मंगलवार, 17 जुलाई 2018

पुस्तक समीक्षा: काल है संक्रांति का, डा. श्याम गुप्त


पुस्तक समीक्षा

[समीक्ष्य कृति: काल है संक्रांति का,रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, मूल्य: २००/-, आवरण: मयंक वर्मा, रेखांकन: अनुप्रिया, प्रकाशक-समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर, चलभाष: ७९९९५५९६१८, समीक्षक: डा. श्याम गुप्त, लखनऊ] 
साहित्य जगत में समन्वय के साहित्यकार, कवि हैं आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'।प्रस्तुत कृति ‘काल है संक्रांति का’ की सार्थकता का प्राकट्य मुखपृष्ठ एवं शीर्षक से ही हो जाता है। वास्तव में ही यह संक्रांति-काल है, जब सभी जन व वर्ग भ्रमित अवस्था में हैं। एक और अंग्रेज़ी का वर्चस्व जहाँ चमक-दमक वाली विदेशी संस्कृति दूर से सुहानी लगती है; दूसरी और हिंदी–हिंदुस्तान का, भारतीय स्व संस्कृति का प्रसार जो विदेश बसे को भी अपनी मिट्टी की ओर खींचता है। या तो अँगरेज़ हो जाओ या भारतीय किंतु समन्वय ही उचित पंथ होता है, जो हर युग में विद्वानों, साहित्यकारों को ही करना होता है। सलिल जी की साहित्यिक समन्वयक दृष्टि का एक उदाहरण प्रस्तुत है: 'गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचानें ।' माँ शारदा से पहले, ब्रह्म रूप में चित्रगुप्त की वंदना भी नवीनता है। कवि की हिंदी भक्ति वंदना में भी छलकती है: हिंदी हो भावी जग वाणी / जय जय वीणापाणी’।
यह कृति लगभग १४ वर्षों के लंबे अंतराल में प्रस्तुत हुई है। इस काल में कितनी विधाएँ आईं–गईं, कितनी साहित्यिक गुटबाजी रही, सलिल मौन दृष्टा की भाँति गहन दृष्टि से देखने के साथ-साथ उसकी जड़ों को, विभिन्न विभागों को अपने काव्य व साहित्य-शास्त्रीय कृतित्वों से पोषण दे रहे थे, जिसका प्रतिफल है यह कृति। 
कितना दुष्कर है बहते सलिल को पन्ने पर रोकना-उकेरना। समीक्षा लिखते समय मेरा यही भाव बनता था जिसे मैंने संक्षिप्त में काव्य-रूपी समीक्षा में इस प्रकार व्यक्त किया है-
“शब्द सा है मर्म जिसमें, अर्थ सा शुचि कर्म जिसमें 
साहित्य की शुचि साधना जो, भाव का नव धर्म जिसमें 
उस सलिल को चाहता है, चार शब्दों में पिरोना।।” 
सूर्य है प्रतीक संक्रांति का, आशा के प्रकाश का, काल की गति का, प्रगति का। अतः, सूर्य के प्रतीक पर कई रचनाएँ हैं | ‘जगो सूर्य लेकर आता है अच्छे दिन’ ( जगो सूर्य आता है ) में आशावाद है, नवोन्मेष है जो उन्नायकी समस्त साहित्य में व इस कृति में सर्वत्र परिलक्षित है। ‘मानव की आशा तुम, कोशिश की भाषा तुम’ (उगना नित) ‘छँट गए हैं फूट के बादल, पतंगें एकता की उड़ाओ”(-आओ भी सूरज)।
पुरुषार्थ युक्त मानव, शौर्य के प्रतीक सूर्य की भाँति प्रत्येक स्थित में सम रहता है। ‘उग रहे या ढल रहे तुम, कांत प्रतिपल रहे सूरज’ तथा ‘आस का दीपक जला हम, पूजते हैं उठ सवेरे, पालते या पल रहे तुम ‘(-उग रहे या ढल रहे ) से प्रकृति के पोषण-चक्र, देव-मनुज नाते का कवि हमें ज्ञान कराता है | शिक्षा की महत्ता ‘सूरज बबुआ’ में, संपाती व हनुमान की पौराणिक कथाओं के संज्ञान से इतिहास की भूलों को सुधारकर लगातार उद्योग व हार न मानने की प्रेरणा दी गई है ‘छुएँ सूरज’ रचना में। शीर्षक रचना ‘काल है संक्रांति का’ प्रयाण गीत है, ‘काल है संक्रांति का, तुम मत थको सूरज’ सूर्य व्यंजनात्मक भाव में मानवता के पौरुष का, ज्ञान का व प्रगति का प्रतीक है जिसमें 'चरैवेति-चरैवेति' का संदेश निहित है। यह सूर्य स्वयं कवि भी हो सकता है।“
युवा पीढ़ी को स्व-संस्कृति का ज्ञान नहीं है, कवि व्यथित हो स्पष्टोक्ति में कह उठता है:
‘जड़ गँवा जड़ युवा पीढ़ी, काटती है झाड़, प्रथा की चूनर न भाती, फेंकती है फाड़ /
स्वभाषा को भूल इंग्लिश से लड़ाती लाड़।’
 
यदि हम शुभ चाहते हैं तो सभी जीवों पर दया करें एवं सामाजिक एकता व परमार्थ भाव अपनाएँ। कवि व्यंजनात्मक भाव में कहता है: ‘शहद चाहें, पाल माखी |’ (उठो पाखी )| देश में भिन्न-भिन्न नीतियों की राजनीति पर भी कवि स्पष्ट रूप से तंज करता है: ’धारा ३७० बनी रहेगी क्या’/ काशी मथुरा अवध विवाद मिटेंगे क्या’? ‘ओबामा आते’ में आज के राजनीतिक-व्यवहार पर प्रहार है | 
अंतरिक्ष में तो मानव जा रहा है परंतु क्या वह पृथ्वी की समस्याओं का समाधान कर पाया है? यह प्रश्न उठाते हुए सलिल जी कहते हैं..’मंगल छू / भू के मंगल का क्या होगा?’ ’पंजाबी  गीत ‘सुंदरिये मुंदरिये ’ तथा बुंदेली लोकगीत ‘मिलती कायं नें’ में कवि के समन्वयता भाव की ही अभिव्यक्ति है।
प्रकृति, पर्यावरण, नदी-प्रदूषण, मानव आचरण से चिंतित कवि कह उठता है:
‘कर पूजा पाखण्ड हम / कचरा देते डाल । मैली होकर माँ नदी / कैसे हो खुशहाल?’
‘जब लौं आग’ में कवि 'उत्तिष्ठ जागृत' का संदेश देता है कि हमारी अज्ञानता ही हमारे दुखों का कारण है:
‘गोड़-तोड़ हम फसल उगा रए/ लूट रहे व्योपारी। जागो बनो मशाल नहीं तो / घेरे तुमें अँधेरा।
धन व शक्ति के दुरुपयोग एवं वे दुरुपयोग क्यों कर पा रहे हैं, ज्ञानी पुरुषों की अकर्मण्यता के कारण।सलिल जी कहते हैं: -‘रुपया जिसके पास है / उद्धव का संन्यास है / सूर्य ग्रहण खग्रास है |’ (-खासों में ख़ास है )
पेशावर के नरपिशाच, तुम बन्दूक चलाओ तो, मैं लडूँगा आदि रचनाओं में शौर्य के स्वर हैं।छद्म समाजवाद की भी खबर ली गयी है –‘लड़वाकर / मसला सुलझाए समाजवादी’।
पुरखों-पूर्वजों के स्मरण बिना कौन उन्नत हो पाया है? अतः, सभी पूर्व, वर्त्तमान, प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष पुरखों, पितृजनों के एवं उनकी सीख का स्मरण में नवता का एक और पृष्ठ है ‘स्मरण’ रचना में:
‘काया माया छाया धारी / जिन्हें जपें विधि हरि त्रिपुरारी’
‘कलम थमाकर कर में बोले / धन यश नहीं सृजन तव पथ हो।’ क्योंकि यश व पुरस्कार की आकांक्षा श्रेष्ठ सृजन से वंचित रखती है। नारी-शक्ति का समर्पण का वर्णन करते हुए सलिल जी का कथन है:
‘बनी अग्रजा या अनुजा तुम / तुमने जीवन सरस बनाया ‘ (-समर्पण)।
'मिली दिहाड़ी' रचना में दैनिक वेतन-भोगी की व्यथा उत्कीर्णित है |
‘लेटा हूँ‘ रचना में श्रृंगार की झलक के साथ पुरुष मन की विभिन्न भावनाओं, विकृत इच्छाओं का वर्णन है। इस बहाने झाडूवाली से लेकर धार्मिक स्थल, राजनीति, कलाक्षेत्र, दफ्तर प्रत्येक स्थल पर नारी-शोषण की संभावना का चित्र उकेरा गया है। ‘राम बचाए‘ में जन मानस के व्यवहार की भेड़चाल का वर्णन है: ‘मॉल जारहे माल लुटाने / क्यों न भीड़ से भिन्न हुए हम’| अनियंत्रित विकास की आपदाएँ ‘हाथ में मोबाइल’ में स्पष्ट की गयी हैं।
‘मंजिल आकर’ एवं ‘खुशियों की मछली’ नवगीत के मूल दोष भाव-संप्रेषण की अस्पष्टता के उदाहरण हैं | वहीं आजकल समय बिताने हेतु, कुछ हो रहा है यह दिखाने हेतु, साहित्य एवं हर संस्था में होने वाले विभिन्न विषयों पर सम्मेलनों, वक्तव्यों, गोष्ठियों, चर्चाओं की निरर्थकता पर कटाक्ष है ‘दिशा न दर्शन’ रचना में:  
‘क्यों आये हैं? / क्या करना है? / ज्ञात न पर / चर्चा करना है |’
राजनैतिक गुलामी से मुक्त होने पर भी अभी हम सांस्कृतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं। वह वास्तविक आजादी कब मिलेगी, कृतिकार के अनुसार, इसके लिए मानव बनना अत्यावश्यक है:  
‘सुर न असुर हम आदम यदि बन जायेंगे इंसान, स्वर्ग तभी हो पायेगा धरती पर आबाद।’
सार्वजनिक जीवन व मानव आचरण में सौम्यता, समन्वयता, मध्यम मार्ग की आशा की गई है ताकि अतिरेकता, अति-विकास, अति-भौतिक उन्नति के कारण प्रकृति, व्यक्ति व समाज का व्यबहार घातक न हो जाए:
‘पर्वत गरजे, सागर डोले / टूट न जाएँ दीवारें / दरक न पायें दीवारें।’ 
इस प्रकार कृति का भाव पक्ष सबल है | कला पक्ष की दृष्टि से देखें तो जैसा कवि ने स्वयं कहा है ‘गीत-नवगीत‘ अर्थात सभी गीत ही हैं। कई रचनाएँ तो अगीत-विधा की हैं:‘अगीत-गीत’ हैं। वस्तुतः, इस कृति को ‘गीत-अगीत-नवगीत संग्रह’ कहना चाहिए। सलिल जी काव्य में इन सब छंदों-विभेदों के द्वंद नहीं मानते अपितु एक समन्वयक दृष्टि रखते हैं, जैसा उन्होंने स्वयम कहा है ‘कथन’ रचना में:
‘गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला, शुभ को पहचाने।’
‘छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किन्तु बन आरोह या अवरोह पलता।’
‘विरामों से पंक्तियाँ नव बना / मत कह, छंद हीना / नयी कविता है सिरजनी।’
सलिल जी लक्षण शास्त्री हैं। साहित्य, छंद आदि के प्रत्येक भाव, भाग-विभाग का व्यापक ज्ञान व वर्णन कृति में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न छंदों, मूलतः सनातन छंदों दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा छंद तथा लोकधुनों के आधार पर नवगीत रचना दुष्कर कार्य है। वस्तुतः, ये विशिष्ट नवगीत हैं, प्रायः रचे जाने वाले अस्पष्ट संदेश वाले, तोड़-मरोड़कर लिखे जाने वाले नवगीत नहीं हैं। सोरठा पर आधारित एक गीत देखें:
‘आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता।
करता नहीं ख़याल, नयन कौन सा फड़कता।।’
कृति की भाषा सरल, सुग्राह्य, शुद्ध खड़ी बोली हिंदी है। विषय, स्थान व आवश्यकतानुसार भाव-सम्प्रेषण हेतु देशज व बुंदेली का भी प्रयोग किया गया है: यथा ‘मिलती कायं नें ऊंची वारी/ कुरसी हमकों गुइयाँ।|’ उर्दू के गज़लात्मक गीत का एक उदाहरण देखें:
‘ख़त्म करना अदावत है / बदल देना रवायत है / ज़िंदगी गर नफासत है / दीन-दुनिया सलामत है।’
अधिकाँश रचनाओं में प्रायः उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। वर्णानात्मक व व्यंगात्मक शैली का भी यथास्थान प्रयोग है। कथ्य-शैली मूलतः अभिधात्मक शब्द भाव होते हुए भी अर्थ-व्यंजना युक्त है। एक व्यंजना देखिए: ‘अर्पित शब्द हार उनको / जिनमें मुस्काता रक्षाबंधन।’ एक लक्षणा का भाव देखें:
‘राधा या आराधा सत शिव / उषा सदृश्य कल्पना सुंदर।’
विविध अलंकारों की छटा सर्वत्र विकिरित है: ‘अनहद अक्षय अजर अमर है / अमित अभय अविजित अविनाशी।’ में अनुप्रास का सौंदर्य है।| ‘प्रथा की चूनर न भाती’ व 'उनके पद सरोज में अर्पित / कुमुद कमल सम आखर मनका।’ में उपमा दर्शनीय है। ‘नेता अफसर दुर्योधन, जज वकील धृतराष्ट्र’ में रूपक की छटा है, तो ‘कुमुद कमल सम आखर मनका’ में श्लेष अलंकार है।उपदेशात्मक शैली में रसों की संभावना कम ही रहती है तथापि ओबामा आते, मिलती कायं नें, लेटा हूँ में हास्य व श्रृंगार का प्रयोग है। ‘कलश नहीं आधार बनें हम’ में प्रतीक व ‘आखें रहते भी हैं सूर’ व ‘पौ बारह’ कहावतों के उदाहरण हैं। ‘गोदी चढ़ा उंगलियाँ थामी / दौड़ा गिरा उठाया तत्क्षण ‘ में चित्रमय बिंब-विधान का सौंदर्य दृष्टिगत है। 
पुस्तक आवरण के मोड़-पृष्ठ पर सलिल जी के प्रति विद्वानों की राय एवं आवरण व सज्जाकारों के चित्र, आचार्य राजशेखर की काव्य-मीमांसा का उद्धरण एवं स्वरचित दोहे भी अभिनव प्रयोग हैं। अतः, वस्तुपरक व शिल्प सौंदर्य के समन्वित दृष्टि भाव से ‘काल है संक्रांति का’ एक सफल कृति है। इसके लिए श्री संजीव वर्मा सलिल जी बधाई के पात्र हैं।
लखनऊ, दि.११.१०.२०१६                                                                                                            - डा. श्याम गुप्त
विजय दशमी सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२, चलभाष: ९४१५१५६४६४ ।

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