रात इस काम के लिए गए। हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म रक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था। क्लब की खिड़की में बाहर से बम लगाया, क्लब की इमारत बम फटने और पिस्तौल की आवाज़ से काँप उठी। नाच-रंग के वातावरण में एकाएक चीखें सुनाई देने लगी। १३ अंग्रेज जख्मी हुए, बाकी भाग गए, एक यूरोपीय महिला मारी गई। क्लब से हुई गोलीबारी में प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी। वे घायल अवस्था में भागीं लेकिन गिरते ही और पोटेशियम सायनाइड खा लिया। मात्र २१ साल की उम्र में उन्होंने झाँसी की रानी की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजों से लड़ते हुए स्वयं ही मृत्यु का वरण कर लिया। प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद तलाशी में अंग्रेज अधिकारियों को मिले पत्र में छपा था कि चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।
वीणा दास
वीणा दास (२४ अगस्त १९११ - २६ दिसम्बर १९८६) बीणा दास सुप्रसिद्ध ब्रह्म समाजी शिक्षक वेणीमाधव दास और सामाजिक कार्यकर्त्ता सरला देवी की पुत्री थीं। वे सेंट जॉन डोसेसन गर्ल्स हायर सैकण्डरी स्कूल की छात्रा रहीं। वे कोलकाता में महिलाओं के संचालित अर्ध-क्रान्तिकारी संगठन छात्री संघ की सदस्या थीं। ६ फरवरी १९३२ को कलकत्ता विश्वविद्यालय के समावर्तन उत्सव (दीक्षान्त समारोह) में बंगाल के अंग्रेज लाट सर स्टैनले जैकसन मुख्य अतिथि थे। उस अवसर पर उपाधि लेने आई कुमारी वीणादास ने गवर्नर स्टनली जैक्शन पर गोली चला दी। गोली गवर्नर के कान के पास से निकल गई, वह मंच पर लेट गया। लेफ्टिनेन्ट कर्नल सुहरावर्दी ने दौड़कर वीणादास का गला एक हाथ से दबा लिया और दूसरे हाथ से पिस्तोलवाली कलाई पकड़ कर सीनेट हाल की छत की तरफ कर दी। वीणादास गोली चलाती गई, लेकिन पाँचों गोलियाँ निशाना चूक गईं। उन्होंने पिस्तौल फेंक दी। अदालत में वीणादास ने एक साहसपूर्ण बयान दिया। अखबारों पर रोक लगा दिये जाने के कारण वह बयान प्रकाशित न हो सका। इसके लिए उन्हें नौ वर्षों के लिए सख़्त कारावास की सजा दी गई। १९३९ में रिहा होने के बाद दास ने कांग्रेस पार्टी की सदस्य बनकर सन् १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया और १९४२ से १९४५ तक कारावास भोगा। वे १९४६-४७ में बंगाल प्रान्त विधान सभा और १९४७ से १९५१ तक पश्चिम बंगाल प्रान्त विधान सभा की सदस्या रहीं। उन्होंने १९४७ में युगान्तर समूह के स्वतन्त्रता कार्यकर्ता साथी ज्योतिष चन्द्र भौमिक से विवाह किया। बीणा दास ने बंगाली में 'शृंखल झंकार' और 'पितृधन' नामक दो आत्मकथाएँ लिखीं। पति की मृत्यु के बाद वे कलकत्ता छोड़कर ऋषिकेश के एक छोटे से आश्रम में एकान्त में रहने लगीं । अपना गुज़ारा करने के लिए उन्होंने शिक्षिका के तौर पर काम किया और सरकार द्वारा दी जानेवाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इंकार कर दिया। भारतमाता के लिए स्वयं को समर्पित कर देने वाली इस वीरांगना का अन्त बहुत ही दुखद था। महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रोफेसर सत्यव्रत घोष ने अपने लेख 'फ्लैश बैक: बीना दास – रीबोर्न' में उनकी मार्मिक मृत्यु के बारे में लिखा- ''उन्होंने सड़क के किनारे अपना जीवन समाप्त किया। उनका मृत शरीर बहुत ही छिन्न-भिन्न अवस्था में था। रास्ते से गुज़रने वाले लोगों को उनका शव मिला। पुलिस को सूचित किया गया और महीनों की तलाश के बाद पता चला कि यह शव बीना दास का है। यह सब उसी आज़ाद भारत में हुआ जिसके लिए इस अग्नि-कन्या ने अपना सब कुछ ताक पर रख दिया था। देश को इस मार्मिक कहानी को याद रखते हुए, देर से ही सही, लेकिन अपनी इस महान स्वतंत्रता सेनानी को सलाम करना चाहिए।''
शांति सेन
शांति सेन (२५ दिसंबर १९१३ मालदा - १६ सितंबर १९९६) एक भारतीय क्रांतिकारी और तेज निशानेबाज थे, अंग्रेजों ने उन्हें शांति क्रैकशूट सेन नाम दिया। मालदा जिला स्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे अपने पिता के साथ मिदनापुर चले गए और कॉलेज में दाखिला लिया। बाद में वे ब्रिटिश भारत के एक क्रांतिकारी संगठन, बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल हो गए । दो पिछले जिला मजिस्ट्रेट जेम्स पेडी और रॉबर्ट डगलस की हत्या के बाद, कोई ब्रिटिश अधिकारी मिदनापुर जिले का प्रभार लेने के लिए तैयार नहीं था। पूर्व सैनिक बर्नार्ड ईजे बर्गे को तब मिदनापुर जिले में तैनात किया गया था । बंगाल स्वयंसेवकों के सदस्यों रामकृष्ण रॉय , ब्रजकिशोर चक्रवर्ती, प्रभांशु शेखर पाल, कामाख्या चरण घोष, सोनातन रॉय, नंदा दुलाल सिंह, सुकुमार सेन गुप्ता, बिजॉय कृष्ण घोष, पूर्णानंद सान्याल, मणिंद्र नाथ चौधरी, सरोज रंजन दास कानूनगो, शांति गोपाल सेन, शैलेश चंद्र घोष, अनाथ बंधु पांजा और मृगेंद्र दत्ता ने बरगे की हत्या करने का फैसला किया। रॉय, चक्रवर्ती, निर्मल जिबोन घोष और दत्ता ने मिदनापुर पुलिस मैदान में मिदनापुर मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब (मोहम्मडन एससी (कोलकाता) का एक फैन क्लब ) और मिदनापुर टाउन क्लब ( ब्रैडली-बर्ट चैलेंज कप कॉर्नर शील्ड प्रतियोगिता) के बीच फुटबॉल मैच खेलते समय बर्ज की गोली मारकर हत्या करने की योजना बनाई। २ सितंबर १९३३ को पुलिस परेड ग्राउंड में फुटबॉल मैच के हाफ टाइम के दौरान, बर्ज की पांजा और दत्ता ने गोली मारकर हत्या कर दी। पांजा को बर्ज के एक अंगरक्षक ने मौके पर ही मार डाला। दत्ता को भी गोली लगी और अगले दिन अस्पताल में उसकी मौत हो गई। गोलीबारी के बाद शांति गोपाल सेन साइकिल लेकर सालबानी जंगल भाग गया। वहाँ उसने गोदापियासल रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ी। गोदापियासल गाँव के बिनोद सेन उर्फ बिनोद बिहारी सेन नामक एक क्रांतिकारी ने इस मामले में उसकी मदद की। एक साल बाद शांति गोपाल को कोलकाता से गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार की विशेष अदालत ने उसे और छह अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उसे अंडमान द्वीप समूह भेज दिया। वह १९४६ में जेल से रिहा हुआ। भारत की स्वतंत्रता के बाद सेन ने १९५७, १९६२ और १९६७ में पश्चिम बंगाल विधानसभा की इंग्लिश बाजार सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव जीते। अपने शेष जीवन में सेन ने एक समाजसेवी के रूप में काम किया।उन्हें १९७२ में भारत सरकार द्वारा ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने मालदा महिला महाविद्यालय और मालदा बालिका विद्यालय (शांति सेन बालिका विद्यालय) की स्थापना के लिए विभिन्न प्रकार से दान दिया । उनके नाम पर 'शांति सेन सरणि' नामक एक सड़क का नामकरण किया गया।
वीर क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सैनिकों तथा सत्याग्रहियों के सम्मिलित प्रयासों के फलस्वरूप भारत को १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्रता मिली। हमारा कर्तव्य है कि हम इन सबको याद कर देश के प्रति समर्पित होने का संकल्प करें। इस एक लेख में सब सेनानियों की जनक्री दे पान संभव नहीं है। अनेक सेनानी विशेषकर महिलाओं का योगदान अनदेखा-अनसुना है। हमें इतिहास में पैठकर वास्तविक सेनानियों के अवदान पर साहित्य लेखन, उनके समरक बनाने, उनके वंशजों के प्रति आभार व्यक्त करने के कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
शहीदों की चिताओं पर भरेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशां होगा।।
***
संपर्क: विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com