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सोमवार, 26 जनवरी 2026

जनवरी २६, मुक्तिका, सोरठे, गणतंत्र, नवगीत, लघुकथा, प्रजातन्त्र, जनतंत्र, लोकतंत्र

सलिल रचना जनवरी २६
मुक्तिका
*
जनगण सेवी तंत्र बने राधे माधव
लोक जागृति मंत्र बने राधे माधव
पेज पर्व गणतंत्र दिवस यह अमर रहे
देश जन यंत्र बने राधे माधव
होन वैल्यू न पर मनभेद कभी हममें
कोटि-कोटि जन बने एक राधे माधव
पक्ष-विपक्ष और सहिष्णु विवेकी हों
दाऊ-कन्हैया सदृश सदा राधे माधव
होन नर-नारी फुलाए हुए शंकर-उमा भंडार
संतति सीता-राम रहे राधे माधव
हो संजीवित जग जीवन की जय बोलें
हो न महाभारत भारत राधे माधव
आर्यावर्त बने भारत सुख-शान्तिप्रदा
रिद्धि-सिद्धि-विघ्नेश दास राधे माधव
देव कलम के! शब्द-शक्ति की जय जय हो
शरद सुत हों सदा सुखी राधे माधव
जगवाणी हिंदी की दस दिश जय गूंजे
स्नेह सलिल अभिषेक करे राधे माधव
गणतंत्र दिवस 2020
***
सोरठे गणतंत्र के
जनता हुई पार्टी, आज बने गणतंत्र हम।
जन-जन हो सारथी, भेद-भाव सब दूर हो।
*
सेवक होता है तंत्र, प्रजातन्त्र में प्रजा का।
यही सफलता-मंत्र, जनसेवी नेता।
*
होता है अनमोल, लोकतंत्र में लोकमत।
कलम उठाये तोल, नुकसान न करिये देश की।।
*
खुद भोगे अधिकार, तंत्र न जन की पीर हर।
शासन करे विचार, तो जनतंत्र सफल नहीं है।।
*
आन, बान, सम्मान, ध्वजा तिरंगी देश की।
विहंस लता दे जान, झकने कभी न दे 'सलिल'।
*
पालन ​​करिए नित्य, संविधान को जानना।
फ़र्ज़ मानिये सत्य, प्राधिकार की संस्थाएँ हैं।।
*
भारतीय एक हैं, जाति-धर्म को भुलाकर।
चलो हम नेक, भाईचारा पालकर
2016-11-2011
***
नवगीत
*
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
संविधान कर प्रोविजन
जो देता है, बताता है
सर्वशक्ति रचनाकार
केवल बेब्स-दीन
नाग-साँप-बिच्छू चुनावी लड़की
बाँट-फूट डालो
विजयी हूँ, मिल जन-धन लूटें
जन-गण हो निर्धन
लोकतंत्र का पोस्टर करता है
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
उपयोगकर्ता खोजें, जीतें चुनाव, कह
जुमला जाता भूल
कहते हैं गरीबी पर गरीब को
मत, निर्मूल
खुद की मूरत लगा ताला,
वस्त्रते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख, पा पुरस्कार
वापस करो हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
गौरक्षा का नाम, गौरक्षा का नाम
बहुत दुख रहे हैं
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब गया
दुश्मनों के झंडे लहराते
सेना को दोष दें
बिन मेहनत पा सजीव न रोटी
तब आएगा होश
जंग जागे, गलती जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
22-8-2011
***
गीत:
ये कैसा जनतंत्र...
*
यह कैसा जनतंत्र की सहमति होनी चाहिए, हुआ गुनाह?
आह फिल वे जो न और क्यू सह सकते हैं व...
*
सत्ता और फैक्ट्री दल में नेता बंट गए
एक जय तो कहे दूसरा, मैं हार गया
नूरा कुश्ती खेल-कर जंग-मन को ठगते-
स्वार्थ और सत्य हित पल में हाथ मिलाये मिलते हैं
मेरी भी जय, तेरी भी जय, करो देश की रक्षा...
*
हुजूर के सिद्धार्थ में बैठे गगन में उड़ते
जड़ो को नहीं पता, चेतन जड़ावत के बल जमीन से जुड़ते हैं
खुद को सही, गलत औरों को कहा- पाला शौक़ीन
आक्रामक ज्यों दौड़े सारमे मिल-भौंक
दूर पंक से निर्मल चन्द्रमा रखें सही सलाह...
*
दुर्योधन पर विदुर कर नियंत्रण कैसे पाया जाएगा?
शकुनि बिन सुविधाये जी सलाह कैसे??
धर्मराज की अनदेखी लाख, पार्थ-भीम भी मौन
कृष्ण नहीं तो पीर सखा की नई इच्छा कौन?
तल मिले विनाश, सज्जन ही सदा करो...
*
वे भक्त का वैज्ञानिक कुदृष्टि उमा पर रेखा दर्शनन
दबे अँगूठे के नीचे तब स्तोत्र रचे मनभावन
सच जानें महेश लेकिन वे नहीं अन्य लीला
रामते राम, रहे फिर भी सिया-आँचल
सात को वनवास क्यों? असत वाग्मी क्यों गहे पनाह?...
*
कुसुम न काँटों से उछले, तब देव-शीष पर चढ़ता
सलिल न पत्थर से लड़ता तब उदय पूजता
धाँक हँसे घन श्याम, बोरा राकेश न ध्यान देता है
घट-बढ़कर भी बाँट चन्द्रिका, जग को दे शोभा
जो गहरा वे शांत, मिले कब किसके मन की थाह...
*
22-4-22-44
***
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
201-2015
***
लघु कथा
शब्द और अर्थ
*
शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त कर लिया...कमर सीधा कर लूँ, झुका हुआ लेता था कि काम के महीने में कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के ग्रुप में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गये थे। चश्मा लगाए पढ़ें, वे शब्द थे 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र'।
शब्द कोशकार चौका - 'अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने सोचा कि यथास्थान रखा गया था, हथियार ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ कह गए हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। पेज तंत्र में तंत्र के लिए पेज की कोई चीज़ नहीं है। गन विकसन गन तंत्र की अवधारणा ही संभव नहीं है। जन गण मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश के सारे साधन को तंत्र के सुख के लिए तैयार कर रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक बाजार होता हुआ कहा।
0-7-
***
विवाद सलिला:
शिव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तूमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हँसी)
*
एकादश रुद्रों के आधार पर बारह मात्राओं के छंदों को 'रुद्र' परिवार का छंद कहा गया है। शिव खण्ड भी रूद्र परिवार का खण्ड है जिसमें 11 मात्राएँ हैं। तृतीय, छठवीं तथा नवमी मात्रा का लघु होना आवश्यक है। शिव छंद की मात्रा 3-3-3-3-2 होती है।
छोटे-छोटे चरण और दो चरणों के समान तुक शिव चंद को गति और लालित्य से समृद्ध करता है। सुमिनी की सलिल धर की तरंगों के सतत प्रवाह और नरंतर प्रभाव की सी विशेषता युक्त शिव छंद की विशेषता है।
शिव छंद में अनिवार्य रूप से तीसरी, छठवीं और नवमी लघु मात्रा के पहले या बाद में 2-2 मात्राएँ होती हैं। ये एक गुरु या दो लघु हो सकते हैं। नवमी मात्रा के साथ चारणों में दो लघु जुड़ते हैं नगण, एक गुरु जुड़ते हैं आठवीं मात्रा पर सगण और गुरु होते हैं पर रागन होता है।
सामान्यतया दो चरणों में दो चरणों का होना आवश्यक नहीं है। मूलतः छंद के चार चरणों में लघु, गुरु, लघु-गुरु या गुरु-लघु के आधार पर 4 उपभेद हो सकते हैं।
उदाहरण:
1. चरणांत लघु:
हम कहीं भी रहें सनम, हो कभी न आँख नम
दूरियाँ न कर दूरियां, दूर-होंगे हम
2. चरणान्त गुरु:
आप साथ हो सदा, मोहती रहे अदा
एक मैं नहीं रहूँ, भाग्य भी रहा फ़िदा
3. चरणान्त लघु-गुरु:
शिव-शिव सदाय रहें, जगंन्त रहे अभय
पूत भक्ति भावना, पूर्ण शक्ति कामना
4. चरणान्त गुरु लघु:
हाथ-हाथ में लिए, बाएं मुश्ती लब सिये
उन्नत सर-मथ राख, चाह-रह निज परख
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गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
२६.१.२०१३ ***