सोमवार, 30 जुलाई 2018

शिव पर दोहे

शिव त्रिनेत्र से देखते, तीन काल-त्रैलोक.
जो घटता स्वीकारते, देखें सत्य विलोक.
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ग्यान-कर्म परिणाम क्या?, किसका-क्या शुभ-लाभ?
सर्व हितैषी सदा शिव, श्वेत श्याम नीलाभ.
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शिव न नगरवासी हुए, शिव का महल न भव्य.
दिशा दिवालें हो गईं, नील गगन छत नव्य.
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शिव संकल्प न छोड़ते, शिव न भूलते भाव,
हर अभाव स्वीकारना, शिव का सहज स्वभाव.
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शिव शंकर पर रीझ मन, हरि शंकर भज नित्य.
पूज उमा शंकर सलिल- रवि शंकर सान्निध्य.
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उमा अरुणिमा सूर्य शिव, हैं श्रद्धा-विश्वास.
श्वास-श्वास में बस रहे, बने आस-आवास.
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शिव सम्पद चाहें नहीं, शिव को भाता भाव.
मन रम जा शिव-भक्ति में, भागे भूत-अभाव.
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2.1.2018
शिव-परिवार न जन्मना, नहीं देह-संबंध.
स्नेह-भावना तंतुमय, है अनादि अनुबंध.
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शिवा-पुत्र शिव का नहीं, शिव लें अपना मान.
शिव-सुत अपनातीं शिवा, छिड़कें उस पर जान.
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वृषभ-बाघ दुश्मन मगर, संग भुलाकर बैर.
कुशल तभी जब मनाएँ, सदा परस्पर खैर.
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अमृत-विष शशि-सर्प भी, हैं विपरीत स्वभाव.
किंतु परस्पर प्रेम से, करते 'सलिल' निभाव.
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गजमुख गणपति स्थूल हैं, कार्तिक चंचल-धीर.
कोई किसी से कम नहीं, दोनों ही मति-धीर.
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गरल ताप को शांत कर, बही नर्मदा धार,
शिव-तनया सोमात्मजा दर्शन से उद्धार.
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शिव न शत्रुता पालते, रहते परम प्रसन्न.
रहते खाली हाथ पर, होते नहीं विपन्न.
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3.1.2018
शिव अनेक से एक हों, शिव हैं शुद्ध विवेक.
हों अनेक पुनि एक से, नेक न कभी अ-नेक.
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शिव ही सबके प्राण हैं, शिव में सबके प्राण.
धूनी रचा मसान में, शिव पल-पल संप्राण.
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शिव न चढावा चाहते, माँगें नहीं प्रसाद.
शिव प्रसन्न हों यदि करे, निर्मल मन फ़रियाद.
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शिव भोले हैं पर नहीं, किंचित भी नादान.
पछताते छलिया रहे, लड़े-गँवाई जान.
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हर भव-बाधा हर रहे, हर पल हर रह मौन.
सबका सबसे हित सधे, कहो ना चाहे कौन?
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सबका हित जो कर रहा, बिना मोह छल लोभ.
वह सच्चा शिवभक्त है, जिसे न हो भय-क्षोभ.
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शक्तिवान शिव, शक्ति हैं, शिव से भिन्न न दूर.
चित-पट जैसे एक हैं, ये कंकर वे धूर.
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4.1.2018

वृषभ सवारी कर हुए, शिव पशुओं के साथ।
पशुपति को जग पूजता, विनत नवाया माथ।।
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कृषि करने में सहायक, वृषभ हुआ वरदान।
ऋषभनाथ शिव कहाए, सृजन सभ्यता महान।।
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ऋषभ न पशु को मारते, सबसे करते प्रेम।
पंथ अहिंसक रच किया, सबका सबसे क्षेम।।
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शिवा बाघ शिशु का बदल, हिंसक दुष्ट स्वभाव।
बना अहिंसक सवारी, करतीं नेक प्रभाव।।
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वंशज मनुज को सभ्य कर, हर शंका कर दूर।
शिव शंकर होकर पुजे, पा श्रद्धा भरपूर।।
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७.१.२०१८

शिव को पा सकते नहीं, शिव से सकें न भाग।
शिव अंतर्मन में बसे, मिलें अगर अनुराग।।
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शिव को भज निष्काम हो, शिव बिन चले न काम।
शिव-अनुकंपा नाम दे, शिव हैं आप अनाम।।
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वृषभ-देव शिव दिगंबर, ढंकते सबकी लाज।
निर्बल के बल शिव बनें, पूर्ण करें हर काज।।
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शिव से छल करना नहीं, बल भी रखना दूर।
भक्ति करो मन-प्राण से, बजा श्वास संतूर।।
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शिव त्रिनेत्र से देखते, तीन लोक के भेद।
असत मिटा, सत बचाते, करते कभी न भेद।।
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१५.१.२०१८
एफ १०८ सरिता विहार, दिल्ली


शिव में खुद को देख मन, मनचाहा है रूप।
शिव को खुद में देख ले, हो जा तुरत अरूप।।
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शिव की कर ले कल्पना, जैसी वैसा जान।
शिव को कोई भी कहाँ, कब पाया अनुमान?
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शिव जैसे शिव मात्र हैं, शिव सा कोई न अन्य।
आदि-अंत, नागर सहज, सादि-सांत शिव वन्य।।
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शिव से जग उत्पन्न हो, शिव में ही हो लीन।
शिवा शक्ति अपरा-परा, जड़-चेतन तल्लीन।।
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'भग' न अंग,ऐश्वर्य षड, धर्म ज्ञान वैराग।
सुख समृद्धि यश समन्वित, 'लिंग' सृजन-अनुराग।।
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राग-विराग समीप आ, बन जाते भगवान।
हों प्रवृत्ति तब भगवती, कर निवृत्ति का दान।।
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ज्योति लिंग शिव सनातन, ज्योतिदीप हैं शक्ति।
दोनों एकाकार हो, देते भाव से मुक्ति।।
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१७-१-२०१८

शिव अनंत ज्यों नील नभ, मिलता ओर न छोर।
विष पी अमृत बांटते, नील कण्ठ तमखोर।।
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घनगर्जन स्वर रुदन सम, अश्रुपात बरसात।
रुद्र नाम दे भक्तगण, सुमिरें कहकर तात।।
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सुबह-सांझ की लालिमा, बने नेत्र का रंग।
मिला नीललोहित विरुद, अनगिन तारे संग।।
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चंद्र शीशमणि सा सजा, शशिशेखर दे नाम।
चंद्रनाथ शशिधर सदय, हैं बालेंदु अकाम।।
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महादेव महनीय हैं, असुरेश्वर निष्काम।
देवेश्वर कमनीय को, करतीं उमा प्रणाम।।
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जलधर विषधर अमियधर, ले त्रिशूल त्रिपुरारि।
डमरूधर नगनाथ ही, काममुक्त कामारि।।
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विश्वनाथ समभाव से, देखें सबकी ओर।
कथनी-करनी फलप्रदा, अमिट कर्म की डोर।।
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जो बोया सो काट ले, शिव का कर्म-विधान।
भेंट-चढ़ोत्री व्यर्थ है, करते नजर नादान।।
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महाकाल निर्मम निठुर, भूले माया-मोह।
नहीं सत्य-पथ से डिगें, सहते सती-विछोह।।
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करें ओम् का जप सतत, ओंकारेश्वर-भक्त।
सोमनाथ सौंदर्य प्रिय, चिदानंद अनुरक्त।।
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शूलपाणि हर कष्ट सह, हॅंसकर करते नष्ट।
आपद से डरते नहीं, जीत करें निज इष्ट।।
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२२.१.२०१८, जबलपुर

शिव हों, भाग न भोग से, हों न भोग में लीन।
योग साध लें भोग से, सजा साधना बीन।।
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चाह एक की जो बने, दूजे की भी चाह।
तभी आह से मुक्ति हो, दोनों पाएं वाह।।
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प्रकृति-पुरुष हैं एक में दो, दो में हैं एक।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों, सुख दे-पा सविवेक।।
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योनि जीव को जो मिली, कर्मों का परिणाम।
लिंग कर्म का मूल है, कर सत्कर्म अकाम।।
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संग तभी सत्संग है, जब अभंग सह-वास।
संगी-संगिन में पले, श्रृद्धा सह विश्वास।
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मन में मन का वास ही, है सच्चा सहवास।
तन समीप या दूर हो, शिथिल न हो आभास।।
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मुग्ध रमणियों मध्य है, भले दिगंबर देह।
शिव-मन पल-पल शिवा का, बना हुआ है गेह।।
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तन-मन-आत्मा समर्पण, कर होते हैं पूर्ण।
सतत इष्ट का ध्यान कर, खुद होते संपूर्ण।।
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भक्त, भक्ति, भगवान भी, भिन्न न होते जान।
गृहणी, गृहपति, गृह रहें, एक बनें रसखान।।
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शंका हर शंकारि शिव, पाकर शंकर नाम।
अंतर्मन में व्यापकर, पूर्ण करें हर काम।।
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नहीं काम में काम हो, रहे काम से काम।
काम करें निष्काम हो, तभी मिले विश्राम।।
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३१.१.२०१८, जबलपुर

कौर त्रिलोचन के हुए, गत अब आगत मीत।
उमा मौन हो देखतीं, जगत्पिता की प्रीत।।
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यह अनुपम वह निरुपमा, गौर-बौरा साथ।
'सलिल' धन्य दर्शन मिले, जुड़े हाथ, नत माथ।।
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शिव विद्येश्वर नित्य हैं, रुद्र उमेश्वर सत्य।
शिव अंतिम परिणाम हैं, शिव आरंभिक कृत्य।।
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कैलाशी कैलाशपति, हैं पिनाकपति भूत।
भूतेश्वर शमशानपति, शिव हैं काल अभूत।।
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शिव सतीश वागीश हैं, शिव सुंदर रागीश।
शून्य-अशून्य सुशील हैं, आदि नाद नादीश।।
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शिव शंभू शंकर सुलभ, दुर्लभ रतिपतिनाथ।
नाथ अपर्णा के अगम, शिव नाथों के नाथ।।
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शिव अनाथ के नाथ हैं, सचमुच भोलेनाथ।
बड़भागी है शीश वह, जिस पर शिव का हाथ।।
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हाथ न शिव आते कभी, दशकंधर से जान।
हाथ लगाया खो दिया, सकल मान-सम्मान।।
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नर्मदेश अखिलेश शिव, पर्वतेश गगनेश।
निर्मलेश परमेश प्रभु, नंदीश्वर नागेश।।
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अनिल अनिल भू नभ सलिल, पंचतत्वपति ईश।
शिव गति-यति-लय छंद हैं, शंभु गिरीश हरीश।।
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मंजुल मंजूनाथ शिव, गुरुओं को गुरुग्राम।
खास न शिव को पा सके, शिव को अतिप्रिय आम।।
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आम्र मंजरी-धतूरा, अमिय-गरल समभाव।
शिव-प्रिय शशि है, सर्प भी, शिव में भावाभाव।।
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भस्मनाथ शिव पुरातन, अति नवीन अति दिव्य।
सरल-सुगम सबको सुलभ, शिव दुर्लभ अति भव्य।।
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१५-२-२०१८, ८.४५, एच ए १ महाकौशल एक्सप्रेस

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दोहा में शिव तत्व
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दोहा में शिव-तत्व है, दोहा भी शिव-तत्व।
'सलिल' न भ्रम यह पालना, दोहा ही शिव-तत्व।।
*
अजड़ जीव, जड़ प्रकृति सह, सृष्टि-नियंता मौन।
दिखते हैं पशु-पाश पर, दिखें न पशुपति, कौन?
*
अक्षर पशु ही जीव है, क्षर प्रकृति है पाश।
क्षर-अक्षर से परे हैं, पशुपति दिखते काश।।
*
पशुपति कुमार ही कृपा से, पशु को होता ज्ञान।
जान पाश वह मुक्त हो, कर पशुपति का ध्यान।।
*
पुरुषोत्तम पशुपति करें, निज माया से मुक्त।
माया-मोहित जीव पशु, प्रकृति मायायुक्त।।
*
क्षर प्रकृति अक्षर पुरुष, दोनों का जो नाथ।
पुरुषोत्तम शिव तत्व वह, जान झुकाकर माथ।।
*
है अनादि बिन अंत का, क्षर-अक्षर संबंध।
कर्मजनित अज्ञान ही, सृजे जन्म अनुबंध।।
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माया शिव की शक्ति है, प्रकृति कहते ग्रंथ।
आच्छादित 'चिद्' जीव है, कर्म मुक्ति का पंथ।।
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आच्छादक तम-तोम है, निज कल्पित लें मान।
शुद्ध परम शिव तम भरें, जीव करे सत्-भान।।
*
काल-राग-विद्या-नियति, कला भोगता जीव।‌
पुण्य-पाप सुख-दुख जनित, फल दें करुणासींव।।
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मोह वासना अविद्या, जीव कर्म का मैल।
आत्मा का आश्रय गहे, ज्यों पानी पर तैल।।
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कर्म-नाश हित भोग है, मात्र भोग है रोग।
जीव-भोग्या है प्रकृति, हो न भोग का भोग।।
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शिव-अर्पित कर कर्म हर, शिव ही पल युग काल।
दशा, दिशा, गति, पंथ-पग, शिव के शिव दिग्पाल।।
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३.३.२०१८



काम करें निष्काम हो, फल की करें न आस। श्री वास्तव में तब मिले, बुझे आत्म की प्यास।।
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चित्र गुप्त होता प्रगट, देखें मन में झाँक। मैं तू यह वह एक हैं, सत्य कभी यह आँक।।
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खरे काम का खरा ही, होता है परिणाम। जो खोटा उसका बुरा, आज न कल अंजाम।।
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निगम न गम कर; थके बिन, कर ले सतत प्रयास। गिर उठ बढ़ता रह अथक, श्वास-श्वास मधुमास।।
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शक-सेना का अंत कर, खुद पर कर विश्वास। सक्सेना की कोशिशें, दें अधरों को हास।।
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भट है योद्धा पराक्रमी, नागर सबका मित्र।
लड़ता देश-समाज हित, उज्जवल रख निज चित्र।।
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वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार। चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार।।
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सूर्य उजाला देकर कहता शुभ प्रभात है। चिड़िया गाना गाकर कहती शुभ प्रभात है।। हम मानव कुछ करें सभी की ख़ातिर अच्छा- धरा पवन नभ सलिल कहें तब शुभ प्रभात है।।
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समय ग्रन्थ के एक पृष्ठ को संजीवित कर आप रहे। बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में होकर नित प्रति व्याप रहे।। हर दिन जन्म नया होना है, रात्रि मूँदना आँख सखे! पैर धरा पर जमा, गगन छू आप सफलता नाप रहे।।
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निरुपमा की उपमा कैसे शब्द कहेंगे? अपनी अक्षमता पर लज कर मौन रहेंगे।। कसे कसौटी पर कवि बार-बार शब्दों को- पूर्ण न तब भी, आंशिक ही कह 'वाह' गहेंगे।। *

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