सोमवार, 3 सितंबर 2018

bhasha vividha: magahi


मगही भाषा: इतिहास और विकास

‘‘तैत्तिरीय संहिता’’ के निम्न श्लोक से भाषा का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है -
वाग्वै पराच्यव्याकृतवदत। ते इन्द्रमब्रुवमन इमा नो वाच।।
व्याकुर्वति . . . तामिद्रो मध्यतोऽवक्रम्य व्याकरोत।।  ६/४/७
अर्थात पुरा-काल में वाणी अव्याकृत (व्याकरण संबंधी प्रकृति-प्रत्यादि संस्कार से रहित अखण्ड पद रूप) बोली जाती थी। उन्होंने (अपने राजा) इन्द्र से कहा, ‘इस वाणी को हमलोगों के लिए व्याकृत (प्रकृति-प्रत्यादि संस्कार से युक्त) करो।’ . . . इन्द्र ने उस वाणी को मध्य से तोड़कर व्याकृत किया। स्पष्ट है कि आरंभ में वाणी व्याकरणादि नियमों से मुक्त लोकवाणी के रूप में रही होगी। कालांतर में वाणी ने व्याकरण संबंधी नियमों को ग्रहण किया। यही प्राचीन लोकवाणी व्याकरण से संस्कारगत होकर संस्कृत रूप में विकसित हुई। चूँकि व्याकरण आदि नियमों से परिनिष्ठित होकर वाणी संस्कारपूर्ण भाषा रूप (संस्कृत) में सामने आयी, इसलिए उसका यह भाषा-रूप जनसमुदाय से अलग हो गई। अतः हमारे बीच भाषा के दो रूप सामने आये, जो आज भी हैं - 1. व्याकरण के नियमों से बँधी आभिजात्य भाषा अर्थात् पढ़े-लिखे व विद्वानों की भाषा, 2. जन-सामान्य की लोकवाणी।
यह तो सत्य है कि जन-सामान्य की लोकवाणी ही उपयुक्त अवसर पाकर परिनिष्ठित भाषा का रूप ग्रहण करती है। यही स्थिति व्यापक शौर्य-शक्ति सम्पन्न मगध की भाषा ‘मागधी‘ (मगही) के साथ रही। इसने भी कई उत्थान-पतन देखे। कच्चान ने इसे ही ‘मूलभाषा‘ कहकर संबोधित किया है। इसकी गिनती भारोपीय परिवार के भारत-ईरानी वर्ग में आधुनिक भारतीय आर्यभाषा के अन्तर्गत की जाती है। डाॅ0 ग्रियर्सन ने इसे आधुनिक आर्यभाषा की बाहरी उपशाखा के पूर्बी समुदाय में रखकर इसे ‘बिहारी’ कहा है।1 ‘बिहारी’ से तात्पर्य बिहार प्रान्त में बोली जाने वाली भाषा से है। बिहार में मगही, मैथिली, भोजपुरी और अंगिका बोली जाती है और सब का अलग-अलग क्षेत्र है। लेकिन आन्तरिक एकता का तिरस्कार नहीं किया जा सकता। शायद इसी आन्तरिक एकता के कारण इन्हें ‘बिहारी’ कहा गया है। डाॅ0 सुनीति कुमार चटर्जी को यह वैज्ञानिक नहीं लगा और उन्होंने भारतीय आर्यभाषाओं को पाँच वर्गों में विभाजित कर मगही को प्राच्य मागध सम्प्रदाय में रखा।
संस्कृत काल में मागधी (मगही) गाँव की वाणी आर्थात लोकवाणी रही: क्योंकि संस्कृत नाटकों में सामान्य ग्रामीण पात्रों के मुख से मागधी भाषा का प्रयोग मिलता है। प्राचीन काल मंे जिसे ‘मागधी’ कहा गया है, उसे ही आज ‘मगही’ के नाम से जानते हैं। हम जानते हैं कि भाषा का नामाकरण जाति अथवा क्षेत्र के नाम पर होता है। ऋग्वेद में जिसे ‘कीकट’ कहा गया है, अथर्ववेद में उसी को ‘मगध’ के नाम से पुकारा गया है।2  अतः क्षेत्र के नाम पर भाषा के नामाकरण के अनुसार ‘मागधी’ मगध की भाषा थी।3 यह संस्कृत से भिन्न रूप में थी। भगवान बुद्ध ने इसे ही अपने प्रवचन का माध्यम बनाया। बुद्धघोष ने स्थान-स्थान पर ‘मागधी’ शब्द का प्रयोग किया है - ‘‘मागधिकाय सब्बसत्तानं मूलभाषाय,’’ ‘‘सकायनिरुत्तिनाम सम्मासम्मबुद्धेन वुत्तप्पकारो मागध को वोहोरो।’’       विसु0, पृष्ठ 34, समन्त पृष्ठ 308)
पालि का व्याकरण लिखते समय आचार्य मोग्गलान ने कहा है -
सिद्धिमिद्धिगुणं साधु नमस्सित्वा तथागत।
सद्धम्मसङ्ग भासिस्स मागधं सघलक्खणं।’’ - मोग्गलानपच्चिका, पृष्ठ - ३
कच्चान के शब्दों में -
‘‘मागधीकाय बालानं बद्धिया बुद्धसासने।
वक्खं कच्चायनसारं जङधदसकं।।’’ - २२ कारिका
सारिपुत्त संघराज (११५० ई0) ने ‘‘सारत्यदीपिनी’’ नामक विनय अट्ठकथा-टीका के प्रारंभ में लिखा है -
‘‘मागधीकाय भाषाय आरभित्वा पि केनचि।
भासन्तरेहि सम्मिस्सं लिखितं किच्चिदेव च।।’’
संङधविखत थेर (१३०० ई0 के आसपास) ‘बुत्तोदय’ नामक छन्दशास्त्र गं्रथ के मंगलाचरण में कहते हैं -
‘‘पिङलाचारियादीहि  छंद यमुदितं पुरा।
सुद्धमागधिकानं तं न साधेति यथिच्छितं।।
ततो   मागधभासाय  मत्तावण्णविभेदनं।
लक्ष्खलक्खणसंयुत्तं प्रसन्नत्यपदक्कमं।।’’
उपर्युक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मगध की भाषा मागधी उस समय काफी विकसित थी। इसे ही भगवान बुद्ध के प्रवचन का माध्यम बनने का अवसर प्राप्त हुआ। भिक्षु सिद्धार्थ का कहना है कि ‘‘निःसन्देह भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश मगध की टकसाली भाषा में दिये और उसी में शिष्यों ने उन्हें सीखा और उपदेश दिया।’’4 इसी मत का समर्थन पालि भाषा-साहित्य के विद्वान इतिहासकार डाॅ0 भरत सिंह ने भी किया है, ‘‘जिस भाषा में त्रिपिटक लिखा गया है, उसके लिए ‘‘मागधी’’, ‘‘मागध भाषा’’, ‘‘मागधा-निरुक्ति’’, ‘‘मागधिक भाषा’’ जैसे शब्दों का व्यवहार किया गया है, जिसका अर्थ होता है मगध में बोली जाने वाली भाषा।’’5 इस तरह मागधी भगवान बुद्ध के प्रवचन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इसका कारण यह था कि भगवान बुद्ध ने उस परंपरा का विरोध किया था, जिसकी भाषा संस्कृत थी। वे जन-सामान्य को परंपरा के विरोध में खड़ा करना चाहते थे, इसलिए संस्कृत की जगह लोकवाणी मागधी को स्वीकार करना आवश्यक था। इसी मागधी को बाद में ‘पालि’ के नाम से जाना गया। ‘‘मागधी’’ उस समय की सम्पन्न भाषा थी। इसका कारण यह है कि मगध प्रतिष्ठित और प्रतापी राजाओं का केन्द्र रहा। बाद में बौद्ध अनुयायी राजाओं के द्वारा इसे संरक्षण भी मिलता रहा। इससे राज-काज के रूप में मागधी को अपनाया गया। उस समय की प्राप्त मूर्तियाँ और शिलालेख इसके प्रमाण हैं। ‘‘भारत में अब तक ऐतिहासिक काल की जो सबसे पुरानी मूर्तियाँ मिली हैं, वे शैशुनागवंश (727-366 ई0 पू0) के कई राजाओं के हैं, जैसा कि उन पर खुदे नामों से विदत होता है। . . . उक्त शैशुनाग की मूर्तियों में सबसे पुरानी अजातशत्रु की है, जो बुद्ध का तुल्यकालीन था।’’ (रायकृष्ण दास, भारतीय मूर्तिकला, पृष्ठ - 13)। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि मागधी मगध की समुन्नत भाषा के रूप में विकसित थी। यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हो जाता है कि इन मूर्तियों के शिलालेख जिस भाषा में लिखे गये उसी में राज-काज भी होता था। यही कारण है कि भगवान बुद्ध ने अपने प्रवचन के लिए इसी मागधी को अपनाया। भगवान बुद्ध के उपरांत उनके शिष्यों ने मागधी को विकसित किया, लेकिन समय और स्थान के चलते इसके स्वरूप में परिवर्तन होते गये, जिसे भाषा वैज्ञानिक विकास कहा जायगा। इसी परिवर्तन को देखकर कुछ लोगों को इसे मगध की भाषा मानने में भ्रम होता है। वे इसे ‘‘पूर्बी बोली’’ कहकर समूहवाची बना देते हैं, जैसा कि ग्रिर्यसन ने इसी तरह ‘बिहारी’ कहा है। ‘‘इस पालि भाषा को गलती से मगध या दक्षिण बिहार की प्राचीन भाषा मान लिया जाता है ; वैसे यह उज्जैन से मथुरा तक के मध्यदेश के भू भाग की भाषा पर आधारित साहित्यिक भाषा है, वैसे इसे पश्चिमी हिन्दी का एक प्राचीन रूप कहना ही उचित होगा।’’ (भारतीय आर्यभाषा हिन्दी - पृष्ठ - 174-175)। वास्तव में मागधी भाषा (पालि) का व्याकरण इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि मागधी मगध की भाषा रही है।
लेकिन इस तथ्य से इन्कार भी नहीं किया जा सकता है कि मागधी पालि के नाम से विकसित होकर धीरे-धीरे व्याकरणादि नियमों में बँधती गई। कालांतर में जिस रूप में इसका विकास हुआ वह विद्धानों और पढ़े-लिखे लोगों के पास चली गयी। इसने अपने-आप को बौद्ध दर्शन और साहित्य का माध्यम बनाया। बाद में इसका और विकास हुआ। फलतः मगध क्षेत्र के अलावे सुदूर के क्षेत्रों में इसे ‘भाषा’ के रूप में अपनाया गया। इसलिए इसमें स्थानगत विशेषताओं का समावेश हो जाना स्वाभाविक ही है।
दूसरी ओर जन-सामान्य की भाषा गतिशील रही, जिसे हम प्राकृत के रूप में जानते हैं। कालांतर में इसी प्राकृत ने साहित्यिक रूप ग्रहण किया। प्राकृत के अन्य रूपों में मागधी प्राकृत का विशेष स्थान है। यह मागधी प्राकृत मगध की भाषा थी। इसी को सम्राट्र अशोक ने अपनी राजभाषा बना कर सुदूर तक फैलाया। ई0 पू0 चैथी शताब्दी में जब मगध का साम्राज्य चमका तो लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती ने भी मगध में पधार कर इसे संस्कृति और सभ्यता का केन्द्र बना दिया। फिर तो स्थिति बिल्कुल ही बदल गयी। इसमें उत्पन्न बौद्ध, जैन जैसे महान दार्शनिक सम्प्रदाय जो कि सिंधु की ओर फैलते जा रहे थे, और भी सहायक हुए। फलतः मगध सभ्यता का केन्द्र बन गया और अपनी भाषा को सारे भारत में सम्मानित करने में सफल हुआ।6 इसकी पुष्टि डाॅ0 भरत सिंह उपाध्याय ने भी की है, ‘‘मगध साम्राज्य जब अपनी चरम उन्नति पर पहुँचा तो यही मानना उक्ति संगत है कि मगध की भाषा को ही राष्ट्रभाषा होेने का गौरव प्राप्त हुआ।’’7 इससे स्पष्ट होता है कि       मगध की भाषा उस समय अपने विकास की चरम शिखर पर थी। इसी में राज-काज और धार्मिक, साहित्यिक रचनायें हुआ करती थीं। अशोक ने अपने शिलालेख में इसी मागधी प्राकृत का प्रयोग किया है। यद्यपि स्थान विशेष का प्रभाव उन शिलालेखों में मिलता है, फिर भी कहीं-कहीं इसका मूल रूप विद्यमान है। रामगढ़ की पहाडि़यों की गुफाओं और बोधगया आदि के प्रकीर्ण लेखों में ईसा की पहली शताब्दी की मागधी प्राकृत का रूप मिलता है। दूसरी शताब्दी से छठी शताब्दी तक की मागधी प्राकृत का प्राचीनतम रूप ‘अश्वघोष’ में मिलता है।8
प्राकृतों के विकास के साथ इसके व्याकरणादि की रचना होने लगी। इसे भी व्याकरण के नियमों से बाँध दिए जाने के कारण इसका स्वाभाविक विकास रुक गया और उधर जन-सामान्य की भाषा गतिशील रही, जिसका विकास अपभं्रश के रूप में हुआ।
अपभं्रश मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा और आधुनिक भारतीय आर्य भाषा के बीच की कड़ी है। मागधी प्राकृत नाम की तरह मगध की अपभ्रंश को मागधी अपभं्रश कहा गया। विद्वानों ने इसी मागधी अपभं्रश से बिहारी, बांग्ला, उडि़या और असमिया का विकास माना है। बिहारी के अन्तर्गत मगही, मैथिली, भोजपुरी, और अंगिका का नाम लिया जाता है।
चाहे मागधी हो अथवा मागधी प्राकृत या मागधी अपभं्रश, निश्चय ही इसका मूल केन्द्र मगध रहा है। मगध क्षेत्र की भाषा होने के कारण इन नामों के पूर्व ‘‘मागधी’’ स्थानवाची विशेषण जोड़ा गया। इसलिए मागधी का विकास जब दूसरे क्षेत्र (मगध को छोड़कर) में हुआ तो उसकी क्षेत्रीयता से प्रभावित होकर उसका विकास परिवर्तन की दिशा में हुआ। यह कोई नयी बात नहीं है। आज खड़ी बोली हिन्दी और राष्ट्रभाषा हिन्दी के बीच भी यही स्थिति है। गत्यात्मक रूप से विकसित आज की मगही के पूर्व स्वरूप, जो सिद्ध साहित्य में सुरक्षित है, को देखा जा सकता है। यही कारण है कि सिद्ध साहित्य पर दावा करने वाली अन्य भाषाओं की अपेक्षा वर्तमान मगही से उसकी (सिद्ध साहित्य की भाषा) अधिक समानता है।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने मगही भाषा के विकासात्मक इतिहास को निम्न रूप में प्रस्तुत किया है9 -
. अशोक के पूर्व की मागधी - ई0 पू0 ६०० से ३०० तक (अनुपलब्ध)
. अशोक की मागधी       - ई0 पू0 ३०० से २०० तक (सुलभ)
. अशोक के पीछे की मागधी - ई0 पू0 २०० से ई0 सन् २०० तक (दुर्लभ)
. प्राकृत मागधी           - ई0 सन् ५०० तक (सुलभ)
. अपभं्रश मागधी           - ई0 सन् ५०० से ७०० तक (अनुपलब्ध)
. मगही प्राचीन           - ई0 सन् ८०० से १२०० तक (सुलभ)
. मध्यकालीन मगही       - ई0 सन् १२०० से १६०० तक (अनुपलब्ध)
८. आधुनिक मगही         - ई0 सन्   १६०० से . . . (जीवित)
इस तरह यह कहना समीचीन होगा कि मगही भाषा का अतीत अत्यंत ही गौरवमय रहा है। मगध के इतिहास की तरह मगही भाषा अपने समय के थपेड़े खाते-खाते आगे बढ़ती रही है। इसे ही भगवान बुद्ध की प्रवचन-भाषा, बौद्ध साहित्य की भाषा, अशोक के शिलालेख की भाषा और बौद्ध सिद्धों की साहित्यिक भाषा बनने का अवसर मिला। ‘भाषा बहता नीर’ के कारण वत्र्तमान काल की मगही और प्राचीन काल की मगही में जो अंतर मिलता है वह स्वाभाविक है ; फिर भी प्रकृति और प्रवृत्ति पर विचार किया जाय तो भाषा वैज्ञानिक अक्षुण्णता मिल जायगी।
मागधी प्रसूत भाषायें और मगही
नवजागरण काल की चेतना ने लोगों को सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक और भाषायी परंपराओं की तलाश के लिए प्रेरित किया। फिर खण्डहरों, भग्नावशेषों और शिलालेखों की महत्ता समझी गई। यहाँ तक कि लोक साहित्य से लेकर दंतकथाओं और किंवदन्तियों आदि का अन्वेषण होने लगा। ठाकुरबाडि़यों, तहखानों, खानकाहों, राजाओं, जमींदारों आदि में रक्षित दस्तावेजों में अपने प्राचीनतम अस्तित्व और अस्मिता की संभावनायें जागीं और उसकी निरंतर खोज चलती रही। खुदायी से मिले अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों आदि ने उस चेतना को और भी गतिशील बना दिया। पुरातात्त्विक अध्ययन के मार्ग खुले।
अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की खोज मंे लोगों का ध्यान भाषा साहित्य की ओर गया। इसके लिए लोक साहित्य, लोककंठ और अतीतकालीन भाषा साहित्य को समझने-परखने का काम हुआ। देश-विदेश के मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों से सामग्रियाँ खोजी गईं। इस दिशा में हरप्रसाद शास्त्री, सुनीति कुमार चटर्जी, और महापंडित राहुल सांकृत्यायन आदि का नाम विशेष रूप से लिया जायगा। महापंडित राहुल सांकृत्यायन तो ऐसी सामग्रियों को तिब्बत से खच्चर पर लाद कर लाये। ये सामग्रियाँ भाषा साहित्य की परंपरा को निर्धारित करने मंे विशेष महत्व की चीज साबित हुईं।
लेकिन अवशेषों के स्वरूप, सामग्रियों की अल्पता और कहीं-कहीं भावात्मक आग्रहों ने मिलकर जो विचार प्रस्तुत किये, उससे निर्णयात्मक और वैज्ञानिक निष्कर्ष संदेहास्पद होने लगा। तभी तो बहुत दिनों तक विद्यापति का अस्तित्व बंगाल में बना रहा। यह क्षेत्रीय आग्रह का परिणाम था। फिर भी कुछ ऐसे विद्वान चिंतक अवश्य हुए जिनकी तटस्थता प्रामाणिक चिंतन उपस्थित करती रही।
जैसा कि प्रमाणित हो चुका है कि मागधी अथवा मागधी प्राकृत मगध की भाषा थी जिसमें भगवान बुद्ध ने अपना प्रवचन दिया था। कालांतर में इसी मागधी अपभ्रंश में सिद्ध साहित्य की रचना हुई। सिद्ध साहित्य की भाषा के संबंध में वही विवाद ख्ड़ा हुआ, जो कभी विद्यापति के संबंध में हुआ था। यह सही है कि मागधी अपभ्रंश से मैथिली, भोजपुरी, असमिया, उडि़या आदि का विकास हुआ। लेकिन अस्मिता की तलाश में कहीं-कहीं आग्रहों का इतना दबाव रहा कि सिद्ध साहित्य की भाषा विवादास्पद हो गई। मागधी प्रसूत होने के कारण इन भाषाओं की आंतरिक एकता स्वयंसिद्ध है। इसी आन्तरिक एकता के आधार पर लोगों ने एक-दूसरे की अस्मिता को नजरअंदाज कर दिया। यही कारण है कि बहुत दिनों तक विद्यापति बंगला के कवि माने जाते रहे। इतना ही नहीं, महामहिम हरप्रसाद शास्त्री, बी0 एन0 भट्टाचार्य और सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘‘बौद्धगान ओ दूहा’’ की भाषा को पुरानी बंगला कहा। श्रीवरूआ ने इसे पुरानी असमिया कही। श्री प्रहराज और प्रियरंजन सेन ने इसे पुरानी उडि़या और जयकांत मिश्र ने मैथिली कहकर संबोधित किया।10
इसी तरह की बात बिहारी भाषाओं के साथ भी है, जिसमें भोजपुरी की भाषागत विशेषता सबसे अलग है। बात रह गई मगही और मैथिली की, तो इस संबंध में डाॅ0 इकवाल सिंह राकेश ने मैथिली को साहित्य सम्पदा की दृष्टि से अपनी बहनों (मगही, भोजपुरी आदि) में सबसे प्राचीन माना है। लेकिन यह कितना वैज्ञानिक है, जबकि वे स्वयं विद्यापति को मैथिली का प्रथम कवि घोषित करते हैं ; जबकि मगही के प्रथम कवि के रूप मंे सरहप्पा स्वयंसिद्ध हैं।
जहाँ तक मैथिली और मगही के भाषागत अस्तित्व का प्रश्न है तो इस संबंध में डाॅ0 जयकांत मिश्र और प्रो0 श्रीकांत मिश्र ने मगही को मैथिली की उपबोली घोषित किया है। ‘‘मगही नाम की एक उपभाषा प्राचीन मगध साम्राज्य के केन्द्र में बोली जाती रही है।.. . . बहुत भेद रहते हुए भी मैथिली के साथ इसके अन्यतम साम्य और आधुनिक काल में इसके कोई अपने स्वतंत्र अस्तित्व के अभाव को देखकर यही उचित मालूम होता है कि मगही भाषी लोगों को हिन्दी प्रान्त (भोजपुरी) के साथ मिलाने की अपेक्षा मैथिली भाषा प्रान्त के संग मिलाने में अधिक सुविधा होगी।’’11 अपनी इस बात की पुष्टि के लिए उन्होंने ग्रियर्सन के इस तथ्य का सहारा लिया है कि ‘‘मगही को एक स्वतंत्र बोली मानने की अपेक्षा आसानी से मैथिली की उपबोली के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।12 सुभद्रा झा ने भी यही माना है।13
ऐसा लगता है, मानो जिस तरह मगध पर बार-बार आक्रमण होते रहे उसी तरह इसके भाषायी अस्तित्व के ऊपर भी आक्रमण की परंपरा बनी रही। ऐसे लोगों के पास या तो सामग्रियों का अभाव रहा अथवा वे मगध की राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक व भाषायी इतिहास की पृष्ठभूमि की जानकारी से अनभिज्ञ रहे। स्पष्ट हो चुका है कि बिहार की अन्य भाषायें मागधी प्रसूत हैं, मगही मागधी प्रसूत नहीं, मागधी-विकसित है। दूसरी बात यह कि   मागधी भाषा क्षेत्र मगध का गौरवमय इतिहास रहा है। मिथिला से अलग इसकी सांस्कृतिक परंपराएँ रही हैं। तीसरी बात यह कि मिथिला बहुत दिनों तक मगध के अधीन रहा है। ज्ञात हो कि विजयी की भाषा विजीत पर लागू होती है न कि विजीत की विजयी पर। इन सब के अतिरिक्त मिथिला और मगध के बीच गंगा जैसी भाषा विभाजक नदी बहती है। स्पष्ट है कि मगध का गौरवपूर्ण अतीत, विपुल लोक साहित्य और परिनिष्ठित साहित्य तथा प्राचीन काल से इस क्षेत्र में राजधानी की परंपरा के बावजूद मगही भाषा के अस्तित्व पर प्रश्न लगाया जाय, तो बात एकदम हास्यास्पद हो जायगी।
अगर आन्तरिक एकता को लेकर मगही को मैथिली की उपबोली कही जाती है, तो मैथिली को पहले बंगला से हिसाब करना होगा। बिहारी भाषाओं के व्याकरण रूपों की समानता न केवल मगही और मैथिली के बीच है अपितु भोजपुरी के बीच भी विद्यमान है। ऐसा प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डाॅ0 उदयनारायण तिवारी ने स्पष्ट किया है।14
इस समस्या पर अपना तटस्थ निर्णय देते हुए महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा कि ‘‘ब्रजभाषा को कोई गुजराती बनाने की कोशिश नहीं करता, फिर मगही और मैथिली के बारे में ऐसा क्यों ?. . . मगही, मैथिली, उडि़या और आसामी को खड़ी करने पर सर्वप्रथम किसे स्थान मिलना चाहिए ? मगही को ही न।’’15 स्वयं जयकांत मिश्र ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि डंहीप पे पद ं ूंल जीम उवेज कपतमबज तमउेदज व िजीम ंदबपमदज डंहीकीप च्तंातपजण्16
इस तरह मागधी प्रसूत भाषायें और उसके अस्तित्व की तलाश निरंतर जारी है। बिहार की प्रमुख भाषाओं में मगही को मागधी से प्रसूत होने का नहीं, मागधी से विकसित होने का गौरव प्राप्त हुआ है। यह सत्य है कि इसमें विद्यापति और भिखारी ठाकुर नहीं हुए, फिर भी मगही के पास अपना इतिहास है, सिद्ध साहित्य रूपी धरोहर, समृद्ध भक्ति साहित्य और नवजागरणपूर्ण वर्तमान है। वर्तमान में मगही साहित्य की विपुलता, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, मगही अकादमी, आकाशवाणी केन्द्र, पटना से स्वतंत्र प्रसारण और इंटरमीडिएट, स्नातक व स्नातकोत्तर तक शिक्षण संस्थानों में पठन-पाठन की व्यवस्था आदि इसके स्वतंत्र अस्तित्व की जागृत पहचान हैं।



राष्ट्रभाषा हिंदी और मगही



राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ मगही की जितनी समानता है उतनी बिहार की अन्य भाषाओं के साथ नहीं है। यों तो बिहारी भाषाओं के बीच आंतरिक एकता है, फिर भी इन भाषाओं की कुछ अपनी विशेषतायें हैं, जो एक-दूसरे से अलग करती हैं। मगही की प्रकृति कुछ ऐसी है जिसके आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि बिहार की अन्य भाषाओं की अपेक्षा इसका सीधा संबंध राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ हो जाता है। हम जानते हैं कि भाषाओं की सहायक क्रियायें बहुत दूर तक उसकी प्रकृति को निर्देशित और निर्धारित करती हैं। मगही की वत्र्तमानकालिक सहायक क्रिया ‘हइ’ है, जो हिन्दी के ‘है’ से समता रखती है। बिहार की अन्य भाषाओं में भोजपुरी में इसके लिए ‘बा, बाड़न, बाटे, बानी या बानू’ का प्रयोग होता है। मैथिली में ‘अछि, छी, छै’ का प्रयोग होता है। इसी तरह आप के लिए भोजपुरी में ‘राउर’ का प्रयोग होता है लेकिन मगही में ‘आप’, अपने’ का। यथा-
 हिंदी मगही भोजपुरी
आपका क्या नाम है ?   अपने के की नाम हइ ?  रउआ/राउर के का नाम बा ?
राष्ट्रभाषा हिन्दी का ‘तू’ मगही में ज्यों का त्यों (कहीं-कहीं अनुनासिकता के कारण ‘तूँ’ ) रह जाता है। इसी तरह ‘तुम’ के लिए मगही में ‘तों’ और ‘तुम्हारा’ के लिए ‘तोर’ तोहर,’ और ‘तेरा’ के लिए ‘तोरा’ का प्रयोग होात है, जबकि बिहार की अन्य भाषाओं में ऐसा नहीं होता है। मगही का वाक्य विन्यास राष्ट्रभाषा हिन्दी के समान है।
ध्वनि परिवर्तन
 (क) मगही में ‘र’ ध्वनि है, फिर भी राष्ट्रभाषा हिन्दी के बहुत से ऐसे शब्द हैं जिनका ‘र’ झ ‘ल’ में बदल ताजा है। जैसे -
हिन्दी मगही हिंदी  मगही
फलना फरना जलना जरना
ढालना ढारना गाली गारी
साला सारा साली सारी
ससुराल ससुरार कलेजा करेजा
हल हर फाल फार
कुदाल कुदार कुदाली कुदारी
काली कारी उजला उजरा  आदि
(ख)  मगही में ‘श’, ‘ष’ के सथान पर स‘ प्रवृत्ति है, लेकिन साहित्यिक प्रयोग ध्वनिगत आवश्यकता व मगही की प्रकृति के अनुरूप होता है। जैसे -
हिन्दी मगही हिन्दी  मगही
शिव सिव आशा आसा
आकाश आकास भाषा भासा
अभिलाषा अभिलासा निराशा निरासा
(ग) कहीं-कहीं ‘ष’ ‘ख’ या ‘स’ में बदल जाता है। जैसे -  विष झ विख, दोष झ दोख/दोस, धनुष झ धनुख/धनुस
(घ) मगही में ‘ण’ का ‘न’ हो जाता है। जैसे कारण झ कारन, प्राण झ परान, व्याकरण  वेयाकरन
(च) मगही में ‘ऋ’ का रि’, ‘त्र’ का ‘त्त/र’, ‘ज्ञ’ का ‘ग्य’/गे’ हो जाता है। - जैसे
ऋषी झ रिसि, पत्र झ पत्तर/पत्ता, ज्ञान झ गेयान/ग्यान, ज्ञानवान झ गेयानमान/ग्यानमान
(छ) उपसर्गों में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता है, लेकिन प्रत्यय में परिवर्तन संभव है। धातु में लगनेवाला ‘ना’ प्रत्यय का ‘नइ’ हो जाता है। जैसे - पढ़ना झ पढ़नइ, लिखना झ लिखनइ, जाना  झ जनइ, खाना झ खनइ, बैठना झ बइठनइ, गाना झ गनइ, उठना झ उठनइ, सोना झ सोनइ, चलना  झ चलनइ आदि।
(ज) ‘वान’ प्रत्यय ‘मान’ में बदल जाता है। जैसे - गाड़ीवान झ गाड़ीमान, कोचवान झ कोचमान, विद्वान  झ विदमान आदि।
(झ) ‘आई प्रत्यय ‘आय’ में बदल जाता है। जैसे - पढ़ाई झ पढ़ाय, लिखाई झ लिखाय, मिठाई झ  मिठाय, लड़ाई झ लड़ाय, बड़ाइ झ बड़ाइ, जमाई झ जमाय आदि।
(ट) भूतकालिक (पूर्ण) प्रत्यय ‘आ’ अथवा प्रत्यय के लिए मगही में ‘लक’ का प्रयोग होता है। जैसे-
प्रत्यय धातु शब्द
पढ़ पढ़ा झ पढ़लक
लिख लिखा झ लिखलक
या सो सोया झ सोलक/सुतलक
(ठ) भाववाचक ‘इमा’ प्रत्यय का मगही में ‘इया’ हो जाता है। जैसे - मधुरिमा झ मधुरिया, कालिमा  झ करिया
(ड) ‘वाला’ प्रत्यय ‘हार, हरबा, हारा’ और ‘अइया’ में बदल जाता है। जैसे - देखनेवाला झ  देखनहार, देखनहारा, देखबइया, पढ़नेवाला झ पढ़निहार, पढ़बइया, करनेवाला झ करनिहार, करबइया,
इसी तरह ‘वाला’ कहीं-कहीं ‘वला या ओला रूप में भी मिलता है। जैसे - जानेवाला झ  जायवला/जायओला/जवइया, आनेवाला
झ आवइवला/आवइओला/अवइया आदि।सामान्यतः हर भाषा के वाक्य में क्रिया की संरचना या तो कर्ता से निर्धारित होती है या
कर्म से। जैसे राम रोटी खाता है। राम ने रोटी खायी। यहाँ पर पहले वाक्य मंे क्रिया की संरचना कर्ता ‘राम’ के अनुसार है और
दूसरे वाक्य में कर्म ‘रोटी’ के अनुसार है। लेकिन मगही मंे एक और ही रूप मिलता है। जैसे राम रोटी खैलको। इस क्रिया की
संरचना नहीं तो कर्ता के अनुसार है और कर्म के अनुसार भी नहीं है। इस क्रिया की संरचना उसके अनुसार है जिससे कहा जा रहा
है। लेकिन जिससे कहा जा रहा है वह तो वाक्य में है ही नहीं। यह मगही की अपनी खासियत है।
मगही की शब्द संपदा
भाषा की प्रकृति उसके शब्द विन्यास और शब्द संपदा से दिखाई पड़ती है। भाषा-विशेष के शब्द उसकी कोमलता अथवा परुषता के परिचायक होते हैं। भाषा की प्रकृति का निर्धारण इससे भी होता है कि जब किसी अन्य भाषाओं के शब्द उस भाषा में आते हैं तब उसके परिवर्तन की दिशा किस रूप में होती है। ज्ञात हो कि एक भाषा के शब्द जब दूसरी भाषा में आते हैं तो उसमें ध्वनि परिवर्तन होता है। मगही की भी अपनी शब्द संपदा है। मगही की शब्द-रचना अथवा शब्द संपदा को देखा जाय तो यह स्पष्ट हो जायगा कि कोमलता मगही की अपनी प्रकृति है। यहाँ मगही के कुछ शब्दों को प्रस्तुत किया जा रहा है -
मगही शब्द - अन्नस, अउंखा, उदवास, उरेहल, उखी-विखी, सुरता, सेराल, सवासिन, सिझल, भुरकुस, सपरनइ, डगरिन, छुच्छुम, चसका, चोख, सितुआ, टहपर इंजोरिया, घुप्प अन्हरिया, बदरकट्टू, माँड़र, पनछोछर, परसौत, परसन, पलानी, पोहपित, फरहर, बउसाव, बापुत, बित्ता, बेगार, बोहनी, बीहन, बिहान, भदराह, भरता, भदेस, भनसार, भुरकुस, भूर, मटकोर, मसकल, मसुआल, मिंझाल, मुआर, रउद, साइत, सितुआ, सिलपट, हकासल, हुज्जत, हिलोर, हिलकोर, हिंड़ल, हिगराल, हेहर, हौ/हव, हौआल/हवआल इत्यादि।
शब्द-युगल - मगही में शब्द-युगल की प्रवृत्ति मिलती है। इसके अन्तर्गत दो शब्दों का मेल होता है। कभी एक ही शब्द की पुनरुक्ति से, कभी विपरीतार्थक शब्दों के मेल से और कभी सार्थक शब्दों के साथ निरर्थक शब्द लगाकर शब्द-युगल बनाया जाता है। जैसे -
पुनरुक्ति - घुमा-घुमा, पीछु-पीछु, हाली-हाली, लुरेठ-लुरेठ, सले-सले, बेर-बेर, हउले-हउले, पातर-पातर, गुजुर-गुजुर, सुनते-सुनते,
गइते-गइते, खइते-खइते, पीते-पीते, साँय-साँय, कभियो-कभियो इत्यादि।
समान अर्थवाले भिन्न शब्द-युगल - राँड़-बेवा, जोर-पगहा, खम्हा-खुट्टा, चीरल-फारल, हल्ला-गदाल, गरदा- धूरी, झंडा-पताखा,
कूड़ा-कचरा, डोल-बालटी, रगड़इत-मंइजइत, पियासल-तरासल, घिस्सल-पिस्सल, जउर-पगहा इत्यादि।
विपरीतार्थक शब्द-युगल - आगू-पाछू, ऊपर-नीचे, अनइ-जनइ, देखा-सुनी, कउर-घोंट, अँगना-ओसरा, एन्ने-ओन्ने, आवा-जाही,
आल-गेल, साँझ-बिहान, दिन-दोपहरिया रात-अधरतिया इत्यादि।
निरर्थक शब्दों से युगलबंदी - नामी-गिरामी, चिरइं-चिरगुन, बचल-खुचल, तनी-मनी, लेटल-पोटल, चोरी-चमारी, पान-पतउरा,
अन्हार-पन्हार, चोर-चिल्लर, मइल-कुचइल, जुआन-जहान, गरदा-गुवार, लगुआ-भगुआ इत्यादि।
युगल शब्दों से शब्द विन्यास - उक्खि-विक्खि, साथी-संगी, सोंटल-सिलोर, सिक्खा-बुद्धि, दिक्कत-सिक्कत, अहल-बहल, मिलल
-जुलल, कुली-कलाला, कउर-घोंट, लुत्ती-पुत्ती, गोल-गंटा, रोजी-रोटी, चुक्को-मुक्को इत्यादि।
इस तरह मगही बिहार की अन्य भाषाओं के साथ भिन्नत्व का निर्धारण करती है। इसकी प्रकृति और प्रवृति में कुछ ऐसी
विशेषतायें हैं जिनसे यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ समानता स्थापित करते हुए बिहार की अन्य भाषाओं से अपना अलग स्वरूप
ग्रहण करती है।
 
१. लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडिया,  पृष्ठ - १२०
२. अथर्ववेद संहिता, का0 ५. सूत्र २२
३. हिन्दी भाषा का उद्भव और विकास, उदयनारायण तिवारी
४. बुद्धिस्टिक स्टडीज,  डाॅ0 लाहा द्वारा संपादित, पृष्ठ - ६४९
५. पालि साहित्य का इतिहास, पृष्ठ - १०
६. पुरातत्व निबंधावली, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ - १८६
७. पालि साहित्य का इतिहास - पृष्ठ - ११४
८. संस्कृत और संस्कृति, पृष्ठ - डाॅ राजेन्द्र प्रसाद,
९. गंगा पुरातत्वांक, जनवरी, १९३३
१०. मगही भाषा साहित्यिक निबंधावली, रासबिहारी पाण्डेय, पृष्ठ - २८
११. मैथिली साहित्य का इतिहास, (,डाॅ0 सम्पति आर्याणी की पुस्तक ‘मगही व्याकरण कोश’ पृष्ठ - १४ से उद्धृत)
१२. लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडिया, भाग दो, पृष्ठ - ३
१३. द फारमेशन आॅफ मैथिली लिट्रेचर, भूमिका
१४. ‘भोजपुरी भाषा साहित्य’ में  ‘बिहारी बोलियों की आन्तरिक एकता’ शीर्षक निबंध से।
१५. गंगा पुरातत्वांक, जनवरी १९३३
१६. ए हिस्ट्री आॅफ मैथिली लिट्रेचर, भाग १, पृष्ठ - ५८

कोई टिप्पणी नहीं: