सोमवार, 30 जुलाई 2018

basant

मुक्तक * श्वास-श्वास आस-आस झूमता बसन्त हो मन्ज़िलों को पग तले चूमता बसन्त हो भू-गगन हुए मगन दिग-दिगन्त देखकर लिए प्रसन्नता अनंत घूमता बसन्त हो * साथ-साथ थाम हाथ ख्वाब में बसन्त हो अँगना में, सड़कों पर, बाग़ में बसन्त हो तन-मन को रँग दे बासंती रंग में विहँस राग में, विराग में, सुहाग में बसन्त हो * अपना हो, सपना हो, नपना बसन्त हो पूजा हो, माला को जपना बसन्त हो मन-मन्दिर, गिरिजा, गुरुद्वारा बसन्त हो जुम्बिश खा अधरों का हँसना बसन्त हो * अक्षर में, शब्दों में, बसता बसन्त हो छंदों में, बन्दों में हँसता बसन्त हो विरहा में नागिन सा डँसता बसन्त हो साजन बन बाँहों में कसता बसन्त हो * मुश्किल से जीतेंगे कहता बसन्त हो किंचित ना रीतेंगे कहता बसन्त हो पत्थर को पिघलाकर मोम सदृश कर देंगे हम न अभी बीतेंगे कहता बसन्त हो * सत्यजित न हारेगा कहता बसन्त है कांता सम पीर मौन सहता बसंत है कैंसर के काँटों को पल में देगा उखाड़ नर्मदा निनादित हो बहता बसन्त है * मन में लड्डू फूटते आया आज बसंत गजल कह रही ले मजा लाया आज बसंत मिली प्रेरणा शाल को बोली तजूं न साथ सलिल साधना कर सतत छाया आज बसंत * वंदना है, प्रार्थना है, अर्चना बसंत है साधना-आराधना है, सर्जना बसंत है कामना है, भावना है, वायदा है, कायदा है मत इसे जुमला कहो उपासना बसंत है *

कोई टिप्पणी नहीं: