शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

मुक्तिका: किस्सा नहीं हूँ

मुक्तिका:
संजीव
.
आप मानें या न मानें, सत्य हूँ ;किस्सा नहीं हूँ
कौन कह सकता है, हूँ इस सरीखा; उस सा नहीं हूँ
मुझे भी मालुम नहीं है, क्या बता सकता है कोई?
पूछता हूँ आजिजी से, कहें; मैं किस सा नहीं हूँ
साफगोई ने अदावत, का दिया है दंड हरदम
फिर भी मुझको फख्र है, मैं छल रहा घिस्सा नहीं हूँ
हाथ थामो या न थामो, फैसला-मर्जी तुम्हारी
कस नहीं सकता गले में, आदमी- रस्सा नहीं हूँ
अधर पर तिल समझ मुझको, दूर अपने से न करना
हनु न रवि को निगल लेना, हाथ में गस्सा नहीं हूँ
निकट हो या दूर हो तुम, नूर हो तुम; हूर हो तुम
पर बहुत मगरूर हो तुम, सच कहा; गुस्सा नहीं हूँ
***
खामियाँ कम, खूबियाँ ज्यादा, तुम्हें तब तक दिखेंगी
मान जब तक यह न लोगे, तुम्हारा हिस्सा नहीं हूँ
.

कोई टिप्पणी नहीं: