शनिवार, 28 जुलाई 2018

दोहा शतक: शोभित वर्मा

स्वप्न करें साकार
दोहा शतक
शोभित वर्मा














जन्म: १८.५.१९८१, दिल्ली ।
आत्मज: श्रीमती अरुणा-श्री नवीन वर्मा।
जीवनसंगिनी: श्रीमती नेहा वर्मा।
काव्य गुरु: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’।
शिक्षा: बी.ई. (इलेक्ट्रोनिक्स), एम् टेक., पीएच. डी. (शोधरत)।
लेखन विधा: दोहा, लघुकथा, कविता, तकनीकी लेख ।
संप्रति: विभागाध्यक्ष इलेक्ट्रोनिक्स, तक्षशिला इंस्टीटयूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी जबलपुर।
संपर्क: टी ९, मानस मंदिर के बाजू में, शक्ति नगर, गुप्तेश्वर जबलपुर।
चलभाष: ९१९९९३२०१११९। ईमेल: shobhitteachingmaterial@gmail.com ।
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शोभित वर्मा जी अभियांत्रिकी संस्थान में इलेक्ट्रोनिक्स जैसे जटिल विषय के प्राध्यापक होने के बाद भी पारिवारिक संस्कार और व्यक्तिगत रुचि से हिंदी के प्रति समर्पित हैं। हिंदी में तकनीकी लेख, पाठ्य पुस्तक और अभियन्त्रिक अध्यापन की दिशा में सचेष्ट शोभित जी कविता, लघुकथा तथा छंद के प्रति लगाव रखते हैं। वे माता-पिता तथा गुरु के प्रति आत्यन्तिक श्रृद्धा-भाव रखते हैं:
मात-पिता-गुरु को नमन, करिए बारंबार।
त्रुटि बतलाकर सुधारें, मन में प्रेम अपार।।
गीता के कर्म- योग को दैनिक दिनचर्या में उतारते हुए शोभित हर रात्रि को मरण-पर्व और भोर को पुनर्जीवन मानते हुए नित्य नए प्रयास करने का आव्हान करते हैं:
हर दिन नव आरंभ है, मन में नव विश्वास।
भुला पुरानी गलतियाँ, करिए नवल प्रयास।।
लोकतंत्र में ‘लोक’ का तंत्र पर आश्रित होते जाना चिंता का विषय है। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की नीति किसी भी समाज के लिए हितकर नहीं हो सकती। जागरूक नागरिक होने के नाते शोभित जी हर नागरिक से सक्रियता चाहते हैं:
दोष मढ़े सरकार पर, करें न मात्र विलाप।
देश बदलना है अगर, यत्नशील हों आप।।
भारत में पूर्व संप्रभुओं की भाषा-भूषा के प्रति स्वतंत्र होने के सात दशक बाद भी प्रबल आकर्षण देखा जाता है। शोभित इसे घातक मानते हैं। वे सामान्य जन कोसचेत करते हैं कि वह अपने मूल जीवन मूल्यों को न भूले:
अंग्रेजी माध्यम-पढ़े, करे ज्ञान का दंभ।
सूट-बूट टाई पहन, भूला है आरंभ।।
अभियांत्रिकी की विधा आत्मानुशासन का महत्त्व जानती है। सहे इसमे पर सही कदम न उठाया जाए तो सब किए-धरे पर पानी फिरते देर नहीं लगती। इस सनातन सत्य को अभियांत्रिकी शिक्षक हों के नाते शोभित जी भली-भाँति जानते हैं:
यदि न समय पर लिया तो, निर्णय हो बेअर्थ।
समय बीतने पर लिया, निर्णय करे अनर्थ।।
शोभित जी के दोहे साज-सज्जा और अलंकार पर कथ्य–तथ्य को वरीयता देते हैं चढ़ता सूरज देख कर, रहे नमन की होड़। ढलते सूरज से सभी, लेते नाता तोड़।। कहीं-कहीं हिंदी मे पारंपरिक नीति के दोहों और कहीं-कहीं शिक्षकीय जीवन दृष्टि बोध से संपन्न ये दोहे पथ प्रदर्शक की तरह हैं । वे सामाजिक रीति-नीति और आचारविचार पर आगत करते भी हैं तो विसंगति विलोपन की दृष्टि से:
चढ़ता सूरज देख कर, रहे नमन की होड़। ढलते सूरज से सभी, लेते नाता तोड़।।
शोभित जी का सही दिशा में सही गति से उठाया गया दोहा रचना का कदम उन्हें बहुत आगे ले जाएगा इसमें संदेह नहीं है।
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कार्य न यदि कर पा रहे, बाधा-विघ्न हजार।
छू ले झट से गुरु-चरण, पल में उतरे भार।।
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माँ कहते ही व्याप्त हो, ममता-निश्छल प्रेम।
माँ के आँचल में मिले, शिशु को हर पल क्षेम।।
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सूर्य उदय के साथ ही, कर ईश्वर का ध्यान।
अपने मन में झाँक रे!, पाएगा नव ज्ञान।।
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भाग्यवान हैं हम हुई, दैवी-कृपा अपार।
धरती पर माता-पिता, ईश्वर के अवतार।।
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हर दिन नव आरंभ है, मन में नव विश्वास।
भुला पुरानी गलतियाँ, करिए नवल प्रयास।।
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मात-पिता-गुरु को नमन, करिए बारंबार।
त्रुटि बतलाकर सुधारें, मन में प्रेम अपार।।
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सिर्फ ठानने से नहीं, होते सफल सुजान।
पाना है यदि सफलता, कोशिश मात्र निदान।।
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खून खौलता आज भी, उनका नाम पुकार।
नेताजी की कीजिए, सब मिल जय-जयकार।।
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निर्णय करिए शांत मन , भूल कलेश-विकार।
करें सफलता का वरण, स्वप्न सभी साकार।।
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दोष मढ़े सरकार पर, करें न मात्र विलाप।
देश बदलना है अगर, यत्नशील हों आप।।
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सुदृढ़ राष्ट्र भारत बने, स्वप्न किया साकार।
असरदार सरदार का, युग माने उपकार।।
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कर की चोरी कर हुए, वे बेघर धनवान।
भाग देश से भटकते, इंसां हो हैवान।।
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काट रहे नित पेड़ हम, करते नहीं विचार।
अपना पाँव कुल्हाड़ पर, आप रहे हैं मार।।
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रहे लुटाते उम्र भर, जो नित अपना ज्ञान।
सीख उन्हीं को शिष्यगण, बतलाते नादान।।
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किसके मन में कौन है, कह सकता है कौन।
बोले टेलीफोन ही, सोच न पाए मौन।।
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मोबाइल ने कर दिया, बातचीत का काम।
टेलीग्राम न शेष है, भूले उसका नाम।।
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करी शिकायत पिता से:, 'भाई है शैतान।'
भाई पिटा; पछता रही, पकड़े अपने कान।।
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शांति-मसीहा हम हुए, आप न करते जंग।
मान न शैतां पड़ोसी, करता रहता तंग।।
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अपना भारत स्वच्छ है, स्वप्न करें साकार।
पूर्ण करें संकल्प ले, फिर लें प्रभु अवतार।।
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यदि न समय पर लिया तो, निर्णय हो बेअर्थ।
समय बीतने पर लिया, निर्णय करे अनर्थ।।
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जो करते हैं अनसुनी, आत्मा की आवाज।
सुखी न रह पाते कभी, उन पर गिरती गाज।।
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नहीं रहा निष्पक्ष अब, बिकता लेकर दाम।
पत्रकार को सत्य से, रहा न कोई काम।।
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स्वस्थ बदन मन शांत ही, है पूँजी अनमोल।
मोल न कोई दे सके, तुला न सकती तोल।।
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नियमित कसरत कीजिए, सादा भोजन साथ।
अधिक स्वाद-आराम से, कुछ भी लगे न हाथ।।
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जातिवाद ने डँस लिया, राजनीति को आज।
शकुनी नेता फेंकते, पाँसे करें न काज।।
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ऊँच-नीच ने रोक दी ,उन्नति की रफ़्तार।
इंसानों के बीच में, भेद-भाव दीवार।।
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राम-राम जप निरंतर, सदा हृदय रख साफ़।
मिले शांति; कर अन्य की, सभी गलतियाँ माफ़।।
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अंग्रेजी माध्यम-पढ़े, करे ज्ञान का दंभ।
सूट-बूट टाई पहन, भूला है आरंभ।।
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पढ़ने से करते रहे, झूठ बोल परहेज़।
घर से निकलें समय पर, गए नहीं कोलेज।।
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समय न रहता एक सा, सत्य समझ लो आज।
सुख-दुःख झेलो धैर्य रख, बनते बिगड़े काज।।
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पल-पल बढ़ता जा रहा, अहंकार-अभिमान।
छोटी-छोटी बात पर, लड़ते लेते जान।।
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ऐसे डॉक्टर हो गए, नहीं समझते मर्ज।
जाँच-दवाई इस तरह, शीश चढ़ गया कर्ज।।
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प्रेम-रोग उतरे नहीं, समझे अन्य न दर्द।
सर्दी में भी गर्म हो, गर्मी में हो सर्द।।
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महाशक्ति भारत बने, लक्ष्य नहीं आसान।
पूरा हो जब हो सुखी, हर मजदूर-किसान।।
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महाशक्ति भारत बने, जन-गण करे प्रयास।
शक्ति एकता से मिले, मिटे सकल संत्रास।।
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पंछी चुप सहमी हवा, डरे-मिटे हैं गाँव।
दूषित नगरी हवा ने, मारा घातक दाँव।।
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बिना बिचारे दे दिया, नेता ने व्याख्यान।
लेने के देने पड़े, निज मुँह निज गुणगान।।
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भेद-भाव की नीति ने, किया हाय! अंधेर।
कहीं न दिखती एकता, फूट रही है घेर।।
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जाति-धर्म के नाम पर, मचते रहे बवाल।
जाट धरम से क्या मिले, पूछो जरा सवाल।।
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मजबूती से चल सके, हम सबकी सरकार।
जन-गण के विश्वास प्रति, हो कृतज्ञ साभार।।
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फेंकें कूड़ा गली में , फिर दें नेता ज्ञान। कागज़ पर है स्वच्छता, दे सरकार न ध्यान।।
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ऊपर से दिखता सफल, किन्तु न खुश इंसान।
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, समझ बने मतिमान।।
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देश बदलना चाहते, बस बातों से यार।
कष्ट न हो खुद को तनिक, काम करे सरकार।।
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निज श्रम कोशिश लगन ही, हो निर्णय-आधार।
लक्ष्य-सफलता प्राप्ति का, बने तभी आगार।।
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मढ़े दोष सरकार पर, करते नित्य विलाप।
खुद प्रयास करते नहीं, मिटे किस तरह शाप।।
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नित्य कार्य करिए अगर, समय न कर बर्बाद। निश्चित जल्दी सफलता, मिले रहें आबाद।।
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गुरुवार का जब भी हुआ, कहीं मान-सम्मान।
हृदय प्रफुल्लित हो उठा, ज्यों पाया खुद मान।।
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कलियुग में उपकार का, प्रतिफल है आघात।
जिसे सहारा दे रहा, वही करेगा घात।।
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स्वस्थ देह आचार मन, है पूँजी अनमोल।
दूषित हो यदि एक भी, शेष न रहता मोल।।
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शांत चित्त व्यायाम कर, सादा भोजन मीत।
ग्रहण करें संतुष्ट हो, सुख देती यह रीत।।
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चलते जो कर अनसुना, निज मन की आवाज़।
कभी न रह पाते सुखी,गिर ही जाती गाज।।
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नहीं सत्य-निष्पक्ष हैं, समाचार क्यों आज?
चंद रुपये में बिक रहे ,पत्रकार खो लाज।।
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रंग-पर्व होली-मिलन, खेलो रंग-गुलाल।
राग-द्वेष सब भुला दो, होगे तभी निहाल।।
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कठिनाई हो सामने, सूझे नहीं उपाय।
लगन-परिश्रम ही लिखे, मनवांछित अध्याय।।
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निर्णय करिये शांत मन, भूल कलेश-विकार।
मान सफलता सुनिश्चित, बाधा रहें हजार।।
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जो होना होता रहे, तजना नहीं प्रयास।
थक-चुककर रुकना नहीं, होगा तभी विकास।।
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जो किस्मत वाले उन्हें, मिलता लाड-दुलार।
किंतु सफल होते वही, जो श्रम करें अपार।।
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सूर्योदय के साथ ही, नित कर प्राणायाम।
गुरु-ईश्वर को नमन कर, बनें बिगड़ते काम।।
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शक्ति-एकता में रहे, अटल सत्य यह मान।
हिन्दू एक न हुए तो, नाश सुनिश्चित मान।।
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सोच-विचार किए बिना, काम करें नादान।
अवसर जाए निकल जब, तब लेते संज्ञान।।
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छोटी-छोटी बात को, भूल न रखिए ध्यान।
बूँद-बूँद सागर बने, समय-पूर्व अनुमान।।
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भाग-दौड़ ही जिंदगी, थमना है बेकार।
हार मान यदि रुक गए, स्वप्न न हों साकार।।
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दिशा-दशा परखे बिना, होते व्यर्थ प्रयास।
नीति-नियत हो सही तो, बँध जाती है आस।।
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निज इच्छा का दमन कर, करता प्रेम अपार।
मात-पिता, गुरु चरण छू, नित मानो आभार।।
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अंग्रेज़ी पतझड़ गया, हिंदी हरियल दूब।
जड़ें विश्व में जमाकर, फूल-फलेगी खूब।।
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मंत्री पद के लोभ में, दल निष्ठा को छोड़।
अवसरवादी जा रहे, अपना ही घर तोड़।।
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उनसे मुँह न चुराइए, करिए कभी न रोष।
जिन रिश्तों से आपको, मिलता हो संतोष।।
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जनता सपने देखती, बदल-बदल कर ताज।
कभी सदी इक्कीसवीं, कभी राम का राज।।
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दातूनें दिखती नहीं, मंजन है लाचार।
टूथपेस्ट बिकने लगा, गाँव-गली बाज़ार।।
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आयु घटाता रोग दे, अंग्रेज़ी उपचार।
आयुर्वेद न भूलिए, मेटे रोग हज़ार।।
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कर्म भाग्य दोनों बड़े, इससे बढ़कर कौन।
कर्म लगन से कीजिए, भाग्य न रहता मौन।।
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पंचदेव का वास हो, सुख आनंद बहार।
जिस घर बेटी जन्म ले, स्वर्ग वहीं साकार।।
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राजनीति की नीति का, कहीं न पारावार।
जैसे चाहो मोड़ दो, अर्थों का संसार।।
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पल-पल निष्ठा बदलना, राजनीति का खेल।
आज गले जो मिल रहे, कल वे ही अनमेल।।
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कुछ हरियाली फूल कुछ, काँटों का विस्तार।
बाग़ कैक्टसी हो गया, रिश्तों का संसार।।
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रिश्तों के संसार का, यह कैसा दस्तूर।
काम पड़े तो निकट हों, काम न हो तो दूर।।
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जीव मारना पाप है, कहते हैं सब लोग। मच्छर का फिर क्या करें, जो फैलाता रोग।।
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नहीं दे रहे चाकरी, नहीं दे रहे काम। नेतागण अजगर हुए, खा करते आराम।।
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वोट दिया या भीख दी, गया हाथ से तीर।
किस को फिर पहिचानते, नेता, पीर, फकीर।।
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गीदड़ बहुमत ढूँढ़ते, रहे अकेला शेर।
गीदड़ रहते डरे से, होता शेर दिलेर।।
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नेता जी की बात पर, कैसे करें यकीन।
जब से ऊँचे वह उड़े, देखी नहीं ज़मीन।।
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छोटी-छोटी पार्टियाँ, मिली बड़ी के साथ।
भोली-भाली मछलियाँ, चढ़ीं मगर के हाथ।।
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चढ़ता सूरज देख कर, रहे नमन की होड़।
ढलते सूरज से सभी, लेते नाता तोड़।।
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जनता ने तो चुनी थी, सोच-समझ सरकार।
दल-बदलू ने बदल दी, जनमत दिया नकार।।
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किसे फ़िक्र है वतन की, बनते सभी नवाब।
रोटी चुपड़ी चाहिए, मिलता रहे कबाब।।
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सोच-समझ कर कीजिए, नेता जी तक़रीर।
हुए सभी आज़ाद हम, हुए न सभी अमीर।।
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मिली-जुली सरकार है, करती खींचातान। साथ हुए बंदर-मगर, कैसे हो कल्यान।।
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माँगा उनसे वोट जो, हुए बहुत बेजार।
कहते अपने वोट को, कौन करे बेकार।।
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पद लोलुप नेता हुए, बेच रहे ईमान। जनमत का कर रहे हैं, खुले आम अपमान।।
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जिनको अपना समझते, वह रहते थे मौन।
हमें चुनाव बता गया, इन में अपना कौन।।
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हर दल वोटर से कहे, बीती ताहि बिसार।
फिर से अवसर दे मुझे, ला दूँ तुझे बहार।।
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आज गए थे बूथ पर, दी वोटर ने चोट।
नैतिकता की बात की, डाले जाली वोट।।
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हर दल को अच्छे लगें, अपने गीत बहार।
क्या जनमत का सुनेगा, कोइ राग मल्हार।।
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हँसी-खेल मत समझिए, दुनिया बड़ी विचित्र।
करें उन्हीं से मित्रता, जिनकी नीति पवित्र।।
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चाहे दुःख का रुदन हो, चाहे सुख के गीत।
रहना मेरे साथ में, हर दम मेरे मीत।।
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सारे रिश्ते देह के, मन का केवल यार।
दूरी जब से हो गई , जीवन है बेजार।।
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आज़ादी को लग चुका, घोटालों का रोग।
जिसके जैसे दाँत हैं, कर ले वैसा भोग।।
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भारत जैसा मिलेगा, कहाँ विलक्षण देश। घूम रहे हैं विदेशी, धर कर देशी वेश।। ९८
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दोहा लिखना सीख रहा ,कर रोज अभ्यास
गुरु आशीष मिले तो ,सफल होंगे प्रयास
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माँगे बिन खुशियाँ सभी, आएँगी घर-द्वार। लुटती माया, सुख नहीं, दुःख के दिन है चार।। *
नेकी अपनी छोड़ के, गया बदल इंसान। मक्कारी का राज है, रहा सिसक ईमान।। *
छल प्रपंच से दूर हो, जग मंगल की चाह। आत्म निरोगी जन वही, गहे सत्य की राह।। *
देख भक्त की भावना, हैरत में भगवान। दृष्टि मूर्ति है मगर, जूते पर है ध्यान।। *
परिवर्तन के दौर का, यह कैसा दस्तूर। एक जगह रहते मगर, दिल हैं कोसो दूर।। *
प्रभु ने हमको जो दिया, उसका कर उपभोग। उतना मिलता यहाँ, जितने का है योग

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